भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

वि० मन्तव्य—साधर्म्य—समानधर्मता—समानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान हैं। वैधर्म्य—विपरीत धर्मता—असमानधर्मता—असमानता अर्थात् उक्त कुछ बातों में प्रकृति एवं पुरुष समान नहीं हैं। बीजधर्मिणी—जैसे बीज में वृक्ष स्वरूप से विद्यमान होता है और आगे चलकर इतना बड़ा रूप (शरीर) धारण कर लेता है वैसे प्रकृति से ही सब मूर्तिमान्—रूप उत्पन्न होते हैं। प्रसवधर्मिणी—प्रकृति में से ही सब पदार्थों का प्रसवजन्य-प्रादुर्भाव होता है। अमध्यस्थ धर्मिणी—सुख दुःख आदि ज्ञान-गुण से रहित। जड़ होने से ज्ञान शून्य। और पुरुष—अबीजधर्माणः—प्रकृति के समान बीज के धर्मवाले नहीं, चेतना धातु में से कुछ विलक्षण वस्तु उत्पन्न नहीं होती। अप्रसवधर्माणः—प्रकृति के समान उसमें से किसी पदार्थ का प्रसव नहीं होता। मध्यस्थधर्माणः—सुख दुःख आदि के ज्ञान से युक्त—ज्ञानी-ज्ञानाधिकरण आत्मा-अनुभवो ॥६॥

तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैते विशेषाः सत्स्वरजस्तमांमया भवन्ति, तद्व्युत्तत्वात्तन्मयत्वाच्च तदुगुणा एव पुरुषा भवन्तीत्येके भाषन्ते ॥१०॥

कारण के अनुसार ही कार्य होता है, श्वेत तन्तुओं से श्वेत वस्त्र बनता है, इस न्याय से ये सब भूत मौलिक सम्पूर्ण कार्य, सत्त्व, रजः तमो रूप (सुख दुःख मोहात्मक) हैं। चूंकि उन्हीं के समान आकार होने से तथा बुद्धि में उसका प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण तन्मय होने से पुरुष भी सत्त्व, रज तमोमय होते हैं, ऐसा कई आचार्य मानते हैं।

नापि संसरति कश्चित्।

संसरति-व्यत्ये मुच्यते च नानाभया प्रकृतिः ॥

तस्मात् च विषम्यासात् सिद्ध साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।

कैवल्यमाध्यस्थं दुष्ट-वमकत्वाभावरुच ॥”

(२) “तस्मात् तत्संयोगादवचेतनं चेतनावल्लिगम् ॥”

१ “तस्मात्तत्र विविशोवास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चमस्यः ।

एते स्मृताः विशेषाः शान्ता धोराश्च मूढाश्च ॥”

जिस प्रकार से कि एक ही स्त्री रूप, यौवन, कुलशील से युक्त होने पर स्वामी को सुखी करती है, सुपलियों को दुःखी करती है, अन्य पुरुषों को मोहित करती है, इसी प्रकार से यह प्रकृति भी तीनों गुणवाली है। इसी प्रकार से स्फटिक मणि के पास रक्खा जासुदी का फूल स्फटिकमणि में चमकता है, बच्चा मणि में से फूल लेता चाहता है, इसी प्रकार से पुरुष के अव्यन्त समीप में आई प्रकृति में पुरुष के गुण चमकने लगते हैं—इसीलिये योगसूत्र में कहा है—“वृत्तिसारूप्यमितिरत्र ।” जिस प्रकार से मैले दर्पण में मनुष्य अपना मुख देखकर चिन्ता करने लग जाता है,

वि० मन्तव्य—कारण के अनुरूप—अनुकूल—समान रूप—मूर्तिवाला कार्य होता है यह कुछ विद्वानों का मत है सबका नहीं क्योंकि यह न्याय (सिद्धान्त)—अतिव्याप्ति रहित या निर्दोष नहीं है कारण के विरूप भी कार्य होते हैं यथा हरिद्रा-चूर्ण संयोग में लालिमा आदि आदि । इस सिद्धान्त को मानने-वाले निर्गुण पुरुष (आत्मा) को सगुण—सत्त्व, रजस् एवं तमस् गुणों से युक्त होते देखे जाते हैं और वैसे भी वह पुरुष-सत्त्वादि गुणमय बना रहता है ॥१०॥

वैद्यके तु—

स्वभावामीश्वरं कालं यदृच्छां नियतिं तथा ।

परिणामं च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शनः ॥११॥

वैद्यक शास्त्र में तो उदार बुद्धिवाले (दूरदर्शी, संकुचित विचार न रखनेवाले) लोकस्वभाव (अर्थात् तत्तद्वृद्ध से प्रतिबद्ध सहजधर्म या गुण), ईश्वर, काल, यदृच्छा (अनेक प्रकार की अचानक घटनाओं को उत्पन्न करनेवाली शक्ति) नियति (धर्माधर्म जनित फल) तथा परिणाम इनको ही प्रकृति (उपादान कारण) मानते हैं। परन्तु वास्तव में कुछ तो कारण नहीं बन सकते और कुछ निमित्त कारण हैं।

उसी प्रकार से सुख आदि का अन्तःकरण में प्रतिबिम्ब पड़ने पर अपने को सुखी अनुभव करता है। इसीलिये कहा है—

“तस्मिन्निचिद दर्पणस्फोटसमस्तवास्तुदृष्टयः ।

इमास्ताः प्रतिबिम्बन्ति सरसीव तटद्वमाः ॥”

१ कुछ आचार्य इसका अर्थ इस प्रकार से करते हैं—

वैद्यक शास्त्र में—विपुल बुद्धिवाले विद्वान् स्वभाव, ईश्वर, काल, यदृच्छा, नियति और परिणाम इन छे को कारण मानते हैं। यथा—

स्वभाव—कांटों में तीक्ष्णता, मृग-पक्षियों के विश्व विचित्र रङ्ग, मरिच में कटुता स्वभाव से ही है।

ईश्वर—मनुष्य जड़ है, आत्मा-सुख-दुःख का स्वामी नहीं है। ईश्वर को प्रेरणा से स्वर्ग-नरक में जाता है।

काल—काल ही सृष्टि को स्थिति प्रलय का कारण है—‘कालः कलयतामहम् ॥’

यदृच्छा—जो स्वयं उत्पन्न हो जाता है—यथा तूण और अरणि के संयोग से अग्नि उत्पन्न हो जाती है, इसी प्रकार संसर स्वयं बन जाता है।

नियति—धर्म-अधर्म ही सब की उत्पत्ति में कारण है।

परिणाम—प्रधान (प्रकृति) ही महद-अहंकार आदि रूप में बदलकर सब को उत्पन्न करता है। आयुर्वेद शास्त्र में इन छे के उदाहरण मिलते हैं। यथा—

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