सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनिदानस्थानम्
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अ० १६] चालीस से सत्तर वर्ष की आयु में अतिशय कष्टसाध्य हो जाता है ॥१५॥
तरुणस्थिति नम्यन्ते भव्यन्ते नलकानि तु ॥१६॥ कपालानि विभिद्यन्ते स्फुटन्ति रुचकानि च । तरुणस्थियाँ (Cartilage-घ्राण, कान, आँख की) — टेढ़ी बन जाती हैं। नलक (Long-Bones शाखास्थियाँ) टूटती हैं। कपालस्थियाँ (Flat-सिर आदि की) फटती हैं। रुचक (दाँत आदि) एवं बलयास्थियाँ (Small Bones कलई की) में स्फुटन (दराड़) होता है। इस प्रकार से अस्थियाँ पाँच प्रकार की बताई हैं। यथा—तरुण, कपाल, बलया, रुचक और नलक ॥१६॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने भग्गनिदानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
षोडशोऽध्यायः
अथातो मुखरोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥१७॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१८॥ इसके आगे मुखरोग निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१९,२०॥
मुखरोगाः पङ्कषष्ठिर्भवन्ति समश्वायतनेषु । तत्रा- यतनानि-ओठो, दन्तमूलाणि, दन्ताः, जिह्वा, तालु, कण्ठः, सर्वाणि चेति । तत्राद्योषोऽध्यायः, पञ्चदश दन्तमूलेषु, अधो दन्तेषु, पञ्च जिह्वायां, नव तालुनि, समदश कण्ठे, त्रयः सर्वश्वायतनेषु ॥१९॥
मुख रोग पैंसठ प्रकार के हैं। ये सब रोग सात स्थानों में उत्पन्न होते हैं। सात स्थान यह हैं—दोनों ओठ, दन्तमूल, दाँत, जीभ, तालु, कण्ठ और सम्पूर्ण मुख। इनमें ओठों में आठ, दन्तमूलों में पन्द्रह, दाँतों में आठ, जिह्वा में पाँच, तालु में नौ, कण्ठ में सत्रह और सब स्थानों में तीन, इस प्रकार से कुल ६५ मुखरोग हैं ॥२०॥
तत्राद्येष्वक्रोपा वातपित्तइलेषमसन्निपातरक्तमांसमेदो- मिघातानमिताः ॥२१॥
इनमें ओष्ठरोग—वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस, मेद और अभिघात के कारण उत्पन्न होते हैं ॥२२॥
कक्कशो पुरुषो स्तन्ध्वो कृष्णो तीव्रहृगन्वितो । दाल्येते परिपाट्यते ह्योष्टो साहतकोपतः ॥२३॥
वायु के कारण ओष्ठ—खुरदरे, कठोर, निश्चल, काले हो जाते हैं, इनमें तीव्र वेदना होती है, ओठ गम्भीर रूप में फट जाते हैं, और इनकी (स्वचा) उत्खण्ड फट जाती है ॥२४॥
आचितो पिडकाभिस्तु सर्वपाकृतिभिर्भृगम् । सदाहपाकसंज्ञावो नीलो पीतो च पित्ततः ॥२५॥
पित्त के कारण ओठ—सरसों के आकार वाली पिडकाओं से पूर्ण रूप में भर जाते हैं। इन ओठों में जलन, पाक और खाव होता है। ओठों का रङ्ग नीला या पीला पड़ जाता है ॥२६॥
सवर्णाभिस्तु च्येते पिडकाभिरेवेदो । कण्डुमन्तो कफाच्छूनौ पिच्छिद्यौ शीतलो गुरु ॥२७॥
कफ के कारण ओठ—स्वचा के समान वर्णवले पिडकाओं से भर जाते हैं, इनमें वेदना नहीं होती। आंठों में कण्डु होती है, ओठ सूजे हुए, पिच्छिद्य, शीतल और भारी हो जाते हैं ॥२७॥
सक्रुत्तु कृष्णो सक्रुत्तु पीतो सक्रुच्छ्वेते तथैव च । सन्निपातेन विज्ञेयावनेकपिडकाचितो ॥२८॥
सन्निपात के कारण ओठ—कभी काले, कभी पीले और कभी श्वेत हो जाते हैं। अनेक प्रकार की पिडकाओं से ओठ भरे रहते हैं ॥२८॥
खर्जूरफलवर्णाभिः पिडकाभिः समाचितौ । रक्तोपसृष्टो रुधिरं क्षत्रतः शोणितप्रभो ॥२९॥
रक्त के कारण ओठ—खर्जूर के फल के समान वर्ण की पिडकाओं से भरे रहते हैं। इनमें लाल रङ्ग का रक्त बहता है ॥३०॥
मांसदुष्टो गुरु स्थूलो मांसपिण्डवदुदगती । जन्तवश्चात्र मूच्छन्ति सूचकस्योभयतो मुखान् ॥३१॥
मांस के कारण ओष्ठ—गुरु (भारी), स्थूल (मोटे) एवं मांसपिण्ड के समान उत्तत हो जाते हैं। मुख के दोनों पाश्वों में स्थित ब्रणों में कृमि उत्पन्न हो जाते हैं ॥३२॥
मेदसा घृतमण्डाभो कण्डुमन्तो स्थिरी मृदू । अन्च्छस्फटिकसङ्काजमासावं क्षत्रो गुरु ॥३३॥
मेद के कारण ओठ—घृतमण्ड (श्री के ऊपर के स्वच्छ भाग) के समान, एवं कण्डुयुक्त स्थिर (निश्चल) और कोमल होते हैं। इनसे स्वच्छ-स्फटिक के समान खाव बहता है और ओठ भारी हो जाते हैं ॥३४॥
क्षतजाभो विदीर्यते पाठ्यते चाभिघाततः । प्रथितो च समाख्यातावोष्टो कण्डुसमन्वितो ॥३५॥
अभिघात के कारण ओठ—क्षतज (रक्त) की आभावाले होते हैं, गहरे रूप में फट जाते हैं, इनकी स्वचा फट जाती है। ओठों में गॉठ-सी पड़ जाती है, इनमें कण्डु होती है। (अभिघातजन्य ओष्ठरोगों में वायु, कफ रक्त के साथ मिलकर कारण बनती है) ॥३६॥
दन्तमूलगातास्तु—शीतादो, दन्तपुष्पटको, दन्तवेष्टकः, शोषिरो, महाशोषिरः, परिदर, उपकुशो, दन्तवैदभी, वर्धनः, अधिमांसो, नाड्यः पश्चति ॥३७॥
दन्तमूल में स्थित रोग—शीताद, दन्तपुष्पटक, दन्तवेष्टक, शोषिर, महाशोषिर, परिदर, उपकुश, दन्तवैदभी, वर्धन, अधिमांस और पाँच नाडीब्रण—इस प्रकार से पन्द्रह रोग हैं ॥३८॥