भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० १५ ] ३५

निदानस्थानम्

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मांसदोषेण जानीयादुर्बुद्धं मांससंभवम् । मांसादुर्बुद्धं—मांस में उत्पन्न होनेवाला मांसादुर्बुद्ध मांसदोष से (मांस की बृद्धि से) उत्पन्न होता है ॥

शौर्यन्ते यस्य मांसानि यत्र सर्वश्रश्च वेदनाः ॥१४॥ विद्यान्तं मांसपाकं तु सर्वदोषकृतं भिषक् । मांसपाक—जिस रोगी के शिरन का मांस शीर्ण (गल जाता) हो जाता है, वातादि सब दोषों की (तोद-दाह-कण्डु आदि) वेदनायें होती हैं, उसको मांसपाक कहते हैं । यह रोग सन्निपातजन्य है ॥१४॥

विद्रवि सन्निपातेन यथोक्तमभिनिर्दिशेत् ॥१५॥ विद्रवि—सन्निपातजन्य विद्रवि के समान इसमें लक्षण होते हैं ॥१५॥

कृष्णानि चित्राण्यथवा शूकानि सविषाणि च । पातितानि पचन्त्यासु मेदं निरवशेषतः ॥१६॥ कालानि भूत्वा मांसानि शौर्यन्ते यस्य देहिनः । सन्निपातसमुत्थानं तं विद्यात्तिलकालकम् ॥१७॥

तिलकालक—कृष्णवर्ण अथवा चित्रवर्ण (श्वेत, पीले, नीले विचित्रवर्ण) वाले और विषयुक्त (मिलावा मिश्रित) जलशुकों के प्रयोग करने से शिरन सम्पूर्ण रूप में पक जाता है । शिरन का मांस पके हुए तिलों के समान काला पड़कर गलने (झड़ने) लगता है । इस रोग को तिलकालक कहते हैं, यह रोग सन्निपातजन्य है ॥१६, १७ ॥

तत्र मांसादुर्बुद्धं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः । विद्रविश्च न सिध्यन्ति ये च स्थुस्तिलकालकाः ॥१८॥ असाध्य रोग—मांसादुर्बुद्ध, मांसपाक, विद्रवि और तिलकालक ये चार शूकापचारजन्य रोग असाध्य हैं ॥१८॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने शूकदोषनिदानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥

पञ्चदशोऽध्यायः

अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः ॥१९॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२०॥ शुक्रदोष के समान भग्न निदान के भी सूत्र होने से अब भग्न-निदान की व्याख्या करते हैं जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१९, २०॥

पतनपीडनप्रहराश्लेषणव्यालमृगदंशनप्रभृतिभिरभिघातविशेषैरनेकविधमस्थनां भङ्गमुपदिशन्ति ॥२१॥

भग्नरोग के कारण—गिरने से, दबाने से, चोट लगने से, आक्षेपण (आकर्षण अथवा अतिशय झटके से), व्याल (विहादि), मृग (हरिण आदि) के दन्त-नख आदि से, (एवं बलवान् से लड़ाई करने आदि से) चोट विशेष लगने के कारण बहुत प्रकार से अस्थियों का भङ्ग होता है ॥२१॥

तत्र भङ्ग (म) जातमनेकविधमनुसार्थमाणं द्विविधमेवोपपद्यते सन्धिमुक्तं, काण्डभग्नं च । तत्र षड्विधं सन्धिमुक्तं द्वादशविधं काण्डभग्नं भवति ॥२४॥

सम्पूर्ण प्रकार के भग्नों का तत्त्व रूप में अनुसन्धान करने से (संक्षेप रूप से) दो प्रकार के भग्नों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । यथा सन्धिमुक्त (dislocation) और काण्डभग्न (Fracture) ॥२४॥

तत्र सन्धिमुक्तम्—उत्पिष्टं, विस्फिष्टं, विवर्तितम्, अवक्षिप्तम्, अतिक्षिप्तं, तिर्यक्क्षिप्तमिति षड्विधम् ॥२५॥

इनमें सन्धिमुक्त भग्न छे प्रकार का है । यथा—उत्पिष्ट (चूर्णित), विस्फिष्ट (प्रथम हुआ), विवर्तित (दक्षिण या वाम-पार्श्व में घुमा), अवक्षिप्त (ऊपर या नीचे क्षिप्त), अतिक्षिप्त (मांस आदि का विदारण करके उत्पन्न), और तिर्यक्क्षिप्त (टेढ़ा होकर थोड़ा सा हिला हुआ) ॥२५॥

तत्र प्रसारणकुच्छनविवर्तनाक्षेपणाशक्तिरुग्रजत्वं स्पर्शासहत्वं चेति सामान्यं सन्धिमुक्तलक्षणमुक्तम् ॥२६॥

लक्षण—प्रसारण (फैलाने में) आकुंचन (संकोच) विवर्तन (विपरीत घुमाने), आक्षेपण (अतिशय चालन अथवा आकर्षण) में अशक्ति, तीव्रवेदना, स्पर्श की असहिष्णुता ये सन्धिमुक्त के सामान्य लक्षण हैं ॥२६॥

वैशेषिकं तूत्पिष्टे सन्धावुभयतः शोफो वेदनाप्रादुर्भाषो विशेषतश्च नानाप्रकारा वेदना राज्ञो प्रादुर्भवन्ति, विस्फिष्टेऽल्पः शोफो वेदनासातत्यं सन्धिविक्रिया च, विवर्तिते तु सन्धिपार्श्वोपगमनाद्विषमाङ्गता वेदना च; अवक्षिप्ते सन्धिविश्लेषतोत्तरोत्तरजत्वं च; अतिक्षिप्ते द्वयोः सन्ध्यस्थनोरतिक्रान्तता वेदना च; तिर्यक्क्षिप्ते त्वेकास्थिपार्श्वोपगमनमत्यर्थं वेदना चेति ॥२७॥

विशेष लक्षण—उत्पिष्ट सन्धिमुक्त में—सन्धि के दोनों पार्श्वों में शोफ, वेदना का होना, और विशेषतः नाना प्रकार की वेदनायें रात्रि में उत्पन्न होती हैं । विस्फिष्ट सन्धिमुक्त में—थोड़ी सूजन, निरन्तर वेदना, सन्धि में अक्रियता आ जाती है । विवर्तित सन्धिमुक्त में—सन्धि के एक पार्श्व से हटकर दूसरे में जाने से अङ्ग में विषमता तथा वेदना होती है । अवक्षिप्त सन्धिमुक्त में—सन्धि का प्रथम होना और तीव्र वेदना होती है । अतिक्षिप्त सन्धिमुक्त में—सन्धिवाली—दोनों अस्थियों परस्पर दूर हट जाती हैं और वेदना होती है । तिर्यक्क्षिप्त सन्धिमुक्त में—एक अस्थिपार्श्व में दूरी आ जाती है और तीव्र वेदना होती है ॥२७॥

काण्डभग्नमत उभवं वक्ष्यामः—कटकम्, अश्चकर्णं, चूर्णितं, पिच्छितम्, अस्थिच्छलितं, काण्डभग्नं, मञ्जानुगतम्, आंतपातितं, वक्रं, छिन्नं, पाटितं, स्फुटितमिति द्वादशविधम् ॥२८॥

इसके आगे काण्डभग्न की व्याख्या करते हैं ।