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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

१६

अथ शारीरस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे सर्वभूतचिन्ता (नामक) शारीर का व्याख्यान करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।१

वक्तव्य—शारीरज्ञान में अंगप्रत्यंगविज्ञान (शरीरविचय) तपोवक्रान्ति, शरीर-कार्य विज्ञान आदि अनेक विषयों का समावेश होता है। इसी से चरक में कहा है—

“शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा।

सर्वभावेयतस्तस्मात् शारीरं स्थानमुच्यते ॥”

वि० मन्तव्य—शारीर—शरीर अधिकृत्य कृतं शारीरं—शरीर की रचना का वर्णन है जिसमें। इस स्थान में—सब प्राणियों की उत्पत्ति का चिन्तन-विचार किया गया है। शरीर के विज्ञान के लिये १० अध्यायों का वर्णन किया गया है (सू० अ० ३)। भूत शब्द का अर्थ-भूतिः अस्ति अस्थ—जिसमें ऐश्वर्य-सामर्थ्य हो, या भाव्यते स्म इति-या भवति प्राप्नोति-जो प्राप्त करता है, आहार आदि का ग्रहण करता है, जन्तु-प्राणीमान, परन्तु इस प्रकरण में मानव-प्राणी का ध्यान रखकर विचार किया गया है। प्राणियों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भिन्न २ दर्शनों, पुराणों, विचारकों के भिन्न २ प्रकार के विचार हैं परन्तु आयुर्वेद का विचार यहाँ लिखा गया है। यह आयुर्वेद का अपना “दर्शन” है। इसमें यदि किसी दर्शन से विरोध प्रतीत हो तो उस दर्शन के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करो।

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्ट-रूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम। तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवौदकानां भावानाम् ॥३॥

सब प्राणियों का कारण व्यक्त (अगोचर-मूलप्रकृति) है। यह व्यक्त स्वयं अकारण (कारण रहित) है, सत्त्व-रज और तम इसका स्वरूप है, आठ रूपवाला है (व्यक्त, महान्, अहंकार और पंचतन्मात्रा, अथवा—मन, बुद्धि, अहंकार और महाभूत या धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनेश्वर्य)। इस सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति का कारण

है। जिस प्रकार एक समुद्र अनेक जल-जन्तु एवं पद्मादि-स्थावर जङ्गम रूप पदार्थों का आश्रय होता है, उसी प्रकार से यह अद्यक्त एक होते हुए भी अनेक क्षेत्रज्ञ (जीवात्माओं) का अधिष्ठान है।१

वि० मन्तव्य—अव्यक्त-न व्यज्यते स्म या न व्यज्यते कार्यं यस्मिन् अर्थात् जो व्यक्त-स्फुट विशिष्ट लक्षण युक्त नहीं है या जिसमें कार्य-व्यक्त नहीं रहता। यह सब भूतों का कारण है परन्तु इसका कोई कारण नहीं है यह स्वयंसिद्ध-अनादि है। सत्त्व-अस्तित्व, रजसु-राग-आकर्षण, तमसु-विकर्षण ही उसका लक्षण है। इसमें से समस्त जगत् उत्पन्न होता है। इसमें अनेक-असंख्य आत्माएँ विद्यमान हैं कहीं अन्यत्र से नहीं आतीं जैसे समुद्र-समुद्र के जल में सब शंख, शुक्ति, शैवाल, मगर, मत्स्य आदि विद्यमान रहते हैं उचित परिस्थिति-कार्य कारण की उचित स्थिति होने पर व्यक्त-उत्पन्न हो जाते हैं। स्मरणीय—कार्योत्पत्ति के पूर्व-कारण अव्यक्त होता है उसमें कार्य के आकार-प्रकार व्यक्त नहीं होते जैसे बीज (कारण) में वृक्ष (कार्य) के शुक्ल शोणित में प्राणों के और समुद्र जल में मत्स्य आदि के कारण जो अव्यक्त कहलाता है उसमें ही चेतन तत्त्व अर्थात् आत्मा का अधिष्ठान होता है, वही अव्यक्त को साय लेकर प्राणी रूप में परिणत हो जाता है। प्राणी का ही नाम “भूत” है, यही सब इस अध्याय में वर्णित विषय है ॥३॥

तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लक्षण एवाहङ्कार उत्पद्यते, स त्रिविधो वैकारिक-स्तैजसो भूतादिरिति। तत्र वैकारिकाहङ्कारात्तैजससहा-यातल्लक्षणान्यैवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा—श्रोत्र-त्वक्चक्षुजिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति, तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धेन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयान्तर्क मनः, भूतादेरपि तैजससहायातल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते—शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं,

१ क्षेत्रज्ञ का लक्षण—

(१) “इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतच्चो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥”

गीता० अ० १२।

(२) सांख्यकारिका में कहा भी है—“मूलप्रकृतिरविकृतिः।

१ क्योंकि कहा भी है— “भूतेन्यो हि परं यस्मात् नास्ति चिन्ता चिकित्सिते ॥”

२८२

मुञ्चतसंहिता

[ अ० ।

रूपतन्मात्रं रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषा शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेष्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोऽन्यैः, एवमेषा तत्त्वचतुर्विअतिव्याख्याता ॥४॥

इस अव्यक्त से अव्यक्त के लक्षणोंवाला (सत्त्व-रज तमरूप) महान् (महत् तत्त्व या बुद्धि तत्त्व) उत्पन्न होता है१ । इस सत्त्व-रज-तम लक्षणोंवाले महत् तत्त्व से सत्त्व-रज-तम लक्षणों से युक्त अहंकार उत्पन्न होता है । यह अहंकार (अभिमान) तीन प्रकार का है । यथा—वैकारिक सात्विक, तैजस राजस, भूतादि तामस । इनमें वैकारिक (सात्विक) अहंकार से, तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन्हीं लक्षणोंवाली (सात्विक एवं राजस) ग्यारह इन्द्रियाँ [पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन (सात्विक), पाँच कर्मेन्द्रिय, (राजस) ] उत्पन्न होती हैं । यथा—श्रोत्र (कान), त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (नासिका), वाक् (वाणी), हस्त (हाथ), उपस्थ (शिश्न-भग), पायु (गुदा), पाद (पाँव) और मन, ये ग्यारह इन्द्रियाँ हैं । ये पहली पाँच इन्द्रियाँ बुद्धि (ज्ञान)-इन्द्रियाँ हैं, शेष पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । मन, ज्ञान और कर्म दोनों प्रकार का है, चूँकि दोनों के साथ प्रवृत्त होता है । भूतादि (तामसिक) अहंकार से भी तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन लक्षणोंवाली पंच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । यथा—शब्द-तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्ध-तन्मात्रा । इन तन्मात्राओं के विशेष (मेदक) गुण-क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । इन विसेदक गुणों से क्रमशः व्योम (आकाश), अनिल (वायु), अनल (अग्नि), जल और पृथिवी—ये भूत उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार से चौबीस तत्त्वों की (अव्यक्त, महान्, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पंचतन्मात्रा और पंचमहाभूत) व्याख्या कर दी है२ ।

१ महान का रूप—

“यदेतत् विसृतं बीजं प्रधानपुरुषात्मकम् ।

महत्त्वमिति प्रोक्तं दृष्टितत्त्वं तदुच्यते ॥”

बुद्धितत्त्वं—सत्त्वसमुद्भेकात् निर्मलस्फटिकोपलक्षणं चिन्हाया-संक्रान्तिप्राप्तचैतन्यं पुरुषवस्त्रानात्मकाध्यवसेयविषयं निश्चितार्थ-करणमित्यर्थः ।

चरक में भी कहा है—

“शुद्धसत्त्वस्य या शुदा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते ।

यया भिन्नस्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥” इत्यादि ॥

२ कहा भी है—

“सात्विक एकादशकः प्रवर्तते वैकारिकादहङ्कारात् ।

भूतादेस्तन्मात्रः स तामसत्त्वजसामावात् ॥” स० का०

“तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता ।

तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषस्ततो द्विते ॥” वि० पु०

वि० मन्तव्य—यह भूत-प्राणी की उत्पत्ति का वर्णन है—जब उक्त अव्यक्त में विद्यमान आत्मा जीव-चेतयिता-पुरुष-चेतना धातु-शरीरी नामधेय-उचित परिस्थिति पाकर चेतना-गति-हर्कत उत्पन्न करता है—उत्पन्न होने लगता है तब—महान्-बोध-ज्ञान उत्पन्न होता है उससे या उसके पश्चात् अहंकार, अहंकार से या उसके पश्चात्—श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ या इन्द्रियों के अधिष्ठान-आदि २—उत्पन्न होने लगते हैं और काल परिणाम से शरीर एवं आत्मा का यौगिक प्राणी जन्तु उत्पन्न हो जाता है । दार्शनिक दृष्टि से—उत्पत्ति का प्रारम्भ होते ही समस्त शरीर का सूक्ष्म ढाँचा बन जाता है केवल उसका व्यक्ति भाव काल परिणाम से होता है । समय पाकर बीज ही वृक्ष, शुक्र शोणित ही प्राणी तथा समुद्र जल ही मत्स्य आदि का रूप = आकार धारण कर लेता है ॥४॥

तत्र बुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विषयाः, कर्मेन्द्रियाणां यथासङ्ख्यं वचनादानानन्दविसर्गविहरणानि ॥५॥

इन चौबीस तत्त्वों में बुद्धि (ज्ञान) इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । कर्मेन्द्रियों के विषय क्रमशः वचन (बोलना-वाणी का), आदान (ग्रहण करना हाथ का), आनन्द (उपस्थेन्द्रिय का), विसर्ग (पायु का) और विहरण (चलना पाँव का) कार्य हैं ॥५॥

अव्यक्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणि चेत्यष्टा प्रकृतयः, शेषाः षोडशविकाराः ॥६॥

अव्यक्त, महान् (बुद्धि), अहंकार और पञ्चतन्मात्र ये आठ प्रकृतियाँ हैं, शेष सोलह (ग्यारह इन्द्रियाँ और पञ्चभूत) विकार हैं—(किसी अन्य वस्तु को उत्पन्न नहीं करते१) ।

वि० मन्तव्य—अव्यक्त तो प्रकृति (कारण) है ही परन्तु महान् आदि भी प्रकृति हैं परन्तु—ये विकृति विकार-कार्य भी हैं क्योंकि ये उत्पत्ति काल में उत्पन्न होते हैं । और—सोलह तत्त्व—विकार-कार्य ही हैं इनसे

इनमें भूत परस्पर अनुप्रविष्ट हैं । यथा—“पूर्वः पूर्वां गुणस्वैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥” इससे “शब्दतन्मात्रात्-शब्दगुणं व्योमः, शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्रात्-वायुः, शब्दतन्मात्र स्पर्शतन्मात्रसहितात् रूपतन्मात्रात्-शब्द-स्पर्श-रूप-गुण-तेजः ॥”

इसी प्रकार से आगे-विस्तार के लिये इल्लूगाचार्य की टीका देखिये ।

१ “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदायाः प्रकृतिविकृतयः सप्त । — शेषाः षोडश विकाराः.....॥”

प्रकृति से अभिप्राय—तत्त्वान्तर को उत्पन्न करने से हैं । इसलिये बुद्धि, अहंकार, विकृति—प्रकृति दोनों हैं ।

अ० १]

शरीरस्थानम्

२८३

नवीन वस्तु की—या विलक्षण वस्तु-तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती केवल इनका संयोग तथा वृद्धि ही होती है। दृश्यमान शरीर इन्हीं २४ तत्त्वों से निर्मित रहता है। इसमें पुरुष—अर्थात् चेतना धातु पञ्चीसवाँ तत्व है—चेतना धातु अपि एकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः—अर्थात् अकेली चेतना धातु (आत्मा) का नाम भी पुरुष है और “खाऽऽदयः चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः” ( च० शा० अ० १ ) अर्थात् आकाश आदि पञ्च तत्त्व तथा चेतना के संयोग (प्राणी मात्र) का नाम भी आयुर्वेद दर्शन में पुरुष है ॥६॥

स्वः स्वरूपैषां विषयोऽधिभूतं, स्वयमध्यात्मम्, अधिदैवतम्—अथ बुद्धेनैक्षा, अहंकारस्थेश्वरः मनसस्त्रदमाः, दिशः श्रोत्रस्य, त्वचो वायुः, सूर्यश्चलुषः, रसतस्यापः, पृथिवी प्राणस्य, वाचोऽग्निः, हस्तयोरिन्द्रः, पादयोर्विष्णुः, पायोर्मित्रः, प्रजापतिरुपस्थस्येति ॥७॥

इन चौबीस तत्वों के अपने अपने विषय आधिभौतिक हैं, (मूर्तों के अधीन हैं)। स्वयं आध्यात्मिक हैं। अधिदैवत यथा—(जो जो देवता, विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ, वह वह उस तत्व का अधिष्ठाता है) वृद्धि का ब्रह्मा, अहंकार का ईश्वर, मन का चन्द्रमा, श्रोत्र का दिशा, त्वचा का वायु, चक्षु का सूर्य, रसना का जल, घ्राण का पृथिवी, वाणी का अग्नि, हाथों का इन्द्र, पाँव का विष्णु, पायु का मित्र और उपस्थ का प्रजा पति अधिष्ठाता है ॥

वि० मन्तव्य—इनके विषयों—गुणों का अधिष्ठानभूत है प्राणी है और इन सब का अधिष्ठान—आत्मा है, और इनके अधिकारी या अधिष्ठानभूत दैवत—शक्तिदाता या प्रेरक हैं—ब्रह्मा आदि। यह विषय एक दार्शनिक विषय है इसे समझ लेना या मान लेना दार्शनिक दृष्टि से उचित है ॥७॥

तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः पुरुषः पञ्चविंशतितमः कार्यकारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति। सत्यप्यचेतन्ये प्रधानस्य पुरुषकैवल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिगन्ति, स्त्रीरादींश्चात्र हैतुमुदाहरन्ति ॥८॥

इन प्रस्तुत सम्पूर्ण चौबीस तत्वों का वर्ग अचेतन (जड़) है। पुरुष (चेतन जीवात्मा) पञ्चीसवाँ तत्व है। कार्य (शरीर) और कारण (इन्द्रियाँ) इनके साथ संयुक्त होकर पुरुष—चेतयिता (चेतन्य का आश्रय) हो जाता है। जिस

१ (१) उपनिषद् मे भो कहा है— ‘अग्निर्वागं भूत्वा मुखं प्राविशत्’ (२) “वागध्यात्ममिति प्राहुः ब्राह्मणस्तत्त्वदर्शनः। वक्तव्यमधिभूतं तु वल्लिस्तत्राधिदैवतम् ॥” इसी प्रकार से बुद्धिरध्यात्मं, बोद्धव्यम् अधिभूतं, ब्रह्मा अधिदैवतम्—इत्यादि।

प्रकार से जड़ शीर (दूध) वत्स (बछड़े) की वृद्धि के लिये स्वयं क्षरता है, उसी प्रकार से स्वयं अचेतन (जड़भूत) प्रधान (प्रकृति) भी पुरुष के मोक्ष के लिये प्रवृत्त होती है। इस प्रकार से पंगु तथा अन्धे पुरुष के समान इनका संयोग है ॥

वि० मन्तव्य—यह सम्पूर्ण शरीर वस्तुतः अचेतन—जड़ है परन्तु लोहादि निर्मित यन्त्र (इंजन) के समान (गतिशील होने पर भी) जड़ नहीं है। पुरुष के संयोग से—कार्य (१६ विकार) एवं कारण (अध्या प्रकृति) मय शरीर—समस्त शरीर चेतन रहता है यहाँ तक कि वत्स को देखकर गौ का, सन्तान को देखकर माता का दूध भी गतिशील चेतन के समान चलने-वाला हो जाता है और अङ्ग-प्रत्यङ्ग की क्रिया का कहना ही क्या। तालयं यह है प्राणी का शरीर जड़ होने पर भी चेतना के संयोग से क्रियाशील बना रहता है उसके हृदय आदि यन्त्र विधिवत् चलते रहते हैं और कुछ यन्त्र (यथा मेषुनो-पयोगी अवयव और माता के दुग्धनिर्माता अवयव) समय समय पर क्रियाशील हो जाते हैं ॥८॥

अत ऊर्ध्वं प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यवैधर्म्यं व्याख्यास्यामः। तद्यथा—उभावप्यनादी, उभावप्यनन्तौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपि नित्यौ, उभावप्यनपरो, उभौ च सर्वगताविति, एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा वाजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चेति, बहुवस्तु पुरुषाश्चेतनावन्तोऽगुणा अबोजधर्माणोऽप्रसवधर्माणा मध्यस्थधर्मिणश्चेति ॥९॥

इसके आगे प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य की व्याख्या करते हैं। यथा—(प्रथम साधर्म्य)—दोनों ही अनादि (आदि कारण से शून्य), दोनों ही अनन्त (अविनाशी), दोनों ही अलिङ्ग (आकार रहित), दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर (परश्रेष्ठ—दोनों से कोई अधिक श्रेष्ठ नहीं, इसीलिये ऊपर है), और दोनों ही सर्वगत (व्यापक सम्पूर्ण मूर्त संयोगी) हैं। वैधर्म्य—इनमें प्रकृति अचेतन (जड़) एक है, त्रिगुण (सुख, दुःख, मोहात्मक या सत्त्व-रज-तमोगुण रूप), बीजधर्मिणी (बीज के धर्मवाली, उत्पादक शक्ति युक्त), प्रसवधर्मिणी (सगमांवरथा में—कार्यावरथा में परिणामिनी), अमध्यस्थधर्मिणी (सुख, दुःख, भोगवती) है। पुरुष (जीवात्मा) अनेक हैं, चेतन हैं, निगुण हैं, बीज धर्म रहित, प्रसवधर्म से शून्य, मध्यस्थधर्म (सुख दुःख से) रहित हैं ॥

१ कहा भी है— “वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरजस्य। पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्त्तते तद् अय्यवत्म् ॥” २ कहा भी है— (१) तस्मात् न वय्यतेऽध्या न मुच्यते।

२८४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

वि० मन्तव्य—साधर्म्य—समानधर्मता—समानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान हैं। वैधर्म्य—विपरीत धर्मता—असमानधर्मता—असमानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान नहीं हैं। बीजधर्मिणी—जैसे बीज में वृक्ष स्वरूप से विद्यमान होता है और आगे चलकर इतना बड़ा रूप (शरीर) धारण कर लेता है वैसे प्रकृति से ही सब मूर्तिमान्—रूप उत्पन्न होते हैं। प्रसवधर्मिणी—प्रकृति में से ही सब पदार्थों का प्रसवजन्य-प्रादुर्भाव होता है। अमध्यस्थ धर्मिणी—सुख दुःख आदि ज्ञान-गुण से रहित। जड़ होने से ज्ञान शून्य। और पुरुष—अबीजधर्माणः—प्रकृति के समान बीज के धर्मवाले नहीं, चेतना धातु में से कुछ विलक्षण वस्तु उत्पन्न नहीं होती। अप्रसवधर्माणः—प्रकृति के समान उसमें से किसी पदार्थ का प्रसव नहीं होता। मध्यस्थधर्माणः—सुख दुःख आदि के ज्ञान से युक्त—ज्ञानी-ज्ञानाधिकरण आत्मा-अनुभवो ॥६॥

तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैते विशेषाः सत्स्वरजस्तमांमया भवन्ति, तद्व्युत्तत्वात्तन्मयत्वाच्च तदुगुणा एव पुरुषा भवन्तीत्येके भाषन्ते ॥१०॥

कारण के अनुसार ही कार्य होता है, श्वेत तन्तुओं से श्वेत वस्त्र बनता है, इस न्याय से ये सब भूत मौलिक सम्पूर्ण कार्य, सत्त्व, रजः तमो रूप (सुख दुःख मोहात्मक) हैं। चूंकि उन्हीं के समान आकार होने से तथा बुद्धि में उसका प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण तन्मय होने से पुरुष भी सत्त्व, रज तमोमय होते हैं, ऐसा कई आचार्य मानते हैं।

नापि संसरति कश्चित्।

संसरति-व्यत्ये मुच्यते च नानाभया प्रकृतिः ॥

तस्मात् च विषम्यासात् सिद्ध साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।

कैवल्यमाध्यस्थं दुष्ट-वमकत्वाभावरुच ॥”

(२) “तस्मात् तत्संयोगादवचेतनं चेतनावल्लिगम् ॥”

१ “तस्मात्तत्र विविशोवास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चमस्यः ।

एते स्मृताः विशेषाः शान्ता धोराश्च मूढाश्च ॥”

जिस प्रकार से कि एक ही स्त्री रूप, यौवन, कुलशील से युक्त होने पर स्वामी को सुखी करती है, सुपलियों को दुःखी करती है, अन्य पुरुषों को मोहित करती है, इसी प्रकार से यह प्रकृति भी तीनों गुणवाली है। इसी प्रकार से स्फटिक मणि के पास रक्खा जासुदी का फूल स्फटिकमणि में चमकता है, बच्चा मणि में से फूल लेता चाहता है, इसी प्रकार से पुरुष के अव्यन्त समीप में आई प्रकृति में पुरुष के गुण चमकने लगते हैं—इसीलिये योगसूत्र में कहा है—“वृत्तिसारूप्यमितिरत्र ।” जिस प्रकार से मैले दर्पण में मनुष्य अपना मुख देखकर चिन्ता करने लग जाता है,

वि० मन्तव्य—कारण के अनुरूप—अनुकूल—समान रूप—मूर्तिवाला कार्य होता है यह कुछ विद्वानों का मत है सबका नहीं क्योंकि यह न्याय (सिद्धान्त)—अतिव्याप्ति रहित या निर्दोष नहीं है कारण के विरूप भी कार्य होते हैं यथा हरिद्रा-चूर्ण संयोग में लालिमा आदि आदि । इस सिद्धान्त को मानने-वाले निर्गुण पुरुष (आत्मा) को सगुण—सत्त्व, रजस् एवं तमस् गुणों से युक्त होते देखे जाते हैं और वैसे भी वह पुरुष-सत्त्वादि गुणमय बना रहता है ॥१०॥

वैद्यके तु—

स्वभावामीश्वरं कालं यदृच्छां नियतिं तथा ।

परिणामं च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शनः ॥११॥

वैद्यक शास्त्र में तो उदार बुद्धिवाले (दूरदर्शी, संकुचित विचार न रखनेवाले) लोकस्वभाव (अर्थात् तत्तद्वृद्ध से प्रतिबद्ध सहजधर्म या गुण), ईश्वर, काल, यदृच्छा (अनेक प्रकार की अचानक घटनाओं को उत्पन्न करनेवाली शक्ति) नियति (धर्माधर्म जनित फल) तथा परिणाम इनको ही प्रकृति (उपादान कारण) मानते हैं। परन्तु वास्तव में कुछ तो कारण नहीं बन सकते और कुछ निमित्त कारण हैं।

उसी प्रकार से सुख आदि का अन्तःकरण में प्रतिबिम्ब पड़ने पर अपने को सुखी अनुभव करता है। इसीलिये कहा है—

“तस्मिन्निचिद दर्पणस्फोटसमस्तवास्तुदृष्टयः ।

इमास्ताः प्रतिबिम्बन्ति सरसीव तटद्वमाः ॥”

१ कुछ आचार्य इसका अर्थ इस प्रकार से करते हैं—

वैद्यक शास्त्र में—विपुल बुद्धिवाले विद्वान् स्वभाव, ईश्वर, काल, यदृच्छा, नियति और परिणाम इन छे को कारण मानते हैं। यथा—

स्वभाव—कांटों में तीक्ष्णता, मृग-पक्षियों के विश्व विचित्र रङ्ग, मरिच में कटुता स्वभाव से ही है।

ईश्वर—मनुष्य जड़ है, आत्मा-सुख-दुःख का स्वामी नहीं है। ईश्वर को प्रेरणा से स्वर्ग-नरक में जाता है।

काल—काल ही सृष्टि को स्थिति प्रलय का कारण है—‘कालः कलयतामहम् ॥’

यदृच्छा—जो स्वयं उत्पन्न हो जाता है—यथा तूण और अरणि के संयोग से अग्नि उत्पन्न हो जाती है, इसी प्रकार संसर स्वयं बन जाता है।

नियति—धर्म-अधर्म ही सब की उत्पत्ति में कारण है।

परिणाम—प्रधान (प्रकृति) ही महद-अहंकार आदि रूप में बदलकर सब को उत्पन्न करता है। आयुर्वेद शास्त्र में इन छे के उदाहरण मिलते हैं। यथा—

अ० १]

शारीरस्थानम्

३८५

वि० मन्तव्य—पृथुदर्शी एकग्रही-एकान्त ग्रहण करनेवाले या आग्रही नहीं होते अतः वे कोई एक ही प्रकृति ( कारण ) नहीं मानते अपितु अनेक कार्यों के अनेक कारण मानते हैं और यह उचित भी है। यहन्ता—जो कार्य जिस कारण से उत्पन्न हो जाता है वही उसका कारण मान लिया जाता है, दूसरे शब्दों में—अलक्षित कारण से कार्य की उत्पत्ति “यहन्ता” कही जाती है। देखिये चि० अ० १८ श्लो० ४१—यद्यपि अर्बुद पक्ता नहीं है परन्तु कभी २ अष्टद्वय कारण से पक भी जाता है ॥११॥

तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येव चादिशेत् ।

तैश्च तत्त्वक्षणः कृत्स्नो भूतग्रामो न्यजन्व्यत ॥१२॥

तस्योपयोगोऽभिहितश्चिकित्सां प्रति सर्वदा ।

भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते । १३

वास्तव में भूत (पञ्चमहाभूत) तन्मय (प्रकृतिमय) हैं।

कार्य और कारण में भेद न होने से एवं प्रकृति के सत्व, रज, तम गुणोंवाले हैं—चूँकि कारण के अनुरूप ही कार्य होते हैं। इन महाभूतों से तत्त्वक्षण (भूतों के लक्षणों से युक्त)। सम्पूर्ण भूतग्राम (स्थावरजङ्गमात्मक) उत्पन्न हुए। इस भूतग्राम का सदा से ही चिकित्सा के लिए उपयोग किया जा रहा है। क्योंकि चिकित्साशास्त्र में भूतों से पर (श्रेष्ठ, क्षेत्रज्ञ, अव्यक्त आदि)

स्वभाव—

(१) अङ्ग-प्रत्यङ्ग-निर्वृत्ति-स्वभाववादेव जायते ।

(२) धातुषु क्षीयमाणेषु वर्धते द्वाविमो सदा ।

स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशादिति स्थितिः ॥

(३) स्वभावाल्लघवो मृदुगाः तथा लावकपिञ्जलः ॥

ईश्वर—जाठरो भगवान्निरीस्वरोऽनस्य पाचकः । काल—‘महाभूतविशेषास्तु शीतोष्णद्रव्यभेदतः । काल इत्यध्यवस्थितिः’ ॥११॥

यदुच्छा—यदुच्छाचोपगतानि पाकं, पाकक्रमेणोपचरेद् विधिज्ञः ।

नियति (धर्माधर्म)—

(१) ‘ब्रह्मस्योऽज्जनवधपरस्वरहणादिभिः ।

कर्मभिः पापयोगस्य प्रादुः कुण्डस्य संभवम् ।

(२) कर्मजा व्याधयः केचित् ।

परिणाम—

(१) जाठरानेस्तु संयोगात् यदुदेति रसान्तरम् ।

रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥

(२) ता एवोपधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्यं बलवत्यो हेमन्ते भवन्ति ।

(३) सम्यक्परिणतस्याहारस्य सारो रसः ।

(४) वालानां वयःपरिणामात् शुक्लप्रादुर्भावो भवति ।

ऊपर अर्थ कबिराज हाराणचन्द के अनुसार दिया है।

का (जीवात्मा का) चिकित्सोपकरण रूप में विचार ही नहीं किया जाता है ॥

वि० मन्तव्य—प्रकृति पुरुष (जड़ चेतन) मय भूत—प्राणी हैं अतः वे भी प्रकृति पुरुष के गुणों से युक्त हैं और उन भूतों से—तत्त्वक्षण-भूतों के लक्षणोंवाला (वस्तुतः प्रकृति पुरुष के लक्षणोंवाला) समस्त भूत समूह (प्राणि जगत्) प्रादुर्भूत हुआ था और होता है—होता रहेगा। और चिकित्सा शास्त्र में इसी भूत समूह का उपयोग होता है अर्थात् चिकित्सा के उपकरण भी और उपकार्य भी यही भूत हैं और भूतों (प्राणियों) से परे—आगे—ऊपर—चिकित्सा शास्त्र में चिन्ता-विचार ही नहीं किया जाता या किया गया है—रोगी भी भूत है और वनस्पति, वानस्पत्य वीरुध तथा ओषधी भी भूत है, और खनिज पदार्थ भी भूत परन्तु अन्य भूत से मिलकर क्रियाशील होते हैं अन्यथा नहीं। तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः १—संस्वेदज, २—जरायुज, ३—अण्डज, ४—उद्भिज संज्ञः स० सू० अ० १। अर्थात् स्वेद—प्राणी का और मृमि आद का स्वेद, इससे प्रादुर्भूत—जूर्प, मच्छर आदि, जरायु—जेरेजेडी में प्रादुर्भूत-मानव, गौ, घोड़ा आदि, अण्ड से प्रादुर्भूत-पक्षी, सर्प आदि और उद्भिज-बीज, पौदा, घास आदि से प्रादुर्भूत वृक्ष, पौदा, घास आदि। बस यही जगत्, संसार या सृष्टि है—गच्छति इति जगत्, संसरति इति संसारः (गम्लु)—गती सृ—गती धातुः—जो गति करता है—ज्ञान, गति (चलना) तथा प्राप्ति करता है, प्राणि मात्र में यह तीनों गुण हैं, स्थावर प्राणी में गति—स्थानान्तर प्राप्ति मले ही न हो, पर वह भी—ज्ञान एवं प्राप्ति—आदान अवश्य करता है। इसी जगत् या संसार का विचार आयुर्वेद में किया गया है, आयुर्वेद दर्शन इसी को देखता है मानता है और समझता है ॥१३॥

यतोऽभिहितं—“तत्संभवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तः” (सू० अ० १); भौतिकानि चैन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते, तथेन्द्रियाथोः ॥१४॥

क्योंकि पहले कहा है कि—‘पुरुष’ के ग्रहण से ही पुरुष से उत्पन्न होनेवाले शुक्ल शोणित आदि द्रव्यसमूहों (जिनका कारण पृथिवी आदि पञ्चमहाभूत हैं) का भी ग्रहण हो जाता है, ऐसा समझना चाहिये। आयुर्वेद शास्त्र में इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के विषय शब्दादि भी भौतिक ही कहकर वर्णन किये जाते हैं ॥

१ यथा—लोको हि द्विविधः—स्थावरो जङ्गमश्च । तत्र पुरुषः प्रधानं तस्योपकरणमन्यत् ॥

२ कहा भी है— खं श्रोत्रे स्पशने वायुदर्शने तेज उत्कटम् । सलिलं रसने भूमिर्घ्राणे तज्जीर्णरूपितम् ॥

२८६

सुश्रुतसंहिता

[ ३०१ ]

आयुर्वेद शास्त्र का इन्द्रियों के विषय में सांख्यशास्त्र से जो भेद है—उसको स्पष्ट करते हैं—सांख्यशास्त्र में इन्द्रियों की उत्पत्ति अहंकार से, मूतादि (तामसिक) अहंकार से पञ्चतन्मात्र की उत्पत्ति मानकर इनसे पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी है। परन्तु आयुर्वेद में—

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में (यहाँ) श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ भौतिक मानी जाती हैं और उनके शब्द आदि विषय भौतिक माने जाते हैं क्योंकि—॥१४॥

भवति चात्र—

इन्द्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः।

नियतं तुल्ययोनिश्वात्रान्येनान्यमिति स्थितिः ॥१५॥

मनुष्य इन्द्रियों द्वारा निश्चित इन्द्रिय के अर्थ (विषय) का ही ग्रहण करता है। क्योंकि—इन्द्रिय तथा इन्द्रिय के विषय के कारण समान हैं। इसलिये अन्य विषय को इन्द्रिय ग्रहण नहीं करती है ॥१५॥

मनुष्य श्रोत्र द्वारा शब्द को ही सुनता है, गन्ध को नहीं ग्रहण कर सकता। चूँकि श्रोत्र तथा शब्द कारण समान हैं (आकाश ही दोनों की योनि है)। इसलिये आकाश गुण शब्द को ग्रहण करने के लिये आकाश इन्द्रिय चाहिये। इसलिये अनुमान द्वारा कह सकते हैं—

“घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपदिषु मध्ये गंधस्वेव व्यञ्जकत्वात्। कुंकुमगंधाऽभिन्व्यञ्जकभूतादिवत् ॥”

न चायुर्वेदशास्त्रेपूदिर्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, असर्वगतेषु च क्षेत्रज्ञेषु नित्यपुरुषव्यापकान् हेतुतुदाहरन्ति, आयुर्वेदशास्त्रेऽसर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु संचरन्ति धर्माधर्मनिमित्तं, त एतेऽनुमानप्राह्याः परमसूदमाश्चेतनावन्तः शाश्वता लोहितरेतसोः सन्निपातंऽन्विष्यज्यन्ते, यतोऽभिहितं—“पञ्चमहाभूतशरीरसिमवायः पुरुषः” (सू० अ० १) इति, स एष कमपुरुषश्चिक्तासाधिष्ठतः ॥१६॥

आयुर्वेद शास्त्र में क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा पुरुष) को सर्वगत नहीं मानते अपितु नित्य कहते हैं और असर्वगत क्षेत्रज्ञों में नित्य कहते हैं। अणु आत्मा को प्रतिपादन करने के लिये पुरुष की नित्यता को बतानेवाले कारणों को कहते हैं।

शब्दो विहायसः सशो वायवीयः प्रकीर्तितः।

रूपमानेयमाप्योऽत्र रसो गन्धस्तु पार्थिवः ॥

१ आत्मा को विमु माननेवाले यथा—

“वालाप्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।

सागो जीवः स विज्ञेयः स च नन्यथाय कल्पते।

विशुद्धे अन्तःकरणे आत्मानो विभुत्वं दर्शयति ॥” सत्कारण

रहित वस्तु नित्य है। भोज न भी कहा है—

“शुभाशुभाभ्यां कर्मभ्यां प्रेरणामनसो गतिः।

देहाहंहान्तरं याति कृमिवत् शाश्वतोऽव्ययः।

नित्य इत्युच्यते सद्भिः धनं कारणवान् यतः ॥”

आयुर्वेद शास्त्र के सिद्धान्त से धर्म और अधर्म के कारण ही असर्वगत (अणु) और नित्य क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा-आत्मा) तिर्यग्योनि-देवयोनि और मनुष्ययोनि में विहार करता फिरता है। इन आत्माओं को हम अनुमान द्वारा ही जान सकते हैं। ये आत्मायें अतिसूक्ष्म, चेतन, नित्य हैं। तथा शुक्र एवं शोणित के संयोग होने पर ही (जिस प्रकार कि सूर्यकांतमणि के लैन्स द्वारा घास के जलने पर ही सूर्य की किरणों को अनुमान द्वारा ही जानते हैं) स्पष्ट होती हैं। इसलिये कहा है कि पञ्चमहाभूत और आत्मा के संयोग का नाम ‘पुरुष’ है और यही कर्मफल भोगी पुरुष चिकित्सा का अधिकरण है ॥१६॥

तस्य सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नः प्राणापानानुमेप-निमेषौ बुद्धिर्मनःसङ्कल्पो विचारणा स्मृतिर्विज्ञानमध्य-वसायो विषयोपलब्धिश्च गुणाः ॥१७॥

इस कर्मफल भोगी शरीर—आत्मा एवं मन का संयोग होने पर जो गुण उत्पन्न होते हैं—वे कहते हैं, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन का संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय (निश्चयात्मक बुद्धि) और विषय का ज्ञान (इन्द्रिय द्वारा) ये गुण हैं। ये सोलह गुण हैं, इन्हीं को ‘कला’ शब्द से उपनिषदों में कहा है। ये गुण आत्मा में रहते हैं—इसलिये गुणों को आत्मा कहते हैं ॥१७॥

सात्विकास्तु—आनुराश्यं संविभागरुचिता तितिखा सत्यं धर्मं आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिर्मधा स्मृतिर्धृतिरनभि-षङ्गश्च; राजसास्तु-दुःखबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च; तामसास्तु—विषादित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेनिरा-धोऽज्ञानं दुर्मधस्त्वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति ॥१८॥

मन के सात्विक आदि गुणों को कहते हैं—

आनुराश्यं (कृर कर्म का न करना, दया), संविभागरुचिता (बाँटकर खाने की इच्छा), तितिखा (द्वन्द्व सहिष्णुता) सत्य, धर्म, आस्तिकता, ज्ञान, बुद्धि (तत्काल विषय सूझना), मेधा (ग्रन्थावधारण शक्ति), धृति (धैर्य), स्मृति, अनभिषंग (अनासक्ति-निष्कामता) ये सात्विक गुण हैं।

दुःख की अधिकता, अटनशीलता (धूमने-फिरने की प्रवृत्ति), अधीरता, अहङ्कार, आनृतिकत्व (मिथ्यावचनशीलता) अकारुण्य (निर्दयता), दम्भ (छल-कपट), मान, हर्ष, काम और क्रोध ये राजस गुण हैं।

१ चरकसंहिता में कहा है—

“सत्वमात्मा शरीरञ्च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्।

लोकस्तितृष्टि संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

स पुमाश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम्।

वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं सम्प्रकाशितः ॥”

४०२]

शारीरस्थानम्

२८९

विषादिव ( अप्रसन्नता ), नास्तिकता, अवमंशीलता, बुद्धि का कुन्द होना, अज्ञान, दुर्मेधा ( दुष्ट बुद्धि ), अकर्मशीलता ( काम न करना आलस्य ), निद्रालुत्व ( निद्राधिक्य ) ये तामसगुण हैं ॥ १८ ॥

आन्तरिक्षः—शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्त्ता च; वायव्यास्तु-स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टा-समूहः सर्वशरीरस्पर्शद्वयं लघुता च, तैजसास्तु—रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पत्किरमषस्तेदण्यं शौर्यं च, आप्यास्तु—रसो रसनेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शौर्यं स्नेहो रेतश्च, पार्थिवस्तु—गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्व-मूलेसमूहो गुरुता चेति ॥ १९ ॥

महामृतों के गुणों को कहते हैं—शब्द, शब्देन्द्रिय (श्रोत्र), सम्पूर्णछिद्रता ( अवकाश ) तथा शिरा-स्नायु आदि का परस्पर पृथक् होना आकाश का गुण है । स्पर्श, स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ), नमन-उन्नमन आदि सम्पूर्ण चेष्टायें तथा सम्पूर्ण शरीर में स्नदन ( गति का होना ) एवं लघुता ( हल्कापन ) वायु का गुण है । रूप—रूपेन्द्रिय ( आँख ), वर्ण ( गौरादि ), संताप, भ्राजिष्णुता ( दीप्तता ) पत्कि ( आहार की परिणति ), अमर्ष ( क्रोध ), तीक्ष्णता ( आशुक्रिया ) और शौर्य ( शूरता ) अग्नि के गुण हैं । रस, रसनेन्द्रिय ( जिह्वा ), सम्पूर्ण दौष-धातु समूहों में द्रवत्व, भारीपन, शीतलता, स्नेह और रेतः ( वीर्य ) ये जल के धर्म हैं । गंध, गन्धेन्द्रिय ( नासिका ), सम्पूर्ण पदार्थों में काठिन्य, भारीपन पृथ्वी के धर्म हैं ॥ १९ ॥

तत्र सत्त्वबहुलमाकाशं, रजोबहुलो वायुः, सत्त्वरजो-बहुलोऽग्निः सत्त्वतमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथिवीति । इनमें आकाश सत्त्व प्रधान, वायु रज प्रधान, अग्नि सत्त्व एवं रज प्रधान, जल-सत्त्व एवं तम प्रधान और पृथ्वी तम प्रधान है ॥ २० ॥

श्लोको चात्र भवतः— अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् । स्वे स्वे द्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्तं लक्षणमिष्यते ॥ २१ ॥ दो श्लोक कहे भी हैं—ये पञ्चभूत परस्पर एक दूसरे में अनुप्रविष्ट ( घुसे ) हुए हैं । अर्थात् एक के धर्म दूसरे में भी आ जाते हैं । यथा—आकाश का गुण शब्द वायु में, वायु

१ (१) अथवा सम्पूर्ण भूत परस्पर सब भूतों में प्रविष्ट हैं । अर्थात्-आकाश में—शब्द गुण के साथ पृथ्वी-जल-तेज और वायु के भी गुण प्रविष्ट हैं । परन्तु अणुमात्र में है, इसलिये स्पष्ट नहीं होते, जहाँ पर इनकी अधिकता रहती है, वहाँ पर स्पष्ट होते हैं । गौतम ऋषि ने भी कहा है—'विष्टं ह्युपरं परेण'—एक भूत दूसरे अगले भूत में प्रविष्ट हुआ है ।

का स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप गुण अगले भूतों में पहुँच जाता है । परन्तु अपने-अपने द्रव्य में ही इनके अपने विशेष गुण का प्रकाशन होता है ॥ २१ ॥

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराः षोडशैव तु । क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतन्त्रपरतन्त्रतः ॥ २२ ॥

इस अध्याय में स्वतन्त्र ( अपने सिद्धान्त से ) और परतन्त्र ( सांख्य-सिद्धान्त से ) दृष्टि से आठ प्रकृतियाँ, और सोलह विकार तथा क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) का वर्णन संक्षेप में कर दिया है ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सर्वभूतचिन्ता-शारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः

अथातः शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

शुक्र और शोणित के संयोग से क्षेत्रज्ञ आत्मा की अभिव्यक्ति होती है, यह प्रथम कहा है, इसलिये शुक्र और शोणित के स्वरूप को बताने के लिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ।

वि० मन्तव्य—इस शास्त्र में मानव प्राणी के शरीर की रचना तथा क्रिया का वर्णन है अतः उसीके शुक्र एवं शोणित का वर्णन इस अध्याय में किया गया है ॥ १, २ ॥

वात पित्त श्लेष्म-कुण्प-प्रन्थि-पूतिपूय-क्षीण-मूत्रपुरीष-रेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति ॥ ३ ॥

सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, इसके लिये दूषित शुक्र को कहते हैं—

वात, पित्त, कफ से दूषित, रक्त से दूषित ( रक्त मिश्रित या रक्तिया शुक्त ) कुण्प ( मुर्दे की गन्धवाला अथवा जिसमें शुक्रकीट मृत हो गये हों ), प्रथित ( गाँठवाला ), पूति ( दुर्गन्ध युक्त ), पूय ( मवाद-पस युक्त ), क्षीण ( जिनका वीर्य क्षीण हो गया है ), जिनके वीर्य में मल मूत्र की गन्ध आती है,

(२) वायु का स्पर्श—अनुष्णशीत है । अग्नि के साथ मिलकर उष्ण स्पर्श, जल के साथ मिलकर शीत स्पर्श देती है ।

जल में भी आकाश विद्यमान है, व्यापक होने से, जल में वायु भी विद्यमान है, बुलबुले उठने से, जल में अग्नि भी विद्यमान है, क्योंकि अग्नि वहाँ से उत्पन्न होती है ( अदृश्योऽग्निः ), भूमि भी अणुरूप से जल में व्याप्त है । इस प्रकार से सब भूत परस्पर प्रविष्ट हैं ।

२८८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

ऐसे पुरुष संतानोत्पत्ति में समर्थ नहीं होते। ॥ ३ ॥

तेषु वातवर्णवेदनं वातेन, पित्तवर्णवेदनं पित्तेन, श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा, कुणपगन्धन्यनरूपं च रक्तन, प्रन्थिभूतं श्लेष्मवाताभ्यां, पूतिपूयनिभं पित्तश्लेष्मभ्यां, क्षीणं प्रागुक्तं पित्तमास्ताभ्यां, मूत्रपुरीषगन्धि सन्निपातेनेति। तेषु कुणपप्रन्थिपूतिपूयक्षीणरेतसः कृच्छ्राध्याः, मूत्रपुरीषरेतसस्वसाध्या इति ॥ ४ ॥

वायु के कारण शुक्र के दूषित होने पर वीर्य में लाल-काला वर्ण तथा वातजन्य-तोद, भेद आदि वेदनायें होती हैं। पित्त के कारण शुक्र के दूषित होने पर, पीला नीला वर्ण तथा ओष-चोष आदि वेदनायें होती हैं। कफ के कारण शुक्र के दूषित होने पर श्वेत वर्ण तथा कण्डू आदि वेदनायें होती हैं। रक्त के कारण दूषित शुक्र में मुर्दे के समान गन्ध तथा मात्रा में अधिक एवं रक्तवर्ण और ओष-चोष आदि वेदनायें होती हैं। कफ और वायु से दूषित वीर्य प्रन्थि रूप ( बहुत गांठवाला ) हो जाता है। पित्त और कफ के कारण दूषित वीर्य दुर्गन्ध युक्त तथा मवाद मिश्रित होता है। पित्त और वायु के कारण से वीर्य क्षीण हो जाता है, क्षीण वीर्य के लक्षण प्रथम कह चुके हैं। सन्निपात के कारण वीर्य में मूत्र और मल की गन्ध आने लगती है।

१ मल और मूत्र के वीर्य में आने से भगन्दर रोग होते हैं। जैसे कहा भी है—

“वातमूत्रपुरोपाणि क्रमयः शुक्रभेव च ।

भगन्दराः स्वनत्स्तु नाशयन्ति तमातुरम् ॥”

२ चरकसंहिता में दोषों से दूषित वीर्य के लक्षण निम्न कहते हैं—

“फेनिलं तनु रुक्षञ्च कृच्छ्रेणाल्पञ्च मास्तात् ।

भवत्युपहतं शुक्रं न तद् गन्धाय कल्पते ॥

सन्मिलमथवा पीतमयुष्णं पूतिगन्धित्वा ।

दहर्लिङ्गं विनियति शुक्रं पित्तेन दूषितम् ॥

श्लेष्मणा रुद्वमार्गन्तु भवत्यल्पयथिपिच्छलम् ।

इति दोषाः समाख्याताः शुक्रस्य तु विशेषतः ॥” चरकः

शुक्रस्य के लक्षण— शुक्रस्य मेद्वृषणयोर्वेदनाशक्तिर्मथुने, विराद वा प्रसंकः प्रसंके चाल्यरक्तशुक्रदर्शनञ्च ॥ सु० सू० अ० १५ ।

शुक्राभाव ( Aspermia ), शुक्र का कम होना ( Oligospermia ), शुक्र का पतला होना ( Hydrospermia ), शुक्र में रक्त मिला होना ( Hoemospermia ), शुक्रकीट का निर्जीव होना ( Necrozoospermia ), शुक्रकीटों का कम होना ( Oligo zoospermia ), शुक्रकीटों का न होना ( Azoospermia ), शुक्र में पीलापन ( Pyo-spermia ) कहते हैं। विस्तार के लिये वैद्यजयदेव का सुश्रुत बारोर देखिये।

इनमें कुणप-प्रन्थि-पूति-पूय-क्षीण-वीर्यवाले व्यक्ति कष्टसाध्य हैं। मूत्र-मलमिश्रित वीर्यवाले व्यक्ति असाध्य हैं। शेष, वात, पित्त, कफ रक्त से दूषित वीर्यवाले व्यक्ति साध्य हैं।

वि० मन्तव्य—वात, पित्त तथा कफ से दूषित शुक्र के स्वल्पन के समय उक्त वेदनायें होती हैं ॥ ४ ॥

आर्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तैश्चोपसृष्टमबीजं भवति; तदपि दोषवर्णवेदनादिभिर्विज्जयम्। तेषु कुणपप्रन्थिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशसमाध्यं, साध्यमन्यन्चचेति ॥ ५ ॥

आर्तव भी वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों से, रक्त से, दन्द्दों से (वात, पित्त, वातकफ, पित्तकफ) और सन्निपात रूप से दूषित होने पर प्रजोत्पादन में असमर्थ होता है। इस आर्तव में भी दोषों के अनुसार वर्ण और वेदनायें समझनी चाहिये।

इनमें भी कुणप, प्रन्थि, पूति, पूय, क्षीण मूत्र, मल सहसा आर्तव असाध्य हैं और शेष साध्य हैं।

वि० मन्तव्य—वातादि से दूषित आर्तव में मासिक स्नाय या प्रदर हो जाने पर उक्त वेदनायें होती हैं। इनमें भी कुणप, प्रन्थि, पूति, पूय तथा क्षीण आर्तव कष्टसाध्य होते हैं और मूत्र पुरीषगन्धी असाध्य होते हैं। इस प्रकार आर्तव ( शोणित ) भी प्रजोत्पादन में असमर्थ होता है ॥ ५ ॥

भवन्ति चात्र—

तेष्वद्यान् शुक्रदोषाखीन् स्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् ।

क्रियाविशेषैर्मितास्तथा चोत्तरवस्तिभिः ॥ ६ ॥

कहा भी है—इनमें से आदि के ( वात, पित्त, कफ ) तीन शुक्रदोषों को स्नेहन-स्वेदन द्वारा ( वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन, उत्तरवस्ति ) तथा विशेष चिकित्सा-द्वारा और रसायन औषधियों से तथा उत्तरवस्ति द्वारा ( दोषों के अनुसार ) चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६ ॥

पाययेत् तं नरं सर्पभिषक् कुणपरेतसि ।

धातकीपुष्पखदिरदाडिमाजुनसाधितम् ॥ ७ ॥

पाययेदथवा सर्पिः शालसारदिसाधितम् ।

प्रन्थिभूते शटीशिङ्गं पाठाशे वाडपि भस्मनि ॥ ८ ॥

पुरुषकवटादिभ्यां पूयप्रख्ये च साधितम् ।

प्रागुक्तं वद्यते यच्छ तत् कार्यं क्षीणरेतसि ॥ ९ ॥

वितप्रभे पाययेत् सिद्धं चित्रकोडीरहिजुभिः ।

स्तिग्धं वान्तं विरिक्तं च निरुद्वमनुवासितम् ॥ १० ॥

योजयेत्कुक्कुदोषात् सम्यग्गुत्तरवस्तिना ।

कुणपगन्धी शुक्रदोष में वैद्य को चाहिये कि रोगी को धाय के फूल खदिर (वैर की छाल) अनार (की छाल) तथा अर्जुन की छाल से साधित घृत अथवा शालसारदिगण के कल्क एवं क्वाय के साधिर घृत रोगी को पिळावें। प्रन्थिभूत (गांठदार) वीर्यदोष में

अ० २]

३७

शारीरस्थानम्

२८६

शठी (कचूर) द्वारा सिद्ध अथवा पलाशभस्म (पलाश की राख या पलाशधारजल) में साधित घृत पिठाना चाहिये। पूर-नामक वीर्यदोष में पुरुषकादि या वटादिगण द्वारा साधित घृत रोगी को पिठावे। क्षीणवीर्य की अवस्था में दोषादिविज्ञानीय में कहे स्वयोनिवर्धक द्रव्यों का उपयोग तथा क्षीणवलीय नामक अथवा में कही विधि को बरतना चाहिये। मल मूत्र गंधि शुक्-दोष में चित्रक, खस और हींग से साधित घी का प्रयोग करना चाहिये। शुक्दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रथम स्नेहन, वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन आदि कम करने के पश्चात् उत्तर-बस्ति का यथाविधि प्रयोग करना चाहिये। ॥ ७-१० ॥

स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च ॥११॥ शुक्रमिच्छन्ति, केचित्त तैलक्षोदनभिं तथा। विधिमुत्तरबस्त्यन्तं कुयोदातं वशुद्धये ॥१२॥

(१) वृत्तसाधन का नियम— वृत्तादिकरणनेकितर्गणे स्यात् स्नेहप्रविधौ। तथैव कल्कनिर्युहाविष्येते स्नेहवेदिना ॥ क्वाथ से आठगुणा जल, शेष चतुर्थांश, वृत्त क्वाथ से चतुर्थांश, कल्क घृत से चतुर्थांश है।

(२) चरक में— वातान्तिते हितः शुक्ले निरुहाः सानुवासनाः। अभयामलकीयञ्च पित्तं शस्तं विरेचनम् ॥ मागध्यमृतलोहानां त्रिफलाया रसायनम्। कफोद्भवं शुक्दोषं हृत्पाद भल्लातकस्य च ॥ वाजीकरणीययोगैस्तैरप्युक्तैः शुभैः हितम्। रक्तपित्तहरेः योगैः योनिव्यापदिकैस्तथा ॥ दुष्टं तावत् यदा शुक्लं तदा तत् समुपाचरेत्। घृतं यज्जावनायोक्तं च्यवनप्राश एव च ॥ गिरोजस्य प्रयोगश्च रेतोदोषान् व्यपोहति ॥ तंत्रातरोय प्रयोग—अमृतसारलोह, अमृतप्राशघृत, गोधूमा-विघृत देने चाहिये।

(३) घातकोघृत—आदि तीनों घी क्वाथ एवं कल्क में सिद्ध होंगे। मात्रा आधा तोला। (४) सालसारदि, वटादि और पुरुषकादिगण के लिये सूत्र-स्थान देखिये। (५) पलाशघृत—पलाशभस्म एक आदक, पानी छे आदक में सात बार छानकर एक आदक, पानी में एक प्रस्थ घी पकाता चाहिये। रक्तगुल्म में पलाशघृत की विधि—पलाशधारतोयिन सपि-सिद्ध पिबेच्च सा।

(६) उत्तरबस्ति के लिये चरकसिद्धिस्थान या छंभह देखिये।

शुद्ध शुक्र की परीक्षा—

शुद्ध वीर्य—स्फटिक मणि के समान श्वेत (जरा-सी नीली झाँके लिये), द्रव (तरल) स्निग्ध (चिकनाहट शुक्र), मधुर (रस में) और मधु के समान गन्धवाला होता है। कई आचार्यों की मान्यता है कि शुद्ध वीर्य तिल तैल और मधु के समान वर्ण में तथा षट होता है, ऐसा वीर्य प्रजा-उत्पादन में समर्थ है ॥ ११,१२ ॥

क्षीणां स्नेहादियुक्तानां चतसृष्वार्त्तावतिष्ठु। कुयोः कल्कान् पिच्छंश्चापि पथ्यान्याचमनानि च ॥ प्रन्थिभूते पिबेत् पाठां ज्यूषणं वृक्षकाणि च। दुर्गन्धिपूयसङ्घाशे मञ्जतुलये तथाऽऽतंवे ॥१४॥ पिबेद्द्रवश्रयः क्वाथं चन्दनक्वाथमेव च। शुक्रदोषहराणां च यथास्वमवचारणम् ॥१५॥ योगानां शुद्धिकरणं शेषास्वप्नार्त्तावतिष्ठु।

अन्नं शालियवं मद्यं हितं मांसं च पित्तलम् ॥१६॥ आर्त्तवशुद्धि के लिये उत्तरबस्ति पथ्यन्त शुक्रदोषों में कही चिकित्सा करनी चाहिये। वात, पित्त, कफ और रक्तजन्य आर्त्तव दोषों के लिये स्नेहन आदि कर्मों के साथ साथ योनि में कल्क, पित्रु, पथ्य आचमन (योनिप्रक्षालन—वातादिदोषहर, क्वाथ द्रव्यों से बने) का प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तव के प्रन्थि-युक्त होने पर पाठा, ज्यूषण (चिकट) और वृक्षक (इन्द्रजो) इनका क्वाथ पीना चाहिये। यदि आर्त्तव दुर्गन्धित पूय के समान अथवा मञ्ज के तुल्य हो तो मद्रश्रय (हरि-चन्दन-व्यवहार में देवदारु) और चन्दन (श्वेत चन्दन) इनका क्वाथ पिठाना चाहिये। वातादि एकदोषजनित आर्त्तव की शुद्धि के लिये शुक्रदोषनाशक पूर्वोक्त स्नेह स्वेदादि कर्म तथा योगों (रसायन, वाजीकरण, मूत्रदोषनाशकप्रयोग) -दोषों के अनुसार—प्रयोग करना चाहिये। आर्त्तवपीडा में—भोजन

१ (१) चरक ने शुद्ध शुक्र के लक्षण निम्न कहे हैं—स्तिग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च।

(२) स्फटिक मणि के समान श्वेत वर्ण शुक्र श्वेतगौर वर्ण संतान को, तैल वर्ण शुक्र कृष्ण वर्ण और मधु वर्ण शुक्र व्यामवर्ण संतान को उत्पन्न करता है। दिवार पर फंका शुक्र नीचे नहीं बहता।

(३) वैद्य जयदेव ने 'मधुर' शब्द का अर्थ—Natural in Recation किया है। यथा—The seminal fluid is viscous, Natural or Alkaline in recation है। इसको गन्ध खास होती है, जो किसी से नहीं मिलती। शुद्ध वीर्य का दाग साधारणतः घोने पर साफ नहीं होता।

२ आचमन—उत्तरबस्ति तथा योनिप्रक्षालन के लिये त्रिप-लाक्वाथ बरतना चाहिये।

२९०

मुश्रुतसंहिता

[ ७० ]

के लिये शालि साठी ( हेमन्त धान्य ), जो, मद्य, तथा पित्त-वर्धक मांस हितकारी है ॥ १३-१६ ॥

अगस्त्यप्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षणस्योपमम् ।

तदार्त्तवैः प्रअंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ॥ १७ ॥

शुद्ध आर्त्तव की परीक्षा—जो आर्त्तव खरगोश के रक्त के समान रङ्ग में तथा घनता में होता है, अथवा लाख के पानी के समान होता है, वस्त्र पर शुष्क हुआ आर्त्तव धोने से कपड़े पर चब्बा नहीं छोड़ता, वह रज गर्भ धारण करने के योग्य होता है ॥ १७ ॥

तदेवाति प्रसङ्गेन प्रवृत्तमनुतावपि ।

असृग्दरं विज्ञानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणं ॥ १८ ॥

असृग्दरो भवेत् सर्वः साङ्गमर्दः सवेदनः ।

तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्च्छा तमस्त्रुषा ॥ १९ ॥

दाहः प्रलापः पाण्डुरवैः तन्द्रा रोगाश्च वातजाः ।

यहाँ आर्त्तव जब ऋतुकाल में भी अधिक मात्रा में आता है, अथवा अधिक दिनों तक चालू रहता है, या ऋतुकाल के दिनों के अतिरिक्त अन्य समय में भी आता है, और इस रक्त का रङ्ग आर्त्तव से भिन्न हो तो इसको असृग्दर ( रक्तप्रदर ) जानना चाहिये ॥

सब प्रकार के असृग्दर में—अङ्गों में टूटने की पीड़ा, गर्भाशय के समीप के अङ्गों में पीड़ा होती है । और यदि रक्तप्रदर अधिक मात्रा में हो तो दुर्बलता, भ्रम ( चक्कर आना ), मूर्च्छा ( बेहोशी ), तम ( आँखों के सामने अन्धकार ), प्यास, दाह, प्रलाप पाण्डुता ( शरीर का वर्ण पीला पड़ना ), तन्द्रा एवं वातजन्य ( आन्त्रेपकादि ) रोग होते हैं ॥ १८, १९ ॥

१ चरक में—

“गुंजाफलसर्वणं च पद्यालवतकसन्निभम् ।

इन्द्रगोपकसंकाशमार्त्तवं शुद्धमेव तत् ॥

भाससिन्धिच्छदाहात्तिपञ्चरात्रानुबन्धे च ।

नैवातिबहुनात्यल्पं तदार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ॥”

आर्त्तव का परिमाण साधारणतः ५ से १० औंस है, परन्तु अनिश्चित है ।

आर्त्तव की चारों स्थितियाँ, आर्त्तव के विषय में निम्न पुस्तकें देखिये—

घात्रीशिक्षा, मुश्रुत-शरीर जयदेव कृत पृष्ठ २५, Midwifery by Johnstone और हमारे शरीर की रचना ।

२ जीवरक्त और आर्त्तव्रक्त में परीक्षा—

तेनासं मिश्रितं दद्याद्यायसाय शुनःपि वा ।

भुक्ते तच्चेद्व वेदज्जीवं न भुक्ते पित्तामादिशेत् ॥

शुक्लं वा भावितं वस्त्रभावानां कोष्णवारिणा ।

प्रशालितं विवर्णं चेत् पित्तं, शुद्धं तु शोषितम् ॥

आजकल—मैनोंरेजिया और मेटोरेजिया कहते हैं ।

तहण्या हितसेविन्यास्तमल्पोपद्रवं भिषक् ॥ २० ॥

रक्तपित्तविधानेन यथावत् समुपाचरेत् ।

तहणी ( सोलह वर्षवाली ), पश्व सेवन करनेवाली, असु उपद्रवों से युक्त ( निरन्तर खाव का बहना-दुर्बलता आदि ) रोगिणी में रक्तपित्त ( तथा रक्तार्श एवं रक्तातिसार ) की विधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २० ॥

दोषैरावृतमार्गस्वादात्तवैः नश्यति स्त्रियाः ॥ २१ ॥

तत्र मत्स्यकुल्लथाम्लतिलमापसुरा हिताः ।

पाने मूत्रमुदधिच्छ च दधि शुक्लं च भोजने ॥ २२ ॥

क्षणं प्रागोरितं रक्तं सलक्षणचिकित्सितम् ।

तथाऽप्यत्र विधातन्यं विधानं नष्टरक्तवत् ॥ २३ ॥

वातादि दोषों के कारण आर्त्तव—वहाँ ( गर्भाशय ) को रक्तवाहिनियों के अवरोध हो जाने पर स्त्रियों में आर्त्तव को प्रवृत्ति नहीं होती । इसके लिये—मछलियाँ, कुल्लथी, अम्लस, तिल, माष, सुरा हितकारी हैं । पीने के लिये मूत्र ( गायों का मूत्र तीक्ष्ण होने से ), उदधि ( अर्द्धादक मिला तक ), दधि, और शुक्त देना चाहिये । क्षीणात्तव के लक्षण और चिकित्सा प्रथम दोषादिविज्ञानीय अस्थाय में कह दी है । इसके साथ र नष्टार्त्तव की भी चिकित्सा मिला लेनी चाहिये ॥ २१-२३ ॥

एवमदुष्टशक्तः शुद्धार्त्तवा च ॥ २४ ॥

इस प्रकार से दोष रहित वीर्यवान् पुरुष और शुद्ध आर्त्तव-वाली स्त्री ही उत्तम प्रजा उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं ॥ २४ ॥

ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नान्ध्वनाश्रपातस्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधानवहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिल्यायासान् परिहरेत् । कि कारणं ? दिवा स्वप्नत्याः स्वापगोलः, अञ्जनादन्धः, रोदनादिकृतटष्टिः, स्नानानुलेपनादुःखगोलः, तैलाभ्यङ्गानु कुष्ठौ, नखापकर्तनात् कुतखौ, प्रधानान्चञ्चलः, हसनाच्छ्वाशवदन्तोष्ठतालुजिह्वाः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्घ्रिः, अवलेखनात् खलतिः, माहत्यायाससे वनाडुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेत् । दर्भसंस्त रगयिनीं करतलश्रावणान्यतमभोजिनीं हविष्यं ज्यहं च भर्तुः संरचेत् । ततः शुद्धस्नानात् चतुर्थेऽह्न्यहत्तवासं समलङ्कृतां कुतमङ्गलस्वस्तिवाचनां भर्तारं दशयेत् । तत् कस्य हेतोः ? ॥ २५ ॥

अर्थात् मैथुन से रहित ब्रह्मचारिणी स्त्री को चाहिये कि ऋतुकाल के प्रथम दिन से ही दिन में सीता

१ क्षीणात्तव के लक्षण—

“आर्त्तवस्यैव यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च । तत्र संशोधनानपेयानाच्छ च द्रव्याणां विधिवदुपयोगः ॥” सु० सू०

२ ऋतुकाल —“ऋतुस्तु दुष्टार्त्तवो द्वादशरात्रं भवति, षोडशरात्रमित्यन्ये । शुद्धयोनिगर्भाशय आर्त्तवायाःभासमपि केचित् । तदवद्व दृष्टार्त्तवाऽप्यस्तीत्यपरे ॥ अर्थात्संग्रह ॥

शारीरस्थानम्

२६१

अ २]

आँखों में अञ्जन, रोना, स्नान, अनुलेपन (चन्दन आदि का बरार पर लगाना), अश्वंग, नखों का काटना, दौड़ना, ऊँचे हँसना, बहुत बोलना, ऊँचे शब्दों का सुनना, अवलेखन (कड़ी से सिर साफ करना), वायु का सीधा झोंका, परिश्रम करना छोड़ देवे, क्योंकि—दिन में सोने से शिशु निद्रालु होता है, अञ्जन करने से अन्धा, रोने से विकृत दृष्टिवाला, स्नान और अनुलेपन से दुःखशील, तैल की मालिहा से कुष्ठी, नखों के काटने से दूषित नखवाला, भागने से चञ्चल, हँसने से श्यावदन्तक, श्यामवर्ण ओठ, ताख, जिह्वावाला, बहुत बोलने से प्रलापी (बकवादी), ऊँचे शब्द सुनने से बहरा, सिर खुजाने से गंजा, वायु और परिश्रम के सेवन करने से उन्मत्त (पागल) होता है, इसलिये इन बातों का त्याग करना चाहिये।

कुशा को विछाकर उसके ऊपर सोनेवाली, हाथ—मिट्टी के पात्र अथवा पत्ते पर हविष्य-(घी मिश्रित शालि-धान्य या दूध में संस्कृत गेहूँ आदि का) अन्न का भोजन करनेवाली जो तीन दिन पति से अपनी रक्षा करे—अलग रहे। चौथे दिन स्नान करके शुद्ध हुई स्त्री उत्तम वस्त्र तथा सुन्दर आभूषण धारण करके, मङ्गल पाठ स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् पति का दर्शन करे१ ॥२५॥

यह सब किस लिये ?

पूर्व पर्येष्टुस्नाता याहर्शं नरमङ्गना । ताहर्शं जनयेत् पुत्रं भतौरं दक्षयेदतः ॥२६॥ ततो विधानं पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् । कर्मन्ते च क्रमं ह्येतमारभेत विचक्षणः ॥२७॥

श्रुतुस्नात स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन सबसे प्रथम करती है, उसी प्रकार के पुत्र को उत्पन्न करती है। इसलिये सबसे प्रथम पति का दर्शन करना चाहिये। इसके पश्चात् वैदिक कर्म को जाननेवाला याचिक-पुत्रेष्टि विधि को (चरकोक्त-तन्त्राचार्यों द्वारा) आरम्भ करे। इस कर्म के उपरान्त बुद्धिमान् पति वद्यमाण कार्य को करे ॥२६, २७॥

ततोऽपराह्ने पुमान् मासं ब्रह्मचारी सर्पः स्निग्धः सर्पः क्षीराभ्यां शाल्योदनं मुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणीं तैलं स्निग्धां तैलमाषोत्तराहारं नारीमुपेयाद्रात्रीं सामभिरभि-विश्वान्, विकल्प्यैव चतुर्थ्यां षष्ठ्यां मष्टभ्यां दशभ्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः ॥२८॥

बिता श्रुतुदर्शनं हुए भी गर्भ रह जाता है।

१ कहा भी है—

“नवे तनी च संजाते विगते जीर्णं शोणिते । नारी भवति संबुद्धा पुंसा संसृज्यते तदा ॥”

जो पुरुष एक मास तक ब्रह्मचारी रह चुका हो, वह घृत द्वारा स्निग्ध होकर पुत्रीय कर्म के पश्चात् सार्यकाल की ओर दूध से शालि चावलों को खाये। इसी प्रकार से एक मास तक ब्रह्मचर्य धारण की हुई स्त्री तैल से स्निग्ध होकर सार्यकाल तैल, उड़द का भोजन करे। रात्रि में इस स्त्री को सामादि वचनों से शान्त करके पति स्त्री से सहवास करे। इस प्रकार से यदि पुत्र की कामना हो तो चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, दशमी और बारहवीं (आर्तवस्त्राव से) रात्रि में सहवास करना चाहिये१ ॥

एषुत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च । प्रजासौभाग्यमेश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ॥२९॥

अतः परं-पञ्चभ्यां सप्तभ्यां नवभ्यामेकादश्यां च स्त्री-कामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्धाः ॥३०॥

इसमें भी उत्तरोत्तर तिथियों में आयु, आरोग्य, प्रजा, सौभाग्य, ऐश्वर्य, बल की वृद्धि होती है। इसके आगे पांचवीं, सप्तमी, नवमी और एकादशी रात्रि में पुत्री की कामनावाले पति पत्नी के सहवास के लिये उत्तम है। इनमें भी उत्तरोत्तर रात्रियाँ श्रेष्ठ हैं। शेष त्रयोदशी आदि रात्रियाँ निन्दित हैं२ ॥

तत्र प्रथमे दिवसे श्रुतुभ्यो सैशुतगमनमनायुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विसु-

१ गर्भाधान के विषय में बहुत से भेद एवं नियम हैं। सचार-णतः श्रुतुकाल के समाप्त होने पर गर्भधारण करने की जो शक्ति गर्भाशय में रहती है, वह पीछे उतनी नहीं रहती। इसी कारण से १०-१५ दिन बाद किया गर्भाधान इतना विश्वास का नहीं होता, जितना पहिला। दूसरी बात-प्रथम दिनों में गर्भाधान करने से शिशु उतना पृष्ठ नहीं होता, जितना कि पिछले दिनों में गर्भाधान करने से होता है। इसलिये पिछली उत्तरोत्तर तिथियों को आचार्य ने श्रेष्ठ बताया है।

(१) हमारे शास्त्र में गर्भाधान का समय रात्रि का माना है। उस समय भी दिये का मन्द प्रकाश रखना कहा है। जिससे कि आँख की कनीनिका ठीक रहती है। परन्तु डाक्टर कोवन आदि दिन का समय मानते हैं। यह हमारी दृष्टि में सहमत नहीं। साथ ही स्मृति का कथन है—‘प्राणा एव प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते।’

(२) सहवास से पूर्व स्त्री की अनुकूलता प्राप्त करनी आवश्यक है।

२ पुत्र और पुत्री के लिये यह साधारण नियम है। चूँकि युगम तिथियों में स्त्री का रक्त घटा होता है और पुरुष का वीर्य चन्द्रमा के कारण बढ़ा होता है। अयुगम तिथियों में इसके विपरीत होता है। इसका उदाहरण समुद्र का ज्वारभाटा है।

२८२

सुश्रुतसंहिता

[ ७० ]

च्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवमसंपूर्णा- ङ्कोऽल्पायुर्वा भवति, चतुर्थं तु संपूर्णाङ्को दीर्घायुश्च भवति । न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्त्रोतः प्लाविन्द्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेतद्वदृष्टव्यम् । तस्मान्निममवतीं त्रिरात्रं परिहरेत । अतः परं मासादुपेयात् ॥३१॥

ऋतुमती स्त्री के साथ प्रथम दिन सहवास करने से मनुष्य की आयु कम होती है और जो गर्भ रहता है वह प्रसवकाल में मर जाता है । ऋतुकाल के दूसरे दिन जो गर्भ रहता है, वह सूतिका घर में (दस दिन के भीतर ही) मर जाता है । ऋतु के तीसरे दिन जो गर्भ रहता है, वह असम्पूर्ण अंगों वाला और अल्पायु होता है । चौथे दिन जो गर्भ रहता है, वह सम्पूर्ण अंगों वाला और दीर्घायु होता है । बहते हुए रक्त में प्रविष्ट हुआ बीज गुणकारी नहीं होता । जिस प्रकार कि— बहती हुई नदी की धारा के विपरीत फेंकी हुई तेरनेवाली वस्तु वापस आ जाती है, उपर को नहीं जाती, उसी प्रकार से शुक्रकांट भी आर्त्तव के प्रवाह के साथ गर्भाशय से बाहर आ जाती है, गर्भाशय में नहीं पहुँचता । इसलिये ऋतु के तीन दिनों में नियम पालन करनेवाली स्त्री से पृथक् रहना चाहिये । इसके पश्चात् (गर्भ न रहने पर) एक मास के उपरान्त सहवास करना चाहिये । जल्दी जल्दी सहवास करने से गर्भ स्थिर हुआ भी गिर जाता है ।

वि० मन्तव्य—कभी २ या किसी २ स्त्री को बहुत थोड़ा या थोड़े समय के लिये आर्त्तवस्त्राव होता है इस दशा में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय दिन में भी गर्भाधान हो जाता है । और बहते हुए आर्त्तवस्त्राव में तो सहवास करने पर आर्त्तव के साथ ही शुक्र मां वह जाता है इसलिये तीन दिन तो सहवास करना ही नहीं चाहिये । आयुर्वेद में गर्भाधान के लिये ही सहवास का विधान है वासनापूर्ति के लिये नहीं ॥३२॥

लब्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणावटशुक्रसहदेवा- विश्वदेवानामन्यतमां क्षारेणाभिपुत्य त्रीश्चतुरो वा बिन्दून् दद्यादक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै, न च ताभि- ष्टोवेत् ॥३२॥

गर्भस्थिति होने पर वैद्य को चाहिये कि (स्त्री पुरुष के विमेदक लक्षणों के प्रकट होने से पूर्व अर्थात् दो मास से पूर्व ही) लक्ष्मणा, वटशुक्र (वटप्रोह), सहदेवा, (वला मेद), अथवा विश्वदेवा (गारोस्को-गंगेरन) इनमें से किसी एक को दूध के

१ ऋतुमती का लक्षण—“गते पुराणे रजसि नवे चावस्थिते शुद्धस्नतां स्त्रियमव्यापन्न-शुक्र-शोणितगर्भाशयामृतुमती व्याचक्षते ॥ चरक० ॥

साथ पीसकर पुत्र की कामना करनेवाली स्त्री के दक्षिणनासा- पुट में, तीन चार बूँदें डाल दे । कन्या की कामना करनेवाली स्त्री के वाम नासापुट में तीन-चार बूँदें डाल देनी चाहिये । स्त्री को चाहिये कि इनको थुके नहीं ॥३२॥

ध्रुवं चतुर्णां साञ्चिध्याद्गर्भः स्याद्विधिपूर्वकम् । ऋतुभेदत्रामुबीजानां सामग्रचादङ्गुरो यथा ॥३३॥ जिस प्रकार ऋतुकाल, चेत (खेत), अम्बु (जल), और बीज के संयोग से अंकुर अवश्य उत्पन्न होता है, उसी प्रकार से विधिपूर्वक ऋतुकाल, चेत, (गर्भाशय), अम्बु (शोणित) और बीज (शुक्र) के परस्पर मिलने से निश्चित रूप में गर्भ रहता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥३३॥

एवं जाता रूपवन्तः सन्त्ववन्तश्चिरागुषः । भवन्त्युणस्य भोक्ताः सत्पुत्राः पुत्रिणे हिताः ॥३४॥ इस प्रकार से रूपवान्, तेजस्वी, महान् पराक्रमी, दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होते हैं । ये सत्पुत्र ऋग से माता पिता को छुड़ाते हैं, तथा माता पिता के लिये हितकारी होते हैं ॥३४॥

तत्र तेजोधातुर्वर्णानां प्रभवः, स यदा गर्भोत्पत्ताव- न्धातुप्रायो भवति तदा गर्भं गौरं करोति, पृथिवीधातु- प्रायः कृष्णं, पृथिव्याकाशधातुप्रायः कृष्णश्यामं, तोया- काशधातुप्रायो गौरश्यामम् । ‘याहवर्णमाहारमुपसेवते गभिणी ताहवर्णप्रसन्ना भवति’ इत्येके भाषन्ते । तत्र द्विभागमप्रतिपन्नं तेजो जात्यन्धं करोति तदेव रक्ता- नृतं रक्ताक्षं, पित्तानुगतं पिङ्गाक्षं, श्लेष्मानुगतं शुक्लाक्षं, वातानुगतं विकृताक्षमिति ॥३५॥

इन पाँचों भूतों में तेज धातु, वह सब प्रकार के वर्णों की उत्पत्ति में कारण है । यह तेज धातु जब

१ (१) गर्भविस्था में स्त्री—पुरुष के लिंगों का निर्माण एक या १२ मास के पश्चात् होता है । इसलिये इस समय से पूर्व ही पुंसवन कर्म करना चाहिये । यथा चरक में कहा है—

“तस्मादापन्नगर्भायां स्त्रियमभिस्मभीक्ष्य प्राग्व्यक्तीमावात् गर्भस्य पुंसवनमस्यै दद्यात् ।”

(२) लक्ष्मणा आदि का नस्य गर्भस्थान के लिये भी दिया जाता है । गर्भ रहने पर पुंसवन कार्य के लिये तीन मास तक प्रतिदिन या समय समय पर देते रहना चाहिये । यथा—

“पूर्वमोषसहस्राभिहुतं कृत्वा मागव्यदेशे गोः क्षीरेण पेष- यित्वा तस्मात् त्रीन् बिन्दून् दक्षिणे नासापुटे दद्यात् । न निष्टोवे- त्तान् कण्डप्राप्तान् सा पञ्च दिनानि पयसोदनमन्नीयात् तद्ब्रह्म ग्राम्यधमसेवनम् ।

“पुत्रकाकाररक्ताल्पबिन्दुभिलोळिच्छता सदा । लक्ष्मणा पुत्रजननी वस्तगन्वाकुर्विर्भवेत् ॥”

४०१]

शारीरस्थानम्

२६२

गर्भोत्पत्ति (गर्भाधान काल) में जलीय धातु प्रधान होता है, तब गर्भ को गौर वर्ण करता है। जब तेज धातु पृथिवी धातु बहुल होता है, तब कृष्णवर्ण होता है। और जब पृथिवी, आकाश धातु प्रधान रहता है, तब कृष्णवर्ण रहता है। जब लल और आकाश धातु की बहुलता रहती है, तब गौर श्याम-वर्ण रहता है। कई आचार्यों का मत है, कि गर्भिणी स्त्री जिस वर्ण के आहार का अधिक मात्रा में सेवन करती है, उसी वर्ण की संतान उत्पन्न होती है।

यदि चौथे मास में तेज दृष्टि भाग (चतुः इन्द्रिय के आश्रय स्थान) में नहीं पहुँचता, तो शिशु जन्म से ही अन्धा रहता है। तेज धातु रक्त के साथ मिल जाये तो लाल आँखोंवाला, पित्त से मिल जाय तो पीली आँखोंवाला, कफ से मिल जाय तो श्वेत आँखोंवाला और वायु से मिल जाय तो विकृत आँखों वाला शिशु उत्पन्न होता है। ॥३५॥

भवति चात्र—

घृतपिण्डो यथैवाग्निसाश्रितः प्रबिलीयते। विसर्पत्यार्तवं नार्यास्तथा पुसां समागमे ॥३६॥

कहा भी है—जिस प्रकार से जमा हुआ घृत अग्नि के पास रखने से पिघल जाता है, इसी प्रकार से पुरुषों के साथ सहवास करने पर इन्द्रियद्वयसंवर्षण द्वारा उत्पन्न उष्णमा द्वारा विलीन आर्तव-स्त्रियों में प्रवर्त्तित होता है। इस क्रिया से मार्ग के शुद्ध होने पर शुक्रकीट और डिम्ब सुगमता से मिल जाते हैं।

वि० मन्तव्य—पुमान् समागम के बिना भी आर्तव की प्रवृत्ति होती रहती है परन्तु शुक्र संयोग के बिना गर्भाधान नहीं होता। ॥३६॥

१ वर्ण की उत्पत्ति के विषय में चरक में लिखा है कि—जिस जिस वर्ण तथा पराक्रम को संतान गर्भवती स्त्री उत्पन्न करना चाहे, उन उन जनपदों का मन से ध्यान करे। इसी के लिये सुन्दर हरिश्चन्दन से अंकित श्वेत बैल को देखना बताया है। देखिये चरक शारीर आठवों अध्याय।

२ चरक में इस बात को बहुत ही खूबी से कहा है, यथा—'यस्य यस्यावयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषा प्रकोपमापद्यन्ते, तस्य तस्यावयवस्य विकृतिर्जायते—नोपजायते चानुप्तापाद् तस्माद् उत्तमोत्पत्तिः ॥ चरक० शा० ४।

३ जिस प्रकार कि लोहे के साथ चुम्बक की प्रीति है, पारे को मसूड़ों के तन्तुओं से, संखिये को आमाशय से, इस प्रकार शुक्रकीट को डिम्ब से लगाव है। यही कारण है कि शुक्रकीट जहाँ भी होगा वहाँ से डिम्ब उसे खींच लेगा।

बोजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ। यमावित्यभिधीयते धर्मतरपुरःसरी ॥३७॥

शुक्र और शोणित (शुक्रकीट और डिम्ब) के अन्तःवायु (ध्यान) द्वारा दो भाग होने पर दो जीव गर्भाशय में उत्पन्न होते हैं। इनको यम कहते हैं। ये अवर्ग के कारण उत्पन्न होते हैं। अथवा वायु के कारण दो शुक्रकीट और दो डिम्ब मिलकर यमसंतान को उत्पन्न करते हैं।

वि० मन्तव्य—दो से अधिक गर्भ भी उत्पन्न हो जाते हैं। यमगर्भ—परस्पर उदर अथवा पीठ पर से जुड़े भी रहते हैं। दो से अधिक गम प्रायः जन्मते ही मर जाते हैं अथवा उनमें से कोई १-२ जीवित भी रहते हैं, जुड़े हुए भी जीवित रहते हैं। और किसी २ गर्भ के अधिक अंग भी होते हैं यथा—दो से अधिक ३-४ बाहु या टाँगें तथा १ से अधिक २ शिर आदि, किसी का गुद मार्ग ही नहीं होता अथवा अन्य कोई अवयव ही नहीं रहता ये भी प्रायः जन्मते ही मर जाते हैं। यम को जोड़ले जोड़े, यमक (ल) कहते हैं। कभी २ एक बालक और एक बालिका भी जन्मते हैं। जन्म में एक क्षण से लेकर कई दिन का अन्तर रहता है, यमलों के जरायु—नाल ही पृथक् २ होते हैं, इनमें कोई जीवित तो कोई मृत भी जन्मता है ॥३७॥

पित्रोऽरत्यरूपबीजत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत्।

स शुक्रं प्रारय लभते ध्वजोच्छ्वायमसंशयम् ॥३८॥

माता-पिता के अत्यरूप बीज (शुक्र-शोणित) होने से 'आसेक्य' नामक नपुंसक संतान उत्पन्न होती है। इस आसेक्य पुरुष में शिरन की उत्तेजना शुक्र को खाकर उत्पन्न होती है। अर्थात् यह आसेक्य पुरुष अपने मुख में अन्य पुरुष से मधुन करवाकर क्षरित शुक्र को खाकर ही उत्तेजना प्राप्त करता है। इसका दूसरा नाम 'मुखयोनि' है।

वि० मन्तव्य—आसेक्यः—आसेचयितु—शुक्रजनकद्रव्यैः तर्पयितु योग्यः अर्थात् शुक्रजनक मकरध्वज (शिवशुक्र) तथा अश्वगन्धा आदि के सेवन द्वारा जो ध्वजोच्छ्वाय (लिंग हर्ष) को प्राप्त करता है वह आसेक्य है ॥३८॥

यः पृथियोनौ जायेत स सौगन्धिकसंज्ञितः।

स योनिशेफसौगन्धमाघ्राय लभते बलम् ॥३९॥

जो पुरुष दुर्गन्धित योनि में उत्पन्न होता है, उसका नाम 'सौगन्धिक' है। यह पुरुष योनि और शिरन की गन्ध को सँघकर बल प्राप्त करता है। इसका दूसरा नाम 'नासायोनि' है।

वि० मन्तव्य—सौं, कुत्ते आदि के समान ॥३९॥

स्वे गुदेऽन्नद्वाचर्यायः क्षीणु पुंवत् प्रवर्तते।

कुम्भीकः स तु विज्ञेयः ईष्यकं श्रूणु चापरम् ॥४०॥

२८४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

जो पुरुष अन्नहृत्त्व के कारण स्त्रियों में उनकी गुदा में पुरुष की तरह प्रवृत्त होता है, उसे कुम्भीक जानना चाहिये। अथवा जो मनुष्य अपनी गुदा में मेषुन करवाकर शिशुन की उत्पत्ति को प्राप्त करके—फिर स्त्रियों में प्रवृत्त होता है, इसका नाम 'कुम्भीक' है बिना अग्राकृतिक मेषुन के इसको शक्ति नहीं मिलती१। इसी का नाम गुदयोनि है।

वि० मन्तव्य—कुम्भीक को यह व्यसन होता है। इसका एक दूसरा भी रूप है यथा—बीजात् समाशात् उपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसल्लिङ्गे भवति द्विरेताः ( च० शा० अ० २ )—अर्थात् माता-पिता के शोणित एवं शुक्र के समानांश होने तथा उपतप्त ( विकृत ) होने से जो सन्तान होती है वह स्त्रीलिंग ( योनि-भाग ) तथा पुल्लिंग ( शिशुन ) वाली तथा द्विविध-दोनों प्रकार के रेतस वाली होती है इसको कभी पुमान् के साथ और कभी स्त्री के साथ सहवास की इच्छा होती है। इसको योनि भी होती है और शिशुन भी होता है। कुम्भीक इस इच्छा को अन्य पुमान् से स्वगुद में रति कराकर पूर्ण करता है इस क्रिया में कुम्भीक का शुक्र भी स्वलिप्त हो जाता है ॥४०॥

हृष्टा न्यवायमन्येषां न्यवाये यः प्रवर्तते।

ईष्यकः स तु विज्ञेयः षण्डकं शृणु पञ्चमम ॥४१॥

इसके आगे ईष्यक को सुनो। जो पुरुष दूसरों के मेषुन को देखकर मेषुन में प्रवृत्त होता है, इसको ईष्यक कहते हैं। बिना मेषुन देखे इसमें उत्पत्ति नहीं होती२।

वि० मन्तव्य—यह सन्तान उनको उत्पन्न होती है जो नर नारी परस्पर की ईर्ष्या ( असहिष्णुता-मनमुटाव ) से अभिभूत होने पर फलतः मन्द हर्ष ( मेषुनामिलाष ) से युक्त होकर गर्भाधान करते हैं ॥४१॥

आगे पाँचवें षण्डक नपुंसक को सुनो।

यो भार्यायामृतौ मोहाद्वक्त्रनेव प्रवर्तते।

ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्डसंज्ञितः ॥४२॥

जो पुरुष मोह ( अज्ञान या स्वरस के लोम ) वश श्रुतु-काल में अपनी स्त्री के साथ स्त्री की भाँति ( नीचे पुरुष और स्त्री ऊपर होकर ) प्रवृत्त होता है, इससे जो पुत्र होता है, उसकी चेष्टा और आकार स्त्री के समान रहते हैं। इस अवस्था में पुरुष विपरीत वन्धन द्वारा क्रिया में प्रवृत्त होता है३।

१ कुम्भिल की उत्पत्ति—

“अरजस्कां यदा नारी श्लेष्मरेता व्रजेदती।

अन्यसक्ता भवेत् प्रीतिर्जायते कुम्भिलस्तदा ॥”

२ ईष्यक का लक्षण—

“इष्यभिभूतावपि मन्दहर्षावौष्यद्विहृत्यापि वदन्ति हेतुम् ॥”

३ षण्डस्तु स्याकृतिः स्त्रीचेष्टितश्च स्त्रीवदवोभूतस्वमेहस्यो-र्ध्वप्रदेशे अपरपुरुषात् वीर्यच्युतिं कारयति।

वि० मन्तव्य—षण्ड ( हिजड़ा ) को न योनि होती है और न शिशुन ही होता है परन्तु मेषुनामिलाष तो होती है, फलतः वह स्वमूत्रमार्ग पर अथवा स्वगुद में अन्य पुमान् से... यह प्रायः स्त्री की वेधभूषा में रहता है। कोई ऐसे भी होते हैं जिनके शिशुन होता है या बहुत छोटा एवं दुर्बल होता है। स्तन नहीं बढ़ते ॥४२॥

श्रुतौ पुरुषवद्वाऽपि प्रवर्तताङ्गना यदि।

तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ॥४३॥

यदि श्रुतुकाल में स्त्री पुरुष की भाँति ( पुरुष को नीचे रखकर ) मेषुन करती है, उससे यदि कन्या उत्पन्न होती है, तो उसकी चेष्टा पुरुष के समान होती है४।

वि० मन्तव्य—यह भी षण्ड के समान होती है किसी २ को योनि भी होती है परन्तु अपूर्ण। यह प्रायः नर के समान वेधभूषा में रहती है। इसके स्तन भी कुछ या अपूर्ण बढ़ते हैं। इन दोनों प्रकार के षण्डों को थोड़ी दाढ़ी एवं मोह भी होती है किसी को नहीं भी। इनको नपुंसक या तृतीय प्रकृति कहा जाता है और चरक शा० स्था० अ० २ में—इन दोनों को नर षण्ड एवं नारी षण्ड कहा गया है। इनका उत्पादक बीज ( शुक्र शोणित ) मन्द शक्ति एवं अल्प होता है फलतः ये भी बलहीन एवं हर्षहीन होते हैं। यदि गर्भाशय में ही गर्भ के शुक्रस्त्रोत को वायु नष्ट कर डालता है तो “पवनेन्द्रिय” यदि शुक्रस्त्रोत के मुख अवरुद्ध हो जाते हैं तो “संस्कारवाही” माता के व्यवय का प्रतिघात तथा पिता का शुक्र दुर्बल होने से “वक्रौ” वायु एवं पित्त की विकृति से—बुध्ण का नाश हो जाने से “वत्तिकषण्डक” नामक गर्भ विकृतियाँ हो जाती हैं। च० शा० अ० २ देखिये। इनके अतिरिक्त वन्या, पूतिप्रजा तथा सन्ता नामक तीन स्त्रीव्यापद् और वन्य, पूतिप्रजा तथा तृणपुत्रिक ( तृणपुत्तलिक या तृणपूलिक ) नामक तीन पुरुष व्यापद् होती हैं ये दोष भी माता-पिता के शोणित शुक्र के विकार से गर्भोत्पत्ति काल में ही उत्पन्न हो जाते हैं। विवरण देखिये च० शा० अ० ४ में। ये सब अपूर्ण स्त्री पुरुष हैं अर्थात् न पूर्ण स्त्री और न पूर्ण पुरुष होते हैं ॥४३॥

आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकरचैष्यकस्तथा।

सरेतसस्त्वमी बोधा अशुक्रः षण्डसंज्ञितः ॥४४॥

इनमें आसेक्य, सुगन्धि, कुम्भीक और ईष्यक ये चार नपुंसक होते हुए भी शुक्रवाले ( प्रजोत्पादन में समर्थ ) हैं। षण्ड नपुंसक शुक्र रहित ( प्रजोत्पादन में असमर्थ ) हैं ॥४४॥

१ स्त्रीरूपापि पुंवत् स्त्रियमाहह तद्योनां स्वयोनिवर्षणं करोति ॥

२६२]

शारीरस्थानम्

२६५

अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः सिराः। हर्षात् स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥४५॥ शुक्रमक्षण आदि विरुद्ध अथवा विशेष स्वभाव द्वारा शुक्रवही शिरायें हर्ष के कारण फूल जाती हैं, इसीलिये ध्वज (शिरन) की उत्तेजना होती है। बिना उपर्युक्त कारणों के उत्पादक केन्द्र-मस्तिष्क तथा मेरुदण्ड के केन्द्र उत्तेजित नहीं होते ॥४५॥

आहाराचारचेष्टाभिर्घोषैर्गोभिः समन्वितौ। क्षीपुसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥४६॥

सहवास के समय स्त्री और पुरुष की चेष्टायें, आहार, और आचार जैसे होते हैं, इनकी संतान में भी वैसा ही आहार आचार एवं चेष्टा रहती है।

वि० मन्तव्य—इसका विशद वर्णन—च० शा० अ० ८ में देखिये। और गर्भाधान के पूर्व माता पिता के आहार, आचार तथा चेष्टा का भला बुरा प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। यदा नार्थोपेयातां वृषस्थन्यो कथंचन।

सुव्रतः शुक्रमन्योन्यमनस्थितस्तत्र जायते ॥४७॥

जिस समय सम्भोग की इच्छावाली दो स्त्रियाँ काम से अभिभूत होकर परस्पर मिलती हैं, उस समय परस्पर शुक्र के मिलने से जो मांसपिण्ड बनता है, वह अस्थि रहित या कोमलस्थिवाला होता है।

वि० मन्तव्य—वात्स्यायन काम सूत्र में इसे 'विस्मृष्टि सुख' कहा है, केवल शुक्र क्षरण-शुक्र विसर्जन का सुख पाने की इच्छा में दो नारियाँ तथा दो पुमान् परस्पर सहवास करते हैं। शुक्र धातु ही नारी तथा नर को मधुन के लिये बाध्य करता है और उसके क्षरण में आनन्द का अनुभव होता है अतएव उपस्थ (योनि एवं शिरन) का विषय-आनन्द (सु० शा० अ० १-६) माना है। नारी का शुक्र भी पुमान् के शुक्र का सा लसीला, श्वेत एवं विशिष्ट गन्धवाला होता है। यह मग की भित्तियों से स्रवता है। इससे गर्भाधान हो जाता है मले ही वहपैचिक गुणों से हीन होता है। वृषस्थन्यो कामुकी-कामातुरा का नाम है जो अपने शुक्र का विसर्जनमात्र करना चाहती है किसी भी प्रकार से ॥४७॥

ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मधुनभावहेतु। आर्त्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ॥४८॥

मासि मासि विवर्धेत गभिण्यो गर्भलक्षणम्। कललं जायते तस्या वर्जितं पैरुकेगुणैः ॥४९॥

१ वास्तव में यह बात संगत नहीं—चूकि स्त्रियों का शुक्र निरर्थक है—

“शोषितोऽपि सवत्येव शुक्रं पुसां समागमे।

गर्भस्य तन्न किञ्चित् करोतीति न चित्तयति ॥”

जो ऋतुस्नाता स्त्री स्वप्न में मधुन करती है, तो वायु आर्त्तव को प्राप्त करके कुक्षि में गर्भ रूप कर देती है। यह रुद्ध आर्त्तव गुल्म रूप में प्रतिमास बढ़कर गर्भ के लक्षणों को (जी मचलाना, आर्त्तव का न आना आदि) उत्पन्न कर देता है। यह गर्भ कलल के रूप में बदल जाता है, इसमें पिता के गुण (केश, नख, अस्थि, नहीं होते)।

वि० मन्तव्य—पुमान् के समान स्त्री को भी स्वप्न दोष होता है और उसके शुक्र का क्षरण भी होता है इस शुक्र को कभी २ वायु लेकर गर्भाशय में पहुँचा देता है और तत्रस्थ आर्त्तव के साथ मिला देता है फलतः उक्त प्रकार का गर्भ हो जाता है ॥४८, ४९॥

सर्पवृश्चिककृष्माण्डविकृताकृतयश्च ये।

गर्भोऽस्त्वेते स्त्रियश्चैव ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ॥५०॥

स्त्रियों के जो गर्भ सांप-बिच्छू, पेठे के समान विकृत आकृतियों वाले होते हैं, ये सब पापजन्य हैं ॥५०॥

१ रक्तगुल्म के लक्षण देखिये—चरक में इसके ही लक्षण मिलते हैं। इसी प्रकार चरक के शारीर में भी 'ओजोऽधानानामित्यादि' श्लोक देखना। 'लेखक की आशंका' में गर्भ के लक्षण देखिये। जो स्त्रियाँ गर्भ के लिये अतिसय उत्कण्ठित रहती हैं, उनमें स्रग्य आर्त्तव अवरुद्ध होकर गर्भ के लक्षण उत्पन्न कर देता है। परन्तु क्लोरोफॉर्म सुधाकर उदर की परीक्षा करें, तो कोई लक्षण स्पष्ट नहीं होते।

२ आजकल साधारण तौर से विकृत भ्रूणों के निम्न रूप हैं। यथा—

  • (क) Hemitaria इसमें बौना, दैत्य शरीर, अत्यन्त छोटा सिर, दो गर्भाशय आदि होते हैं।
  • (ख) Heterotaxia इसमें अवयव अपने स्थान पर नहीं होते।
  • (ग) Thratism बनावट की विकृति—
  • (१) Ectromelic monster हाथ-पैर पूरी आकृति के नहीं होते।
  • (२) Symelic monster—निचले अवयव मिले होते हैं।
  • (३) Celosomatic monster—मध्य भाग बाहर को निकला होता है।
  • (४) Exencephalic-monster—मस्तिष्क की बनावट ठीक नहीं होती।
  • (५) Pseudencephalic monster—बृहत्मस्तिष्क नहीं होता।
  • (६) Anencephalic monster—सम्पूर्ण मस्तिष्क नहीं होता।

२६६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

गर्भों वातप्रकोपेण दौह्द्रे वाऽवमानिते ।

भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्कुमू को मिन्मिण एवं वा ॥५॥

गर्भावस्था में गर्भ के अन्दर वायु का प्रकोप होने से अथवा गर्भवती स्त्री की श्रद्धा का खण्डन होने से गर्भ कुब्जा, कुणि (विकृत हाथोंवाला) पंगु (लङ्कड़ा), अथवा मूक (गूज़ा) और मिन्मिन अस्पष्ट बोलनेवाला होता है ॥५॥

भातापित्रोन्तु नास्तिक्यादशुभैश्च पुराकृतैः ।

वातादीनां प्रकोपेण गर्भो वैकृतभापुन्यात् ॥६॥

माता-पिता के नास्तिक होने से, अथवा पूर्वकृत अशुभ कर्मों से, अथवा वातादि दोषों के प्रकोप के कारण गर्भ विकृत हो जाता है ।

वि० मन्तव्य—नास्तिक्यात्—आयुर्वेदीय उपदेशों के अनुसार आचरण न करने से ॥६॥

मलात्पत्वादयोर्गच्छ वायोः पक्वाशयश्च च ।

वातमूत्रपुरीषाणि न गर्भस्थः करोति हि ॥७॥

मल के अत्यन्त अल्प होने से, वायु और पक्वाशय का परस्पर संयोग न होने के कारण गर्भ-वायु, मूत्र और मल का त्याग नहीं करता१ ।

वि० मन्तव्य—गर्भ का पोषण माता के आहार रस के द्वारा होता है अतः मलाशय में पुरीष का सञ्चय होता ही नहीं । मलाशय में वायु की गति भी नहीं होती अतः पुरीष का या तद्गत वायु का निःसरण भी नहीं होता, और अतएव

(७) Cyclocephalic monster—नाक नहीं होती ।

(८) Octocephalic monster—कान मिलकर एक हो जाते हैं ।

(९) Omphalositic monster—हृदय नहीं होता ।

(१०) Double monster—दो भ्रूण जुड़े होते हैं । इसके निम्न में—

(i) Sternopagus—उरोऽस्थि मिली रहती है ।

(ii) Ischiopagus—श्रोणि प्रदेश पर जुड़े होते हैं ।

(iii) Cephalopagus—सिर जुड़े होते हैं ।

(iv) XiphoPagns—उरोऽस्थि का अधोभाग जुड़ा होता है । Syncephalic—सिर का कुछ भाग जुड़ा होता है । Monocephalic—सिर एक ही होता है । Synosomatic—शरीर एक देश से मिले होते हैं । monosomatic शरीर एक होता है । Double Parasitic monster—एक भ्रूण दूसरे भ्रूण के वीच में होता है ।

१ गर्भ का पोषण माता के रक्त और अपरा से होता है, अतः शरीर की शुद्धि भी इन्हीं से हो जाती है । इसलिये पक्वाशय-बन्ति आदि अवयव कार्य नहीं करते ।

मूत्र का निर्माण भी नहीं होता और न त्याग ही । तत्पर्य यह है भ्रूण के उत्क अवयव क्रियाशील ही नहीं होते, होने का आवश्यकता भी नहीं होती ॥७॥

जरायुणा मुखे च्छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते ।

वायोर्मांगनिरोधोऽन्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ॥८॥

जरायु द्वारा गर्भ का मुख बन्द होने से तथा गले में कफ रक्ता होने से, दोषजनक वायु का मार्ग रक्ता रहने से गर्भस्थ बालक रोता नहीं है ।

वि० मन्तव्य—भ्रूण के फुफ्फुस भी क्रियाशील नहीं होते फलतः न श्वास लेता है, न बोलता एवं रोता है ॥८॥

निःश्वासोऽङ्गाससङ्क्षोभस्वप्नान् गर्भोऽभिगच्छति ।

मातुर्निश्वासितोऽङ्गाससङ्क्षोभस्वप्नसंभवान् ॥९॥

गर्भ के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और स्वप्न आदि सब कार्य माता के निःश्वास, उच्छ्वास, संक्षोभ और स्वर पर निर्भर रहते हैं । अर्थात् बच्चे का जीवन तथा मानसिक संकल्प आदि सब कुछ माता के साथ सम्बद्ध हैं । उनका प्रभाव बच्चे पर पड़ा रहता है ।

वि० मन्तव्य—जीवन के लिये अत्यावश्यक श्वास उच्छ्वास एवं जागरण स्वप्न आदि की प्राप्ति—गर्भ माता के ही श्वास आदि से कर लेता है ॥९॥

सन्निवेशः शरीराणां दन्तानां पतनोद्भवौ ।

तलेऽवसंभवो यश्च रोम्पाभेतत् स्वभावतः ॥१०॥

शरीर-अवयव-चरणादि की रचना-विशेष दूध के दाँतों का गिरना तथा नये स्थायी दाँतों का उत्पन्न होना, हथेली या पंख के तलुवें में बालों का उत्पन्न न होना, ये सब कार्य स्वभाव से ही होते हैं१ ।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेददर्शन में—स्वभाव को भी कारण माना है (शा० अ० १ सू० ११) ॥१०॥

भाविताः पूर्वदेहेषु सततं गाछनुद्वयः ।

भवन्ति सवभूमिष्टाः पूर्वजातिस्मरा नराः ॥११॥

जिन लोगों ने पूर्व जन्म में निरन्तर शास्त्राभ्यास के द्वारा अन्तःकरण को पवित्र कर लिया होता है, वे इस जन्म में सत्यबहुल होते हैं, इन पुरुषों को अपनी पूर्व जाति का स्मरण रहता है२ ।

१ चरक में इसका उत्तर दूसरो प्रकार से दिया है—अर्थात्—जिस प्रकार मोम आदि के सौंचे में स्वर्ण रजत आदि डालने पर सौंचे के आकार के हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य की योनि में वीज के पड़ने से वह भी उस आकार में ढल जाता है ।

१ देखिये भगवद्गीता में “पूर्वाभ्यासेन तेनैव” इत्यादि श्लोक ।

अ. २ ]

३८

शारीरस्थानम्

२६७

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में—चेतनाधातु को नित्य माना है अर्थात् वह अनेक बार जन्म ग्रहण करता है अतः पूर्व-जन्म की स्मृति भी कभी-कभी बनी रहती है ॥५७॥

कर्मणा चोदितो येन तद्वाप्नोति पुनर्भवे ।

अभ्यस्ताः पूर्वदेहे ये तानेव भजते गुणान् ॥५८॥

जिन कर्मों को प्रेरणा से मनुष्य इस शरीर को धारण करता है, तथा पूर्वजन्म में जिन गुणों का अभ्यास किया हुआ होता है, उन्हीं कर्मों तथा गुणों को इस जन्म में पाता है ।

वि० मन्तव्य—वर्तमान जन्म में उन गुणों—दुर्गुणों को शोध ग्रहण करता है जो पूर्वजन्म में अभ्यस्त होते हैं ॥५८॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शुक्शांणिता-

शुद्धिशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

तृतीयोऽध्यायः

अथातो गर्भावक्रान्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

पिछले अध्याय में कहा है कि चार वस्तुओं के संयोग से गर्भ रहता है, इसलिये इसको स्पष्ट करने के लिये गर्भावक्रान्ति (गर्भ का अवतरण) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥

सौम्यं शुक्रमार्तवमग्नेयमितरेषामप्यत्र भूतानां सान्निध्यमस्यगुणा विक्षोषेण, परस्परोपकारात् (परस्परानुग्रहान्) परस्परानुप्रवेगाच्च ॥३॥

शुक्र सौम्य (सोमगुण-भूषिष्ट) है और आर्त्तव-आग्नेय (अग्निगुणबहुल) है । इन दोनों अग्नि और जल के अतिरिक्त पृथिवी आदि शेष भूतों का भी अत्यन्त सूक्ष्म रूप से सम्पर्क है । क्योंकि—पृथिवी आदि भूत परस्पर-एक दूसरे का उपकार करते हैं, एक दूसरे के अनुग्राहक हैं, एक दूसरे में घुसे हुए हैं, इसलिये इन तीन कारणों के कारण इनमें प्रवेश है ।

वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित दोनों पञ्च महाभूतात्मक होते हैं । परस्परानुग्रहात्—परस्पर-एक दूसरे से अनुगृहीत-आकृष्ट होने से । शुक्र, शोणित एवं जीव के संयुक्त-मिश्रित पदार्थ का नाम “बीज” है । इसी बीज से शरीर का निर्माण होता है ॥३॥

तत्र षोणुसंयोगः संयोगे तेजः शरीराद्यायुश्चरीरयति, ततस्तैजोनिष्ठसन्निपाताच्छुक्लं च्युतं योनिमभिप्रतिपद्यते संसृज्यते चार्तवेन, ततोऽग्नीषोमसंयोगात् संसृज्यमानो

१ विस्तार के लिये देखिये प्रश्नोपनिषद् में—“भगवन् कुत्रेमाः भजाम्यते । सहोवाच—प्रजापतिर्हि प्रजाकामी स तपस्तत्त्वा मिथुन-भुलादयते रथिच्छ प्रानच्छ । इत्येतौ से बहुधा प्रजाः करिष्यन्ते । रयिरेव चन्द्रमाः प्राण एव सूर्यः ।” इत्यादि ।

गर्भाजयमनुप्रतिपद्यते चेतन्नो वेदयिता स्पृष्टा प्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः खष्टा गन्ता साक्षी धाता वक्ता यः कोऽसवित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादक्षयोऽव्ययोऽचिन्त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्स्वरजस्तमोभिर्दैवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्यमाणो गर्भाजयमनुप्रविश्यावतिष्ठते ॥४॥

छी और पुरुष के संयोग के समय वायु शरीर से तेज (उष्णिमा) को उत्पन्न करती है । यह तेज वायु के साथ मिलकर शुक्र को क्षरित करता है । क्षरित शुक्र (शरीर के सब अवयवों के प्रतिनिधियों को साथ में लेकर) योनि में पहुँचता है । वहाँ आर्त्तव के साथ मिल जाता है । इसके पश्चात् आग्नेय तथा सोमगुण के सम्बन्ध से बनता गर्भ गर्भाशय में पहुँचता है । इसके साथ में चेतन्न, वेदयिता, स्पृष्टा, प्राता, द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष, खष्टा, गन्ता, साक्षी, धाता, वक्ता इत्यादि पर्यायवाचक शब्दों से कहा जानेवाला अक्षय, अव्यय (निर्विकार) अचिन्त्य, रूप (आत्मा) भूतात्मा-तथा सूक्ष्म इन्द्रियों के साथ, या लिंग शरीर के साथ अपने कर्मों के अनुसार सत्त्व, रज, तम, तथा दैव, आसुर, पशु भावों से युक्त हुआ वायु द्वारा प्रेरित होकर गर्भाशय में प्रविष्ट होकर स्थिति करता है ।

वि० मन्तव्य—चेन्नश शरीर भर को जाननेवाला, वेदयिता-सुख दुःख का अनुभव करनेवाला (कुछ दर्शनों के अनुसार मन को अनुभव करनेवाला), स्पृष्टा-स्पृष्टा का अनुभव करनेवाला, प्राता-सूँघनेवाला, द्रष्टा-देखनेवाला, श्रोता-सुननेवाला, रसयिता-रस का ज्ञान करनेवाला, पुरुष—पुरि-शरीर श्वेत-शरीर में शयन करनेवाला या पुरुषः—शरीर का पूर्ण-आभ्यायन करनेवाला, खष्टा-रचना सुष्ठि करनेवाला अपने शरीर की रचना करनेवाला या अगली सन्तान की सृष्टि करनेवाला, गन्ता-चलनेवाला, साक्षी-ज्ञाता, धाता—धारण पोषण का कारण, वक्ता-बोलनेवाला, अक्षय-न घटनेवाला, अव्यय-विकृति-रूपान्तर को प्राप्त न होनेवाला, अचिन्त्य-मनस् द्वारा जिसका चिन्तन नहीं हो सकता । भूतात्मा-मनस् । अक्ष-इन्द्रियाँ । गर्भाशय अनुप्रविश्य अवतिष्ठते-गर्भाशय में जाकर उसमें चिपक जाता है और वहाँ चिपकता है जहाँ से रजस् की प्रवृत्ति होने में क्षत हुआ रहता है ॥४॥

१ शुक्र सम्पूर्ण सिर से तब तक के अवयवों का सार है । इसमें सब शरीर के प्रतिनिधि मिले रहते हैं । इस शुक्र के साथ ही आत्मा भी अवतरण करता है । आत्मा के साथ पूर्वजन्म-कृत कर्म भी शरीर में अवतरित होते हैं । इस शुक्र को नियमित करने वाले सुषुम्ना और मस्तिष्क केन्द्र हैं । शुक्र के साथ पौष्ट्यप्रनिय तथा अन्य प्रनियों के भी स्वाव मिले रहते हैं । यह शुक्र जिम्ब से मिलकर गर्भ को बनाता है ।

२६८

मुश्रतसंहिता

[ अ. ]

तत्र शुक्रबाहुल्यात् पुमान्, आतवबाहुल्यात् स्त्री, सान्ध्यादुभयोनंपुंसकमिति ॥१॥

शुक्र की प्रबलता—अधिकता होने से पुरुष, आर्त्तव की प्रबलता—अधिकता होने से स्त्री, और दोनों की समानता रहने से नपुंसक संतान उत्पन्न होती है।

वि० मन्तव्य—यह एक मत है इस विषय में अन्य मत-विचार भी हैं। यथा—श्लो० १२ देखिये ॥१॥

ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्तवः, अदृष्टार्तवोऽप्यस्तीत्येके भाषन्ते ॥६॥

रजोदर्शन के पश्चात् ऋतुकाल बारह दिन तक रहता है। कई आचार्यों का मत है कि रजोदर्शन न होने पर भी ऋतु-काल होता है। गर्भस्थिति की योग्यता की परीक्षा के लिये ऋतु-धर्म को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। मासिक धर्म के बिना भी ऋतुधर्म रह जाता है, क्योंकि—

वि० मन्तव्य—किसी २-लाखों में किसी एक स्त्री को रजो-दर्शन होता ही नहीं परन्तु गर्भाधान होता है। ७-८ वें श्लोक में इसी के लक्षण लिखे हैं। यद्यपि ये सब लक्षण दृष्टार्त्तवा के भी देखे जाते हैं। ऋतु—गर्भाधान का समय—उत्तम समय। कभी २ इस समय के पश्चात् भी गर्भाधान हो जाता है। परन्तु वह—उत्तम गर्भ नहीं होता है ॥६॥

भवन्ति चान्न—

पीनप्रसन्नवदनां प्रकिलन्नात्ममुखद्विजाम्।

नरकामां प्रियकथां घस्तकुट्यक्षिभूर्धजाम् ॥७॥

स्फुरद्वजकुचश्रोणिनाभ्यूरजघनस्फिकम्।

हृषीत्सुक्यपरां चापि विद्याहतुमतीमिति ॥८॥

कहा भी है—

ऋतुमती के लक्षण—जिस स्त्री का मुख पुष्ट तथा प्रसन्न हो, आत्मा (शरीर) मुख और दांत (मस्ते), विशेष रूप में किलन्न हो जायें, जो पुरुष की इच्छा करती हो, प्रिय बचन बोलती हो, कुखि, आँख और बाल धियिल हों, जिसकी सुजायें, कुच, श्रोणि, नाभि, ऊरु, जघन और नितम्ब में स्फुरण होता हो, जिसकी हृष एवं उत्सुकता रहती हो, उसे ऋतुमती समझना चाहिये ॥७,८॥

नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं तथा।

ऋती व्यतीते नार्यास्तु योनिः सन्त्रियते तथा ॥९॥

दिन के व्यतीत होने पर सार्यकाल में जिस प्रकार कमल फूल बन्द हो जाता है, उसी प्रकार से ऋतुकाल व्यतीत होने पर स्त्री की योनि का मुख बन्द हो जाता है। योनि का मुख बन्द होने से वीर्य गर्भाशय तक नहीं पहुँचता।

वि० मन्तव्य—परन्तु शुक्र इतना सूक्ष्म होता है कि कभी २ गर्भाशय में प्रविष्ट हो ही जाता है और हो सकता है ऋतुकाल

के पश्चात् भी किसी गर्भाशय का मुख खुला रह जाता हो। यह सत्य है कि—अधिकांश गर्भाधान ऋतुकाल में ही होते हैं। योनि शब्द गर्भाशय का भी नाम है और व्यवहार में भग का भी। ऋतुकाल व्यतीत होने पर गर्भाशय का मुख संकुचित हो जाता है, योनि-भग या अपत्य पथ का मुख बन्द नहीं हो जाता। पाठक ध्यान दें ॥९॥

मासेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदार्त्तवम्।

ईषक्कृष्णं विवर्णं च वायुयोनिसुखं नयेत् ॥१०॥

एक मास तक परिपक्व होता हुआ आर्त्तव (डिम्ब) समय पर वायु द्वारा धमनियों में से होकर योनिमुख की ओर लाया जाता है। इसी समय गर्भाशय की धमनियों से भी रक्त बाहर आता है। यह रक्त किंचित् कृष्ण तथा विकृत गन्धवाला होता है ॥१०॥

तद्वर्षाद्द्वादशात् काले वर्तमानसमूक् पुनः।

जरापक्वशरीराणां याति पद्माशतः क्षयम् ॥११॥

यह रक्त बारह साल की आयु से प्रारम्भ होता है और बुढ़ावस्था के कारण शरीर का परिपाक होने पर पचास वर्ष की आयु में नष्ट हो जाता है। यह समय रजोनिवृत्ति का है ॥११॥

युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेऽवन्यथाऽवला।

पुष्पकाले शुचिस्तस्मादपत्यार्थी क्षियं व्रजेत् ॥१२॥

ऋतुकाल के युग्म (समसंख्यक) दिनों में मैथुन करने से पुत्र उत्पन्न होता है और अयुग्म दिनों में संयोग करने से कन्या उत्पन्न होती है। इसलिये संतान की इच्छावाले पुरुष को चाहिये कि वह पवित्र होकर पुष्पकाल (ऋतुसमय) में सहवास करें ॥१२॥

तत्र सद्योगृहीतगर्भाया लिङ्गानि-श्रमो रत्नानिः पिपासा सकिथसदनं शुक्रशोणितयोरवबन्धः स्फुरणं च योनेः ॥१३॥

जिस स्त्री ने अभी गर्भ ग्रहण किया हो उसके लक्षण निम्न हैं—श्रम (थकावट), रत्नानि (दिल का मचलाना), प्यास, टांगों

१ मासिक धर्म में जो रक्त आता है, उसका स्वरूप मसूइ से बहनेवाले रक्त से मिलता है। इसमें योनि, गर्भाशय के एपी-थिलियम होते हैं। यह रक्त जमता नहीं, इसका रङ्ग काजा होता है। यह आर्त्तव कभी चालीस वर्ष से पूर्व बन्द हो जाता है, और कभी ५० के बाद भी चालू रहता है।

२ विदेह ने भी कहा है—“युग्मेषु दिनेष्व्यासां भवत्यल्पतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् पुमां सा प्रसूयते। अयुग्मेषु दिनेष्व्यासां भवेद् बहुतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् सा तु कन्या प्रसूयते ॥” इसी प्रकार भोज ने भी कहा है।

अं. ३ ]

शरीरास्थानम्

२६६

में शिथिलता, शुक्र और शोणित का रुक जाना, और योनि का स्फुरण (Pulsation) आदि लक्षण होते हैं१।

वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित का अवबन्ध—बद्धमिलित—मिश्रित हो जाना—मिल जाना फलतः बाहर न निकलना—जिस दिन गर्भाधान होता है उस दिन मैथुन के पश्चात् शुक्र बाहर नहीं निकलता अपितु गर्भाशय में ही रह जाता है अन्य दिनों में निकल जाता है। गर्भाधान होते ही योनि—गर्भाशय में स्फुरण होने लगता है। बहुधाः प्रसूता तत्काल उसका अनुभव कर लेती है। यह वही स्फुरण है जिसे वेद में “सोऽस्फुरत्” वह स्फुरित होने लगा। यही स्फुरण जीवन भर रहता है। इसी से शरीर की-गर्भ की—बुद्धि होने लगती है ॥१३॥

स्तनयोः कृष्णमुखता रोमराज्यदुग्गमस्तथा। अक्षिपक्षमाणि चाप्यस्याः संमोलयन्ते विशेषतः ॥१४॥ अकामतश्छूर्दयति गन्धादुद्धिज्जे शुभात्। प्रसेकः सदन् चापि गर्भिण्या लिङ्गमुच्यते ॥१५॥

गर्भिणी के लक्षण— स्तनमुखों का काला होना, लोमहर्ष, आँखों की पलकों का विशेष रूप से बन्द होना, बिना इच्छा के वमन होना, शुभ, गन्धों से उद्विग्नता (घबराहट) होना, मुख से लाला बहना और अंगों में शिथिलता होना गर्भिणी के लक्षण हैं२।

वि० मन्तव्य—स्तनों के मुखों में दूसरे तीसरे मास में कृष्णता व्यक्त हो जाती है। छवि—किसी २ को, कभी २, किसी २ गर्भाधान में प्रथम दिन से प्रसव पर्यन्त होती है और किसी को एक दो, दस बीस बार। मासिक रजः खाव भी बन्द हो जाता है परन्तु किसी २-लालों में एक को प्रसव पर्यन्त नियमित रूप से होता रहता है और गर्भ को कोई हानि भी नहीं पहुँचती। उदर धीरे २ बढ़ने लगता है ज्यों २ गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों। इसी प्रकार स्तन भी बढ़ने लगते हैं। किसी २ के पाँच में शोफ तथा विदाह भी होता है ॥१४, १५॥

तदा प्रभृति व्यव्याय व्यायामसतिपर्यमतिकर्शनं दिवास्वप्नं राज्रिजागरणं शोकं यानारोहणं भयमुत्कटुकासन् चैकान्ततः स्नेहाद्विक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत ॥१६॥

जिस समय से ही गर्भस्थिति के लक्षण स्पष्ट हो जायें, उसी समय से अर्थात् प्रथम मास से ही व्यायाम, व्यव्याय (मैथुन)

१ चरक ने भी कहा है—“तृप्तिश्च बीजग्रहणञ्च योर्न्या गर्भस्य सद्योनुगतस्य विम्बम्”।

२ चरक ने भी कहा है—“आर्तवादशन्मास्यसंखणमनन्ना-भिलापः छदिररोचकोऽस्लकामता च” इत्यादि।

अपतर्पण (शरीर को तृप्त-पुष्ट न करनेवाला आहार-विहार), अतिकर्षण (कृश करनेवाला), दिन में सोना, रात्रि में जागना, शोक, सवारी (बोड़े आदि) पर चढ़ना, भय, उत्कट आसन (उकड़ू बैठना), इनको एकदम से त्याग कर देना चाहिये। असमय में स्नेहादि क्रिया, रक्तमोक्षण तथा मल-मूत्र आदि के वेगों को नहीं रोकना चाहिये१।

वि० मन्तव्य—व्यवाय आदि के सेवन से—गर्भ—गर्भाशय में ही मर जा सकता है, उसका खाव अथवा पात अथवा शोष हो सकता है। अधिक जानने के लिये देखिये च० चि० अ० ८-२२। और देखिये इसी स्थान का १० वॉ अध्याय ॥१६॥

दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते। स स भागः अज्ञोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ॥१७॥ वात आदि दोषों तथा आघात के कारण गर्भिणी का जो भाग या अंग पीड़ित होता है, गर्भस्थ शिशु के भी वही अंग तथा भाग पीड़ित होते हैं ॥१७॥

तत्र प्रथमे मासि कललं जायते; द्वितीये शीतोष्मा-निलैरभिप्रपञ्चमानानां महाभूतानां संघातो घनः संजायते, यदि पिण्डः पुमान्, स्त्री चेतु पेशी, नपुंसकं चेदुर्बुद्धमिति। तृतीये हस्तपादशिरसा पञ्च पिण्डका तिवर्तन्तऽङ्ग-प्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति; चतुर्थे सर्वांगप्रत्यङ्गविभागः प्रत्यक्तो भवति, गर्भहृदयप्रत्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिप्रायक्तो भवति, कस्मात्? तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भ-श्रतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति, द्विहृदयां च नारीं दौहद्विनीमाचक्षते। दौहद्वविमानात् कुब्जं कुर्णि खब्जं जडं वामनं विकृताक्षमनक्षं वा नारीमुते जनयति, तस्मात् सा यद्यद्विच्छेत्तत्तस्यै दापयेत्, लब्धदौहदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति ॥१८॥

शुक्र और आर्तव का संयोग होने के पीछे प्रथम मास में कलल (बुदबुदाकार) रूप गर्भ होता है। दूसरे मास में शीत (कफ) और उष्म (पित्त) एवं अनिल (वायु) द्वारा पंचमहामृतों के संघात का परिपाक होने पर गर्भ घन (ठोस) हो जाता है। यदि यह घन पिण्डाकार (गोल) हो तो पुरुष, यदि पेशी के आकार में (लम्बा-चार कोनों वाला) हो तो स्त्री, यदि अर्बुद (सिम्बल के फूल—Tumour) के आकार में हो तो नपुंसक समझना चाहिये। तीसरे महीने में दो हाथ दो पाँव और शिर को बतानेवाली पिण्डकार्य (निशान) बन जाते हैं, शेष अंगों प्रत्यङ्गों का विभाग अतिसूक्ष्म रहता है। चौथे मास में सब अङ्गों-प्रत्यङ्गों की बनावट अधिक स्पष्ट हो जाती है। गर्भ के हृदय के स्पष्ट होने (हृदय की धड़कन के स्पष्ट सुनाई देने) से

१ किस्तार के लिये लेखक की धार्मशिक्षा पुस्तक देखिये।

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

चेतना (आत्मा-चेतना) धातु स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि—चेतना का स्थान हृदय ही है। इसलिये चतुर्थ मास में गर्भ इन्द्रियों के विषयों में चाह (इच्छा) करने लगता है। अतः स्त्री को दो हृदयवाली होने से—“दौहदिनी” कहते हैं। दौहद (गर्भवती) की इच्छा का प्रतिपात होने से संतान कुबडी, कुसित हाथों वाली, एक टांग से लंगड़ी, जड़, नाटी, विकृत आँखोंवाली, अथवा अन्धी उत्पन्न होती है। इसलिये गर्भिणी जिस जिस वस्तु की इच्छा करे दह-वह इसको देनी चाहिये। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से संतान वीर्यशाली और चिरायु होती है।

वि० मन्तव्य—यदि दुर्भाग्य से दूसरे मास में गर्भखाव हो जाता है तो पिण्ड, पेशी अथवा अर्बुद जैसा गर्भ गिरता है और यदि मृत गर्भिणी का शवच्छेदन किया जाय तो देखा जा सकता है और गर्भिणी अत्यन्त कुश हो तो चतुर दाईं स्पर्श द्वारा अनुमान लगा सकती है अथवा “एक्स्ते” द्वारा देखा जा सकता है। इसके पश्चात् भी गर्भखाव-पात होने पर गर्भ के आकारों का ज्ञान होता है। चौथे मास से गर्भ हिलता-डुलता भी प्रतीत होने लगता है। दापयेत्—दिलावे—अर्थात् गृह-चिकित्सक घरवालों से कह सुनकर अवश्य दिलावे। चतुर्थ मास में गर्भवती को विशेष प्रकार की उत्कट इच्छा-अभिलाषा हुआ करती हैं इनको घर की बड़ी बूढ़ियाँ समझ लेती हैं कि वह दौहद है—गर्भ एवं गर्भिणी की सम्मिलित इच्छा है। दौहद = दो हृदयों का भाव। दौहद को “दोहद” कहते हैं।

भवन्ति चात्र—

इन्द्रियाधारस्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी ।

गर्भो बाधभयात्तांस्तान् भिषगाहृत्य दापयेत् ॥१६॥

सा प्राप्तदौहदा पुत्रं जनयेत् गुणान्वितम् ।

अलब्धदौहदा गर्भं लभेतात्मनि वा भयम् ॥१७॥

येषु ये ष्विन्द्रियार्थेषु दौहदे वै विमानना ।

प्रजायेत् सुतरस्यातिस्तस्मिस्तस्मिस्तथेन्द्रिये ॥१८॥

कहा भी है—

गर्भवती स्त्री इन्द्रियों के जिस जिस विषय का भोग करना चाहती हो, वैद्य को चाहिये कि गर्भहानि के भय से उन-उन पदार्थों को लेकर गर्भिणी को देवे। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से गुणशाली पुत्र उत्पन्न होता है। और स्त्री की इच्छा के पूर्ण न होने से गर्भ अथवा अपने में (स्त्री में) ही विकार आ जाता है। गर्भवती स्त्री की जिन जिन विषयों में पूर्ति नहीं होती, पुत्र

१ रघुवंश के तीसरे सर्ग में सुदक्षिणा की चाह को पूर्ण करने का वर्णन कालिदास ने किया है। इसी प्रकार गर्भवती सीता को वन की घोमा देखने के लिये रामचन्द्र जी ने भेजा था।

की उन्हीं २ इन्द्रियों में पीड़ा होती है। वही वही इन्द्रिय वन्धे की खराब रहती है ॥१९-२१॥

राजसंदर्शने यस्या दौहदं जायते खियाः ।

अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ॥२२॥

दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहदात् ।

अलङ्कारिषणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ॥२३॥

आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते ।

देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पाषण्दोपमम् ।

दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते ॥२४॥

गोधामांसाशने पुत्रं सुषुप्तुं धारणात्मकम् ।

गवां मांसे तु बलिनं सबकेशसहं तथा ॥२५॥

माहिषे दौह्दोच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् ।

वराहमांसात् स्वप्नालुं शूरं संजनयेत् सुतम् ॥२६॥

मार्गाद्विक्रान्तजङ्गलं सदा वनचरं सुतम् ।

सूमराद्विग्नमनसं नित्यभोतं च तैत्तिरात् ॥२७॥

अतोऽनुक्तेषु या नारो समभिध्याति दौह्दंम् ।

शरीराचारशीलेः सा समानं जनयिष्यति ॥२८॥

जिस गर्भवती स्त्री को राजा के दर्शन की इच्छा होती है, वह धनवान् और भाग्यशाली कुमार को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को दुकूलपट्ट (क्षोमवस्त्र), तथा कौशेय (रेशमी) वस्त्र एवं आभूषण आदि की चाह होती है, वह अलंकार प्रिय एवं सुन्दर पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को तपस्वियों के निवास स्थान में रहने की इच्छा होती है वह धर्मात्मा एवं संयमी पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को देवताओं की प्रतिमा को देखने की इच्छा होती है, वह पार्षद (समा में प्रशस्त पुरुष-सभ्य) के समान पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को हिंसक पशुओं को देखने की इच्छा होती है वह हिंसाशील पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोह का मांस खाने की इच्छा होती है वह सोने की इच्छावाले एवं दौड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोमांस की इच्छा होती है वह बलवान् एवं सब क्लेशों को सहनेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को भैंस के मांस में अभिरुचि होती है वह शूरवीर, लाल आँखोंवाले तथा बालों वाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को वराह (भुअर) मांस की इच्छा होती है वह सोनेवाले एवं शूरवीर पुत्र को

१ पार्षद का अर्थ हाराणचन्द्र जी ने—रुद्र के अनुचर, किया है। कहा भी है—“रुद्रैर्बलादचं वृषभाधिर्रुद्रैः सपार्षदैरस्वर्मायु पुरे”।

२ कहीं पर ‘धारणात्मकम्’ यह पाठ है—हाथ में पकड़कर न छोड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है।