सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
लिङ्गवृद्धिभिच्छतामकमप्रवृत्तानां शूकदोषनिमित्ता दश चाष्टौ च व्याधयो जायन्ते। तद्यथा—सर्पपिका; अष्टौलिका, प्रथितं, कुम्भिका, अलजी, मृदितं, संमूढ-पिडका, अवमन्य, पुष्करिका, स्पर्शहानिः, उत्तमा, शत-पोतकः, त्वक्पाकः, शोणितावृदं, मांसावृदं, मांसपाकः, विद्रधिः, तिलकालकश्चेति ॥ ३ ॥
लिङ्गवृद्धि (आयाम और परिणाह रूप में) की चाह करने-वाले एवं शालोक क्रम का अनुसरण न करनेवाले पुरुषों में अठारह प्रकार के शूकदोषजन्य रोग होते हैं। यथा—सर्पपिका अष्टौलिका, प्रथित, कुम्भीका, अलजी, मृदित, संमूढपिडका, अवमन्य, स्पर्शहानि, उत्तमा, शतपोनक, त्वक्पाक, शोणितावृद, मांसावृद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये अठारह रोग हैं ॥ ३ ॥
गौरसर्पपुतुल्या तु शूकदुर्भग्नेहेतुका। पिडका कफरक्तभ्यां ज्ञेया सर्पपिका बुधैः ॥ ४ ॥ सर्पपिका—शूकदुर्भग्नेहेतुका (दुखचारित शूक हेतु के कारण) श्वेत सरसों के समान पिडका उत्पन्न होती है। यह पिडका कफ-रक्तजन्य है ॥ ४ ॥
कठिना विषमैरन्तैर्मांसुत्तस्य प्रकोपतः। शूकैस्तु विषसंभुनैः पिडकाऽष्टौलिका भवेत् ॥ ५ ॥ अष्टौलिका—(विषसंयुक्त भक्ष्यताकास्थि आदि) शूकों के कारण से वायु का प्रकोप होने पर कठिन एवं विषम अन्तों से युक्त (प्राप्त भागों पर निम्नोन्नत) पिडका उत्पन्न होती है, इसको 'अष्टौलिका' कहते हैं ॥ ५ ॥
शूकैर्यत् पुरितं शस्त्रदुप्रथितं तत् कफोत्थितम्। कुम्भीका रक्तपित्तोत्था जाम्बवास्थितिभाऽशुभा ॥ ६ ॥ कुम्भीका—शस्त्रत् (प्रतिदिन) शूक (आरमगुप्ता, कौंच आदि अथवा जलशूकों) के सेवन से (एक दिन के अन्तर से सेवन करना चाहिये), कफ से प्रथित जामुन के समान अशुभ (काली) पिडका उत्पन्न होती है। यह कुम्भीका पिडका रक्त-पित्तजन्य है। (कफ के कारण पिडका गाठ रूप होती है) ॥ ६ ॥ अलजीलक्षणैर्युक्तामलजीं च वितर्कयैत्।
इनसे उत्पन्न दोष (रोगों) की व्याख्या करते हैं। "दोषा ह्यपि रोगशब्दं लभन्ते।"
१ निन्दित कल्पों को छोड़कर जलशूक आदि से रहित प्रशस्त कल्पों के प्रयोग में हानि नहीं। प्रशस्तकल्प यथा—
"अश्वगन्धवारीकुष्ठमासीहिहोफलात्विषतम्।
चतुर्गुणन दुषेन तिलतैलं विपाचयेत्।
स्तनलिंगकर्णपालिवर्धनं प्रक्षणादिवम् ॥ १ ॥
२ किसी किसी स्थान पर—'शूकदुर्भग्नेहेतुका' यह पाठ है। वहाँ पर 'शूक और दूषित भेग के कारण' यह अर्थ है।
अलजी—पिडका प्रमेहपिडका में कही अलजी पिडका के समान लक्षणोवाली होती है।
मृदितं पीडितं यत् संरुध्य वायुकोपतः ॥ ७ ॥
पाणिभ्यां भूशसम्भूढे संमूढपिडका भवेत्।
संमूढपिडका—पीडित (शूक प्रयोग करने के कारण शोथ आदि के उत्पन्न होने से) मृदित (अभिभूत), तथा शूक-प्रयोगों को लगाने के पीछे हाथों से विशेष रूप में मलने के कारण (शिरन के सुप्त होने पर) वायु के कोप से (वात-रक्तजन्य) संमूढ-पिडका उत्पन्न होती है ॥ ७ ॥
दीर्घा बहुयशश्च पिडका दीर्घन्ते मध्यतन्तु याः ॥ ८ ॥ सोऽवमन्यः कफासूग्भ्यां वेदनारोमहर्षण्डत्।
अवमन्य—शूक कर्म के उपचार से दीर्घ (लम्बी) बहुत सी पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं, ये बीच में से फट जाती हैं। यह अवमन्य रोग कफ रक्त से उत्पन्न होता है। इसमें वेदना और शरीर में रोमांच होता है ॥ ८ ॥
पित्तशोणितसंभूता पिडका पिडकाचिता ॥ ९ ॥
पद्मपुष्करसंस्थाना ज्ञेया पुष्करिकेति सा।
पुष्करिका—पित्त रक्त के कारण से—पिडकाओं से व्याप्त, पद्मकर्णिका के आकार की पिडका उत्पन्न होती है, इसको पुष्करिका कहते हैं ॥ ९ ॥
जनयेत् स्पर्शहानिं तु शोणितं शूकदूषितम् ॥ १० ॥
स्पर्शहानि—शूक द्वारा दूषित रक्त स्पर्शहानि रोग को उत्पन्न करता है ॥ १० ॥
मुद्गमाषोपमा रक्ता पिडका रक्तपित्तजा।
उत्तमैषा तु विज्ञेया शूकाजीर्णनिमित्तजा ॥ ११ ॥
उत्तमा—शूकाजीर्णनिमित्तजा (बार-बार शूक के सेवन से निर्ज्वल एवं विकृति विशेष से उत्पन्न) मूँग, माष के समान आकार की, लाल पिडका को 'उत्तमा' कहते हैं, यह रक्त पित्त-जन्य है ॥ ११ ॥
छिद्रैरणुमुखवर्स्तु चितं यस्य समन्ततः।
वातशोणितजो व्याधिर्विज्ञेयः शतपोनकः ॥ १२ ॥
शतपोनक रोग में—मेढ-चारों ओर सूक्ष्म मुखवाले छिद्रों से भर जाता है, यह रोग वात-रक्त जन्य है ॥ १२ ॥
पित्तरक्तकृतो ज्ञेयस्त्वक्पाको ज्वरदाहवान्।
त्वक्पाक रोग—पित्त-रक्तजन्य है। इसमें रोगी को ज्वर और दाह होता है ॥
कृष्णः स्फोटैः सरक्तैश्च पिडकाभिश्च पीडितम्।
यस्य वास्तुरुजश्चोप्रा ज्ञेयं तच्छोणितावृदम् ॥ १३ ॥
शोणितावृद—जिसमें वास्तु (अधिष्ठान शिरन) काटे छालों एवं लालवर्ण की पिडकाओं से व्याप्त होता है, उसको 'शोणितावृद' कहते हैं। यह रोग शूकापवार द्वारा रक्त के दूषित होने से होता है ॥ १३ ॥