सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शरीरस्थानम्
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नवीन वस्तु की—या विलक्षण वस्तु-तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती केवल इनका संयोग तथा वृद्धि ही होती है। दृश्यमान शरीर इन्हीं २४ तत्त्वों से निर्मित रहता है। इसमें पुरुष—अर्थात् चेतना धातु पञ्चीसवाँ तत्व है—चेतना धातु अपि एकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः—अर्थात् अकेली चेतना धातु (आत्मा) का नाम भी पुरुष है और “खाऽऽदयः चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः” ( च० शा० अ० १ ) अर्थात् आकाश आदि पञ्च तत्त्व तथा चेतना के संयोग (प्राणी मात्र) का नाम भी आयुर्वेद दर्शन में पुरुष है ॥६॥
स्वः स्वरूपैषां विषयोऽधिभूतं, स्वयमध्यात्मम्, अधिदैवतम्—अथ बुद्धेनैक्षा, अहंकारस्थेश्वरः मनसस्त्रदमाः, दिशः श्रोत्रस्य, त्वचो वायुः, सूर्यश्चलुषः, रसतस्यापः, पृथिवी प्राणस्य, वाचोऽग्निः, हस्तयोरिन्द्रः, पादयोर्विष्णुः, पायोर्मित्रः, प्रजापतिरुपस्थस्येति ॥७॥
इन चौबीस तत्वों के अपने अपने विषय आधिभौतिक हैं, (मूर्तों के अधीन हैं)। स्वयं आध्यात्मिक हैं। अधिदैवत यथा—(जो जो देवता, विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ, वह वह उस तत्व का अधिष्ठाता है) वृद्धि का ब्रह्मा, अहंकार का ईश्वर, मन का चन्द्रमा, श्रोत्र का दिशा, त्वचा का वायु, चक्षु का सूर्य, रसना का जल, घ्राण का पृथिवी, वाणी का अग्नि, हाथों का इन्द्र, पाँव का विष्णु, पायु का मित्र और उपस्थ का प्रजा पति अधिष्ठाता है ॥
वि० मन्तव्य—इनके विषयों—गुणों का अधिष्ठानभूत है प्राणी है और इन सब का अधिष्ठान—आत्मा है, और इनके अधिकारी या अधिष्ठानभूत दैवत—शक्तिदाता या प्रेरक हैं—ब्रह्मा आदि। यह विषय एक दार्शनिक विषय है इसे समझ लेना या मान लेना दार्शनिक दृष्टि से उचित है ॥७॥
तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः पुरुषः पञ्चविंशतितमः कार्यकारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति। सत्यप्यचेतन्ये प्रधानस्य पुरुषकैवल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिगन्ति, स्त्रीरादींश्चात्र हैतुमुदाहरन्ति ॥८॥
इन प्रस्तुत सम्पूर्ण चौबीस तत्वों का वर्ग अचेतन (जड़) है। पुरुष (चेतन जीवात्मा) पञ्चीसवाँ तत्व है। कार्य (शरीर) और कारण (इन्द्रियाँ) इनके साथ संयुक्त होकर पुरुष—चेतयिता (चेतन्य का आश्रय) हो जाता है। जिस
१ (१) उपनिषद् मे भो कहा है— ‘अग्निर्वागं भूत्वा मुखं प्राविशत्’ (२) “वागध्यात्ममिति प्राहुः ब्राह्मणस्तत्त्वदर्शनः। वक्तव्यमधिभूतं तु वल्लिस्तत्राधिदैवतम् ॥” इसी प्रकार से बुद्धिरध्यात्मं, बोद्धव्यम् अधिभूतं, ब्रह्मा अधिदैवतम्—इत्यादि।
प्रकार से जड़ शीर (दूध) वत्स (बछड़े) की वृद्धि के लिये स्वयं क्षरता है, उसी प्रकार से स्वयं अचेतन (जड़भूत) प्रधान (प्रकृति) भी पुरुष के मोक्ष के लिये प्रवृत्त होती है। इस प्रकार से पंगु तथा अन्धे पुरुष के समान इनका संयोग है ॥
वि० मन्तव्य—यह सम्पूर्ण शरीर वस्तुतः अचेतन—जड़ है परन्तु लोहादि निर्मित यन्त्र (इंजन) के समान (गतिशील होने पर भी) जड़ नहीं है। पुरुष के संयोग से—कार्य (१६ विकार) एवं कारण (अध्या प्रकृति) मय शरीर—समस्त शरीर चेतन रहता है यहाँ तक कि वत्स को देखकर गौ का, सन्तान को देखकर माता का दूध भी गतिशील चेतन के समान चलने-वाला हो जाता है और अङ्ग-प्रत्यङ्ग की क्रिया का कहना ही क्या। तालयं यह है प्राणी का शरीर जड़ होने पर भी चेतना के संयोग से क्रियाशील बना रहता है उसके हृदय आदि यन्त्र विधिवत् चलते रहते हैं और कुछ यन्त्र (यथा मेषुनो-पयोगी अवयव और माता के दुग्धनिर्माता अवयव) समय समय पर क्रियाशील हो जाते हैं ॥८॥
अत ऊर्ध्वं प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यवैधर्म्यं व्याख्यास्यामः। तद्यथा—उभावप्यनादी, उभावप्यनन्तौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपि नित्यौ, उभावप्यनपरो, उभौ च सर्वगताविति, एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा वाजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चेति, बहुवस्तु पुरुषाश्चेतनावन्तोऽगुणा अबोजधर्माणोऽप्रसवधर्माणा मध्यस्थधर्मिणश्चेति ॥९॥
इसके आगे प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य की व्याख्या करते हैं। यथा—(प्रथम साधर्म्य)—दोनों ही अनादि (आदि कारण से शून्य), दोनों ही अनन्त (अविनाशी), दोनों ही अलिङ्ग (आकार रहित), दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर (परश्रेष्ठ—दोनों से कोई अधिक श्रेष्ठ नहीं, इसीलिये ऊपर है), और दोनों ही सर्वगत (व्यापक सम्पूर्ण मूर्त संयोगी) हैं। वैधर्म्य—इनमें प्रकृति अचेतन (जड़) एक है, त्रिगुण (सुख, दुःख, मोहात्मक या सत्त्व-रज-तमोगुण रूप), बीजधर्मिणी (बीज के धर्मवाली, उत्पादक शक्ति युक्त), प्रसवधर्मिणी (सगमांवरथा में—कार्यावरथा में परिणामिनी), अमध्यस्थधर्मिणी (सुख, दुःख, भोगवती) है। पुरुष (जीवात्मा) अनेक हैं, चेतन हैं, निगुण हैं, बीज धर्म रहित, प्रसवधर्म से शून्य, मध्यस्थधर्म (सुख दुःख से) रहित हैं ॥
१ कहा भी है— “वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरजस्य। पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्त्तते तद् अय्यवत्म् ॥” २ कहा भी है— (१) तस्मात् न वय्यतेऽध्या न मुच्यते।