सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में—चेतनाधातु को नित्य माना है अर्थात् वह अनेक बार जन्म ग्रहण करता है अतः पूर्व-जन्म की स्मृति भी कभी-कभी बनी रहती है ॥५७॥
कर्मणा चोदितो येन तद्वाप्नोति पुनर्भवे ।
अभ्यस्ताः पूर्वदेहे ये तानेव भजते गुणान् ॥५८॥
जिन कर्मों को प्रेरणा से मनुष्य इस शरीर को धारण करता है, तथा पूर्वजन्म में जिन गुणों का अभ्यास किया हुआ होता है, उन्हीं कर्मों तथा गुणों को इस जन्म में पाता है ।
वि० मन्तव्य—वर्तमान जन्म में उन गुणों—दुर्गुणों को शोध ग्रहण करता है जो पूर्वजन्म में अभ्यस्त होते हैं ॥५८॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शुक्शांणिता-
शुद्धिशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
तृतीयोऽध्यायः
अथातो गर्भावक्रान्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पिछले अध्याय में कहा है कि चार वस्तुओं के संयोग से गर्भ रहता है, इसलिये इसको स्पष्ट करने के लिये गर्भावक्रान्ति (गर्भ का अवतरण) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥
सौम्यं शुक्रमार्तवमग्नेयमितरेषामप्यत्र भूतानां सान्निध्यमस्यगुणा विक्षोषेण, परस्परोपकारात् (परस्परानुग्रहान्) परस्परानुप्रवेगाच्च ॥३॥
शुक्र सौम्य (सोमगुण-भूषिष्ट) है और आर्त्तव-आग्नेय (अग्निगुणबहुल) है । इन दोनों अग्नि और जल के अतिरिक्त पृथिवी आदि शेष भूतों का भी अत्यन्त सूक्ष्म रूप से सम्पर्क है । क्योंकि—पृथिवी आदि भूत परस्पर-एक दूसरे का उपकार करते हैं, एक दूसरे के अनुग्राहक हैं, एक दूसरे में घुसे हुए हैं, इसलिये इन तीन कारणों के कारण इनमें प्रवेश है ।
वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित दोनों पञ्च महाभूतात्मक होते हैं । परस्परानुग्रहात्—परस्पर-एक दूसरे से अनुगृहीत-आकृष्ट होने से । शुक्र, शोणित एवं जीव के संयुक्त-मिश्रित पदार्थ का नाम “बीज” है । इसी बीज से शरीर का निर्माण होता है ॥३॥
तत्र षोणुसंयोगः संयोगे तेजः शरीराद्यायुश्चरीरयति, ततस्तैजोनिष्ठसन्निपाताच्छुक्लं च्युतं योनिमभिप्रतिपद्यते संसृज्यते चार्तवेन, ततोऽग्नीषोमसंयोगात् संसृज्यमानो
१ विस्तार के लिये देखिये प्रश्नोपनिषद् में—“भगवन् कुत्रेमाः भजाम्यते । सहोवाच—प्रजापतिर्हि प्रजाकामी स तपस्तत्त्वा मिथुन-भुलादयते रथिच्छ प्रानच्छ । इत्येतौ से बहुधा प्रजाः करिष्यन्ते । रयिरेव चन्द्रमाः प्राण एव सूर्यः ।” इत्यादि ।
गर्भाजयमनुप्रतिपद्यते चेतन्नो वेदयिता स्पृष्टा प्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः खष्टा गन्ता साक्षी धाता वक्ता यः कोऽसवित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादक्षयोऽव्ययोऽचिन्त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्स्वरजस्तमोभिर्दैवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्यमाणो गर्भाजयमनुप्रविश्यावतिष्ठते ॥४॥
छी और पुरुष के संयोग के समय वायु शरीर से तेज (उष्णिमा) को उत्पन्न करती है । यह तेज वायु के साथ मिलकर शुक्र को क्षरित करता है । क्षरित शुक्र (शरीर के सब अवयवों के प्रतिनिधियों को साथ में लेकर) योनि में पहुँचता है । वहाँ आर्त्तव के साथ मिल जाता है । इसके पश्चात् आग्नेय तथा सोमगुण के सम्बन्ध से बनता गर्भ गर्भाशय में पहुँचता है । इसके साथ में चेतन्न, वेदयिता, स्पृष्टा, प्राता, द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष, खष्टा, गन्ता, साक्षी, धाता, वक्ता इत्यादि पर्यायवाचक शब्दों से कहा जानेवाला अक्षय, अव्यय (निर्विकार) अचिन्त्य, रूप (आत्मा) भूतात्मा-तथा सूक्ष्म इन्द्रियों के साथ, या लिंग शरीर के साथ अपने कर्मों के अनुसार सत्त्व, रज, तम, तथा दैव, आसुर, पशु भावों से युक्त हुआ वायु द्वारा प्रेरित होकर गर्भाशय में प्रविष्ट होकर स्थिति करता है ।
वि० मन्तव्य—चेन्नश शरीर भर को जाननेवाला, वेदयिता-सुख दुःख का अनुभव करनेवाला (कुछ दर्शनों के अनुसार मन को अनुभव करनेवाला), स्पृष्टा-स्पृष्टा का अनुभव करनेवाला, प्राता-सूँघनेवाला, द्रष्टा-देखनेवाला, श्रोता-सुननेवाला, रसयिता-रस का ज्ञान करनेवाला, पुरुष—पुरि-शरीर श्वेत-शरीर में शयन करनेवाला या पुरुषः—शरीर का पूर्ण-आभ्यायन करनेवाला, खष्टा-रचना सुष्ठि करनेवाला अपने शरीर की रचना करनेवाला या अगली सन्तान की सृष्टि करनेवाला, गन्ता-चलनेवाला, साक्षी-ज्ञाता, धाता—धारण पोषण का कारण, वक्ता-बोलनेवाला, अक्षय-न घटनेवाला, अव्यय-विकृति-रूपान्तर को प्राप्त न होनेवाला, अचिन्त्य-मनस् द्वारा जिसका चिन्तन नहीं हो सकता । भूतात्मा-मनस् । अक्ष-इन्द्रियाँ । गर्भाशय अनुप्रविश्य अवतिष्ठते-गर्भाशय में जाकर उसमें चिपक जाता है और वहाँ चिपकता है जहाँ से रजस् की प्रवृत्ति होने में क्षत हुआ रहता है ॥४॥
१ शुक्र सम्पूर्ण सिर से तब तक के अवयवों का सार है । इसमें सब शरीर के प्रतिनिधि मिले रहते हैं । इस शुक्र के साथ ही आत्मा भी अवतरण करता है । आत्मा के साथ पूर्वजन्म-कृत कर्म भी शरीर में अवतरित होते हैं । इस शुक्र को नियमित करने वाले सुषुम्ना और मस्तिष्क केन्द्र हैं । शुक्र के साथ पौष्ट्यप्रनिय तथा अन्य प्रनियों के भी स्वाव मिले रहते हैं । यह शुक्र जिम्ब से मिलकर गर्भ को बनाता है ।