भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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ॐ ११७

निदानस्थानम्

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वक्रं वक्रं भवेद्यसिम्न दन्तभङ्गश्च तीव्ररक्तम् । कफवातकृतो व्याधिः स भञ्जनकसंज्ञितः ॥ ३१ ॥ भञ्जनक—रोग में मुख टेढ़ा हो जाता है, दाँत टूट जाते हैं, तीव्र वेदना होती है, यह रोग कफवातजन्य है ॥३१॥ शर्करैव स्थिरीभूतो मलो दन्तेषु यस्य वै । सा दन्तानां गुणहरी विज्ञेया दन्त शर्करा ॥ ३२ ॥ दंतशर्करा—जिन दाँतों में शर्करा ( बालू के सूक्ष्म कण ) के समान मल जम जाता है, उसे दंतशर्करा कहते हैं। यह रोग दाँतों के शुक्लता आदि गुणों को नष्ट कर देता है ॥३२॥ दलन्ति दन्तवलकानि यदा शर्करया सह । ज्ञेया कपालिका सैव दशनानां चिन्ताशिनी ॥ ३३ ॥ कपालिका—रोग में दाँतों के बल्कल ( त्वचा उपरि-भाग बल्कल के समान ऊपर का श्वेत वर्ण प्लास्टर ) शर्करा के साथ विदीर्ण हो जाते हैं। यह रोग दाँतों को नष्ट करनेवाला ( असाध्य ) है ॥३३॥

योऽसृञ्जिग्रेण पिचने दग्धो दन्तस्वशेषतः । श्यावतां नीलतां वाऽपि गतः स श्यावदन्तकः ॥ ३४ ॥ श्यावदंतक—रोग में दाँत रक्त मिश्रित पित्त से पूर्ण रूप में जल जाता है, दाँत का रङ्ग काला या नीला हो जाता है, इसको श्याव-दंतक कहते हैं ॥३४॥

वातेन तैस्तैर्भावैस्तु हनुसन्धिर्विंसंहतः । हनुमोक्ष इति ज्ञेयो व्याधिर्दितलक्षणः ॥ ३५ ॥ हनुमोक्ष—ऊँचे बोलने से, कठिन पदार्थों के भक्षण से, जूम्भा आदि कारणों से वायु कुपित होकर हनु सन्धि को शिथिल कर देती है। इस रोग में अर्दित के समान लक्षण ( दाँतपीड़ा आदि ) होते हैं। इसका नाम हनुमोक्ष है ॥३५॥

जिह्वागतास्तु—कण्टकाखिबिधाखिभिर्दोषैः, अलास, उपजिह्विका चेति ॥ ३६ ॥

जिह्वागत—कण्टक तीन प्रकार के, वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य, तीनों दोषों से। अलास और उपजिह्विका—ये जिह्वा के काँटों में नहीं होते, जीभ में होते हैं ॥३६॥

जिह्वाऽनिलेन स्फुटिता प्रसुप्ता भवेच्च शाकच्छद्वनप्रकाशा । वायु के कारण जिह्वा—ईषद् विदीर्ण, प्रसुप्त ( रसशान में असमर्थ ) एवं शाकच्छद्व ( खरपत्र शैगुन के पत्ते ) के समान होती है ।

पिचने पीता परिदह्यते च चिता सरकतैरपि कण्टकैश्च ॥ पित्त के कारण जिह्वा—पीली और जलती प्रतीत होती है। जीभ लाल-लाल काँटों से भरी रहती है ।

कफेन गुर्वो बहुला चिता च मांसोदगमैः शालमलिकण्टकामैः ॥३७॥

कफ के कारण जिह्वा—भारी, स्थूल एवं सिम्बल के काँटों के समान मांसांकुरों से व्याप्त होती है ॥३७॥ जिह्वातले यः श्रयश्चः प्रगाढः सोऽलाससंज्ञः कफरक्तमूर्तिः । जिह्वां स तु स्तम्भयति प्रवृद्धो मूले तु जिह्वा भ्रशमेति पाकम् ॥ ३८ ॥ अलास—कफ-रक्त के समान मूर्ति रूप ( कफ-रक्तजन्य ) गम्भीर शोथ जीभ के नीचे उत्पन्न होकर जीभ को जड़ बना देती है ( वायु के कारण )। बढ़ने पर जड़ में विशेष रूप से पक जाती है ( पित्त के कारण )। इसलिये यह रोग सन्निपात-जन्य होने से असाध्य है ॥३८॥

जिह्वाग्ररूपः श्रयशुद्धिं जिह्वा-मुत्रम्य जातः कफरक्तयोनिः । प्रसेककण्डूपरिदाहयुक्ता प्रकथ्यतेऽसावुपजिह्विकेति ॥ ३९ ॥

उपजिह्विका ( Ranala )—कफ रक्त के कारण उत्पन्न जीभ के अग्रभाग के समान शोथ जिह्वा को ऊपर उठाकर उत्पन्न होती है। इसमें—लाला प्रसेक ( खाव ) कण्डू, जलन होती है, इसका नाम उपजिह्विका है ॥३९॥

तालुगतास्तु—गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अभ्रुषः, कच्छपः, अर्बुदः, मांससङ्घातः, तालुपुष्पः, तालुशोषः, तालुपाक इति ॥ ४० ॥

तालुजन्य रोग—गलशुण्डिका, तुण्डिकेरी, अभ्रुष, मांस-कच्छप, अर्बुद, मांससंघात, तालुपुष्प, तालुशोष और तालुगक ये नौ रोग हैं ॥४०॥

इलेष्मासुग्म्यां तालुमूलात् प्रवृद्धो दौर्घः गोफो धमातबस्तिप्रकाशः ।

तृष्णाकासश्चासक्तु संप्रदिष्टो व्याधिर्वैद्यैः कण्ठगुण्डोति नाम्ना ॥ ४१ ॥

कण्ठशुण्डि ( गलशुण्डि )—कफ-रक्त के कारण से उत्पन्न शोथ तालुमूल से आगे की ओर बढ़कर गलशुण्डि ( Tonsils ) में पहुँच जाता है। यह शोथ वातपूर्ण बस्ति के समान एवं लम्बा हो जाता है। इस रोग में—तृष्णा, कास, स्वास उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं। वैद्य इसको 'कण्ठशुण्डि' के नाम से जानते हैं ॥४१॥

शोफः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुत्क्राम्यां तुण्डिकेरी मता तु ।

तुण्डिकेरी—पूर्वोक्त कफ-रक्त के कारण स्थूल, तोद ( चुम्बने की वेदना ) दाह एवं पकनेवाला शोथ उत्पन्न होता है। यह शोथ वनकार्पासों के समान होता है, इसको तुण्डिकेरी कहते हैं।

१ कहा भी है— प्रायस्तोयं तदा जिह्वा शोणितं चान्तरान्तरा । प्रचुरं सावयेत् सद्यः शिराच्छेदादलासके ॥

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