भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

१७४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १५ ]

काण्डभग्न (नलकास्थि का भंग) बारह प्रकार का है। यथा— कर्कटक , अश्वकर्ण , पिच्छित , अस्थिछलित , काण्डभग्न , मज्जानुगत , अतिगणित , वक्र , छिन्न , पाटित और स्फुटित ॥८॥

इवयशुचाहुल्यं स्पन्दनविवर्तनस्पर्शासहिष्णुत्वमवपीड्यमाने ग्रहः स्रस्ताङ्गता विविधवेदनाप्रादुर्भावः सर्वान्व-वस्थासु न गर्भलाभ इति समासेन काण्डभग्नलक्षणमुक्तम् ॥

सामान्य लक्षण—सृजन की अधिकता, स्पन्दन और विवर्चन में स्पर्श की असहिष्णुता, दवाने पर या रगड़ने पर शब्दोत्पत्ति (Capitation) बालों को रगड़ने के समान), अङ्ग का गिरा रहना, नाना प्रकार की वेदनाओं की उत्पत्ति, किसी भी अवस्था में शान्ति लाभ न होना, ये काण्डभग्न के सामान्य लक्षण हैं ॥९॥

विशेषस्तु समूढमुभयतोऽस्थिमध्ये भ (ल) र्गन् ग्रन्थि-रिवोन्नतं कर्कटकम्, अश्वकर्णवदुद्गतमश्वकर्णकं स्पृश्यमानं शब्दवच्चूर्णितमवगच्छेत्, पिच्छितं पृथुगं गतमनल्पशोफं, पार्वेयोरस्थि होनोद्गतमस्थिच्छलितं वेल्लते प्रक्रममानं काण्डभग्नम्, अस्थ्यवयवोऽस्थिमध्यमनुप्रविश्य मज्जानमुल्लक्ष्यतीति मज्जानुगतम्, अस्थि निशेषतद्विच्छिन्नमतिपातितम्, आसुरनमविमुक्तास्थि वक्रम्, अन्यतरपार्ववांशिर्ग्रंथिर्छिन्नं, पाटितमणुबहुविदारितं वेदनावच्छ, शुकपूर्णमिवाधमात् विपुलं विस्फुटितं स्फुटितमिति ॥१०॥

विशेष लक्षण—कर्कटक में—अस्थि मध्य में से टूट जाने पर ऊर्ध्व और अधः दोनों प्रान्तों से समूढ (कार्य में अशक्य) बन जाती है, अस्थि के कड़े के समान ऊपर को उठी रहती है। घोड़े के कान के समान ऊपर को उठी अस्थि अश्वकर्ण है। चूर्णितभग्न में—अस्थि स्पर्श करने पर चर-चर शब्द करती हुई प्रतीत होती है। पिच्छितभग्न से—अस्थि फैल जाती है और सृजन थोड़ी होती है। अस्थिछलित में—अस्थिपाश्वों में कुछ ऊपर को उठ जाती है (अथवा इसमें अस्थि टूटकर छलका-सा बन जाता है)। काण्डभग्न में—अस्थि हिलाने पर चलती (हिलती) है। मज्जानुगत में—अस्थि का कोई भाग अस्थि के अन्दर घुसकर मज्जा को बाहर कर देता है। अतिपातित भग्न में—अस्थि सम्पूर्ण रूप में छिन्न हो जाती है। वक्र भग्न में—अस्थि मुड़ जाती है परन्तु पृथग् नहीं होती। छिन्न—एक पार्श्व में लगी रहती है और एक पार्श्व से छिन्न हो जाती है। पाटित—फटने से बहुत से छोटे छोटे टुकड़े हो जाते हैं और तीव्र वेदना हो जाती है। स्फुटित—शुक—(यवादि धान्यों का अग्रभाग)—पूर्ण के समान वेदना युक्त, आधमात् (सूजी हुई), विपुल विस्फुटित (विशेष रूप से विदलित—कणों के रूप में टूटी) अस्थि “स्फुटित” होती है ॥११॥

तेषु चूर्णितच्छिन्नातिपातितमज्जानुगतानि कृच्छ्रसाध्यानि, कृङ्गवृद्धबालानां क्षतक्षीणकुष्ठिरूबासिनां सन्ध्युपगतं चेति ॥११॥

इनमें—स्फुटित, चूर्णित, छिन्न, अतिपातित, मज्जानुगत, ये काण्डभग्न कष्टसाध्य हैं। कृश वृद्ध और बालक तथा क्षत (उरः-क्षत रोग), क्षीण, कुष्ठ एवं श्वास रोगी में सन्धिभग्न कष्टसाध्य है, (इनमें काण्डभग्न भी कष्टसाध्य समझना चाहिये) ॥११॥

भवन्ति चात्र—

भिन्नं कपालं कटया तु सन्धिमुक्तं तथा न्युतम् ।

जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तन्निच्छक्तिस्तकः ॥१२॥

कपाल (Flat) अस्थियों के भग्न होने पर, कटिसन्धि के मुक्त अथवा न्युत (स्वलिप्त) होने पर, जघनस्थान में पिष्ट (उत्पिष्ट) भग्न होने पर, असाध्य समझना चाहिये।

वि० मन्तव्य—कटि की सन्धि मुक्त होने पर कुञ्जता हो जाती है जो असाध्य होती है, जघनास्थि पिस जाने पर उसका सन्धान नहीं होता ॥१२॥

असद्विलष्टं कपालं तु ललाटे चूर्णितं च यत् ।

भग्नं स्तनान्तरे शङ्खे पृष्ठे मूर्ध्नि च वर्जयेत् ॥१३॥

कपालास्थियों की सन्धियों के पृथक् होने पर, ललाट में कपालभग्न होने पर, स्तनों के मध्यवर्ती शंख नामक मर्म के भग्न होने पर पीठ एवं शिर के दोनों प्रकार के भग्न को असाध्य समझना चाहिये ॥१३॥

आदितो यच्छ दुर्जातमस्थि सन्धिर्वापि वा ।

सम्यग्यमितमप्यस्थि दुर्न्यासाद्दुर्निबन्धन्तान् ॥१४॥

संक्षोभाद्वाऽपि यद्गन्धेद्विक्रियां तच्छ वर्जयेत् ।

आदि से (जन्मोत्पत्ति काल से ही), दुर्जात (दूषित सन्धान के कारण) उत्पन्न अस्थि अथवा सन्धि असाध्य है। सम्यक् प्रकार से संहत (मिलाई) भी अस्थि—दुर्न्यास (बुरी प्रकार से रखने के कारण) से अथवा अनुचित रूप में बाँधने पर या संक्षोभ (हिलाने-जुलाने) से जो विकृत हो जाती है, वह अस्थि असाध्य समझनी चाहिये ॥१४॥

मध्यस्य वयसोऽवस्थास्तिस्रो याः परिकीर्तिताः ॥१५॥

तत्र स्थिरो भवेज्जनुरुपकान्तो विजानता ।

प्रथम जो तीन (बुद्धि यौवन और सम्पूर्ण) अवस्थायें कही हैं, इनमें मध्यम आयु के अन्दर (चालीस वर्ष की आयु में) पुरुष के धातु स्थिर रहते हैं (१६ से ४० तक धातु स्थिर रहते हैं)। इस अवस्था में चिकित्सा करनी चाहिये। इसके आगे

१ कबिराज हाराणचन्द्रजी ने 'खलिल्लं प्रक्रममानं काण्डभग्नम्' यह पाठ दिया है। यहाँ पर खलिल्लं का अर्थ गत्युक्त किया है। यथा—खल्लो वस्त्र प्रसेदं स्मावृ गत्तं । भेदती ।