भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रतसंहिता

[ अ. ]

तत्र शुक्रबाहुल्यात् पुमान्, आतवबाहुल्यात् स्त्री, सान्ध्यादुभयोनंपुंसकमिति ॥१॥

शुक्र की प्रबलता—अधिकता होने से पुरुष, आर्त्तव की प्रबलता—अधिकता होने से स्त्री, और दोनों की समानता रहने से नपुंसक संतान उत्पन्न होती है।

वि० मन्तव्य—यह एक मत है इस विषय में अन्य मत-विचार भी हैं। यथा—श्लो० १२ देखिये ॥१॥

ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्तवः, अदृष्टार्तवोऽप्यस्तीत्येके भाषन्ते ॥६॥

रजोदर्शन के पश्चात् ऋतुकाल बारह दिन तक रहता है। कई आचार्यों का मत है कि रजोदर्शन न होने पर भी ऋतु-काल होता है। गर्भस्थिति की योग्यता की परीक्षा के लिये ऋतु-धर्म को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। मासिक धर्म के बिना भी ऋतुधर्म रह जाता है, क्योंकि—

वि० मन्तव्य—किसी २-लाखों में किसी एक स्त्री को रजो-दर्शन होता ही नहीं परन्तु गर्भाधान होता है। ७-८ वें श्लोक में इसी के लक्षण लिखे हैं। यद्यपि ये सब लक्षण दृष्टार्त्तवा के भी देखे जाते हैं। ऋतु—गर्भाधान का समय—उत्तम समय। कभी २ इस समय के पश्चात् भी गर्भाधान हो जाता है। परन्तु वह—उत्तम गर्भ नहीं होता है ॥६॥

भवन्ति चान्न—

पीनप्रसन्नवदनां प्रकिलन्नात्ममुखद्विजाम्।

नरकामां प्रियकथां घस्तकुट्यक्षिभूर्धजाम् ॥७॥

स्फुरद्वजकुचश्रोणिनाभ्यूरजघनस्फिकम्।

हृषीत्सुक्यपरां चापि विद्याहतुमतीमिति ॥८॥

कहा भी है—

ऋतुमती के लक्षण—जिस स्त्री का मुख पुष्ट तथा प्रसन्न हो, आत्मा (शरीर) मुख और दांत (मस्ते), विशेष रूप में किलन्न हो जायें, जो पुरुष की इच्छा करती हो, प्रिय बचन बोलती हो, कुखि, आँख और बाल धियिल हों, जिसकी सुजायें, कुच, श्रोणि, नाभि, ऊरु, जघन और नितम्ब में स्फुरण होता हो, जिसकी हृष एवं उत्सुकता रहती हो, उसे ऋतुमती समझना चाहिये ॥७,८॥

नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं तथा।

ऋती व्यतीते नार्यास्तु योनिः सन्त्रियते तथा ॥९॥

दिन के व्यतीत होने पर सार्यकाल में जिस प्रकार कमल फूल बन्द हो जाता है, उसी प्रकार से ऋतुकाल व्यतीत होने पर स्त्री की योनि का मुख बन्द हो जाता है। योनि का मुख बन्द होने से वीर्य गर्भाशय तक नहीं पहुँचता।

वि० मन्तव्य—परन्तु शुक्र इतना सूक्ष्म होता है कि कभी २ गर्भाशय में प्रविष्ट हो ही जाता है और हो सकता है ऋतुकाल

के पश्चात् भी किसी गर्भाशय का मुख खुला रह जाता हो। यह सत्य है कि—अधिकांश गर्भाधान ऋतुकाल में ही होते हैं। योनि शब्द गर्भाशय का भी नाम है और व्यवहार में भग का भी। ऋतुकाल व्यतीत होने पर गर्भाशय का मुख संकुचित हो जाता है, योनि-भग या अपत्य पथ का मुख बन्द नहीं हो जाता। पाठक ध्यान दें ॥९॥

मासेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदार्त्तवम्।

ईषक्कृष्णं विवर्णं च वायुयोनिसुखं नयेत् ॥१०॥

एक मास तक परिपक्व होता हुआ आर्त्तव (डिम्ब) समय पर वायु द्वारा धमनियों में से होकर योनिमुख की ओर लाया जाता है। इसी समय गर्भाशय की धमनियों से भी रक्त बाहर आता है। यह रक्त किंचित् कृष्ण तथा विकृत गन्धवाला होता है ॥१०॥

तद्वर्षाद्द्वादशात् काले वर्तमानसमूक् पुनः।

जरापक्वशरीराणां याति पद्माशतः क्षयम् ॥११॥

यह रक्त बारह साल की आयु से प्रारम्भ होता है और बुढ़ावस्था के कारण शरीर का परिपाक होने पर पचास वर्ष की आयु में नष्ट हो जाता है। यह समय रजोनिवृत्ति का है ॥११॥

युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेऽवन्यथाऽवला।

पुष्पकाले शुचिस्तस्मादपत्यार्थी क्षियं व्रजेत् ॥१२॥

ऋतुकाल के युग्म (समसंख्यक) दिनों में मैथुन करने से पुत्र उत्पन्न होता है और अयुग्म दिनों में संयोग करने से कन्या उत्पन्न होती है। इसलिये संतान की इच्छावाले पुरुष को चाहिये कि वह पवित्र होकर पुष्पकाल (ऋतुसमय) में सहवास करें ॥१२॥

तत्र सद्योगृहीतगर्भाया लिङ्गानि-श्रमो रत्नानिः पिपासा सकिथसदनं शुक्रशोणितयोरवबन्धः स्फुरणं च योनेः ॥१३॥

जिस स्त्री ने अभी गर्भ ग्रहण किया हो उसके लक्षण निम्न हैं—श्रम (थकावट), रत्नानि (दिल का मचलाना), प्यास, टांगों

१ मासिक धर्म में जो रक्त आता है, उसका स्वरूप मसूइ से बहनेवाले रक्त से मिलता है। इसमें योनि, गर्भाशय के एपी-थिलियम होते हैं। यह रक्त जमता नहीं, इसका रङ्ग काजा होता है। यह आर्त्तव कभी चालीस वर्ष से पूर्व बन्द हो जाता है, और कभी ५० के बाद भी चालू रहता है।

२ विदेह ने भी कहा है—“युग्मेषु दिनेष्व्यासां भवत्यल्पतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् पुमां सा प्रसूयते। अयुग्मेषु दिनेष्व्यासां भवेद् बहुतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् सा तु कन्या प्रसूयते ॥” इसी प्रकार भोज ने भी कहा है।