भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

चेतना (आत्मा-चेतना) धातु स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि—चेतना का स्थान हृदय ही है। इसलिये चतुर्थ मास में गर्भ इन्द्रियों के विषयों में चाह (इच्छा) करने लगता है। अतः स्त्री को दो हृदयवाली होने से—“दौहदिनी” कहते हैं। दौहद (गर्भवती) की इच्छा का प्रतिपात होने से संतान कुबडी, कुसित हाथों वाली, एक टांग से लंगड़ी, जड़, नाटी, विकृत आँखोंवाली, अथवा अन्धी उत्पन्न होती है। इसलिये गर्भिणी जिस जिस वस्तु की इच्छा करे दह-वह इसको देनी चाहिये। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से संतान वीर्यशाली और चिरायु होती है।

वि० मन्तव्य—यदि दुर्भाग्य से दूसरे मास में गर्भखाव हो जाता है तो पिण्ड, पेशी अथवा अर्बुद जैसा गर्भ गिरता है और यदि मृत गर्भिणी का शवच्छेदन किया जाय तो देखा जा सकता है और गर्भिणी अत्यन्त कुश हो तो चतुर दाईं स्पर्श द्वारा अनुमान लगा सकती है अथवा “एक्स्ते” द्वारा देखा जा सकता है। इसके पश्चात् भी गर्भखाव-पात होने पर गर्भ के आकारों का ज्ञान होता है। चौथे मास से गर्भ हिलता-डुलता भी प्रतीत होने लगता है। दापयेत्—दिलावे—अर्थात् गृह-चिकित्सक घरवालों से कह सुनकर अवश्य दिलावे। चतुर्थ मास में गर्भवती को विशेष प्रकार की उत्कट इच्छा-अभिलाषा हुआ करती हैं इनको घर की बड़ी बूढ़ियाँ समझ लेती हैं कि वह दौहद है—गर्भ एवं गर्भिणी की सम्मिलित इच्छा है। दौहद = दो हृदयों का भाव। दौहद को “दोहद” कहते हैं।

भवन्ति चात्र—

इन्द्रियाधारस्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी ।

गर्भो बाधभयात्तांस्तान् भिषगाहृत्य दापयेत् ॥१६॥

सा प्राप्तदौहदा पुत्रं जनयेत् गुणान्वितम् ।

अलब्धदौहदा गर्भं लभेतात्मनि वा भयम् ॥१७॥

येषु ये ष्विन्द्रियार्थेषु दौहदे वै विमानना ।

प्रजायेत् सुतरस्यातिस्तस्मिस्तस्मिस्तथेन्द्रिये ॥१८॥

कहा भी है—

गर्भवती स्त्री इन्द्रियों के जिस जिस विषय का भोग करना चाहती हो, वैद्य को चाहिये कि गर्भहानि के भय से उन-उन पदार्थों को लेकर गर्भिणी को देवे। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से गुणशाली पुत्र उत्पन्न होता है। और स्त्री की इच्छा के पूर्ण न होने से गर्भ अथवा अपने में (स्त्री में) ही विकार आ जाता है। गर्भवती स्त्री की जिन जिन विषयों में पूर्ति नहीं होती, पुत्र

१ रघुवंश के तीसरे सर्ग में सुदक्षिणा की चाह को पूर्ण करने का वर्णन कालिदास ने किया है। इसी प्रकार गर्भवती सीता को वन की घोमा देखने के लिये रामचन्द्र जी ने भेजा था।

की उन्हीं २ इन्द्रियों में पीड़ा होती है। वही वही इन्द्रिय वन्धे की खराब रहती है ॥१९-२१॥

राजसंदर्शने यस्या दौहदं जायते खियाः ।

अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ॥२२॥

दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहदात् ।

अलङ्कारिषणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ॥२३॥

आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते ।

देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पाषण्दोपमम् ।

दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते ॥२४॥

गोधामांसाशने पुत्रं सुषुप्तुं धारणात्मकम् ।

गवां मांसे तु बलिनं सबकेशसहं तथा ॥२५॥

माहिषे दौह्दोच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् ।

वराहमांसात् स्वप्नालुं शूरं संजनयेत् सुतम् ॥२६॥

मार्गाद्विक्रान्तजङ्गलं सदा वनचरं सुतम् ।

सूमराद्विग्नमनसं नित्यभोतं च तैत्तिरात् ॥२७॥

अतोऽनुक्तेषु या नारो समभिध्याति दौह्दंम् ।

शरीराचारशीलेः सा समानं जनयिष्यति ॥२८॥

जिस गर्भवती स्त्री को राजा के दर्शन की इच्छा होती है, वह धनवान् और भाग्यशाली कुमार को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को दुकूलपट्ट (क्षोमवस्त्र), तथा कौशेय (रेशमी) वस्त्र एवं आभूषण आदि की चाह होती है, वह अलंकार प्रिय एवं सुन्दर पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को तपस्वियों के निवास स्थान में रहने की इच्छा होती है वह धर्मात्मा एवं संयमी पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को देवताओं की प्रतिमा को देखने की इच्छा होती है, वह पार्षद (समा में प्रशस्त पुरुष-सभ्य) के समान पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को हिंसक पशुओं को देखने की इच्छा होती है वह हिंसाशील पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोह का मांस खाने की इच्छा होती है वह सोने की इच्छावाले एवं दौड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोमांस की इच्छा होती है वह बलवान् एवं सब क्लेशों को सहनेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को भैंस के मांस में अभिरुचि होती है वह शूरवीर, लाल आँखोंवाले तथा बालों वाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को वराह (भुअर) मांस की इच्छा होती है वह सोनेवाले एवं शूरवीर पुत्र को

१ पार्षद का अर्थ हाराणचन्द्र जी ने—रुद्र के अनुचर, किया है। कहा भी है—“रुद्रैर्बलादचं वृषभाधिर्रुद्रैः सपार्षदैरस्वर्मायु पुरे”।

२ कहीं पर ‘धारणात्मकम्’ यह पाठ है—हाथ में पकड़कर न छोड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है।