सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
शोकः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे
रक्ताञ्चोयः सोऽध्रुषो रुग्ध्वराह्यः ॥४१॥
अध्रुष—रक्त के कारण तालु प्रदेश में लालवर्ण एवं जड़ ( निश्चल ) शोथ उत्पन्न हो जाता है । इसको अध्रुष कहते हैं । इसमें वेदना तथा ज्वर रहता है ॥४१॥
कूर्मोत्सन्नोऽवेदतोऽश्रीघ्रजन्मा-
उरक्तो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा स्यात् ।
मांसकच्छप—कफ के कारण कल्लुवे के समान मध्य में से उठा हुआ, वेदना रहित, पाण्डुरवर्ण का धीरे धीरे फैलनेवाला शोथ उत्पन्न होता है । इसको कच्छप कहते हैं ।
पद्माकारं तालुमध्ये तु शोफं
विद्याद्रक्तादुर्बुदं प्रोक्तलिङ्गम् ॥ ४३ ॥
अर्बुद—रक्त के कारण से तालु के मध्य में पद्माकर्णिका के समान आकार का शोथ उत्पन्न होता है । इसके लक्षण रक्तार्बुद के समान (पूर्वोक्त लक्षणों के समान) होते हैं ॥४३॥
दुष्टं मांसं श्लेष्मणा नीरुजं च
तालवन्तःस्थं मांससंघातमाहुः ।
मांससंघात—तालु के अन्दर का मांस कफ के कारण दूषित हो जाता है, इसमें वेदना नहीं होती, इसको मांससंघात कहते हैं ।
नीरुक् स्थायी कोलमात्रः कफात् स्थान-
मेदोयुक्तात् पुप्पुटस्तालुदेशे ॥ ४४ ॥
तालुपुप्पुटक—मेदोमिश्रित कफ के कारण से तालु प्रदेश में वेदना रहित, स्थायी ( स्थिर ) एवं कोलमात्र ( बेर के आकार का ) शोथ उत्पन्न होता है, उसको तालुपुप्पुट कहते हैं ॥४४॥
शोषोऽत्यर्थं दीर्घते चापि तालुः
श्वासो वातात्तालुशोषः सपिप्तात् ॥
तालुशोष—इस रोग में अत्यन्त शोष ( शुष्कता ) होता है, तालु विशेष रूप में फट जाता है । श्वास उत्पन्न होता है, यह रोग वात पित्तजन्य है ।
पित्तं कुर्यात् पाकमत्यर्थघोरं
तालुन्येन तालुपाकं वदन्ति ॥ ४५ ॥
तालुपाक—जिस समय पित्त तालु में अभियानक पाक उत्पन्न करता है, उसको 'तालुगक' कहते हैं ॥४५॥
कण्ठगतास्तु—रोहिण्यः पञ्च, कण्ठगालूकम्; अधि-जिह्वा, वलयो, वलास, एकवृन्दो, वृन्दः, शतन्नी, गिलायुः, गलविद्रधिः, गलोघः, स्वरन्नी, मांसतानो, विदारो चेति ॥
कण्ठगत रोग—पाँच रोहिणी ( वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्तजन्य ), कण्ठगालूक, अधिजिह्वा, वलय, वलास, एकवृन्द, वृन्द, शतन्नी, गिलायु, गलविद्रधि, गलोघ, स्वरन्नी, मांसतान और विदारो ये सत्रह रोग हैं ॥४६॥
गलेऽनिलः पित्तकफौ च मूर्च्छितौ
पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् ।
प्रदूष्य मांसं गलरोधिनोऽङ्गुरान्
सूजन्ति यान् साऽसुहरा हि रोहिणी ॥४७॥
रोहिणी—वायु एवं मूर्च्छित ( प्रदूषित ) पित्त और कफ पृथक् २ अथवा सन्निपात रूप से एवं रक्त गले में मांस को दूषित करके, गले को रोकनेवाले अङ्गुरों को उत्पन्न करते हैं । इन अङ्गुरों को रोहिणी कहते हैं । यह रोग प्राणनाशक है ॥४७॥
जिह्वां समन्ताद्भुग्वेदना ये
मांसाङ्गुराः कण्ठनिरोधिनः स्युः ।
तां रोहिणीं वातकृतां वदन्ति
वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ताम् ॥ ४८ ॥
वातजन्य रोहिणी—जो मांसाङ्गुर जिह्वा के चारों ओर उत्पन्न हो जायें तथा इनमें तीव्र वेदना होती हो, इनके कारण गला रुक जाये, इनको वातजन्य रोहिणी कहते हैं । इसमें वातजन्य मन्यास्तम्भ आदि उपद्रव विशेष रूप से रहते हैं ॥४८॥
क्षिप्रोद्गमा क्षिप्रविदाहपाका
तीव्रञ्चवरा पित्तनिमित्तजा स्यात् ।
पित्तजन्य रोहिणी में—अङ्गुर शीघ्र उत्पन्न होते हैं, शीघ्र ही विद्रघ्य होते हैं, शीघ्र ही पकते हैं । इनमें तीव्रञ्चवर उत्पन्न होता है, यह रोग पित्तजन्य है ।
स्रोतोनिरोधिन्यपि मन्दपाका
गुर्वो स्थिरा सा कफसंभवा वै ॥ ४९ ॥
कफजन्य रोहिणी में—अङ्गुर क्षोत ( कण्ठक्षोत ) को रोक लेते हैं, धीरे २ पकते हैं, गुर्वो ( भारी ) एवं स्थिर ( कठिन ) होते हैं ॥४९॥
गम्भीरपाकाऽप्रतिवारवीर्या
त्रिदोषलिङ्गा त्रयसंभवा स्यात् ।
सन्निपातजन्य रोहिणी—गम्भीर ( अनुत्तान ) पकती है, अप्रतिवारवीर्या ( दुनिवार शक्तिवाली ) होती है । इसमें तीनों दोषों के लक्षण रहते हैं ।
स्फोटचित्ता पित्तसमानलिङ्गा-
ऽसाध्या प्रदिष्टा रुधिरात्मिकेयम् ॥५०॥
रक्तजन्य रोहिणी—स्फोटो ( छालों ) से व्याप्त, पित्त के समान लक्षणों से युक्त एवं असाध्य होती है ॥५०॥
कोलास्थिमात्रः कफसंभवो यो
प्रनियर्गले कण्ठकशूकभूतः ।
खरः स्थिरः शब्दनिपातसाध्य-
स्तं कण्ठगालूकमिति ब्रुवन्ति ॥ ५१ ॥
१ असाध्य निर्णय—
“वातात् पित्तात् कफात् त्रिभ्यो रक्ताद् रोहिण्य ईरिताः ।
अन्या सद्यो भारयन्ति आसन्तिश्चः क्रियां विना ॥”