भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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शारीरस्थानम्

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विषादिव ( अप्रसन्नता ), नास्तिकता, अवमंशीलता, बुद्धि का कुन्द होना, अज्ञान, दुर्मेधा ( दुष्ट बुद्धि ), अकर्मशीलता ( काम न करना आलस्य ), निद्रालुत्व ( निद्राधिक्य ) ये तामसगुण हैं ॥ १८ ॥

आन्तरिक्षः—शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्त्ता च; वायव्यास्तु-स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टा-समूहः सर्वशरीरस्पर्शद्वयं लघुता च, तैजसास्तु—रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पत्किरमषस्तेदण्यं शौर्यं च, आप्यास्तु—रसो रसनेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शौर्यं स्नेहो रेतश्च, पार्थिवस्तु—गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्व-मूलेसमूहो गुरुता चेति ॥ १९ ॥

महामृतों के गुणों को कहते हैं—शब्द, शब्देन्द्रिय (श्रोत्र), सम्पूर्णछिद्रता ( अवकाश ) तथा शिरा-स्नायु आदि का परस्पर पृथक् होना आकाश का गुण है । स्पर्श, स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ), नमन-उन्नमन आदि सम्पूर्ण चेष्टायें तथा सम्पूर्ण शरीर में स्नदन ( गति का होना ) एवं लघुता ( हल्कापन ) वायु का गुण है । रूप—रूपेन्द्रिय ( आँख ), वर्ण ( गौरादि ), संताप, भ्राजिष्णुता ( दीप्तता ) पत्कि ( आहार की परिणति ), अमर्ष ( क्रोध ), तीक्ष्णता ( आशुक्रिया ) और शौर्य ( शूरता ) अग्नि के गुण हैं । रस, रसनेन्द्रिय ( जिह्वा ), सम्पूर्ण दौष-धातु समूहों में द्रवत्व, भारीपन, शीतलता, स्नेह और रेतः ( वीर्य ) ये जल के धर्म हैं । गंध, गन्धेन्द्रिय ( नासिका ), सम्पूर्ण पदार्थों में काठिन्य, भारीपन पृथ्वी के धर्म हैं ॥ १९ ॥

तत्र सत्त्वबहुलमाकाशं, रजोबहुलो वायुः, सत्त्वरजो-बहुलोऽग्निः सत्त्वतमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथिवीति । इनमें आकाश सत्त्व प्रधान, वायु रज प्रधान, अग्नि सत्त्व एवं रज प्रधान, जल-सत्त्व एवं तम प्रधान और पृथ्वी तम प्रधान है ॥ २० ॥

श्लोको चात्र भवतः— अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् । स्वे स्वे द्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्तं लक्षणमिष्यते ॥ २१ ॥ दो श्लोक कहे भी हैं—ये पञ्चभूत परस्पर एक दूसरे में अनुप्रविष्ट ( घुसे ) हुए हैं । अर्थात् एक के धर्म दूसरे में भी आ जाते हैं । यथा—आकाश का गुण शब्द वायु में, वायु

१ (१) अथवा सम्पूर्ण भूत परस्पर सब भूतों में प्रविष्ट हैं । अर्थात्-आकाश में—शब्द गुण के साथ पृथ्वी-जल-तेज और वायु के भी गुण प्रविष्ट हैं । परन्तु अणुमात्र में है, इसलिये स्पष्ट नहीं होते, जहाँ पर इनकी अधिकता रहती है, वहाँ पर स्पष्ट होते हैं । गौतम ऋषि ने भी कहा है—'विष्टं ह्युपरं परेण'—एक भूत दूसरे अगले भूत में प्रविष्ट हुआ है ।

का स्पर्श अग्नि में, अग्नि का रूप गुण अगले भूतों में पहुँच जाता है । परन्तु अपने-अपने द्रव्य में ही इनके अपने विशेष गुण का प्रकाशन होता है ॥ २१ ॥

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराः षोडशैव तु । क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतन्त्रपरतन्त्रतः ॥ २२ ॥

इस अध्याय में स्वतन्त्र ( अपने सिद्धान्त से ) और परतन्त्र ( सांख्य-सिद्धान्त से ) दृष्टि से आठ प्रकृतियाँ, और सोलह विकार तथा क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) का वर्णन संक्षेप में कर दिया है ॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सर्वभूतचिन्ता-शारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः

अथातः शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

शुक्र और शोणित के संयोग से क्षेत्रज्ञ आत्मा की अभिव्यक्ति होती है, यह प्रथम कहा है, इसलिये शुक्र और शोणित के स्वरूप को बताने के लिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ।

वि० मन्तव्य—इस शास्त्र में मानव प्राणी के शरीर की रचना तथा क्रिया का वर्णन है अतः उसीके शुक्र एवं शोणित का वर्णन इस अध्याय में किया गया है ॥ १, २ ॥

वात पित्त श्लेष्म-कुण्प-प्रन्थि-पूतिपूय-क्षीण-मूत्रपुरीष-रेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति ॥ ३ ॥

सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, इसके लिये दूषित शुक्र को कहते हैं—

वात, पित्त, कफ से दूषित, रक्त से दूषित ( रक्त मिश्रित या रक्तिया शुक्त ) कुण्प ( मुर्दे की गन्धवाला अथवा जिसमें शुक्रकीट मृत हो गये हों ), प्रथित ( गाँठवाला ), पूति ( दुर्गन्ध युक्त ), पूय ( मवाद-पस युक्त ), क्षीण ( जिनका वीर्य क्षीण हो गया है ), जिनके वीर्य में मल मूत्र की गन्ध आती है,

(२) वायु का स्पर्श—अनुष्णशीत है । अग्नि के साथ मिलकर उष्ण स्पर्श, जल के साथ मिलकर शीत स्पर्श देती है ।

जल में भी आकाश विद्यमान है, व्यापक होने से, जल में वायु भी विद्यमान है, बुलबुले उठने से, जल में अग्नि भी विद्यमान है, क्योंकि अग्नि वहाँ से उत्पन्न होती है ( अदृश्योऽग्निः ), भूमि भी अणुरूप से जल में व्याप्त है । इस प्रकार से सब भूत परस्पर प्रविष्ट हैं ।