सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुञ्चतसंहिता
[ अ० ।
रूपतन्मात्रं रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति, तेषां विशेषा शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेष्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोऽन्यैः, एवमेषा तत्त्वचतुर्विअतिव्याख्याता ॥४॥
इस अव्यक्त से अव्यक्त के लक्षणोंवाला (सत्त्व-रज तमरूप) महान् (महत् तत्त्व या बुद्धि तत्त्व) उत्पन्न होता है१ । इस सत्त्व-रज-तम लक्षणोंवाले महत् तत्त्व से सत्त्व-रज-तम लक्षणों से युक्त अहंकार उत्पन्न होता है । यह अहंकार (अभिमान) तीन प्रकार का है । यथा—वैकारिक सात्विक, तैजस राजस, भूतादि तामस । इनमें वैकारिक (सात्विक) अहंकार से, तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन्हीं लक्षणोंवाली (सात्विक एवं राजस) ग्यारह इन्द्रियाँ [पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन (सात्विक), पाँच कर्मेन्द्रिय, (राजस) ] उत्पन्न होती हैं । यथा—श्रोत्र (कान), त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (नासिका), वाक् (वाणी), हस्त (हाथ), उपस्थ (शिश्न-भग), पायु (गुदा), पाद (पाँव) और मन, ये ग्यारह इन्द्रियाँ हैं । ये पहली पाँच इन्द्रियाँ बुद्धि (ज्ञान)-इन्द्रियाँ हैं, शेष पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । मन, ज्ञान और कर्म दोनों प्रकार का है, चूँकि दोनों के साथ प्रवृत्त होता है । भूतादि (तामसिक) अहंकार से भी तैजस (राजस) अहंकार की सहायता द्वारा, इन लक्षणोंवाली पंच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । यथा—शब्द-तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्ध-तन्मात्रा । इन तन्मात्राओं के विशेष (मेदक) गुण-क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । इन विसेदक गुणों से क्रमशः व्योम (आकाश), अनिल (वायु), अनल (अग्नि), जल और पृथिवी—ये भूत उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार से चौबीस तत्त्वों की (अव्यक्त, महान्, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पंचतन्मात्रा और पंचमहाभूत) व्याख्या कर दी है२ ।
१ महान का रूप—
“यदेतत् विसृतं बीजं प्रधानपुरुषात्मकम् ।
महत्त्वमिति प्रोक्तं दृष्टितत्त्वं तदुच्यते ॥”
बुद्धितत्त्वं—सत्त्वसमुद्भेकात् निर्मलस्फटिकोपलक्षणं चिन्हाया-संक्रान्तिप्राप्तचैतन्यं पुरुषवस्त्रानात्मकाध्यवसेयविषयं निश्चितार्थ-करणमित्यर्थः ।
चरक में भी कहा है—
“शुद्धसत्त्वस्य या शुदा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते ।
यया भिन्नस्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥” इत्यादि ॥
२ कहा भी है—
“सात्विक एकादशकः प्रवर्तते वैकारिकादहङ्कारात् ।
भूतादेस्तन्मात्रः स तामसत्त्वजसामावात् ॥” स० का०
“तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता ।
तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषस्ततो द्विते ॥” वि० पु०
वि० मन्तव्य—यह भूत-प्राणी की उत्पत्ति का वर्णन है—जब उक्त अव्यक्त में विद्यमान आत्मा जीव-चेतयिता-पुरुष-चेतना धातु-शरीरी नामधेय-उचित परिस्थिति पाकर चेतना-गति-हर्कत उत्पन्न करता है—उत्पन्न होने लगता है तब—महान्-बोध-ज्ञान उत्पन्न होता है उससे या उसके पश्चात् अहंकार, अहंकार से या उसके पश्चात्—श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ या इन्द्रियों के अधिष्ठान-आदि २—उत्पन्न होने लगते हैं और काल परिणाम से शरीर एवं आत्मा का यौगिक प्राणी जन्तु उत्पन्न हो जाता है । दार्शनिक दृष्टि से—उत्पत्ति का प्रारम्भ होते ही समस्त शरीर का सूक्ष्म ढाँचा बन जाता है केवल उसका व्यक्ति भाव काल परिणाम से होता है । समय पाकर बीज ही वृक्ष, शुक्र शोणित ही प्राणी तथा समुद्र जल ही मत्स्य आदि का रूप = आकार धारण कर लेता है ॥४॥
तत्र बुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विषयाः, कर्मेन्द्रियाणां यथासङ्ख्यं वचनादानानन्दविसर्गविहरणानि ॥५॥
इन चौबीस तत्त्वों में बुद्धि (ज्ञान) इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं । कर्मेन्द्रियों के विषय क्रमशः वचन (बोलना-वाणी का), आदान (ग्रहण करना हाथ का), आनन्द (उपस्थेन्द्रिय का), विसर्ग (पायु का) और विहरण (चलना पाँव का) कार्य हैं ॥५॥
अव्यक्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणि चेत्यष्टा प्रकृतयः, शेषाः षोडशविकाराः ॥६॥
अव्यक्त, महान् (बुद्धि), अहंकार और पञ्चतन्मात्र ये आठ प्रकृतियाँ हैं, शेष सोलह (ग्यारह इन्द्रियाँ और पञ्चभूत) विकार हैं—(किसी अन्य वस्तु को उत्पन्न नहीं करते१) ।
वि० मन्तव्य—अव्यक्त तो प्रकृति (कारण) है ही परन्तु महान् आदि भी प्रकृति हैं परन्तु—ये विकृति विकार-कार्य भी हैं क्योंकि ये उत्पत्ति काल में उत्पन्न होते हैं । और—सोलह तत्त्व—विकार-कार्य ही हैं इनसे
इनमें भूत परस्पर अनुप्रविष्ट हैं । यथा—“पूर्वः पूर्वां गुणस्वैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥” इससे “शब्दतन्मात्रात्-शब्दगुणं व्योमः, शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्रात्-वायुः, शब्दतन्मात्र स्पर्शतन्मात्रसहितात् रूपतन्मात्रात्-शब्द-स्पर्श-रूप-गुण-तेजः ॥”
इसी प्रकार से आगे-विस्तार के लिये इल्लूगाचार्य की टीका देखिये ।
१ “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदायाः प्रकृतिविकृतयः सप्त । — शेषाः षोडश विकाराः.....॥”
प्रकृति से अभिप्राय—तत्त्वान्तर को उत्पन्न करने से हैं । इसलिये बुद्धि, अहंकार, विकृति—प्रकृति दोनों हैं ।