भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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२.५६ सुशरुतसंहिता [ष | |

' शोणितं दन्तवेष्टभ्यो यस्याकस्मात्‌ प्रवतेते । दिलाने दबाने से रक्त बहने लगता है, मंद ` वेदना होती है।

दुगेन्धीनि स्प्णानि प्रक्टेदीनि मृदूनि च ॥१४॥ || रक्त के निकलने पर मसूडे पुनः ए जाते है, मुखं ओ ष |

दन्तमांसानि ओयंन्ते पचन्ति च परषरम्‌। आती है । यह रोग पित्त रक्तजन्य हे ॥२१,२२

शीतादो नाम स व्याधिः कफञोणितसंभवः ॥९५॥ र्षु दन्तमूटेषु संरम्भो जायत महान्‌ ॥२३॥ ¦ शीताद्‌--बिना किखी कारण के दन्तवेष्ट (मसो) मे से | भवन्ति च चला दन्ताः स वेदर्भोऽभिघातजः। रक्त बहने कगता है मसु का. मांस दुग॑न्ध युक्त, काला, क्टेद | वेदभ रोग मे मसू को धिखने पर तीन शोथ उस्न

(खाव बहक) ओर कोमछ दो जाता ह । मवु का मांख गल्ने | हो जाता हे । दात दिल्ने र्गते हं, यह रोग अमिधातजन्य ३॥ `

छगता है, मसु. पक जाते है (पूय उतन्न हो जाती दै) । यह मारुतनाधिको दन्तो जायते तीत्रवेदनः ॥२४। त 1 वधनः स मतो व्याधिजाते रुक्‌ च प्रशाम्यति

द्न्तयोख्िषु वा यस्य ऋधयथुः सरुजो महान्‌ । वधन्‌ (£दध2-2०५)-वायु के कारण.से तीतर शूर दन्तपुप्पुटको ज्ञयः करक्तनिमित्तजः ॥१९॥- . युक्त अधिक दति उत्पन्न होता है । इख दांत के उस्ने + . दंतपुष्पुटक--दो या. तीनः दतो .के मू मे जब. बवडुत | पर दद (व्याधि प्रभाव से) स्वेयं शान्त दो जाती है ॥२५ ॥ अधिक शोथ एवं वेदना उत्पन्न हो जाती है, तव. इसको .दन्तः हानव्ये पश्चिमे दन्ते महःन्छोथो महारुजः ॥ ९९॥ पुप्युटक कहते हँ । यह रोग कफ-रक्तजन्य है ॥१६॥ खालाखावी कफडतो विज्ञेयः सोऽधिमांसक । खबन्ति पूयरुधिरं चला दन्ता भवन्ति च| अधिमांख--हनु.के अन्तिम दंतमूल मे तीतर वेदनायुक्ष ` दन्तवष्टः स विज्ञयो दुष्टञ्रोणितसंमवः॥१अ महान्‌ शोथ उत्पन्नो जातादहै। इसरोगमे मुखसे ला दन्तवेष्ट- मषु मे से रक्त ओर पूय बहती है, दाति | बहती है, यह रोग कफजन्य है ॥२५॥ | हिटने लगते हे, यह रोग दूषित रक्त से उत्पन्न होता हे-॥१७।॥। द्न्तमूगता नाज्यः पच्च ज्ञया यथेरिताः ॥२६॥

श्वयथुदेन्तमूरेषु रुजावान्‌ कशूरक्तजः। | पू्वज्ति नाड़ीव्रण की भांति पाँच नाड़ियां दन्तभूढ मे भी खाखाखाबी स विज्ञेयः कण्डमान्‌ शौषिरो गद्‌; ॥१द] | होती ह । इनके लक्षण उसी प्रकार के देँ ॥२६॥ शोषिर रोग य मसु मे सूजन उदयन्न हो. जाती है दन्तगतास्तु-दाल्नः, कृमिदन्तको दन्तहषां इसमें वेदना होती दै, यह रोग कफ-रक्तजन्य. है । मुख से व ॥ उअ) स कपाठिका, . इ्यावद्न्तको, दयु

शकरा, कपालिका, श्यावदंतक ओर ` हनुमोक्ष-ये आड रोगं द्न्तमांसानि पच्यन्ते.सुख च.परिपीञ्यते ॥१९॥ | इनये ~ ,; ; : यस्मिन्‌ स सजो व्याधिमहाओौषिरसंज्ञकः। दाव्यन्त.बहुधा दन्ता यस्मिस्तीव्ररुगन्विताः। : ; महार से म-दातःमषडो को छोड देते ह ताह | दारनः स इति जेयः सदागतिनिमिततजः ॥२ट॥ फट जाता ई, मघे पक जाते है, यल भी (अधिक गल्ने से) दालनुरोग मे--दंत अनेक स्थानों से फट जाते दै, इनमे आक्रान्त वन जाता ई | यहे रोग सम्निपातजन्य है ॥१६। तीव्र वेदना होती है, यह रोग सदागति (वायु) के कारण उदयत्न दन्व्माखानि शयन्ते यस्मिन्‌ ीवति चप्यस्‌॥२०॥ होता हे, (अवाध्य दै) ॥२८॥ ५ पित्तासक्कफजो भ्याधिज्ञय्‌ः परिदरो हि सः कृष्णञ्छिद्र चः खावी-ससंरम्भो महारजः ।

आती

परिद्र रोग मे-मसृडे गल जाते है, रक्तः -मिभित थूकृ | अनिमित्तरुजो वाताद्विज्ञेयः कृमिदन्तकः ॥२९॥ हे, थह रोग पित्त-कफःरक्तजन्य है ॥२०॥ र: ङमिदत रोग म-दतः के अन्दर काटा रङ्ग आ जाता £ . वेष्टेषु दाहः पाकश्च तेभ्यो दन्ताश्चरन्ति, च ॥२९१॥ . | छेद बनं जाता ह, दात दिवता दै, दतं से खावः बहता ह आध्धिताः प्रसवन्ति ओणितं मन्दवेदनाः। शाय होती है, वेदना तीव्र होती दै, विना कारण के ही वेदना आध्मायन्ते छते रक्ते युखं पूति च जायते ॥२२] श होने लगती हे, यह रोग वायुजन्य दै ॥२६॥ . ~ -यस्मिन्पड्गः स स्यात्‌ पितरक्तदतो गदः ह शोतसुष्णं च दशनाः सहन्ते स्पर्मनं न च । -: उपङ्श रोग मे- मसूद मे जलन होती है, मसड़े पक यस्य त द्न्तहष तु व्याधि विद्यात्‌ समीरणात्‌ ॥१०॥ श

ई, इनसे दाति निक जाते हे । दातिमूर्छो को पकड़कर द्तहष (1401009 ०{ ४€ ४०९४) रोग मे दति शीत

| ज उष्ण वस्तुके स्पश को सहन नदीं. कर सकते |. यद र , | वात्तजन्यं है ॥३०॥ 2 =

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१, दस्के लक्षण 251०6 पारईरोया से मिर्ते हुं |