भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अथ शारीरस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे सर्वभूतचिन्ता (नामक) शारीर का व्याख्यान करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।१

वक्तव्य—शारीरज्ञान में अंगप्रत्यंगविज्ञान (शरीरविचय) तपोवक्रान्ति, शरीर-कार्य विज्ञान आदि अनेक विषयों का समावेश होता है। इसी से चरक में कहा है—

“शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा।

सर्वभावेयतस्तस्मात् शारीरं स्थानमुच्यते ॥”

वि० मन्तव्य—शारीर—शरीर अधिकृत्य कृतं शारीरं—शरीर की रचना का वर्णन है जिसमें। इस स्थान में—सब प्राणियों की उत्पत्ति का चिन्तन-विचार किया गया है। शरीर के विज्ञान के लिये १० अध्यायों का वर्णन किया गया है (सू० अ० ३)। भूत शब्द का अर्थ-भूतिः अस्ति अस्थ—जिसमें ऐश्वर्य-सामर्थ्य हो, या भाव्यते स्म इति-या भवति प्राप्नोति-जो प्राप्त करता है, आहार आदि का ग्रहण करता है, जन्तु-प्राणीमान, परन्तु इस प्रकरण में मानव-प्राणी का ध्यान रखकर विचार किया गया है। प्राणियों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भिन्न २ दर्शनों, पुराणों, विचारकों के भिन्न २ प्रकार के विचार हैं परन्तु आयुर्वेद का विचार यहाँ लिखा गया है। यह आयुर्वेद का अपना “दर्शन” है। इसमें यदि किसी दर्शन से विरोध प्रतीत हो तो उस दर्शन के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करो।

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्ट-रूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवौदकानां भावानाम् ॥३॥

सब प्राणियों का कारण व्यक्त (अगोचर-मूलप्रकृति) है। यह व्यक्त स्वयं अकारण (कारण रहित) है, सत्त्व-रज और तम इसका स्वरूप है, आठ रूपवाला है (व्यक्त, महान्, अहंकार और पंचतन्मात्रा, अथवा—मन, बुद्धि, अहंकार और महाभूत या धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनेश्वर्य)। इस सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति का कारण

है। जिस प्रकार एक समुद्र अनेक जल-जन्तु एवं पद्मादि-स्थावर जङ्गम रूप पदार्थों का आश्रय होता है, उसी प्रकार से यह अद्यक्त एक होते हुए भी अनेक क्षेत्रज्ञ (जीवात्माओं) का अधिष्ठान है।१

वि० मन्तव्य—अव्यक्त-न व्यज्यते स्म या न व्यज्यते कार्यं यस्मिन् अर्थात् जो व्यक्त-स्फुट विशिष्ट लक्षण युक्त नहीं है या जिसमें कार्य-व्यक्त नहीं रहता। यह सब भूतों का कारण है परन्तु इसका कोई कारण नहीं है यह स्वयंसिद्ध-अनादि है। सत्त्व-अस्तित्व, रजसु-राग-आकर्षण, तमसु-विकर्षण ही उसका लक्षण है। इसमें से समस्त जगत् उत्पन्न होता है। इसमें अनेक-असंख्य आत्माएँ विद्यमान हैं कहीं अन्यत्र से नहीं आतीं जैसे समुद्र-समुद्र के जल में सब शंख, शुक्ति, शैवाल, मगर, मत्स्य आदि विद्यमान रहते हैं उचित परिस्थिति-कार्य कारण की उचित स्थिति होने पर व्यक्त-उत्पन्न हो जाते हैं। स्मरणीय—कार्योत्पत्ति के पूर्व-कारण अव्यक्त होता है उसमें कार्य के आकार-प्रकार व्यक्त नहीं होते जैसे बीज (कारण) में वृक्ष (कार्य) के शुक्ल शोणित में प्राणों के और समुद्र जल में मत्स्य आदि के कारण जो अव्यक्त कहलाता है उसमें ही चेतन तत्त्व अर्थात् आत्मा का अधिष्ठान होता है, वही अव्यक्त को साय लेकर प्राणी रूप में परिणत हो जाता है। प्राणी का ही नाम “भूत” है, यही सब इस अध्याय में वर्णित विषय है ॥३॥

तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लक्षण एवाहङ्कार उत्पद्यते, स त्रिविधो वैकारिक-स्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकाहङ्कारात्तैजससहा-यातल्लक्षणान्यैवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा—श्रोत्र-त्वक्चक्षुजिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति, तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धेन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयान्तर्क मनः, भूतादेरपि तैजससहायातल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते—शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं,

१ क्षेत्रज्ञ का लक्षण—

(१) “इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतच्चो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥”

गीता० अ० १२।

(२) सांख्यकारिका में कहा भी है—“मूलप्रकृतिरविकृतिः।

१ क्योंकि कहा भी है— “भूतेन्यो हि परं यस्मात् नास्ति चिन्ता चिकित्सिते ॥”