सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शरीरास्थानम्
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में शिथिलता, शुक्र और शोणित का रुक जाना, और योनि का स्फुरण (Pulsation) आदि लक्षण होते हैं१।
वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित का अवबन्ध—बद्धमिलित—मिश्रित हो जाना—मिल जाना फलतः बाहर न निकलना—जिस दिन गर्भाधान होता है उस दिन मैथुन के पश्चात् शुक्र बाहर नहीं निकलता अपितु गर्भाशय में ही रह जाता है अन्य दिनों में निकल जाता है। गर्भाधान होते ही योनि—गर्भाशय में स्फुरण होने लगता है। बहुधाः प्रसूता तत्काल उसका अनुभव कर लेती है। यह वही स्फुरण है जिसे वेद में “सोऽस्फुरत्” वह स्फुरित होने लगा। यही स्फुरण जीवन भर रहता है। इसी से शरीर की-गर्भ की—बुद्धि होने लगती है ॥१३॥
स्तनयोः कृष्णमुखता रोमराज्यदुग्गमस्तथा। अक्षिपक्षमाणि चाप्यस्याः संमोलयन्ते विशेषतः ॥१४॥ अकामतश्छूर्दयति गन्धादुद्धिज्जे शुभात्। प्रसेकः सदन् चापि गर्भिण्या लिङ्गमुच्यते ॥१५॥
गर्भिणी के लक्षण— स्तनमुखों का काला होना, लोमहर्ष, आँखों की पलकों का विशेष रूप से बन्द होना, बिना इच्छा के वमन होना, शुभ, गन्धों से उद्विग्नता (घबराहट) होना, मुख से लाला बहना और अंगों में शिथिलता होना गर्भिणी के लक्षण हैं२।
वि० मन्तव्य—स्तनों के मुखों में दूसरे तीसरे मास में कृष्णता व्यक्त हो जाती है। छवि—किसी २ को, कभी २, किसी २ गर्भाधान में प्रथम दिन से प्रसव पर्यन्त होती है और किसी को एक दो, दस बीस बार। मासिक रजः खाव भी बन्द हो जाता है परन्तु किसी २-लालों में एक को प्रसव पर्यन्त नियमित रूप से होता रहता है और गर्भ को कोई हानि भी नहीं पहुँचती। उदर धीरे २ बढ़ने लगता है ज्यों २ गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों। इसी प्रकार स्तन भी बढ़ने लगते हैं। किसी २ के पाँच में शोफ तथा विदाह भी होता है ॥१४, १५॥
तदा प्रभृति व्यव्याय व्यायामसतिपर्यमतिकर्शनं दिवास्वप्नं राज्रिजागरणं शोकं यानारोहणं भयमुत्कटुकासन् चैकान्ततः स्नेहाद्विक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत ॥१६॥
जिस समय से ही गर्भस्थिति के लक्षण स्पष्ट हो जायें, उसी समय से अर्थात् प्रथम मास से ही व्यायाम, व्यव्याय (मैथुन)
१ चरक ने भी कहा है—“तृप्तिश्च बीजग्रहणञ्च योर्न्या गर्भस्य सद्योनुगतस्य विम्बम्”।
२ चरक ने भी कहा है—“आर्तवादशन्मास्यसंखणमनन्ना-भिलापः छदिररोचकोऽस्लकामता च” इत्यादि।
अपतर्पण (शरीर को तृप्त-पुष्ट न करनेवाला आहार-विहार), अतिकर्षण (कृश करनेवाला), दिन में सोना, रात्रि में जागना, शोक, सवारी (बोड़े आदि) पर चढ़ना, भय, उत्कट आसन (उकड़ू बैठना), इनको एकदम से त्याग कर देना चाहिये। असमय में स्नेहादि क्रिया, रक्तमोक्षण तथा मल-मूत्र आदि के वेगों को नहीं रोकना चाहिये१।
वि० मन्तव्य—व्यवाय आदि के सेवन से—गर्भ—गर्भाशय में ही मर जा सकता है, उसका खाव अथवा पात अथवा शोष हो सकता है। अधिक जानने के लिये देखिये च० चि० अ० ८-२२। और देखिये इसी स्थान का १० वॉ अध्याय ॥१६॥
दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते। स स भागः अज्ञोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ॥१७॥ वात आदि दोषों तथा आघात के कारण गर्भिणी का जो भाग या अंग पीड़ित होता है, गर्भस्थ शिशु के भी वही अंग तथा भाग पीड़ित होते हैं ॥१७॥
तत्र प्रथमे मासि कललं जायते; द्वितीये शीतोष्मा-निलैरभिप्रपञ्चमानानां महाभूतानां संघातो घनः संजायते, यदि पिण्डः पुमान्, स्त्री चेतु पेशी, नपुंसकं चेदुर्बुद्धमिति। तृतीये हस्तपादशिरसा पञ्च पिण्डका तिवर्तन्तऽङ्ग-प्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति; चतुर्थे सर्वांगप्रत्यङ्गविभागः प्रत्यक्तो भवति, गर्भहृदयप्रत्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिप्रायक्तो भवति, कस्मात्? तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भ-श्रतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति, द्विहृदयां च नारीं दौहद्विनीमाचक्षते। दौहद्वविमानात् कुब्जं कुर्णि खब्जं जडं वामनं विकृताक्षमनक्षं वा नारीमुते जनयति, तस्मात् सा यद्यद्विच्छेत्तत्तस्यै दापयेत्, लब्धदौहदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति ॥१८॥
शुक्र और आर्तव का संयोग होने के पीछे प्रथम मास में कलल (बुदबुदाकार) रूप गर्भ होता है। दूसरे मास में शीत (कफ) और उष्म (पित्त) एवं अनिल (वायु) द्वारा पंचमहामृतों के संघात का परिपाक होने पर गर्भ घन (ठोस) हो जाता है। यदि यह घन पिण्डाकार (गोल) हो तो पुरुष, यदि पेशी के आकार में (लम्बा-चार कोनों वाला) हो तो स्त्री, यदि अर्बुद (सिम्बल के फूल—Tumour) के आकार में हो तो नपुंसक समझना चाहिये। तीसरे महीने में दो हाथ दो पाँव और शिर को बतानेवाली पिण्डकार्य (निशान) बन जाते हैं, शेष अंगों प्रत्यङ्गों का विभाग अतिसूक्ष्म रहता है। चौथे मास में सब अङ्गों-प्रत्यङ्गों की बनावट अधिक स्पष्ट हो जाती है। गर्भ के हृदय के स्पष्ट होने (हृदय की धड़कन के स्पष्ट सुनाई देने) से
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