भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ ३०१ ]

आयुर्वेद शास्त्र का इन्द्रियों के विषय में सांख्यशास्त्र से जो भेद है—उसको स्पष्ट करते हैं—सांख्यशास्त्र में इन्द्रियों की उत्पत्ति अहंकार से, मूतादि (तामसिक) अहंकार से पञ्चतन्मात्र की उत्पत्ति मानकर इनसे पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति मानी है। परन्तु आयुर्वेद में—

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में (यहाँ) श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ भौतिक मानी जाती हैं और उनके शब्द आदि विषय भौतिक माने जाते हैं क्योंकि—॥१४॥

भवति चात्र—

इन्द्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः।

नियतं तुल्ययोनिश्वात्रान्येनान्यमिति स्थितिः ॥१५॥

मनुष्य इन्द्रियों द्वारा निश्चित इन्द्रिय के अर्थ (विषय) का ही ग्रहण करता है। क्योंकि—इन्द्रिय तथा इन्द्रिय के विषय के कारण समान हैं। इसलिये अन्य विषय को इन्द्रिय ग्रहण नहीं करती है ॥१५॥

मनुष्य श्रोत्र द्वारा शब्द को ही सुनता है, गन्ध को नहीं ग्रहण कर सकता। चूँकि श्रोत्र तथा शब्द कारण समान हैं (आकाश ही दोनों की योनि है)। इसलिये आकाश गुण शब्द को ग्रहण करने के लिये आकाश इन्द्रिय चाहिये। इसलिये अनुमान द्वारा कह सकते हैं—

“घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपदिषु मध्ये गंधस्वेव व्यञ्जकत्वात्। कुंकुमगंधाऽभिन्व्यञ्जकभूतादिवत् ॥”

न चायुर्वेदशास्त्रेपूदिर्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, असर्वगतेषु च क्षेत्रज्ञेषु नित्यपुरुषव्यापकान् हेतुतुदाहरन्ति, आयुर्वेदशास्त्रेऽसर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु संचरन्ति धर्माधर्मनिमित्तं, त एतेऽनुमानप्राह्याः परमसूदमाश्चेतनावन्तः शाश्वता लोहितरेतसोः सन्निपातंऽन्विष्यज्यन्ते, यतोऽभिहितं—“पञ्चमहाभूतशरीरसिमवायः पुरुषः” (सू० अ० १) इति, स एष कमपुरुषश्चिक्तासाधिष्ठतः ॥१६॥

आयुर्वेद शास्त्र में क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा पुरुष) को सर्वगत नहीं मानते अपितु नित्य कहते हैं और असर्वगत क्षेत्रज्ञों में नित्य कहते हैं। अणु आत्मा को प्रतिपादन करने के लिये पुरुष की नित्यता को बतानेवाले कारणों को कहते हैं।

शब्दो विहायसः सशो वायवीयः प्रकीर्तितः।

रूपमानेयमाप्योऽत्र रसो गन्धस्तु पार्थिवः ॥

१ आत्मा को विमु माननेवाले यथा—

“वालाप्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।

सागो जीवः स विज्ञेयः स च नन्यथाय कल्पते।

विशुद्धे अन्तःकरणे आत्मानो विभुत्वं दर्शयति ॥” सत्कारण

रहित वस्तु नित्य है। भोज न भी कहा है—

“शुभाशुभाभ्यां कर्मभ्यां प्रेरणामनसो गतिः।

देहाहंहान्तरं याति कृमिवत् शाश्वतोऽव्ययः।

नित्य इत्युच्यते सद्भिः धनं कारणवान् यतः ॥”

आयुर्वेद शास्त्र के सिद्धान्त से धर्म और अधर्म के कारण ही असर्वगत (अणु) और नित्य क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा-आत्मा) तिर्यग्योनि-देवयोनि और मनुष्ययोनि में विहार करता फिरता है। इन आत्माओं को हम अनुमान द्वारा ही जान सकते हैं। ये आत्मायें अतिसूक्ष्म, चेतन, नित्य हैं। तथा शुक्र एवं शोणित के संयोग होने पर ही (जिस प्रकार कि सूर्यकांतमणि के लैन्स द्वारा घास के जलने पर ही सूर्य की किरणों को अनुमान द्वारा ही जानते हैं) स्पष्ट होती हैं। इसलिये कहा है कि पञ्चमहाभूत और आत्मा के संयोग का नाम ‘पुरुष’ है और यही कर्मफल भोगी पुरुष चिकित्सा का अधिकरण है ॥१६॥

तस्य सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नः प्राणापानानुमेप-निमेषौ बुद्धिर्मनःसङ्कल्पो विचारणा स्मृतिर्विज्ञानमध्य-वसायो विषयोपलब्धिश्च गुणाः ॥१७॥

इस कर्मफल भोगी शरीर—आत्मा एवं मन का संयोग होने पर जो गुण उत्पन्न होते हैं—वे कहते हैं, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन का संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय (निश्चयात्मक बुद्धि) और विषय का ज्ञान (इन्द्रिय द्वारा) ये गुण हैं। ये सोलह गुण हैं, इन्हीं को ‘कला’ शब्द से उपनिषदों में कहा है। ये गुण आत्मा में रहते हैं—इसलिये गुणों को आत्मा कहते हैं ॥१७॥

सात्विकास्तु—आनुराश्यं संविभागरुचिता तितिखा सत्यं धर्मं आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिर्मधा स्मृतिर्धृतिरनभि-षङ्गश्च; राजसास्तु-दुःखबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च; तामसास्तु—विषादित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेनिरा-धोऽज्ञानं दुर्मधस्त्वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति ॥१८॥

मन के सात्विक आदि गुणों को कहते हैं—

आनुराश्यं (कृर कर्म का न करना, दया), संविभागरुचिता (बाँटकर खाने की इच्छा), तितिखा (द्वन्द्व सहिष्णुता) सत्य, धर्म, आस्तिकता, ज्ञान, बुद्धि (तत्काल विषय सूझना), मेधा (ग्रन्थावधारण शक्ति), धृति (धैर्य), स्मृति, अनभिषंग (अनासक्ति-निष्कामता) ये सात्विक गुण हैं।

दुःख की अधिकता, अटनशीलता (धूमने-फिरने की प्रवृत्ति), अधीरता, अहङ्कार, आनृतिकत्व (मिथ्यावचनशीलता) अकारुण्य (निर्दयता), दम्भ (छल-कपट), मान, हर्ष, काम और क्रोध ये राजस गुण हैं।

१ चरकसंहिता में कहा है—

“सत्वमात्मा शरीरञ्च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्।

लोकस्तितृष्टि संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

स पुमाश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम्।

वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं सम्प्रकाशितः ॥”