सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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यस्यावपाद्यते चर्मं तां विद्यादवपाटिकाम् ।
३६ अवपाटिका—अल्पयोनिद्वारवाली—सोलह वर्ष की आयु से कम ली के साथ अतिहर्ष (उत्तेजनावस्था) से जब पुरुष सम्भोग करता है, अथवा हाथ के अभिघात से (हस्त-मैथुन से) बलाकार चर्म उत्तान होकर लौट जाता है। अथवा जिस पुरुष का चर्म (शिरन की त्वचा) मर्दन से, दवाने से अथवा युक्त के उपस्थित वेग को रोकने से फट जाता है, उसको 'अवपाटिका' रोग कहते हैं ॥१५०,५१॥
वातोपसृष्टमेवं तु चर्मं संश्रयते मणिम् ॥१५२॥
मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रछोतो रुणद्धि च ।
निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मन्दधारमवेदनम् ॥१५३॥
मूत्रं प्रवर्तते जन्तोर्मणिर्न च विदीर्यते ।
निरुद्धप्रकशं विद्यादुरुद्धां चावपाटिकाम् ॥१५४॥
४० निरुद्धप्रकश—(Phymasis)—मर्दन पीडन या अभिघात के कारण ध्यान वायु कुपित होकर शिरन चर्म के साथ मिलकर मणि का सम्पूर्ण रूप में आश्रय कर लेती है, उस समय शिरन चर्म मणि के साथ चिपट जाता है (पीछे नहीं सरकाता)। इससे मूत्रछोत रुक जाता है। मूत्रछिद्र के तंग हो जाने से मूत्र की धारा मन्द एवं थोड़ी वेदना युक्त रहती है। इस रोग में मणि को कोई नुकसान नहीं होता। इस रोग को निरुद्धप्रकश कहते हैं। उरुद्धा (अनुचित रूप से रोहित) अवपाटिका भी 'निरुद्धप्रकश' कहाती है ॥१५२-१५४॥
वेगसंधारणाद्धायुर्विहतो गुदमाश्रितः ।
निरुणद्धि महत्स्रोतः सूदमद्वारं करोति च ॥१५५॥
मागस्य सौक्ष्म्यात् कृच्छ्रेण पुरोषं तस्य गच्छति ।
सन्निरुद्धगुदं व्याधिमेनं विद्यात् सुदुस्तरम् ॥१५६॥
४१ सन्निरुद्धगुद—मल के उपस्थित वेग को रोकने से गुदा में आश्रित वायु कुपित होकर मार्ग को रोककर महान् स्रोत को सूक्ष्म द्वार बना देती है। मार्ग के सूक्ष्म होने के कारण मल कठिनाई से बाहर आता है। इस रोग को 'सन्निरुद्धगुद' कहते हैं। यह रोग कष्टसाध्य है।
वि० मन्तव्य—जैसे उल्लिखित निरुद्धप्रकश में मूत्र का मार्ग छोटा-तङ्ग होता है वैसे ही पुरोष का मार्ग तङ्ग हो जाता है ॥१५५,१५६॥
शक्नुमूत्रसमायुक्तेऽघोतेऽपाने शिशोर्भवेत् ।
स्विन्नस्यास्ताप्यमानस्य कण्डू रक्तकफोद्भव ॥१५७॥
कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते ।
पकीभूतं व्रणेघोरं तं विद्यादहिपूतनम् ॥१५८॥
१—वास्तव्यायन कामसूत्र में लिखा है कि—न प्रसह्य किंचिदावरेत् । इसकी व्याख्या में जयमङ्गल ने लिखा है कि जबदेस्ती करने से अवपाटिका रोग उत्पन्न होता है ।
४२ अहिपूतन—मल मूत्र से युक्त अपान (गुदा) के साफ न करने पर तथा स्वेद होने पर भी स्नान न कराने से शिशु में—रक्त एवं कफजन्म कण्डू उत्पन्न होती है। कण्डू के करने से शीघ्र छोले उत्पन्न हो जाते हैं। इन छोलों से खाव बहता है। गुदा व्रणों के साथ मिलकर एक हो जाने पर यह रोग भयानक है। इसको अहिपूतन कहते हैं ॥१५७,१५८॥
स्नानोऽसादनहीनस्य मल्लो वृषणसंश्रितः ।
यदा प्रकिल्लद्यते स्वेदात् कण्डू संजनयेत्तदा ॥१५९॥
तत्र कण्डूयनात् क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते ।
प्राहुर्वृषणकच्छू तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ॥१६०॥
४३ वृषणकच्छू—स्नान एवं उत्सादन (उवटन) न लगानेवाले पुरुष में मल अण्डकोषों में एकत्रित होकर पसीने के कारण जब आर्द्र होता है, तब कण्डू उत्पन्न करता है। कण्डू करने पर शीघ्र खावयुक्त स्फोट (छोले) पैदा हो जाते हैं। इसको 'वृषणकच्छू' कहते हैं—यह रोग कफ रक्त के प्रकोप से उत्पन्न होता है ॥१५९,१६०॥
प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः ।
रूक्षदुर्बलदेहस्य तं गुदंभ्रंशमादिशेत् ॥१६१॥
४४ गुदभ्रंश—(Prolapsuani)—प्रवाहण (अतिशय कांखना) एवं अतिसार के कारण रूक्ष एवं निर्वल शरीरवाले पुरुष की गुदवलियां बाहर आ जाती हैं। इस रोग को गुदभ्रंश कहते हैं ॥१६१॥
इति सुश्रुसंहितायां निदानस्थाने क्षुद्ररोगनिदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
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चतुर्दशोऽध्यायः
अथातः शूकदोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
क्षुद्रत्व धर्म की समानता से क्षुद्ररोग के पीछे शूक दोष निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
१ शूक—जलशूक (घोषा) है, इसकी सहायता से लिंग को बढ़ानेवाले योग बनाये जाते हैं। यथा—
'भल्लातकास्थिजलशूकमथान्मपत्र— मन्तःविवाह्यमतिमान् सह सन्धवेत् । एतद्विरुद्धवृतीफलतोयपिष्ट— मालेपनं महिषविद्विमलीकृतेऽङ्ग ॥ स्थूलंमहततरमनुज्जमनुल्यमाशु— घोफःकरोत्यभिनवं तद्वि संशयोऽस्ति ।