भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ ७० ११ ]

कफोपदिग्धेष्वनिलायनेषु

क्षेयः स रोगः श्वसनात् स्वरघ्नः ॥६१॥

स्वरघ्न—अनिलायन (वातस्थानों) में कफ भर जाने से रोगी अत्यन्त कठिनाई के साथ (अन्धकार आँखों के सामने आ जाता है) निरन्तर श्वास लेता है, स्वर भिन्न (टूट) हो जाता है, गला शुष्क और टूटता हुआ प्रतीत होता है। यह रोग वायु के कारण से उत्पन्न होता है ॥६१॥

प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो

गलोपरोधं कुरुते क्रमेण।

स मांसतानः कथितोऽवष्टम्बो

प्राणप्रणुत् सर्वकृतो विकारः ॥६२॥

मांसतान—जो शोथ फैलानेवाला, कष्टदायक और धीरे धीरे बढ़कर क्रमशः गले को बन्द कर देता है, एवं नीचे की ओर लटकता है, इसको मांसतान कहते हैं, यह रोग सन्निपातजन्य है, एवं प्राणनाशक है ॥६२॥

सदाहृतोर्ब श्वयथुं सरक्त-

मन्तर्गले पूतिविशर्णमांसम्।

पित्तेन विद्याद्बदने विदारी

पार्श्वं विशेषात् स तु येन श्नेते ॥६३॥

विदारी—रोग में उत्पन्न शोथ—लाळवर्ण एवं दाह तथा तौद युक्त होता है। यह शोथ गले में दुर्गन्धित एवं श्रुत (गले) मांस के कारण होता है। यह रोग पित्तजन्य है। मनुष्य जिस पार्श्व (करवट) से प्रायः सोता है, उसी पार्श्व की ओर मुख में उत्पन्न होता है। (अन्यत्र भी इसका होना संभव है) ॥

सर्वसरास्तु वातपित्तकफगोणितनिमिताः ॥६४॥

सर्वसर रोग (सम्पूर्ण मुख में होनेवाले रोग)—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य ये चार हैं१ ॥६४॥

१ पीछे सर्वसर रोग तीन कहे हैं। इसलिये रक्तजन्य सर्वसर रोग को जो आचार्य मानते हैं उनके लिये यहाँ कहा है। जैसा कि

स्फोटैः सतोर्देवदंनं समन्ता-

अस्याचित्तं सर्वसरः स वातात्

वातजन्य सर्वसर में—सम्पूर्ण मुख चारों ओर से तौदयुक्त छालों से भरा रहता है।

रक्तैः सदाहैस्तनुभिः सपीतै-

यस्याचित्तं चापि स पित्तकोपात् ॥६५॥

पित्तजन्य सर्वसर में—मुख लाळवर्ण, दाहयुक्त, सूक्ष्म एवं पीले छालों से भरा रहता है।

कण्डूयुतैरल्परुचैः सवर्णै-

यस्याचित्तं चापि स वै कफेन।

कफजन्य सर्वसर में—मुख कण्डूयुक्त-मन्दवेदनावाले—त्वचा के समान वर्ण छालों से भरा रहता है।

रक्तेन पित्तोदित एक एव

कैश्चित् प्रदिष्टो मुखपाकसंज्ञः ॥६६॥

इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण

महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां

द्वितीयं निदानस्थानम् ॥२॥

कई आचार्य जो रक्तजन्य सर्वसर को मानते हैं, वह पित्तजन्य सर्वसर ही है (पित्तजन्य मुखपाक ही है)। इस प्रकार से तीन ही सर्वसर हैं, और कुल पैंसठ मुख रोग हैं१ ॥६६॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मुखरोगनिदानं

नाम-षोडशोऽध्यायः ॥१६॥

आगे स्वयं स्पष्ट कर देंगे इसीलिये संख्या में भेद नहीं।

१ रक्तजन्य सर्वसर के लक्षण—

“मुखस्य पित्तजे पाके दाहोषो तित्तवव्रता।

क्षारोक्षितक्षतसमा व्रणा दुःखास्तु रक्तजे ॥”