भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११ ]

निदानस्थानम्

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कण्ठशाल्क—गले में कफ के कारण बैर के समान जो प्रथि उत्पन्न होकर कण्ठक की भाँति पीड़ाकारक होती है, स्पर्श में खर, स्थिर (निश्चल) होती है, यह रोग शस्त्र द्वारा साध्य है, इसको कण्ठशाल्क कहते हैं ॥५१॥

जिह्माग्रूपः श्वयथुः कफात् जिह्माग्रवन्धोपरि रक्तमिश्रात् ।

ब्रूयोऽधिजिह्मः खलु रोग एष विवर्जयेदगतपाकमेनम् ॥५२॥

अधिजिह्मा—रक्तमिश्रित कफ के कारण जिह्वा के अग्रभाग के समान शोथ—जिह्वा मूल के ऊपर उत्पन्न हो जाता है। इसको 'अधिजिह्मा' कहते हैं। यदि यह पक जावे तो असाध्य समझना चाहिये ॥५२॥

बलास एवायतमुन्नतं च शोफं करोत्यन्नगतिं निवार्यै ।

तं सर्वथैवाप्रतिवारवीय विवर्जनीयं वलयं वदन्ति ॥५३॥

वलय—कफ अन्न मार्ग को रोककर आयत (लम्बा) और उन्नत (उठा हुआ) शोथ उत्पन्न करता है। यह रोग सर्वदा ही असाध्य है। इस वलय रोग को चिकित्सा कर्म में छोड़ देना चाहिये ॥५३॥

गले तु शोफं कुशतः प्रवृद्धौ इलेऽमानिहो श्वासरुजोपपन्नम् ।

सर्मच्छिदं दुस्तरमेतदाहु- वैलाससंज्ञं निपुणा विकारम् ॥५४॥

बलास—प्रकृपित कफ और वायु—गले में शोफ उत्पन्न करते हैं, जिससे श्वास में कठिनाई होती है, यह रोग सर्मच्छिद (गाणनाशक) है, बुद्धिमानों का कहना है कि यह रोग अतिशय कष्टसाध्य है ॥५४॥

वृत्तोन्नतो यः श्वयथुः सदाहः कण्ठवृन्त्रितोऽपाक्यमृदुर्गुरुश्च ।

नाम्नैकवृन्दः परिकीर्तितोऽसौ व्याधिर्वैलासक्षतजप्रसूतः ॥५५॥

एकवृन्द—बलास (कफ) और क्षतज (रक्त) के कारण से रक्त (गोल), उन्नत (उठा हुआ), दाहयुक्त, कण्ठयुक्त, पाक रहित, कठोर एवं भारी जो शोथ उत्पन्न होता है, उसको 'एकवृन्द' कहते हैं ॥५५॥

समुन्नतं वृत्तममन्ददाहं तीव्रश्चवरं वृन्दमुदाहरन्ति ।

तं चापि पित्तक्षतजप्रकोपा- द्विघात् सतोदं पवनास्त्रजं तु ॥५६॥

१ "तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणोति विनिर्दिश्येत् । पिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जोबितम् ॥ कृष्येन त्वनुकान्तः क्षिप्रं संपद्यते सुखो ॥" वरक०

वृन्द—पित्त और रक्त के प्रकोप से ऊपर को उठा, गोल-कार, तीव्रदाह, तथा तीव्र ज्वर युक्त शोथ उत्पन्न होता है। यदि इसमें तोद (चुभने की वेदना) हो तो इसको वात-रक्तजन्य समझना चाहिये ॥५६॥

वर्तिर्घना कण्ठनिरोधिनी या चिताऽतिमात्रं पिशितप्ररोहैः ।

नानारुजोच्छ्रायकरी त्रिदोषाज्- ब्रूया गतघनीच गतघन्यसाध्या ॥५७॥

शतघनी—जो गॉठ कठार, गले को रोकनेवाली, मांसांकुरों से बहुत अधिक व्याप्त होती है एवं द्विदोषजन्य होने से तोद-दाह कण्ठ नाना प्रकार की वेदनाकारी, तथा शतघनी (कण्ठकों से व्याप्त—महान् शिला या लोहपिण्ड) के समान होती है, उसको शतघनी कहते हैं, यह असाध्य है ॥५७॥

प्रन्थिरगले त्वामलकास्थिमात्रः स्थिरोऽल्परुक्त स्यात् कफरक्तमूर्तिः ।

संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शस्त्रसाध्यस्तु गिलायुसंज्ञः ॥५८॥

गिलायु—कफ-रक्त के कारण गले में आँवले के समान बड़ी, स्थिर, मन्दवेदनायुक्त प्रन्थि उत्पन्न हो जाती है। रोगी को ऐसा प्रतीत होता है कि गले में मध्य वस्तु (भोजन) अटक रहा है। यह रोग शस्त्रसाध्य है ॥५८॥

सर्वं गलं व्याप्य समुस्थितो यः शोफो रजो यत्र च सन्ति सर्वाः ।

स सर्वदोषो गलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ॥५९॥

गलविद्रधि—जो शोफ सम्पूर्ण गले में व्याप्त हो, इस शोथ में वातादि सब दोषों की पीड़ायें (तोद-दाह-कण्ठ आदि) होती हैं। यह गलविद्रधि रोग सन्निपातजन्य है, इसमें सन्निपातजन्य विद्रधि के समान ही लक्षण होते हैं ॥५९॥

शोफो महानन्तजलावरोधी तीव्रश्चवरो वातगतेर्तिहन्ता ।

कफेन जातो रुधिरान्वितेन गले गलोघः परिकीर्त्यतेऽसौ ॥६०॥

गलोघ—कफ और रक्त के कारण से गले में महान् शोथ उत्पन्न हो जाता है। इस शोथ के कारण—अन्न जल का मार्ग रुक जाता है, वायु की गति (उद्गार जुभमा आदि) भी बन्द हो जाती है। रोगी को तीव्र ज्वर रहता है। इस रोग को 'गलोघ' कहते हैं ॥६०॥

योऽतिप्रताम्यन् श्सिसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकण्ठः ।