भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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करोधजोकश्रमङ्कतः अरीरोष्मा शिरोगतः ।

पित्तं च केशान्‌ पचति पलितं तेन जायते ॥२७॥

२८ पल्ति- क्रोध, शोक ओर परिभम के कारण शरीर कौ

ग्रमी शिर में परहुचकर वहाँ पर पित्त के खाय मिलकर गाल

को पकाती ई | इसख्यि "पठितः (खमय से पूवे वालों का श्वेत

होना) रोग होता है ॥२३७॥ दाहञ्वररुजावन्तस्ताम्राः स्फोटाः सपीतकाः ।

गात्रेषु वदने चान्तर्विज्ञयास्ता मसूरिकाः ॥२८

२६ मसूरिका-इस रोग मेँ शरीर मँ तथा सुख के अन्दर

दाह-ज्वर उत्पन्न करनेवाषे, पीड़ाकारक-ताम्‌ वणे के तथा पीले

छाठे उत्यन्न होते द ॥२८॥।

जाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतओोणितेः । जायन्ते पिडा यूनां वक्त्रे या सुखदूषिकाः ॥३९॥ ३० मुखदूषिका-(.५€)}--योवन पिडका सिम्बल के

कयो के समान-छोी छोटी पिड़कायें युवा पुरुषों के मुख पर

कफ, वायु, रक्त के प्रकोप से उयन्न हो जाती है, इनसे चेहरे

का सौन्दयं न्ट हो जाता है ॥२६॥

कण्टकेराचितं वृत्तं कण्डमत्‌ पाण्डुमण्डलम्‌ ।

पद्‌ मिनीकण्टकप्रख्येस्तदाख्यं कफवातजम्‌ ।।४०॥

३१ पद्चिनीकण्टक-पद्चिनी के. करयं के समान काटो से

भरा गोलाकार, कण्डू-युक्त) पाण्ड्वणं मण्डल को 'पद्विनीकण्टकः

कहते हैँ, यह रोग कफ़व।तंजन्य ह ।[४०॥

नीरुजं समसुत्सन्नं मण्डर कफरक्तजम्‌ ।

सहजं रक्तमीषच्च इख्दणं जतुमणि विदुः ॥४१॥

३२ जतुमणि- जन्म से ही उत्पन्न, व्रिना वेदना के

मण्डल को जतुमणिः कहते ह । यह्‌ थोड़ा लाल, श्कद्ण (कक￾ता रहित) तया कफरक्नन्य होता ह ॥४१॥

अवेदनं स्थिरं चैव यस्य गात्रेषु दश्यते ।

माषवक्छृष्णमुत्सन्नमनिखान्मषकं वदेत्‌ ॥४२॥

३३ मषक ( (०165 ) वेदना रहित, स्थिर, उड़द के समान, काले तिक शरीर भ जो उलन्न हो जाते ह, उनको

मषकः कहते है ४२ |

कृष्णानि तिरमात्राणि नीरुजानि समानि च । ` वातपित्तकफोच्छोषात्तान्‌ विदयात्तिखकारकान्‌ ४३ २४ तिखकाल्क-ङृष्णवण, तिक के समान __ भम वकासकडधानृण, ति के समान बे, वड़े, वेदनां वना

१- इसमे रक्त कां मिश्रण रहता हे 1 यथा- “पिततं शोणितसु्टं यदा दूषयति तचम्‌ । तदा करोति पिडकाः सवेगावेषु देहिनः ॥ मसूरमुद्गमाषाणां तुल्या कोलोपमा इति ।

मसूरिका तु वरिज्ञेया पिडका रक्तपित्तज र प ;1 |» १ ‹ - =

ुश्रतसंिता

र _. अल्पीयःखां यदा हषौद्राखौ गच्छेत्‌ लियं नरः ॥५०॥.

,__ मसेनास्पीडनादराऽपि शलवग शतत

| अ० 4 रहित खचा के बरावर होते हं । वायु-पित्त से कफः की ध |

होने के कारण उन्न होते हे * ॥४३॥ च| मण्डलं महदल्पं वा श्यामं वा यदि वा सितम्‌। सष्टजं नीरुजं गात्रे न्यच्छमिर्यमभिधीयते ।४४।॥ ३५ न्यच्छ--यदि जन्मकाल से ही शरीर पर वेदना रहित ।

महान्‌ या हस्व, श्वेत या काला मण्डल हो, तो इसको न्यचछ

कते हं ॥४४॥ ६ सयुत्थाननिदानाभ्यां चमंकोढं प्रकीतितम्‌ ।

३६ चम॑कील--खमुत्थान (सम्ध्रासि) ओर निदान से चम॑.

कीलो को अशं निदान मे कहं दिया दै, (पू्वांचार्यो ने इनको ुद्ररोग में पढ़ा दै) |

क्रोधायासप्रककपितो वायुः पित्तेन संयुतः ॥४५॥

सहसा मुखमागत्य मण्डं विसृजस्यतः ।

नीरजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्ग तमादिशेत्‌ ॥४६॥

३७ व्यङ्ग क्रोध या परिश्रम (जन्मा आदि) से प्रकुपित

वायु पित्त के साथ मिलकर सहसा मुख मे आकर वेदना रहित

सूम, श्याभवणं मण्डल को उन्न करती दै । इसको ध्यं कहते हैँ ॥|४५,४६।।

कृष्णमेवं गुणं गात्रे मुखे वा नीच्किां विदुः|

नीलिका--उपयुंक्त व्यङ्घ के समानद्ीजो कठेरङ्ग काः

मण्डल शरीर पर या मुख पर होता दै उसे नीलिका कते है ।

मदंनात्‌ पीडनाच्चाति तथैवाप्यभिघाततः।

मेढ चमं यदा वायुभंजते सवंतश्चरः॥४७॥। तदा वातोपसष्ठं तु चमं प्रतिनिवतते ।

मणेरधस्तात्‌ कोगश्च ्रन्थिरूपेण छम्बते ॥४८॥।

सवेदनः सदाहश्च पाकं च व्रजति कचित्‌ ।

मारुतागन्तुसंभूतां विदात्तां परिवर्तिकाम्‌ ॥४९॥

सकण्डः कठिना चापि सेव शेष्मसमुत्थिता ।

३८ परिव्सिका-( 2272 {21718815 ) जिस स्मरथ

सवत्र फिरनेवाला व्यान वायु शिश्न के मल्ने से दवनेसे

अथवा शिश्न पर चोट लगने से शिश्न की त्वचा मे आ जाता

है, उख समय वायु से व्याप्त चमं पीडे की ओर खोट जात्‌ दै, (मणि नग्न हो जाती है)। मणिके नीचे (पी,

चमंको गांठ के समान क्टकने ठगतां हे । इसमे वेदना ओर

जलन होती दै, कभी यह पक मी जातौ है | यहं रोगं वायुजन्

है । यदि इसमे कण्ट ओर काठिन्य हो तो इय परवति रोग को कफजन्य समन्नना चाहिये ॥४७-४६॥

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हस्ताभिघातादथवां चमेण्युद्रतिते बखात्‌।

१-फेचित्‌-“बातपित्चासुगुच्छोषात्‌”” यह पाठ पृते ६ ।