सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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वि० मन्तव्य—पृथुदर्शी एकग्रही-एकान्त ग्रहण करनेवाले या आग्रही नहीं होते अतः वे कोई एक ही प्रकृति ( कारण ) नहीं मानते अपितु अनेक कार्यों के अनेक कारण मानते हैं और यह उचित भी है। यहन्ता—जो कार्य जिस कारण से उत्पन्न हो जाता है वही उसका कारण मान लिया जाता है, दूसरे शब्दों में—अलक्षित कारण से कार्य की उत्पत्ति “यहन्ता” कही जाती है। देखिये चि० अ० १८ श्लो० ४१—यद्यपि अर्बुद पक्ता नहीं है परन्तु कभी २ अष्टद्वय कारण से पक भी जाता है ॥११॥
तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येव चादिशेत् ।
तैश्च तत्त्वक्षणः कृत्स्नो भूतग्रामो न्यजन्व्यत ॥१२॥
तस्योपयोगोऽभिहितश्चिकित्सां प्रति सर्वदा ।
भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते । १३
वास्तव में भूत (पञ्चमहाभूत) तन्मय (प्रकृतिमय) हैं।
कार्य और कारण में भेद न होने से एवं प्रकृति के सत्व, रज, तम गुणोंवाले हैं—चूँकि कारण के अनुरूप ही कार्य होते हैं। इन महाभूतों से तत्त्वक्षण (भूतों के लक्षणों से युक्त)। सम्पूर्ण भूतग्राम (स्थावरजङ्गमात्मक) उत्पन्न हुए। इस भूतग्राम का सदा से ही चिकित्सा के लिए उपयोग किया जा रहा है। क्योंकि चिकित्साशास्त्र में भूतों से पर (श्रेष्ठ, क्षेत्रज्ञ, अव्यक्त आदि)
स्वभाव—
(१) अङ्ग-प्रत्यङ्ग-निर्वृत्ति-स्वभाववादेव जायते ।
(२) धातुषु क्षीयमाणेषु वर्धते द्वाविमो सदा ।
स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशादिति स्थितिः ॥
(३) स्वभावाल्लघवो मृदुगाः तथा लावकपिञ्जलः ॥
ईश्वर—जाठरो भगवान्निरीस्वरोऽनस्य पाचकः । काल—‘महाभूतविशेषास्तु शीतोष्णद्रव्यभेदतः । काल इत्यध्यवस्थितिः’ ॥११॥
यदुच्छा—यदुच्छाचोपगतानि पाकं, पाकक्रमेणोपचरेद् विधिज्ञः ।
नियति (धर्माधर्म)—
(१) ‘ब्रह्मस्योऽज्जनवधपरस्वरहणादिभिः ।
कर्मभिः पापयोगस्य प्रादुः कुण्डस्य संभवम् ।
(२) कर्मजा व्याधयः केचित् ।
परिणाम—
(१) जाठरानेस्तु संयोगात् यदुदेति रसान्तरम् ।
रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥
(२) ता एवोपधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्यं बलवत्यो हेमन्ते भवन्ति ।
(३) सम्यक्परिणतस्याहारस्य सारो रसः ।
(४) वालानां वयःपरिणामात् शुक्लप्रादुर्भावो भवति ।
ऊपर अर्थ कबिराज हाराणचन्द के अनुसार दिया है।
का (जीवात्मा का) चिकित्सोपकरण रूप में विचार ही नहीं किया जाता है ॥
वि० मन्तव्य—प्रकृति पुरुष (जड़ चेतन) मय भूत—प्राणी हैं अतः वे भी प्रकृति पुरुष के गुणों से युक्त हैं और उन भूतों से—तत्त्वक्षण-भूतों के लक्षणोंवाला (वस्तुतः प्रकृति पुरुष के लक्षणोंवाला) समस्त भूत समूह (प्राणि जगत्) प्रादुर्भूत हुआ था और होता है—होता रहेगा। और चिकित्सा शास्त्र में इसी भूत समूह का उपयोग होता है अर्थात् चिकित्सा के उपकरण भी और उपकार्य भी यही भूत हैं और भूतों (प्राणियों) से परे—आगे—ऊपर—चिकित्सा शास्त्र में चिन्ता-विचार ही नहीं किया जाता या किया गया है—रोगी भी भूत है और वनस्पति, वानस्पत्य वीरुध तथा ओषधी भी भूत है, और खनिज पदार्थ भी भूत परन्तु अन्य भूत से मिलकर क्रियाशील होते हैं अन्यथा नहीं। तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः १—संस्वेदज, २—जरायुज, ३—अण्डज, ४—उद्भिज संज्ञः स० सू० अ० १। अर्थात् स्वेद—प्राणी का और मृमि आद का स्वेद, इससे प्रादुर्भूत—जूर्प, मच्छर आदि, जरायु—जेरेजेडी में प्रादुर्भूत-मानव, गौ, घोड़ा आदि, अण्ड से प्रादुर्भूत-पक्षी, सर्प आदि और उद्भिज-बीज, पौदा, घास आदि से प्रादुर्भूत वृक्ष, पौदा, घास आदि। बस यही जगत्, संसार या सृष्टि है—गच्छति इति जगत्, संसरति इति संसारः (गम्लु)—गती सृ—गती धातुः—जो गति करता है—ज्ञान, गति (चलना) तथा प्राप्ति करता है, प्राणि मात्र में यह तीनों गुण हैं, स्थावर प्राणी में गति—स्थानान्तर प्राप्ति मले ही न हो, पर वह भी—ज्ञान एवं प्राप्ति—आदान अवश्य करता है। इसी जगत् या संसार का विचार आयुर्वेद में किया गया है, आयुर्वेद दर्शन इसी को देखता है मानता है और समझता है ॥१३॥
यतोऽभिहितं—“तत्संभवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तः” (सू० अ० १); भौतिकानि चैन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते, तथेन्द्रियाथोः ॥१४॥
क्योंकि पहले कहा है कि—‘पुरुष’ के ग्रहण से ही पुरुष से उत्पन्न होनेवाले शुक्ल शोणित आदि द्रव्यसमूहों (जिनका कारण पृथिवी आदि पञ्चमहाभूत हैं) का भी ग्रहण हो जाता है, ऐसा समझना चाहिये। आयुर्वेद शास्त्र में इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के विषय शब्दादि भी भौतिक ही कहकर वर्णन किये जाते हैं ॥
१ यथा—लोको हि द्विविधः—स्थावरो जङ्गमश्च । तत्र पुरुषः प्रधानं तस्योपकरणमन्यत् ॥
२ कहा भी है— खं श्रोत्रे स्पशने वायुदर्शने तेज उत्कटम् । सलिलं रसने भूमिर्घ्राणे तज्जीर्णरूपितम् ॥