सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
अ. २ ]
३८
शारीरस्थानम्
२६७
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में—चेतनाधातु को नित्य माना है अर्थात् वह अनेक बार जन्म ग्रहण करता है अतः पूर्व-जन्म की स्मृति भी कभी-कभी बनी रहती है ॥५७॥
कर्मणा चोदितो येन तद्वाप्नोति पुनर्भवे ।
अभ्यस्ताः पूर्वदेहे ये तानेव भजते गुणान् ॥५८॥
जिन कर्मों को प्रेरणा से मनुष्य इस शरीर को धारण करता है, तथा पूर्वजन्म में जिन गुणों का अभ्यास किया हुआ होता है, उन्हीं कर्मों तथा गुणों को इस जन्म में पाता है ।
वि० मन्तव्य—वर्तमान जन्म में उन गुणों—दुर्गुणों को शोध ग्रहण करता है जो पूर्वजन्म में अभ्यस्त होते हैं ॥५८॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शुक्शांणिता-
शुद्धिशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
तृतीयोऽध्यायः
अथातो गर्भावक्रान्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पिछले अध्याय में कहा है कि चार वस्तुओं के संयोग से गर्भ रहता है, इसलिये इसको स्पष्ट करने के लिये गर्भावक्रान्ति (गर्भ का अवतरण) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥
सौम्यं शुक्रमार्तवमग्नेयमितरेषामप्यत्र भूतानां सान्निध्यमस्यगुणा विक्षोषेण, परस्परोपकारात् (परस्परानुग्रहान्) परस्परानुप्रवेगाच्च ॥३॥
शुक्र सौम्य (सोमगुण-भूषिष्ट) है और आर्त्तव-आग्नेय (अग्निगुणबहुल) है । इन दोनों अग्नि और जल के अतिरिक्त पृथिवी आदि शेष भूतों का भी अत्यन्त सूक्ष्म रूप से सम्पर्क है । क्योंकि—पृथिवी आदि भूत परस्पर-एक दूसरे का उपकार करते हैं, एक दूसरे के अनुग्राहक हैं, एक दूसरे में घुसे हुए हैं, इसलिये इन तीन कारणों के कारण इनमें प्रवेश है ।
वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित दोनों पञ्च महाभूतात्मक होते हैं । परस्परानुग्रहात्—परस्पर-एक दूसरे से अनुगृहीत-आकृष्ट होने से । शुक्र, शोणित एवं जीव के संयुक्त-मिश्रित पदार्थ का नाम “बीज” है । इसी बीज से शरीर का निर्माण होता है ॥३॥
तत्र षोणुसंयोगः संयोगे तेजः शरीराद्यायुश्चरीरयति, ततस्तैजोनिष्ठसन्निपाताच्छुक्लं च्युतं योनिमभिप्रतिपद्यते संसृज्यते चार्तवेन, ततोऽग्नीषोमसंयोगात् संसृज्यमानो
१ विस्तार के लिये देखिये प्रश्नोपनिषद् में—“भगवन् कुत्रेमाः भजाम्यते । सहोवाच—प्रजापतिर्हि प्रजाकामी स तपस्तत्त्वा मिथुन-भुलादयते रथिच्छ प्रानच्छ । इत्येतौ से बहुधा प्रजाः करिष्यन्ते । रयिरेव चन्द्रमाः प्राण एव सूर्यः ।” इत्यादि ।
गर्भाजयमनुप्रतिपद्यते चेतन्नो वेदयिता स्पृष्टा प्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः खष्टा गन्ता साक्षी धाता वक्ता यः कोऽसवित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादक्षयोऽव्ययोऽचिन्त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्स्वरजस्तमोभिर्दैवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्यमाणो गर्भाजयमनुप्रविश्यावतिष्ठते ॥४॥
छी और पुरुष के संयोग के समय वायु शरीर से तेज (उष्णिमा) को उत्पन्न करती है । यह तेज वायु के साथ मिलकर शुक्र को क्षरित करता है । क्षरित शुक्र (शरीर के सब अवयवों के प्रतिनिधियों को साथ में लेकर) योनि में पहुँचता है । वहाँ आर्त्तव के साथ मिल जाता है । इसके पश्चात् आग्नेय तथा सोमगुण के सम्बन्ध से बनता गर्भ गर्भाशय में पहुँचता है । इसके साथ में चेतन्न, वेदयिता, स्पृष्टा, प्राता, द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष, खष्टा, गन्ता, साक्षी, धाता, वक्ता इत्यादि पर्यायवाचक शब्दों से कहा जानेवाला अक्षय, अव्यय (निर्विकार) अचिन्त्य, रूप (आत्मा) भूतात्मा-तथा सूक्ष्म इन्द्रियों के साथ, या लिंग शरीर के साथ अपने कर्मों के अनुसार सत्त्व, रज, तम, तथा दैव, आसुर, पशु भावों से युक्त हुआ वायु द्वारा प्रेरित होकर गर्भाशय में प्रविष्ट होकर स्थिति करता है ।
वि० मन्तव्य—चेन्नश शरीर भर को जाननेवाला, वेदयिता-सुख दुःख का अनुभव करनेवाला (कुछ दर्शनों के अनुसार मन को अनुभव करनेवाला), स्पृष्टा-स्पृष्टा का अनुभव करनेवाला, प्राता-सूँघनेवाला, द्रष्टा-देखनेवाला, श्रोता-सुननेवाला, रसयिता-रस का ज्ञान करनेवाला, पुरुष—पुरि-शरीर श्वेत-शरीर में शयन करनेवाला या पुरुषः—शरीर का पूर्ण-आभ्यायन करनेवाला, खष्टा-रचना सुष्ठि करनेवाला अपने शरीर की रचना करनेवाला या अगली सन्तान की सृष्टि करनेवाला, गन्ता-चलनेवाला, साक्षी-ज्ञाता, धाता—धारण पोषण का कारण, वक्ता-बोलनेवाला, अक्षय-न घटनेवाला, अव्यय-विकृति-रूपान्तर को प्राप्त न होनेवाला, अचिन्त्य-मनस् द्वारा जिसका चिन्तन नहीं हो सकता । भूतात्मा-मनस् । अक्ष-इन्द्रियाँ । गर्भाशय अनुप्रविश्य अवतिष्ठते-गर्भाशय में जाकर उसमें चिपक जाता है और वहाँ चिपकता है जहाँ से रजस् की प्रवृत्ति होने में क्षत हुआ रहता है ॥४॥
१ शुक्र सम्पूर्ण सिर से तब तक के अवयवों का सार है । इसमें सब शरीर के प्रतिनिधि मिले रहते हैं । इस शुक्र के साथ ही आत्मा भी अवतरण करता है । आत्मा के साथ पूर्वजन्म-कृत कर्म भी शरीर में अवतरित होते हैं । इस शुक्र को नियमित करने वाले सुषुम्ना और मस्तिष्क केन्द्र हैं । शुक्र के साथ पौष्ट्यप्रनिय तथा अन्य प्रनियों के भी स्वाव मिले रहते हैं । यह शुक्र जिम्ब से मिलकर गर्भ को बनाता है ।
२६८
मुश्रतसंहिता
[ अ. ]
तत्र शुक्रबाहुल्यात् पुमान्, आतवबाहुल्यात् स्त्री, सान्ध्यादुभयोनंपुंसकमिति ॥१॥
शुक्र की प्रबलता—अधिकता होने से पुरुष, आर्त्तव की प्रबलता—अधिकता होने से स्त्री, और दोनों की समानता रहने से नपुंसक संतान उत्पन्न होती है।
वि० मन्तव्य—यह एक मत है इस विषय में अन्य मत-विचार भी हैं। यथा—श्लो० १२ देखिये ॥१॥
ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्तवः, अदृष्टार्तवोऽप्यस्तीत्येके भाषन्ते ॥६॥
रजोदर्शन के पश्चात् ऋतुकाल बारह दिन तक रहता है। कई आचार्यों का मत है कि रजोदर्शन न होने पर भी ऋतु-काल होता है। गर्भस्थिति की योग्यता की परीक्षा के लिये ऋतु-धर्म को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। मासिक धर्म के बिना भी ऋतुधर्म रह जाता है, क्योंकि—
वि० मन्तव्य—किसी २-लाखों में किसी एक स्त्री को रजो-दर्शन होता ही नहीं परन्तु गर्भाधान होता है। ७-८ वें श्लोक में इसी के लक्षण लिखे हैं। यद्यपि ये सब लक्षण दृष्टार्त्तवा के भी देखे जाते हैं। ऋतु—गर्भाधान का समय—उत्तम समय। कभी २ इस समय के पश्चात् भी गर्भाधान हो जाता है। परन्तु वह—उत्तम गर्भ नहीं होता है ॥६॥
भवन्ति चान्न—
पीनप्रसन्नवदनां प्रकिलन्नात्ममुखद्विजाम्।
नरकामां प्रियकथां घस्तकुट्यक्षिभूर्धजाम् ॥७॥
स्फुरद्वजकुचश्रोणिनाभ्यूरजघनस्फिकम्।
हृषीत्सुक्यपरां चापि विद्याहतुमतीमिति ॥८॥
कहा भी है—
ऋतुमती के लक्षण—जिस स्त्री का मुख पुष्ट तथा प्रसन्न हो, आत्मा (शरीर) मुख और दांत (मस्ते), विशेष रूप में किलन्न हो जायें, जो पुरुष की इच्छा करती हो, प्रिय बचन बोलती हो, कुखि, आँख और बाल धियिल हों, जिसकी सुजायें, कुच, श्रोणि, नाभि, ऊरु, जघन और नितम्ब में स्फुरण होता हो, जिसकी हृष एवं उत्सुकता रहती हो, उसे ऋतुमती समझना चाहिये ॥७,८॥
नियतं दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं तथा।
ऋती व्यतीते नार्यास्तु योनिः सन्त्रियते तथा ॥९॥
दिन के व्यतीत होने पर सार्यकाल में जिस प्रकार कमल फूल बन्द हो जाता है, उसी प्रकार से ऋतुकाल व्यतीत होने पर स्त्री की योनि का मुख बन्द हो जाता है। योनि का मुख बन्द होने से वीर्य गर्भाशय तक नहीं पहुँचता।
वि० मन्तव्य—परन्तु शुक्र इतना सूक्ष्म होता है कि कभी २ गर्भाशय में प्रविष्ट हो ही जाता है और हो सकता है ऋतुकाल
के पश्चात् भी किसी गर्भाशय का मुख खुला रह जाता हो। यह सत्य है कि—अधिकांश गर्भाधान ऋतुकाल में ही होते हैं। योनि शब्द गर्भाशय का भी नाम है और व्यवहार में भग का भी। ऋतुकाल व्यतीत होने पर गर्भाशय का मुख संकुचित हो जाता है, योनि-भग या अपत्य पथ का मुख बन्द नहीं हो जाता। पाठक ध्यान दें ॥९॥
मासेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदार्त्तवम्।
ईषक्कृष्णं विवर्णं च वायुयोनिसुखं नयेत् ॥१०॥
एक मास तक परिपक्व होता हुआ आर्त्तव (डिम्ब) समय पर वायु द्वारा धमनियों में से होकर योनिमुख की ओर लाया जाता है। इसी समय गर्भाशय की धमनियों से भी रक्त बाहर आता है। यह रक्त किंचित् कृष्ण तथा विकृत गन्धवाला होता है ॥१०॥
तद्वर्षाद्द्वादशात् काले वर्तमानसमूक् पुनः।
जरापक्वशरीराणां याति पद्माशतः क्षयम् ॥११॥
यह रक्त बारह साल की आयु से प्रारम्भ होता है और बुढ़ावस्था के कारण शरीर का परिपाक होने पर पचास वर्ष की आयु में नष्ट हो जाता है। यह समय रजोनिवृत्ति का है ॥११॥
युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेऽवन्यथाऽवला।
पुष्पकाले शुचिस्तस्मादपत्यार्थी क्षियं व्रजेत् ॥१२॥
ऋतुकाल के युग्म (समसंख्यक) दिनों में मैथुन करने से पुत्र उत्पन्न होता है और अयुग्म दिनों में संयोग करने से कन्या उत्पन्न होती है। इसलिये संतान की इच्छावाले पुरुष को चाहिये कि वह पवित्र होकर पुष्पकाल (ऋतुसमय) में सहवास करें ॥१२॥
तत्र सद्योगृहीतगर्भाया लिङ्गानि-श्रमो रत्नानिः पिपासा सकिथसदनं शुक्रशोणितयोरवबन्धः स्फुरणं च योनेः ॥१३॥
जिस स्त्री ने अभी गर्भ ग्रहण किया हो उसके लक्षण निम्न हैं—श्रम (थकावट), रत्नानि (दिल का मचलाना), प्यास, टांगों
१ मासिक धर्म में जो रक्त आता है, उसका स्वरूप मसूइ से बहनेवाले रक्त से मिलता है। इसमें योनि, गर्भाशय के एपी-थिलियम होते हैं। यह रक्त जमता नहीं, इसका रङ्ग काजा होता है। यह आर्त्तव कभी चालीस वर्ष से पूर्व बन्द हो जाता है, और कभी ५० के बाद भी चालू रहता है।
२ विदेह ने भी कहा है—“युग्मेषु दिनेष्व्यासां भवत्यल्पतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् पुमां सा प्रसूयते। अयुग्मेषु दिनेष्व्यासां भवेद् बहुतरं रजः। संयोगं तत्र या गच्छेत् सा तु कन्या प्रसूयते ॥” इसी प्रकार भोज ने भी कहा है।
अं. ३ ]
शरीरास्थानम्
२६६
में शिथिलता, शुक्र और शोणित का रुक जाना, और योनि का स्फुरण (Pulsation) आदि लक्षण होते हैं१।
वि० मन्तव्य—शुक्र एवं शोणित का अवबन्ध—बद्धमिलित—मिश्रित हो जाना—मिल जाना फलतः बाहर न निकलना—जिस दिन गर्भाधान होता है उस दिन मैथुन के पश्चात् शुक्र बाहर नहीं निकलता अपितु गर्भाशय में ही रह जाता है अन्य दिनों में निकल जाता है। गर्भाधान होते ही योनि—गर्भाशय में स्फुरण होने लगता है। बहुधाः प्रसूता तत्काल उसका अनुभव कर लेती है। यह वही स्फुरण है जिसे वेद में “सोऽस्फुरत्” वह स्फुरित होने लगा। यही स्फुरण जीवन भर रहता है। इसी से शरीर की-गर्भ की—बुद्धि होने लगती है ॥१३॥
स्तनयोः कृष्णमुखता रोमराज्यदुग्गमस्तथा। अक्षिपक्षमाणि चाप्यस्याः संमोलयन्ते विशेषतः ॥१४॥ अकामतश्छूर्दयति गन्धादुद्धिज्जे शुभात्। प्रसेकः सदन् चापि गर्भिण्या लिङ्गमुच्यते ॥१५॥
गर्भिणी के लक्षण— स्तनमुखों का काला होना, लोमहर्ष, आँखों की पलकों का विशेष रूप से बन्द होना, बिना इच्छा के वमन होना, शुभ, गन्धों से उद्विग्नता (घबराहट) होना, मुख से लाला बहना और अंगों में शिथिलता होना गर्भिणी के लक्षण हैं२।
वि० मन्तव्य—स्तनों के मुखों में दूसरे तीसरे मास में कृष्णता व्यक्त हो जाती है। छवि—किसी २ को, कभी २, किसी २ गर्भाधान में प्रथम दिन से प्रसव पर्यन्त होती है और किसी को एक दो, दस बीस बार। मासिक रजः खाव भी बन्द हो जाता है परन्तु किसी २-लालों में एक को प्रसव पर्यन्त नियमित रूप से होता रहता है और गर्भ को कोई हानि भी नहीं पहुँचती। उदर धीरे २ बढ़ने लगता है ज्यों २ गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों। इसी प्रकार स्तन भी बढ़ने लगते हैं। किसी २ के पाँच में शोफ तथा विदाह भी होता है ॥१४, १५॥
तदा प्रभृति व्यव्याय व्यायामसतिपर्यमतिकर्शनं दिवास्वप्नं राज्रिजागरणं शोकं यानारोहणं भयमुत्कटुकासन् चैकान्ततः स्नेहाद्विक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारणं च न सेवेत ॥१६॥
जिस समय से ही गर्भस्थिति के लक्षण स्पष्ट हो जायें, उसी समय से अर्थात् प्रथम मास से ही व्यायाम, व्यव्याय (मैथुन)
१ चरक ने भी कहा है—“तृप्तिश्च बीजग्रहणञ्च योर्न्या गर्भस्य सद्योनुगतस्य विम्बम्”।
२ चरक ने भी कहा है—“आर्तवादशन्मास्यसंखणमनन्ना-भिलापः छदिररोचकोऽस्लकामता च” इत्यादि।
अपतर्पण (शरीर को तृप्त-पुष्ट न करनेवाला आहार-विहार), अतिकर्षण (कृश करनेवाला), दिन में सोना, रात्रि में जागना, शोक, सवारी (बोड़े आदि) पर चढ़ना, भय, उत्कट आसन (उकड़ू बैठना), इनको एकदम से त्याग कर देना चाहिये। असमय में स्नेहादि क्रिया, रक्तमोक्षण तथा मल-मूत्र आदि के वेगों को नहीं रोकना चाहिये१।
वि० मन्तव्य—व्यवाय आदि के सेवन से—गर्भ—गर्भाशय में ही मर जा सकता है, उसका खाव अथवा पात अथवा शोष हो सकता है। अधिक जानने के लिये देखिये च० चि० अ० ८-२२। और देखिये इसी स्थान का १० वॉ अध्याय ॥१६॥
दोषाभिघातैर्गर्भिण्या यो यो भागः प्रपीड्यते। स स भागः अज्ञोस्तस्य गर्भस्थस्य प्रपीड्यते ॥१७॥ वात आदि दोषों तथा आघात के कारण गर्भिणी का जो भाग या अंग पीड़ित होता है, गर्भस्थ शिशु के भी वही अंग तथा भाग पीड़ित होते हैं ॥१७॥
तत्र प्रथमे मासि कललं जायते; द्वितीये शीतोष्मा-निलैरभिप्रपञ्चमानानां महाभूतानां संघातो घनः संजायते, यदि पिण्डः पुमान्, स्त्री चेतु पेशी, नपुंसकं चेदुर्बुद्धमिति। तृतीये हस्तपादशिरसा पञ्च पिण्डका तिवर्तन्तऽङ्ग-प्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति; चतुर्थे सर्वांगप्रत्यङ्गविभागः प्रत्यक्तो भवति, गर्भहृदयप्रत्यक्तिभावाच्चेतनाधातुरभिप्रायक्तो भवति, कस्मात्? तत्स्थानत्वात्। तस्माद्गर्भ-श्रतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति, द्विहृदयां च नारीं दौहद्विनीमाचक्षते। दौहद्वविमानात् कुब्जं कुर्णि खब्जं जडं वामनं विकृताक्षमनक्षं वा नारीमुते जनयति, तस्मात् सा यद्यद्विच्छेत्तत्तस्यै दापयेत्, लब्धदौहदा हि वीर्यवन्तं चिरायुषं च पुत्रं जनयति ॥१८॥
शुक्र और आर्तव का संयोग होने के पीछे प्रथम मास में कलल (बुदबुदाकार) रूप गर्भ होता है। दूसरे मास में शीत (कफ) और उष्म (पित्त) एवं अनिल (वायु) द्वारा पंचमहामृतों के संघात का परिपाक होने पर गर्भ घन (ठोस) हो जाता है। यदि यह घन पिण्डाकार (गोल) हो तो पुरुष, यदि पेशी के आकार में (लम्बा-चार कोनों वाला) हो तो स्त्री, यदि अर्बुद (सिम्बल के फूल—Tumour) के आकार में हो तो नपुंसक समझना चाहिये। तीसरे महीने में दो हाथ दो पाँव और शिर को बतानेवाली पिण्डकार्य (निशान) बन जाते हैं, शेष अंगों प्रत्यङ्गों का विभाग अतिसूक्ष्म रहता है। चौथे मास में सब अङ्गों-प्रत्यङ्गों की बनावट अधिक स्पष्ट हो जाती है। गर्भ के हृदय के स्पष्ट होने (हृदय की धड़कन के स्पष्ट सुनाई देने) से
१ किस्तार के लिये लेखक की धार्मशिक्षा पुस्तक देखिये।
३००
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
चेतना (आत्मा-चेतना) धातु स्पष्ट हो जाती है। क्योंकि—चेतना का स्थान हृदय ही है। इसलिये चतुर्थ मास में गर्भ इन्द्रियों के विषयों में चाह (इच्छा) करने लगता है। अतः स्त्री को दो हृदयवाली होने से—“दौहदिनी” कहते हैं। दौहद (गर्भवती) की इच्छा का प्रतिपात होने से संतान कुबडी, कुसित हाथों वाली, एक टांग से लंगड़ी, जड़, नाटी, विकृत आँखोंवाली, अथवा अन्धी उत्पन्न होती है। इसलिये गर्भिणी जिस जिस वस्तु की इच्छा करे दह-वह इसको देनी चाहिये। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से संतान वीर्यशाली और चिरायु होती है।
वि० मन्तव्य—यदि दुर्भाग्य से दूसरे मास में गर्भखाव हो जाता है तो पिण्ड, पेशी अथवा अर्बुद जैसा गर्भ गिरता है और यदि मृत गर्भिणी का शवच्छेदन किया जाय तो देखा जा सकता है और गर्भिणी अत्यन्त कुश हो तो चतुर दाईं स्पर्श द्वारा अनुमान लगा सकती है अथवा “एक्स्ते” द्वारा देखा जा सकता है। इसके पश्चात् भी गर्भखाव-पात होने पर गर्भ के आकारों का ज्ञान होता है। चौथे मास से गर्भ हिलता-डुलता भी प्रतीत होने लगता है। दापयेत्—दिलावे—अर्थात् गृह-चिकित्सक घरवालों से कह सुनकर अवश्य दिलावे। चतुर्थ मास में गर्भवती को विशेष प्रकार की उत्कट इच्छा-अभिलाषा हुआ करती हैं इनको घर की बड़ी बूढ़ियाँ समझ लेती हैं कि वह दौहद है—गर्भ एवं गर्भिणी की सम्मिलित इच्छा है। दौहद = दो हृदयों का भाव। दौहद को “दोहद” कहते हैं।
भवन्ति चात्र—
इन्द्रियाधारस्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी ।
गर्भो बाधभयात्तांस्तान् भिषगाहृत्य दापयेत् ॥१६॥
सा प्राप्तदौहदा पुत्रं जनयेत् गुणान्वितम् ।
अलब्धदौहदा गर्भं लभेतात्मनि वा भयम् ॥१७॥
येषु ये ष्विन्द्रियार्थेषु दौहदे वै विमानना ।
प्रजायेत् सुतरस्यातिस्तस्मिस्तस्मिस्तथेन्द्रिये ॥१८॥
कहा भी है—
गर्भवती स्त्री इन्द्रियों के जिस जिस विषय का भोग करना चाहती हो, वैद्य को चाहिये कि गर्भहानि के भय से उन-उन पदार्थों को लेकर गर्भिणी को देवे। गर्भवती स्त्री की इच्छा के पूर्ण होने से गुणशाली पुत्र उत्पन्न होता है। और स्त्री की इच्छा के पूर्ण न होने से गर्भ अथवा अपने में (स्त्री में) ही विकार आ जाता है। गर्भवती स्त्री की जिन जिन विषयों में पूर्ति नहीं होती, पुत्र
१ रघुवंश के तीसरे सर्ग में सुदक्षिणा की चाह को पूर्ण करने का वर्णन कालिदास ने किया है। इसी प्रकार गर्भवती सीता को वन की घोमा देखने के लिये रामचन्द्र जी ने भेजा था।
की उन्हीं २ इन्द्रियों में पीड़ा होती है। वही वही इन्द्रिय वन्धे की खराब रहती है ॥१९-२१॥
राजसंदर्शने यस्या दौहदं जायते खियाः ।
अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते ॥२२॥
दुकूलपट्टकौशेयभूषणादिषु दौहदात् ।
अलङ्कारिषणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ॥२३॥
आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते ।
देवताप्रतिमायां तु प्रसूते पाषण्दोपमम् ।
दर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्रसूयते ॥२४॥
गोधामांसाशने पुत्रं सुषुप्तुं धारणात्मकम् ।
गवां मांसे तु बलिनं सबकेशसहं तथा ॥२५॥
माहिषे दौह्दोच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् ।
वराहमांसात् स्वप्नालुं शूरं संजनयेत् सुतम् ॥२६॥
मार्गाद्विक्रान्तजङ्गलं सदा वनचरं सुतम् ।
सूमराद्विग्नमनसं नित्यभोतं च तैत्तिरात् ॥२७॥
अतोऽनुक्तेषु या नारो समभिध्याति दौह्दंम् ।
शरीराचारशीलेः सा समानं जनयिष्यति ॥२८॥
जिस गर्भवती स्त्री को राजा के दर्शन की इच्छा होती है, वह धनवान् और भाग्यशाली कुमार को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को दुकूलपट्ट (क्षोमवस्त्र), तथा कौशेय (रेशमी) वस्त्र एवं आभूषण आदि की चाह होती है, वह अलंकार प्रिय एवं सुन्दर पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को तपस्वियों के निवास स्थान में रहने की इच्छा होती है वह धर्मात्मा एवं संयमी पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को देवताओं की प्रतिमा को देखने की इच्छा होती है, वह पार्षद (समा में प्रशस्त पुरुष-सभ्य) के समान पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को हिंसक पशुओं को देखने की इच्छा होती है वह हिंसाशील पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोह का मांस खाने की इच्छा होती है वह सोने की इच्छावाले एवं दौड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को गोमांस की इच्छा होती है वह बलवान् एवं सब क्लेशों को सहनेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को भैंस के मांस में अभिरुचि होती है वह शूरवीर, लाल आँखोंवाले तथा बालों वाले पुत्र को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री को वराह (भुअर) मांस की इच्छा होती है वह सोनेवाले एवं शूरवीर पुत्र को
१ पार्षद का अर्थ हाराणचन्द्र जी ने—रुद्र के अनुचर, किया है। कहा भी है—“रुद्रैर्बलादचं वृषभाधिर्रुद्रैः सपार्षदैरस्वर्मायु पुरे”।
२ कहीं पर ‘धारणात्मकम्’ यह पाठ है—हाथ में पकड़कर न छोड़नेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है।
अ० १]
शारीरस्थानम्
३०१
उत्पन्न करती है। जिस स्त्री की मृग मांस में रुचि होती है वह विक्रांत (उद्योगी), जंचाल (जोर से दौड़नेवाला) तथा सदा वन में घूमनेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। सुमर (मृग भेद या चंवर) मांस की इच्छावाली स्त्री चंचल मनवाली संतान को, तीतर के मांस की इच्छावाली स्त्री डरपोक संतान को उत्पन्न करती है इनसे अनुक्त = न कहे पदार्थों में गर्भवती स्त्री जिस जिस प्रकार की कामना करती है, वह उन्हीं पदार्थों के समान शरीर-आचार और स्वभाववाली संतान को उत्पन्न करती है।
वि० मन्तव्य—विक्रान्त—लम्बी डग भरनेवाला या छलांग मारनेवाला, जङ्गाल—लम्बी टाँगोंवाला ॥२२-२८॥
कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुत्रर्भवत्।
यथा तथा दैवयोगाहौर्हृदं जनयेद्बुद्धिं ॥२९॥
पूर्वजन्म के कर्मों के कारण से ही बालक का भविष्य (जन्म अगल शरीर) बनता है। इसी प्रकार दैवयोग (प्राकृत कर्मों के कारण) से ही हृदय में दौहद (इच्छा) उत्पन्न होती है ॥२९॥
पञ्चमे मन्त्रः प्रतिबुद्धतरं भवति, षष्ठे बुद्धिः, सप्तमे सर्वज्ञप्रत्यक्षविभागः प्रत्यक्षतरः, अष्टमेऽस्थिरीभवस्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेश्विरोजस्त्वात्तैर्नृत्तभागत्वाच्च ततो वलिं मांसौदनमस्मै दापयेत्, नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन्जायते अतोऽन्यथा विकारी भवति ॥३०॥
पांचवें मास में मन अधिक प्रबुद्ध हो जाता है (क्रियाशील हो जाता है)। छठे मास में बुद्धि और सातवें मास में सब अंग-प्रत्यंग का विभाजन अत्यंत स्पष्ट हो जाता है। आठवें मास में ओज अस्थिर रहता है। इस मास में यदि बालक उत्पन्न हो जाये तो वह जीता नहीं क्योंकि इसके ओज को निष्क्रिय (राक्षस) छीन लेते हैं, अतः मांस और चाबलों की बलि निष्क्रिय के लिये देनी चाहिये। आठवें मास के बाद नवम-दशम-ग्यारह और बारहवें किसी एक मास में प्रसव हो जाता है। इसके आगे गर्भ की विकृति समझनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—ज्यों ही आठवें मास में प्रसव होने लगे लोहौ मांसोदन की बलि दे देना चाहिये। कोमारभृत्य का कथन है अष्टम मास में जन्म लेनेवाले के ओज को राक्षस खा
१ ओज—जब माता में पहुँचा हो तब यदि शिशु का प्रसव होता है तो मरा होता है। यदि ओज शिशु में हो, तब प्रसव होता है तो वह निर्बल होने के कारण अधिक समय नहीं जीता। इसलिए यह कहा है कि—
“अष्टमे मासि जातस्य हरन्त्योजो निशाचराः।”
२ गर्भावस्था के विस्तृत लक्षणों के लिये—घात्रीशिक्षा, युष्मृत-शारीर (जयदेव) देखिये।
जाते हैं शेष देखिये उ० तं० अ० २७। चरक का कथन है कि—अष्टम मास में गर्भ माता से और माता गर्भ से—रस-वाहिनियों द्वारा बार-बार ओजस् को परस्पर आदान-प्रदान करते रहते हैं, फलतः ओजस् के अनवस्थित रहने के कारण उस मास में गर्भ का जन्म व्यापत्तिमान् होता है। च० शा० अ० ४। सातवें मास में जन्मा जीवित रहता है भले ही कुछ दुर्बल एवं कृश रहता है। १२ मास के पश्चात् भी उपविष्टक एवं नागोदर नामक गर्भ गर्भाशय में पड़े रहते हैं, चिकित्सा करने अथवा स्वतः पोषण प्राप्त होने पर—कई वर्ष पश्चात् जन्मते हैं। देखिये च० शा० अ० २ तथा अ० ८ ॥३०॥
मातुस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाडीप्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहाररसवीर्यमभिवहति। तेनोपस्तेहेनास्याभिबुद्धिर्भवति। असंजाताङ्गप्रत्यङ्गप्रविभागमानिषेकात् प्रभृति सर्वशरीरावयवानुसारिणोनां रसवहानां तिर्गभगतानां धमनीनामुपस्तेहो जीवयति ॥३१॥
माता की रसवहा नाड़ी में गर्भ की नाभिनाड़ी बँधी होती है। यह गर्भनाभि-नाड़ी माता के आहार-रस-वीर्य को बालक में पहुँचाती है। इस नाड़ी द्वारा उपस्तेहन-पोषण मिलने के कारण गर्भ बढ़ता है। योनि में शुक्लचिन्तनरूपी गर्भाधान किया से प्रारम्भ करके जब तक संपूर्ण अंग-प्रत्यंगों का विभाग पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक शरीर के सम्पूर्ण अवयवों में—तियंग रूप में व्याप्त रसवहा धमनियों द्वारा ही उपस्तेहन होने से गर्भ जीवित रहता है।
वि० मन्तव्य—रसवहा-रसमय रक्तवहा नाड़ी-नाली सिरा—जो गर्भाशय का तर्पण करती है और जो “त एव रक्तं अभिवहतः विसृजतः च नारीणां आर्त्तवसंज्ञम्” सु० शा० अ० ६-७ में वर्णित है यह वाम दक्षिण भाग में दो हैं। जो गर्भ के पूर्व तथा पश्चात् आर्त्तव का वहन एवं विसर्जन करती हैं वे ही गर्भाधान हो जाने पर—गर्भ का पोषण करती हैं। भोज के शब्दों में—गर्भ उन रसमय रक्त के स्रोतों को रोक देता है—फलतः मासिक रजःस्त्राव नहीं होता परन्तु उस रसमय रक्त से—जरायु का
१ उपस्तेहन का अर्थ—“यथा पूर्णं सरः सलिलोपस्तेहः चत्वरं जाततश्कदम्बकं जीवयति तद्भूत् प्राणधारणं करोति। तथा च भोजः—गर्भो रूण्द्रि स्रोतांसि रसरक्तवहानि वै। रक्ताज्जरायुर्भवति नाडी चैव रसात्मिका ॥ सा नाडी गर्भमाप्नोति तथा गर्भस्य वर्त्तनम् ॥ यद्यदस्नाति मातास्य भोजनं हि चतुर्विधम्। तस्मादस्नाद्रीसीभूतं वीर्यं द्रष्टा प्रवर्तते। भागः शरीरं पुष्णाति स्तन्यं भागेन वर्धते ॥ गर्भः पुष्यति भागेन वर्धसे च यथाक्रमम् ॥ गर्भकुल्येव केदारं नाडी प्रीणाति तर्पिता ॥ उपासन्नं निष्पन्देन स्नेहयतीत्युपस्तेहः।
३०२
सुश्रुतसंहिता
[ १०१ ]
तथा गर्भनाल का निर्माण होता है और गर्भ का वर्चन-वृत्ति-भरण-पोषण होता है। गर्भिणी जो २ आहार खाती है उसका रस नामक वीर्य (सार) दो भागों में विभक्त हो जाता है १—से उक्त कार्य होता है और २—से स्तनों में स्तन्य की वृद्धि होने लगती है स्तन पुष्ट होने लगते हैं। गर्भ भी गर्भिणी का एक अवयव ही होता है।
रसबहा गर्भाशय का तर्पण करती है और गर्भाशय के भीतर चिपका हुआ गर्भ भी तृप्त होता रहता है आगे चलकर गर्भनाल बनने लगती है और गर्भनाल के अप्रभाग से बढ़ होने से गर्भाशय की दीवार से दूर होता जाता है और गर्भाशय में गर्भोदक भी उत्पन्न होने लगता है, अब गर्भ को गर्भनाल द्वारा जो गर्भ की नाभि में संसक्त रहती है और उधर गर्भाशय की दीवार में संसक्त रहती है—रसरूप पोषण पदार्थ मिलता रहता है और उसका वर्चन-भरण-पोषण होता रहता है। गर्भ को प्रथम मूल प्यास नहीं लगती माता (गर्भिणी) का ही आश्रय लेकर जीवित रहता है निर्वाह करता रहता है ॥३१॥
गर्भस्य खलु संभवतः पूर्व शिरः संभवतीत्याह शौनकः शिरोमूलत्वात् प्रधानेन्द्रियाणां, हृदयमिति कृतवीर्यं, बुद्धेर्मेनसश्च स्थानत्वात्, नाभिरिति पाराशर्यः, ततो हि बधते देहो देहिनः पाणिपादमितां मार्कण्डेयः, तन्मूलत्वाच्चेष्टाया गर्भस्य, मध्यशरीरमिति सुभूतिगौतमः, तन्निबद्धत्वात् सर्वगात्रसंभवस्य। तत्तु न सम्यक्, सर्वाण्यङ्गप्रत्यङ्गानि युगपत् संभवन्तीत्याह धन्वन्तरिः, गर्भस्य सूक्ष्मत्वात्पोष्यन्ते वंशाङ्कुरवच्छूतफलवच्च, तथाथा-चूतफले परिपक्वे केशरमांसस्थिमज्जानः पृथक् पृथक् दृश्यन्ते काष्ठप्रकर्षात् तान्येव तरुणे नोपलभ्यन्ते सूक्ष्मत्वात् तेषां सूक्ष्माणां केशरादीनां कालः प्रव्यक्तां करोति, एतेनैव वंशाङ्कुरोऽपि व्याख्यातः। एवं गर्भस्य तारुण्ये सर्वेष्वङ्गप्रत्यङ्गेषु सत्त्वपि सौक्ष्म्यादुपलब्धिः, तान्येव कालप्रकर्षात् प्रव्यक्तानि भवन्ति ॥३२॥
शौनक ऋषि का विचार है कि गर्भ का सबसे प्रथम शिर बनता है, क्योंकि सब इन्द्रियों में शिर ही मूल है। कृतवीर्य ऋषि का विचार है कि सबसे प्रथम हृदय बनता है, क्योंकि यह बुद्धि और मन का स्थान है। पाराशर्य ऋषि का कथन है कि नाभि सबसे प्रथम बनती है, चूँकि सब प्राणी इसी से बढ़ते हैं (यही केंद्र है)। मार्कण्डेय ऋषि का कथन है कि हाथ पाँव सबसे प्रथम बनते हैं, चूँकि गर्भ की सब चेष्टाएँ इन्हीं के वश में हैं। सुभूति गौतम का मत है कि मध्य शरीर सबसे प्रथम बनता है, चूँकि सम्पूर्ण शरीर का आश्रय यही है।
भगवान् धन्वन्तरि का कथन है कि ये सब विचार ठीक नहीं हैं, गर्भ के सब अंग-प्रत्यंग एक साथ बनते हैं, परन्तु अतिसूक्ष्म होने के कारण पता नहीं लगता। जिस प्रकार बाँस के अंकुर तथा आम के फल में होता है। यथा—आम फल के पक जाने पर केशर, मांस (गुदा), अस्थि (गुटली), मज्जा (गिरी) प्रथम प्रथम दीखने लगते हैं, यह सब कालवश से हो जाता है, परन्तु यही वस्तुयें कन्चे फल में उपलब्ध नहीं होतीं—क्योंकि ये सूक्ष्म होती हैं। समय पर ये सूक्ष्म केशरादि स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार से वंशांकुर को भी समझना चाहिये। इसी तरह गर्भ की तरुणावस्था में सब अङ्ग-प्रत्यंग होने पर भी सूक्ष्म होने के कारण ही उपलब्ध नहीं होते। यही अङ्ग-प्रत्यंग समय आने पर स्पष्ट हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—चेतनामय शुक्र शोणित का मिश्रण-बीज उक्त सब ऋषियों के मत में शिर आदि अवयवों का उपादान होता है और अपने २ मत की पुष्टि में सबने हेतु भी दिये हैं और यह सब मत उनके दृढ़ मत हैं अतः भगवान् धन्वन्तरि ने उनका स्मरण किया है और सबल खण्डन भी नहीं किया है केवल ‘तत्तु न सम्यक्’ अर्थात् वह बहुत ठीक नहीं कहकर अपने मत का प्रतिपादन किया है। उन मतों की अपेक्षा धन्वन्तरि का मत अधिक युक्तिसंगत है इसी का समर्थन श्री पुनर्वसु ने भी (च० शा० अ० ६ में) किया है। बीज में समस्त शिर आदि अवयव सूक्ष्म रूप से विद्यमान होते हैं जो काल पाकर कुछ गर्भाशय में और कुछ जन्म के पश्चात् व्यक्त होते हैं यथा जन्म से ७-१२ मास में २४ दाँत उत्पन्न होते हैं और उनके गिर जाने पर पुनः ३२ दन्त उगते हैं, यौवन में दाढ़ी मोठ आदि व्यक्त होते हैं ॥३३॥
तत्र गर्भस्य पितृजमातृजसजात्मजसत्त्वजसाल्यजानि शारीरलक्षणानि व्याख्यास्यामः। गर्भस्य केशरमांसश्रुलोमास्थिनखदन्तशिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि, मांसशोणितमेदोमज्जहृन्मिथ्यकृतलीहान्त्रगुदप्रभृतीनि सृद्गनि मातृजानि, शरीरोपचयो बलवर्णः स्थितिहानिश्च रसजानि, इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः मुखदुःखादिकं चात्मजानि, सत्त्वजान्युत्तरवद्यमः, वीर्यमारोग्यं बलवर्णो मेधा च सात्म्यजानि ॥३३॥
अब गर्भ के पितृज, मातृज, रसज, आत्मज, सत्त्वज, सात्म्यज-शरीर लक्षणों की व्याख्या करते हैं। गर्भ के केशर, मांस, श्रु, लोम, नख, अस्थि, दांत, शिरा, स्नायु, धमनी और वीर्य आदि स्थिर वस्तुयें पिता के अंश से उत्पन्न होती हैं। मांस, रक्त, मेद, मज्जा, हृदय, नाभि, यकृत, प्लीहा, आँतें, गुदा आदि कामक वस्तुयें माता से उत्पन्न होती हैं। शरीर का उपचय (गठन), बल, वर्ण, स्थिति, हानि रसजन्य हैं। इन्द्रियाँ,
४० ]
शारीरस्थानम्
१०३
शान-विज्ञान, आयु, मुख, दुःख आदि आत्माजन्य हैं। सत्व-जन्य वस्तुओं की आगे व्याख्या करेंगे। वीर्य, आरोग्यता, बल, वर्ण, मेषा यह सत्यजन्य हैं ॥ ३३ ॥
तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति दक्षिण-कुक्षिमहत्वं च पूर्णं च दक्षिणं सकथ्युत्कर्षति बाहु-त्याच्च पुन्नामवेयेषु द्रव्येषु दौर्द्वदमभिव्यापति, स्वप्नेषु चोपलभते पञ्चोत्पलकुमुदाघ्रातकादीनि पुत्रामान्येष्व प्रसन्नमुखवर्णा च भवति तां व्रूयात् पुत्रमियं जनयिष्य-तीति, तद्विपश्ये कन्यां, यस्याः पार्श्वद्वयमवन्तं पुरस्ता-निर्गतमुद्गरं प्रागभिहितं लक्षणं च तस्या नपुंसकमिति विद्यात्, यस्या मध्ये निम्नं द्रोणीभूतमुद्गरं सा युग्मं प्रसूयत इति ॥ ३४ ॥
जिस स्त्री के दक्षिण स्तन में सब से प्रथम दूध का दर्शन होता है, दक्षिण कुक्षि भारी रहती है, प्रथम दक्षिण टांग में उत्कर्ष (रोमांच) आता है, प्रायः करके पुंलिङ्ग नामवाले पदार्थों की चाह करती है, स्वप्नावस्था में पद्म, उत्पल, कुमुद, आमातक (अम्बाड़ा) आदि पुंलिङ्ग वस्तुओं को प्राप्त करती है। जिसका मुखवर्ण स्वच्छ प्रसन्न हो, वह पुत्र को उत्पन्न करेगी ऐसा समझना चाहिये। इसके विपरीत, लक्षणवाली स्त्री कन्या को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री के दोनों पार्श्व उठे होते हैं, पेट आगे को निकला होता है पूर्वोक्त नपुंसक गर्भ के लक्षण उपस्थित हों, वह नपुंसक सन्तान उत्पन्न करती है। जिस स्त्री का पेट बीच से दबा एवं द्रोणी (गूत) के समान होता है वह जोड़िये बच्चों को उत्पन्न करती है १।
वि० मन्तव्य—दक्षिण सकृिय उत्कर्षति—चलते समय या पलंग आदि पर चढ़ते समय प्रथम दाहिना पाँव उठाती है। चौथे पाँवनें आदि मासों में स्तनों से श्वेत द्रव-सा बहने लगता है उसी को स्तन्य कहा गया है। पुत्र गर्भवती का गर्भ-गर्भाशय के दक्षिण पार्श्व से संस्कृत होता है। द्रोणीभूत-द्रोणी-गूत या गोणी का नाम है जो वस्तु भर कर गधे-खच्चर आदि पर लादी जाती है वह दो भागों में भरी रहती है। उद्गर जितना बड़ा होता है वस्तुतः उतना बड़ा गर्भ नहीं होता उसमें (गर्भाशयमें) गर्भादक भरा रहता है जिसमें जरायु में लिपटा गर्भ तैरता रहता है। प्रसव के समय प्रथम यही निकलता है और फिर गर्भ, कभी-कभी गर्भ जरायु को साथ लिये भी निकलता है
१ चरक में भी कहा है—
(१) सव्यांगचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वन्तपानाशानशीलचेष्टा। सव्यातगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यप्रदुष्ठा स्त्रियमेव सूते ॥
पुनः त्वतो लिगविपश्येण व्याभिश्रंलिगां प्रकृतिं तृतीयाम् ॥
(२) रोमराजी भवेन्तिम्ना यस्याः सा सूर्यते यमी।
किन्तु प्रायः वह भीतर ही रह जाता है जैसे पके आम को जोर से दबाने पर छिलका हाथ में ही रह जाता है, यह प्रसव के पश्चात् स्वयं गिर जाती है परन्तु कभी कभी गिराने का प्रयत्न भी करना पड़ता है इसी में नाल भी लगी रहती है जो खिचकर गर्भ के साथ बाहर आ जाती है और उधर जरायु से भी लगी रहती है। गर्भादक १-२ सेर होता है। नाल की लम्बाई १-१। हाथ होती है। कभी कभी जरायु इतनी नहीं फटती जिसमें से गर्भ बाहर आ सके इस दशा में उसे अधिक फाड़ना पड़ता है। प्रसव के समय को वेदना का नाम “आवी” है उस समय गर्भाशय में एँठन या खिड़कन होने लगती है इसी एँठन का नाम आवी है, अकाल में आवी होने से गर्भखाव अथवा गर्भ-पात हो जाता है ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र—
देवताब्राह्मणपराः औचाचारहिते रताः।
महागुणान् प्रसूयन्ते विपरीतास्तु निर्गुणान् ॥ ३५ ॥
कहा भी है—जो माता-पिता, देवता, ब्राह्मण की पूजा (सत्कार) करने में तत्पर रहते हैं, शौच (पवित्रता) तथा आचार का पालन करते हैं, वे महागुणशाली पुत्रों को उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत आचरणवाले माता-पिता निर्गुण संतान उत्पन्न करते हैं।
वि० मन्तव्य—माता के उक्त पवित्र आचरण का प्रभाव सन्तान पर पड़ता है ॥ ३५ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गनिर्गुतिः स्वभावोदेव जायते।
अङ्गप्रत्यङ्गनिर्गुत्तो ये भवन्ति गुणागुणाः।
ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ॥ ३६ ॥
अङ्ग-प्रत्यङ्गों का निर्माण स्वभाव से ही होता है परन्तु अङ्गप्रत्यङ्गों के निर्माण में जो गुण या अवगुण होते हैं, वे गर्भ के धर्म-अधर्म के कारण से होते हैं।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में स्वभाव को भी कारण माना है (दे० शा० अ० १-११) ॥ ३६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भावक्रान्तिशारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातो गर्भव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
पूर्व अध्याय में वर्णित गर्भ की रचना को विस्तार में कहने के अभिप्राय से गर्भव्याकरण नाम अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था—
३०४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
वि० मन्तव्य—आकरणं—आकारः—आकृतिः, विशिष्टानां विविधानां वा आकरणं—व्याकरणम् तच्च अस्ति अस्मिन् इति तत्। अर्थात् इव अध्याय में—शरीर के विशिष्ट या विविध अवयवों के आकारों-आकृतियों का वर्णन किया गया है ॥१-२॥
अग्निः सोमो वायुः सत्त्वं रजस्तमः पञ्चेन्द्रियाणि भूतास्मेति प्राणाः ॥ ३ ॥
अग्नि (पित्त के पाँचों भेद), सोम (कफ, रस, शुक्र द्रव भाग), वायु, सत्त्व, रज, तम, पाँचों इन्द्रियों और भूतात्मा (जीव) ये प्राण हैं। शरीर का प्राणन इनके कारण ही होता है ॥ ३ ॥
तस्य खल्वेवंप्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति। तासां प्रथमा-द्वभासिनी नाम, या सर्वान् वर्णान्वभासयति पञ्चविधां च छायां प्रकाशयति, सा ब्रीहिरष्टादशभागप्रमाण, सिध्मपद्मकण्टकाधिष्ठानाः द्वितीया लोहिता नाम, पोडश-भागप्रमाण, तिलकालकन्यच्छृङ्गङ्गाधिष्ठाना; तृतीया श्वेता नाम, द्वादशभागप्रमाण, चर्मदलाजगल्लीषप्रका-धिष्ठाना; चतुर्थी ताम्रा नामाष्टभागप्रमाण, विविधकिला-सकुष्ठाधिष्ठाना; पंचमी वेदिनी नाम पंचभागप्रमाण, कुष्ठविस्पर्षाधिष्ठाना; षष्ठी रोहिणी नाम ब्रीहिप्रमाण, प्रन्ध्यपच्यवृंदरलीपदगलगण्डाधिष्ठाना, सप्तमी मांसधरा नाम ब्रीहिद्रवप्रमाण; भगन्दरविद्रध्यशोऽधिष्ठाना। यदेतत् प्रमाणं निर्दिष्टं तन्मांसलेष्ववकाशेषु, न ललाटे सूक्ष्माङ्गुल्यादिषु च, यतो वक्ष्यत्युदरेषु—‘ब्रीहिमुखेनाङ्गुष्ठोदरप्रमाणमवगाढं विध्येत’ (चि०अ०१४) इति ॥४॥
भूतात्मा से अधिष्ठित शुक्रशोणित के परिपाक होने से सात त्वचार्ये उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार दूध के परिपाक करने पर मलाई जमती है। इनमें सब से प्रथम त्वचा का नाम अव-भासिनी है। यह प्रथम त्वचा—गौरादि सब वर्णों को तथा पाँचों प्रकार की छाया (कान्ति-आसन्न लक्ष्यते छाया) को प्रकाशित करती है। इस त्वचा की मोटाई जो के अठारहवें भाग के बराबर है। इसी त्वचा में सिध्म तथा पद्मकण्टक रोग होते हैं। दूसरी त्वचा (स्तर) का नाम ‘लोहिता’ है। यह ब्रीहि के सोलहवें भाग के बराबर मोटी है। इस त्वचा में तिलकालक, न्यच्छ, व्यञ्ज आदि रोग होते हैं। तीसरी त्वचा का नाम ‘श्वेता’ है। इसकी मोटाई ब्रीहि का बारहवों भाग है। चर्मदल, अजगल्ली, मशक आदि रोग इसमें होते हैं। चौथी त्वचा का नाम ‘ताम्रा’ है, यह ब्रीहि का आठवों भाग मोटी है। इसमें नाना प्रकार के किलाष और कुष्ठ (त्वचा के रोग) होते हैं। पाँचवीं त्वचा का नाम वेदिनी है, यह ब्रीहि
का पाँचवों भाग मोटी है। इसमें कुष्ठ-बीसर्प रोग होते हैं। छठी रोहिणी नामक है, यह ब्रीहि के बराबर मोटी है। इसमें ग्रन्थि, अपचनी, अबुर्द, श्लीपद, गलगण्ड रोग होते हैं। सातवीं त्वचा का नाम मांसधरा है। यह दो जो के बराबर मोटी है। इसमें भगन्दर, विद्रधि, अर्श रोग होते हैं। यहाँ पर जो मोटाई का प्रमाण कहा है, वह उदर आदि मध्य शरीर तथा मांसल-स्थानों से समझना चाहिये। ललाट, सूक्ष्म अंगुलि आदियों में नहीं। चूँकि आगे उदर रोग में कहेंगे कि ब्रीहिमुख श्लक्ष द्वारा अंगुष्ठोदर के बराबर गहरा वेधन करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—त्वचा—त्वच् संवरणे धातु (तु० प०) से त्वचा शब्द का निर्माण होता है—जो शरीर का संवरण (सम्यक् प्रकार से ढकना) करती है, इसका पर्याय है अस्-धरा जो रक्त को बहने से रोकती है। यह शीतोष्ण (सरदी गर्मी) से बचाती है जैसे वस्त्र। “तनु विस्तारे” से भी त्वचा शब्द बनाया जा सकता है अर्थ है जो शरीर पर फैली हुई है। इसमें रोमकूप रहते है उनकी जड़ वेदिनी त्वचा तक होती है। इसमें से स्वेद निकलता है। त्वचा के सात स्तर हैं—१—अव-भासिनी—अवभासयति—प्रकाशयति वर्ण इति। गौर श्यामादि वर्ण इसी में रहते हैं। २—लोहिता—लाल, ३—श्वेता—श्वेत, ४—तामा—ताम्र की सी लाल, ५—वेदिनी—वेदयति स्पर्श-स्पर्शान् इसी से होता है, कण्टक जब चारों त्वचाओं को पार कर जाता है तब अनुभव होता है, शीत-उष्ण आदि का अनु-भव भी इसी से होता है अतः इसका नाम वेदिनी-विदित अवगत करनेवाली। ६—रोहिणी—इस पर रोह-प्ररोह होते हैं—रोहाः सन्ति अस्यां इति रोहिणी। ७—मांसधरा—जो मांस को धारण करती है उससे सम्बद्ध है उस पर लिप्टी है यह त्वचा का भीतरी अन्तिम स्तर है। शुक्र शोणित के मिश्रण पर सर्व प्रथम जो आवरण बनता है उसे
१ चरक में छै ही त्वचा कहो हैं। यथा—उदकधरा, अस्-धरा, सिध्मकिलाससंभवाधिष्ठाना, ददृ-कुष्ठसम्भवाधिष्ठाना, अलजी-विद्रधिसम्भवाधिष्ठाना, यस्यां छिन्नायां ताम्रत्यम्ब इव च तमः प्रविशति।
कविराज गणनाथ सेन जी ने स्थूल दृष्टि से दीखनेवाली त्वचा के दो ही स्तर माने हैं। (१) एक उपरि त्वचा (Epidermis) और दूसरी अन्तः त्वचा (DerMis)। परन्तु यदि अणु-बीक्षण यन्त्र से देखें तो प्रथम त्वचा पाँच स्तरों में तथा अन्तः त्वचा दो भागों में विभक्त दीखती है। इस प्रकार से ये सात स्तर मिलकर त्वचा को बनाती हैं।
(२) छाया और प्रभा में भेद है। यथा—आसन्ना लक्ष्यते छाया, प्रभा दूरप्रकाशिनी।
४०४]
३६
शरीरस्थानम्
३०५
इधर उधर वह जाने से रोकता है वह त्वचा ही है। वही काल एकर उक्त रूप धारण कर लेती है। इन स्तरो की मोटाई का उल्लेख पूर्ण स्वस्थ के लिये है ॥४॥
कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः ॥५॥
धातुओं (रस-रक्तादि तथा कफ, पित्त, मलादि) के आशयों में सीमा (मर्यादाभूत) कलायें (Membrans) भी सात हैं।
वि० मन्तव्य—धातु-पदार्थ तथा धातु के आशय के अन्तर मध्य की मर्यादा “कला” कहलाती है। जैसे कटोरा में कागज धरकर कोई वस्तु धरी जाती है वैसे ही आशय में कला रहती है, मांसधरा कला मांस पेशियों पर लिपटी रहती है ॥५॥
भवतश्चात्र—
यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।
तथा हि धातुमार्गेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ॥६॥
स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्च जरायुणा।
श्लेष्मणा वेष्टितान्नापि कलाभागान्स्तु तान् विदुः ॥७॥
कहा भी है—जिस प्रकार वृक्ष के काष्ठ को काटने से सार दीखने लगता है (रस बहने लगता है), उसी प्रकार मांस के काटने पर धातु (रस-रक्तादि) दीखने लगते हैं। जो स्नायुओं द्वारा मली प्रकार से ढँपे होते हैं, जरायु (उल्वा शिल्ली) से सम्यक् प्रकार से व्याप्त होते हैं, तथा कफ से घिरे रहते हैं, उनको कला कहते हैं १।
वि० मन्तव्य—हमारे विचार में छठे श्लोक का उत्तरार्ध “तथा कलासु धातुर्हि छिद्यमानासु दृश्यते” होना चाहिये अर्थात् वैसे ही कला के कट-फट जाने पर धातु—उसके भीतर का पदार्थ दिखाई पड़ता है—आशय के कट जाने पर भी यदि उसके भीतर की कला न कटे तो उसके भीतर का पदार्थ दिखाई नहीं पड़ता। और छठे श्लोक के आगे—‘धात्वाशयान्तरं दृश्यं यः क्लेदस्त्वथितिक्षति। देहोष्मणा विपक्वस्तु सा कला इत्यभिधीयते ॥’ पाठ होना चाहिये। अर्थात् धातु एवं आशय के मध्य में जो क्लेद—पिच्छल द्रव रहता है वह शरीर की उष्मा से परिपक्व होकर—कागज का सा होकर “कला” कहलाता है। यह माड़ी एवं सोम से पालिश किये रेशमी कपड़ा की सी होती है। कपड़ा के धागे स्नायु, माँड़ी जरायु तथा सोम श्लेष्मा कहा जा सकता है ॥६,७॥
१. वृद्ध वामभट्ट ने कहा है—“यस्तु धात्वाशयान्तरेषु क्लेदोऽवलिष्ठो यथा स्वमूषमभिर्विपक्वः स्नायुश्लेष्म जरायुच्छनः काष्ठ इव सारो धातुरससोषाल्पत्वात् कलासंज्ञः।”
तासां प्रथमा मांसधरा यस्या मांसे शिरास्तानु-धमनीसौन्तासां प्रताना भवन्ति ॥८॥
सात कलाओं में प्रथम कला का नाम ‘मांसधरा’ है। इसमें से होकर ही शिरा, धमनी, स्नायु और स्रोत—इनकी शाखायें मांस में पहुँचती हैं।
वि० मन्तव्य—यह मांसपेशियों पर लिपटी रहती है। इसी के कारण मांस मांसपेशियों में विभक्त रहता है ॥८॥
यथा विसमृणालानि विवर्धन्ते समन्ततः।
भूमौ पङ्कोदकस्थानि तथा मांसे सिरादयः ॥९॥
कहा भी है—जिस प्रकार से विस और मृणाल कीचड़-भूमि तथा पानी में रहकर चारों ओर बढ़ते हैं, इसी प्रकार से मांस में शिरा आदि (Blood vessels) चारों ओर फैलते हैं ॥९॥
द्वितीया रक्तधरा मांसस्याभ्यन्तरतः, तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतः प्लोहोश्च भवति ॥१०॥
दूसरी कला का नाम ‘रक्तधरा’ है, यह कला मांस के अन्दर रहती है। इसमें रक्त का संवहन होता है। यह कला विशेषकर शिराओं में, यकृत और प्लीहा में रहती है ॥१०॥
वृक्षावथाभिप्रहृतात् क्षोरिणः क्षोरमावहेत्। मांसादेवं क्षतान् क्षिप्रं शोणितं संप्रसिच्यते ॥११॥
कहा भी है—वृक्षवाले वृक्षों पर चोट लगने से जैसे उनमें से दूष बहने लगता है, इसी प्रकार मांस पर आघात होने से रक्त शीघ्र बहने लगता है ॥११॥
तृतीया मेदोधरा, मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च, महत्सु च मज्जा भवति ॥१२॥
तीसरी कला का नाम ‘मेदोधरा’ है। सब प्राणियों के उदर में तथा सूक्ष्म अस्थियों में मेद, तथा बड़ी अस्थियों में मज्जा रहती है। यह कला मेद और मज्जा को धारण करती है ॥१२॥
स्थूलस्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः।
अथैतरेषु सर्वेषु सरक्तं मेद उच्यते।
शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ॥१३॥
विशेषकर स्थूलस्थियों के मध्य में मज्जा रहती है, छोटी अस्थियों में रक्तयुक्त मेद रहता है। शुद्ध मांस के स्नेह को वसा कहते हैं ॥१३॥
१. कविराज गणनाथ सेनजी ने इनमें, निम्न मेद किये हैं।
यथा—‘मेदो नाम सान्द्रसिन्धुल्यः स्नेहधातुः शरीरस्य। वसा तु—मांसान्तरानुप्रविष्टः स्नेहः। मज्जा—अस्थिमध्यगतः स्नेहः। स द्विविधो पीतो रक्तश्च ॥’ प्रत्यक्षं शा० पू० १०।
३०६
सुश्रुतसंहिता
[ ३०४ ]
चतुर्थी श्लेष्मधरा सर्वसन्धिषु प्राणभूतां भवति ॥१४॥
चौथी कला का नाम 'श्लेष्मधरा' है। यह कला प्राणियों की सब सन्धियों में रहती है ॥१४॥
स्नेहाभ्यक्ते यथा ह्युत्ते चक्रं साधु प्रवर्तते।
सन्धयः साधु वर्तन्ते संहिल्लशः श्लेष्मणा तथा ॥१५॥
जैसे चक्र के अक्ष (धुरी) के स्नेह आदि से चिकना होने पर पहिया आराम से घूमता है, इसी प्रकार श्लेष्मा से युक्त सन्धियाँ भी अपना काम भली प्रकार से करती हैं ॥१५॥
पञ्चमी पुरीषधरा नाम, याऽन्तःकोष्ठे मलमभिबिभजते पक्वाशयस्था ॥१६॥
पाँचवीं कला का नाम 'पुरीषधरा' है। कोष्ठ के अन्दर पक्वाशय में स्थित हुई अन्न को मलरूप में विभक्त करती है ॥
यकृतसमन्तात् कोष्ठं च तथाऽन्नाणि समाश्रिता ॥
उण्डु (न्दु) कस्थं विभजते मलं मलधरा कला ॥१७॥
'मलधरा' कलाकोष्ठ में यकृत से आरम्भ होकर सब आँतों में व्याप्त होती हुई उण्डुक (caccum) स्थित मल को पृथक् करती है। मल का विभाग अग्नि तथा वायु के कारण से होता है। उण्डुक तक मल के साथ अन्न का कुछ भाग मिला रहता है। परन्तु उण्डुक में पहुँचने पर सार भाग आँतों से खींचा जाता है, केवल पानी का भाग ही रहता है और कुछ नमक रहता है। बृहदंत्र का भाग इनको मल से पृथक् कर लेता है, इस प्रकार से मल ही बाहर होता है ॥१७॥
षष्ठी पित्तधरा, या चतुर्विधमन्तपानसामाशयान् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ॥१८॥
छठी कला का नाम 'पित्तधरा' है। यह कला चारों प्रकार के खाये अन्न-पान को आमाशय से निकालकर पक्वाशय में जाने के लिये धारण करती है, इसी को ग्रहणी कहते हैं ॥१८॥
१. "तथा च—अनिकृतो यथा—विवेचयति च रसमृत्रपुरोधाणि। माक्षतकृतो यथा—सोऽन्नं पचति तज्जाशविशेषान् विविनक्ति।" कोष्ठ का लक्षण—
"स्थानान्यामानिपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। हृदुण्डुकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥" पाचन के लिये 'हमारे शरीर की रचना' देखिये।
२. पित्तधरा—"षष्ठी पित्तधरा नाम। पक्वाशयामाशयमध्यस्था, सा ह्यन्तरन्यधिष्ठानतमा आमपक्वाशययोरभ्यं चतुर्विधम अन्नं बलेन विधार्य पित्ततेजसा शोषयन्ती पचति। पक्वं च विमुञ्चति। ततोऽसावन्नस्य ग्रहणात् पुत्रग्रहणी संज्ञा। बलं च तस्याः पित्तमेवात्म्यभिधानमृतः ॥" अष्टौगसंघट्टः।
अग्निं खादितं पीतं लीडं कोष्ठगतं नृणाम्।
तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा ॥१९॥
कहा भी है—अशित (खाया हुआ) पीत खादित और लीड चार प्रकार का भोजन कोष्ठ में पहुँचकर पित्त की उष्णमा से सुखाया जाकर यथासमय में सुखपूर्वक पचता है।
वि० मन्तव्य—जीर्यति—पच जाता है अर्थात् सार एवं किङ् रूप में विभक्त हो जाता है, ग्रहणी में ही आहार का सारस ग्रहीत होकर शरीर पोषणार्थ पृथक् हो जाता है ॥१९॥
सप्तमी शुक्रधरा, या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ॥
सातवीं 'शुक्रधरा' नाम कला है। यह कला सब प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है ॥२०॥
यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्वेक्षौ रसो यथा।
शरीरेषु तथा शुक्रं नृणां विद्याद्विष्वरः ॥२१॥
जिस प्रकार कि दूध में घी गन्ने में रस गूढ़ छिपा हुआ है, उसी प्रकार मनुष्यों के शरीर में शुक्र को समझना चाहिये। (शुक्र शरीर के प्रत्येक कण कण में व्याप्त है) ॥२१॥
द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः।
मूळक्षोतःपथाच्छुक्लं पुरुषस्य प्रवर्तते ॥२२॥
बस्तिद्वार के नीचे दो अंगुल दक्षिण पार्श्व में—मूत्रक्षोत के मार्ग से ही पुरुषों में शुक्र प्रवृत्त होता है।
वक्तव्य—सप्तमी शुक्रधरा द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्चयति ॥ बृद्धवामह। द्वयङ्गुले दक्षिणे इत्यादि—इत्यत्र द्वयङ्गुले दक्षिणे वामे इत्येव साधीयान् पाठः—अन्यथा प्रत्यक्षविरोधः (प्रत्यक्षशरीर उपोद्घात पृ० ७२)।
वि० मन्तव्य—शुक्रवहे द्वे क्षोतसी सु० शा० अ० ६। शुक्रवाही दो क्षोतस् हैं। ये बस्ति—मूत्राशय द्वार के दो अंगुल नीचे पुमान् के मूत्रमार्ग में खुलते हैं। अतः "दक्षिणे वामे" यह पाठ साधीयान् है। और नारी के भग की दीवारों में अनेक-सुखी होकर व्याप्त रहते हैं। मैथुन आदि के समय शुक्र समस्त शरीर से आकर इन्हीं क्षोतों में से होकर बाहर आता है, शुक्र को सर्वदा बहने से रोकनेवाली "शुक्रधरा" कला है। शेष देखिये—सु० नि० अ० १० श्लोक० १८-२२ ॥२२॥
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसतस्था।
क्षीषु न्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् संप्रवर्तते ॥२३॥
शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। प्रसन्न मन के कारण, स्त्रियों में सम्मोग करने पर, हर्ष के कारण वह शुक्र प्रवृत्त होता है।
अं. ४ ]
शारीरस्थानम्
३०७
वक्तव्य—संकल्पो वृष्याणाम् श्रेष्ठतमः, चरक । हर्षात्तर्घा- त्सरवाच्च पेक्खिल्याद् गौरवादपि । अणुप्रवणभावान्च द्रुतत्वा- न्माक्षतस्य च ॥ अष्टाध्याय एभ्यो हेतुभ्यः शुक्लं देहात् प्रसिच्यते ॥ तत् क्षीणुषसंयोगे च्छेदा-संकल्प-पीडनात् । शुक्लं प्रच्यवते स्थानाज्बलमाद्वि पटादिव ॥ चरक-० वि० अ० २ ॥ २३ ॥
गृहीतगर्भाणामातृत्ववहानां स्त्रोतसां वत्सोऽन्यवदृश्यन्ते गर्भेण, तस्माद् गृहीतगर्भाणामातृत्वं न दृश्यते; ततस्तद्वधः प्रतिहतमूर्ध्वमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभिधीयते, शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोऽन्ततपयोधरा भवन्ति ॥ २४ ॥
स्त्री के गर्भवती होने पर गर्भ के कारण आर्तत्ववह स्त्रोत बन्द हो जाते हैं। इसलिये गर्भवती स्त्री में आर्तत्व का दर्शन नहीं होता। यह आर्तत्व नीचे रुक जाने से ऊपर की ओर आकर और अन्य आर्तत्व उपचित-सञ्चित होते २ बढ़ते जाने पर, 'अपरा' शब्द से कहा जाता है। शेष बचा आर्तत्व ऊपर आकर स्तनों में पहुँचता है। इसलिये गर्भवती के स्तन मोटे और भारी तथा उन्नत हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—तात्पर्य—आर्तत्व-मासिक रजस्वी रुककर सञ्चित होता हुआ "अपरा" जरायु तथा नालिका रूप धारण कर लेता है और उसका कुछ भाग स्तनों को पुष्ट करने लगता है ॥
गर्भस्य यकृतप्लीहानौ शोणितजौ, शोणितफेनप्रभवः फुफ्फुसः, शोणितकिट्टप्रभव उण्डुकः ॥ २५ ॥
गर्भ के यकृत-प्लीहा रक्तजन्य हैं। फेफड़े रक्त की क्षाग से बनते हैं उण्डुक रक्त के किट्ट से बनता है।
वि० मन्तव्य—गर्भ यकृत एवं प्लीहा का निर्माण रक्त से होता है और रक्त का निर्माण भी ये ही करते हैं। 'स खलु आप्यो रसो यकृत प्लीहानो प्राप्य रागमुपैति' (सू० सू० अ० १४)। जन्म से २-३ मास तक तत्पश्चात् बालक ज्यों २ बड़ा होता है यकृत पशुकाओं से बाहर उदर में स्पशॉपलभ्य रहता है यकृत पशुकाओं के पञ्जर के अन्दर हो जाता है, फिर कभी ज्वर आदि कारणों से बढ़कर उदर में स्पशॉपलभ्य हो जाता है, प्लीहा की दशा भी ऐसी ही रहती है। ज्वर आदि से वह भी बढ़ जाती है। फुफ्फुस या फुफ्फुस- रक्त की फेन से निर्मित होता है, और स्वरूपतः भी फेन-क्षाग के गुप्क जैसा ही होता है, यह उदान-प्राण मिश्रित— श्वास उच्छ्वास का साधन है, "उदानवायोः आधारः फुफ्फुस गोच्यते बुधैः ॥" कण्ठ से श्वास मार्ग का प्रारम्भ होता है और आगे जाकर वह दो भागों में विभक्त हो जाता है और दोनों फुफ्फुसों में चला जाता है और आगे फुफ्फुसों में जाकर फेन- सदृश असंख्य कोष्ठ प्रकोष्ठों में विभक्त होकर समस्त फुफ्फुसों
में व्याप्त हो जाता है। फलतः श्वास द्वारा गृहीत वायु फुफ्फुस के कोने-कोने में जा सकता है। इन्हीं का नाम-फेफड़ा है, यह वायु के प्रवेश से कुछ फूलते और निकलने से कुछ संकुचित होते रहते हैं। फुफ्फुसों को गर्भ का वर्णन करते हुए श्री धन्व- न्तरि ने—अध्याय ६ में स्तनमूल, स्तनरोहित, अपलाप नामक ३ अवयवों में विभक्त माना है और श्वास मार्ग के फुफ्फुसों में जानेवाले दोनों मार्गों को अपस्तम्भ कहा है। देखिये शा० अ० ६-२५। फुफ्फुसायते इति फुफ्फुसः-श्वासक्रिया में फुफ्फु- साते हैं—अतः फुफ्फुस कहे जाते हैं। आशयों का वर्णन करते समय इनको वाताशय कहा गया है (सू० शा० अ० ५)। फुफ्फुसों में सर्वदा वायु भरा रहता है, जितना श्वास में भीतर जाता है उतना उच्छ्वास में निकल जाता है। उण्डुक या उन्दुक—उन्दी-कलेदने धातु (वधादिगण) से उन्दुक शब्द बनता है। अर्थ है जो आर्द्र करता है या जिसके द्वारा आर्द्र किया जाता है—मलद्रव का जलांश यहीं से समस्त शरीर में पहुँचता है, जिससे शरीर आर्द्र बना रहता है। देखिये इसी अध्याय का श्लोक १७ ॥ २५ ॥
असृजः श्लेष्मगन्धश्चापि यः प्रसादः परो मतः। तं पञ्चयमानं पित्रेन वायुश्चाप्यनुवावति ॥ २६ ॥ ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुदं बस्तिश्च देहिनः। उदरे पञ्चयमानानामाधमानादुक्तमसारवत् ॥ २७ ॥ कफशोणितमांसानां साराज्जिह्वा प्रजायते। यथार्थमृदमणा युक्तो वायुः स्त्रोतांसि दारयेत् ॥ २८ ॥ अनुप्रविश्य पिशितं पेशीविभजते तथा। मेदसः स्नेहमाद्याय सिरा स्नायुत्वमानुयात् ॥ २९ ॥ सिराणां तु मृदुः पाकः स्नायूनां च ततः खरः। आशयाभ्यासयोगेन करोत्याशयसंभवम् ॥ ३० ॥
रक्त और कफ का जो अति उत्तम भाग है, उसका पित्र से परिपाक होते समय वायु भी इसमें भाग लेता है। इससे गर्भ के अन्त्र, गुदा, बस्ति बनते हैं। उदर में पचते हुए कफ, रक्त और मांस के सार से जिह्वा उत्पन्न होती है। जिस प्रकार घोंकने पर स्वर्ण का सार मात्र ही बचता है, जिस प्रकार यथा- योग्य उष्णिमा से युक्त वायु स्त्रोतों को विभक्त करता है उसी प्रकार वायु मांस में प्रविष्ट होकर पेशियों को विभक्त करता है। शिरा मेद से स्नेह को लेकर स्नायुरूप बनती है। शिराओं का पाक मृदु रहता है, और स्नायुओं का इनसे खर (कठोर) रहता है। बारम्बार स्थिर रहने का अभ्यास करने से वायु आशयों को उत्पन्न करती है।
वक्तव्य—श्री पं० हरिप्रभञ्जी ने 'शिरा स्नायुत्वमानुयात्' के स्थान पर 'शिरा स्नायुत्वमप्यथ' पाठ बदला है। उनके
३०८
सुश्रुतसंहिता
[३०४]
अर्थ में वायु अन्त्र से स्नेह को लेकर मेद को उदर में एकत्रित करती है। इस मेद के स्नेह के मुदुपाक होने से शिरायें और खर पाक होने से स्नायु उत्पन्न होते हैं। यही वायु मांसपेशियों में सब ओर निवास करके हृदय आदि आशयों को उत्पन्न करती है। (रसयोगसागर ० पु० ११३, ११४)।
वि० मन्तव्य—अन्त्र—आमाशय एवं पक्वाशय के मध्य-वर्ती नली का नाम अन्त्र है। इसकी लम्बाई साढ़े तीन व्यास होती है, १—व्यास=४ हाथ, ३। व्यास=१४ हाथ=२१-२२ फुट। नात्रियों में यह आधा व्यास छोटी होती है। अमृ गतों धातु (भ्वादि गणीय) से अन्त्र शब्द बनता है—अर्थात् जो गति करती है या जिसके द्वारा लाया हुआ आहार गति करता है। इसी गति के कारण—आहार-आमाशय से अन्त्र में, अन्त्र से मलाशय में और मलाशय से गुद द्वारा बाहर चला जाता है। वस्ति का वर्णन सु० नि० अ० ३ में देखिये। गुद का वर्णन अ० २ में देखिये। और शा० अ० ५-६ तथा शा० अ० ६—२५ देखिये। जिह्वा—रसनेन्द्रिय तथा वाग्निन्द्रिय का अधिष्ठान है। इसके द्वारा मधुर अम्ल आदि रसों का अनुभव होता है और बोला जाता है। यह कफ शोणित तथा मांस के सार से बनी है, यथा—जिह्वा अधिकतर मांस से बनी है, मांस के ऊपर श्लेष्मिक मोटी कला चढ़ी रहती है। यह कई मांस पेशियों द्वारा अधो हन्वस्थित से जुड़ी रहती है। यह संकोच से छोटी और प्रसार से बड़ी-चौड़ी हो जाती है। इस पर छोटे २ अङ्कुर होते हैं, इन्हीं से रस का ग्रहण—अनुभव होता है। यह कफ रसन नामक कफ है, जिससे आर्द्र रहने पर इसका अनुभव होता है 'रस्यते अनेन इति रसनः'। पेशी—शरीर पर जितना भी मांस है वह मांस पेशियों में विभक्त है और मांस पेशियों के आकार भिन्न २ होते हैं। उन पर मांसधरा कला लिपटी रहती है। देखिये मांसधरा कला अ० ५ का सु० ३७-४१। शिरा—इसके लिये देखिये सु० शा० अ० ७। और स्नायु के लिये देखिये—अ० ५। आशय—इसके लिये देखिये—शा० अ० ५-८। इसका अर्थ है—जिसमें कोई वस्तु आकर शयन करती है, कुछ समय के लिये रुकती है। गर्भ निर्माण के समय केवल वायु उन स्थानों में जहाँ आशय की आवश्यकता होती है आकर रुककर आशय का निर्माण कर देता है। इस परिभाषा के अनुसार हृद्रान्त, शिरा तथा शुक्रवाही स्रोत आदि को आशय कहना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें ॥ २६-३० ॥
रक्तमेदः प्रसादाद् शुक्ती, मांसासक्तफमेदः प्रसादाद् वृषणी, शोणितकफप्रसादजं हृदयं, यदाश्रया हि धमन्यः
प्राणवहाः, तस्याधो वामनतः प्लीहा फुफ्फुसश्च, दक्षिणतो यकृतं क्लोम च, तद्विशेषेण चेतनास्थानम्, अतस्तस्मिन् स्तमसाऽऽवृते सर्वप्राणिनः स्वपन्ति ॥ ३१ ॥
रक्त और मेद के सार से वृक्क बनते हैं। मांस-रक्त-कफ मेद के सार भाग से वृषण, रक्त-कफ के सार भाग से हृदय उत्पन्न होता है। क्योंकि प्राणवहा धमनियाँ इसी हृदय के आश्रित हैं। इस हृदय के नीचे वाम पार्श्व में प्लीहा और फेफड़े, दक्षिण पार्श्व में यकृत और क्लोम है। यह हृदय विशेष रूप में चेतना का स्थान है। इसीलिये इस हृदय के तम से द्यं जानने पर सब प्राणी सोते हैं।
वि० मन्तव्य—वृक्क—गर्भ के वृक्क—रक्त एवं मेद से के प्रसाद—स्वच्छ सार भाग से निर्मित होते हैं। अतएव वे-रक्त में से अनुपयोगी अंश को छानकर मूत्र का निर्माण करते और मेद से रक्षा करते हैं—बहने से रोकते हैं। ये दो होते हैं, जन्म हो जाने पर क्रियाशील होते हैं, उदर के भीतर-पिल्ली और पृष्ठवंश के दाहिनी एवं बाईं ओर रहते हैं, उनके सामने अन्त्र गेण्डली मारे पड़ी रहती है, ये दोनों ओर की बारहवों पशुकाओं के नीचे फलतः सुरक्षित भी रहते हैं। इनकी आकृति लोबिये के बीज जैसी होती है, यौवन में—इनकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई २३ इञ्च, मोटाई १ इञ्च (लगभग) होती है, भार २ छुट्टाई से कुछ कम, रङ्ग बैंगनी होता है। इसीसे मूत्रवाही स्रोत—(गवोनी) निकलकर मूत्राशय में पहुँचते हैं। वृषण—वर्षति शुक्र—जो शुक्र को बरसाता है, इसका नाम मुष्क भी है, जो शरीर से शुक्र को सुरक्षा है—सुपके से ले लेता है, अण्ड—अयति अस्मात् शुक्रम् इति जहाँ से शुक्र चलता है, अण्डकोष—अण्डों का कोश-थेला। यह वृषण दो हैं, गर्भ के अण्डकोष में नहीं उत्तरते, शिरन मूल के दोनों ओर पड़े रहते हैं, जन्म के कई दिन पश्चात् कोष में आ जाते हैं। कोष एक सूक्ष्म झिल्ली द्वारा दो भागों में विभक्त रहता है, उनमें दोनों अण्ड (अण्डाकार ग्रन्थियाँ) शिराओं तथा लसीका वाहिनियों द्वारा अवलम्बित होकर लटके रहते हैं, इतना ही नहीं, उक्त शिरा तथा लसीका वाहिनियाँ नालियों द्वारा उनका पोषण भी होता है और उनमें शुक्र का निर्माण भी, उनमें से दो नालियाँ आकर 'शुक्रवहे द्वे'—शुक्रवाही दोनों स्रोतों से सम्बद्ध रहती हैं, जिनके द्वारा शुक्र शुक्र-स्रोतों में पहुँचता है। इन सब अवयवों की क्रिया भी यौवन में पूर्णरूप से सम्पन्न होती है। गर्भनिर्माण काल में इनका निर्माण—मांस, रक्त, कफ एवं मेद से होता है। जैसे सूर्या आदि के अण्डों में जीव रहता है वैसे ही इनमें भी जीव रहता है जो शुक्र के साथ आकर—शोणित से मिलकर—उत्पन्न
अ० ४]
शरीरस्थानम्
३०६
परिस्थिति पाकर—अपना शरीर बना लेता है। अतएव पिता कहता है—आत्मा वे पुत्रनामासि—तू आत्मा ही पुत्र नाम हो और शुक्र देहात् प्रसिच्यते—चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ न० वि० अ० २-४६। अंगात् अंगात् सम्भवसि अर्थात्—जो शुक्र देह से परीजता है—परीज कर शुक्रवह खोतों द्वारा गर्भाशय में पहुँचता है। वह गतिशील—ज्ञान, गमन प्रातिशील विश्वरूप—आत्मा का रूप—चतुर्प्राक्ष द्रव्य है। वे पुत्र ! तू अंग अंग से उत्पन्न होता है। अतएव न-सु०शा०अ० २-श्लो० ३३ में—बुध आदि के बीज को शुक्र की उपमा दी गई है और इसी अशय २ का ४७ श्लोक भी देखिये। हृदय—यह शरीराश्रमक रक्त एवं कफ के प्रसाद से निर्मित होता है। रक्तवाहिनी शिराओं में यहीं से धमान-धमनक्रिया का प्रारम्भ होता है, जिसको देखकर-उनको “धमनी” कहा जाता है, यह हृदय-अमर कोशिक—“हृदयं हृत्” है। इसका पाठ अमर कोश के द्वितीय काण्ड के मनुष्य वर्ग श्लो० ६४ में है। और “चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृत् मानसं मनः।” अ० को० प्र० काण्ड काल वर्ग में भी हृदय एवं हृत् शब्द का उल्लेख है। और उक्त दोनों शब्द—हृदय (हृतिण्ड) तथा (२४ तत्त्वों में १) के वाचक हैं और दोनों के लिये प्रयुक्त भी होते हैं, परन्तु प्रस्तुत हृदय या हृत् शब्द मनुष्यवर्गोक्त हृदय के वाचक हैं, मनस के नहीं और यही हृत् शब्द लैटिन भाषा में परिवर्तित होकर “हार्ट” हो गया है। इसका अर्थ है—हरति रक्तं तथा ह्विते रक्तं अनेन—जो रक्त को लेता है तथा जिसके द्वारा रक्त लिया जाता है—शरीर में प्राप्त किया जाता है, इस हृत् का यही काम है। धमानवाली शिराओं को प्राणवह। इस लिये कहा गया है कि हृत् (हार्ट) के अपने कार्य से वञ्चित (फेल) हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। मस्तिष्क के फेल होने पर मृत्यु नहीं होती। मूर्च्छा में कई घण्टों तथा अभिन्यास में कई दिनों—सप्ताहों तक मानव जीवित रहता है, क्योंकि उनमें हृदय क्रियाशील रहता है। इस सच्चाई पर ध्यान देने से मस्तिष्क को भी प्रस्तुत हृत् समझना कथमपि उचित नहीं है। अलमतिवित्स्तेरण, प्रस्तुतमनुसरासः—हाँ, तो यह हृत् जो गर्भनिर्माण के समय रक्त एवं कफ से निर्मित होता है वह—वक्षस के फुफ्फुसों के अन्तराल में स्थित है, इसकी आकृति अधोमुख पुण्डरीक (कमल) के सदृश है या मुड़ी—अँगूठा ऊपर को निकालकर बाँधी गई मुड़ी के सदृश है। बकरा के हृदय की बनावट भी मानव के हृदय जैसी होती है। इसमें चेतना का विशेष निवास है, अतः कहा जाता है कि जागने का हृदय विकसित होता है और सोने का निमीलित होता है (श्लो० ३२), क्योंकि जागते में चेतना क्रियाशील रहती है और सोते (गाढ निद्रा) में क्रियाशील नहीं रहती, हृदय को पुण्डरीक के सदृश कहा है, अतः
विकसन (खिलना) तथा निमीलन (मिचना) कहा गया है। यह हृदय शिरामर्म है। (देखिये अ० ६ सर्वाशय)। रक्त को ले जाने एवं लानेवाली शिराओं का संयोग स्थल है, या यों कहिये कि—शिरा ने “हृत्” का रूप बना लिया है या शिरा “हृत्” रूप में (आकृति में) परियत हो गई है। और यह रक्ताशय भी है। देखिये अ० ५ का सू० ८। क्योंकि इसमें आकर रक्त एक क्षण के लिये ठहरता है—रक्ता है रक्तर फिर चल पड़ता है ॥३१॥
भवति चान्न—
पुण्डरीकेण सहस्रं हृदयं स्यादधोमुखम्। जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति ॥३२॥
इसमें श्लोक भी है—हृदय कमल के समान (उलटे किये हुए कमल-अर्धविकसित) नीचे की ओर मुख किये हुये है। जागते समय यह विकसित (खिल) रहता है और सोने पर बन्द हो जाता है।
वक्तव्य—“प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते। गोपानसीनमागारं कर्णिकैवार्थचिन्तकैः ॥ तस्योपधातान्मुखार्थं भेदान्मरणमृच्छति ॥” हृदय के अर्थ में विवाद है। हृदय से वर्तमान में ‘हार्ट’ जहाँ लेते हैं, वहाँ मस्तिष्क के वैन्द्दीकल भी लेते हैं। इसके सिवाय हृदय-केन्द्र के लिये भी आयुर्वेद में आता है, यथा—गुल्म चिकित्सा में—“मृदनीयाद् गुल्ममेवैकं नत्वत्र हृदयं स्पृशेत् ॥” वर्तमान हार्ट शब्द से कहे जानेवाले हृदय का आकार कमल के अर्धविकसित फूल को उल्टा करके जिससे नोक नीचे आ जाये, सरीखा कह सकते हैं। तम की प्रवृत्ति मस्तिष्क में है। जाग्रत अवस्था में मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, और सोते समय अक्रियाशील रहता है। चेतना का विशेषकर हृदय स्थान है, क्योंकि—“वेदनानामभिष्ठां मनो-देहश्च सेन्द्रियः। केशलोमन्खाप्रान्तर्मलद्रवगुणैर्विना” ॥३१॥
निद्रां तु वैष्णवो पाप्मानसुपदिशन्ति, सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति। तत्र यदा सञ्जावहानि चोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसौ नाम निद्रा संभवत्यनवबोधिनो, सा प्रलयकाले, तमोभूयिष्ठा-नामहः सु निशासु च भवति, रजोभूयिष्ठा नामान्मिचिन्त, सन्त्वभयिष्ठा नामधरान्ने, क्षोणश्लेष्मणामानलबहुलानां मनःशरीराभितापवर्ता च तैव, सा वैकारिकी भवति ॥३२॥
निद्रा विष्णु की माया की भाँति है, इसे पाप भी कहते हैं। यह निद्रा स्वभाव से ही सब प्राणियों में होती है। जब सञ्जावह खोतों में तम की प्रधानतावाला कफ पहुँच जाता है तब तामसी निद्रा उत्पन्न होती है, इसमें प्राणी जागता नहीं, यह निद्रा
११०
मुक्तसंहिता
[ अ० ]
प्रलय काल में होती है। तम की प्रधानतावाले प्राणियों में दिन में और रात में नींद आती है। रजोगुण की अधिकतावालों को बिना कारण के नींद आती है—(किसी समय नींद आ जाती है)। सत्वगुण की प्रधानतावालों को आधी रात के समय आती है। क्षीण कफवाले, वात प्रधानतावाले, मानसिक और शारीरिक दुःख से पीड़ित व्यक्तियों को नींद नहीं भी आती। यह वैकारिकी (विकारजन्य) निद्रा है।
वक्तव्य—चरक में—“यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः। विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥” नींद सात प्रकार की है, यथा—“तमोभवा र्लेभ्समुद्भववा च, मनःशरीरश्रमसंभवा च। आगन्तुकी व्याधनुवर्तिनी च रात्रि-स्वभावप्रभवा च निद्रा ॥” चरक ० सू ० २१। तामसिक पशु-रात-दिन सोते रहते हैं, यथा भैंस या सिंह। राजस-व्यक्ति—किसी भी समय रात या दिन में नींद पूरी कर लेते हैं। सत्वप्रकृति आधी रात में सोते हैं। प्रातः काल-उपाकाल में सत्व गुण की अधिकता रहने से सब देशों के मनुष्य पूजा-पाठ में, मन्दिरों में जाने की प्रवृत्ति रखते हैं। रात में—सार्थकाल में तमोगुण की अधिकता होने से सब देशों में पापाचार के घर, मदिरालय खुलते हैं, लोग उनका उपभोग करते हैं। प्रातःकाल मद्यपान करता हुआ कोई बिरला ही देखा जाता है। यह स्वभाव से है, सारे संसार के देशों में र्वाज है।
वि० मन्तव्य—निद्रा २ प्रकार की होती है १—वैष्णवी-विष्णु पालन (भरण-पोषण) के अधिष्ठाता हैं, (भारतीय भावना के अनुसार पालक हैं) और वह निद्रा—“रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां मूतधात्रीं प्रबदन्ति निद्राम्” जो रात्रि में स्वभाव से उत्पन्न होती है उसको मूतधात्री—मूत-प्राणी की धात्री—धात्र दूध पिलनेवाली—धारण पोषण करनेवाली निद्रा कही जाती है। और-२-पाप्मा-पाप है—धर्म विरुद्ध है—अध का मूल है—तमो-भवामराहुअवस्थ मूल शेषाः पुनः व्याधिषु निर्दिशन्ति (च० सू० अ० २१) अर्थात् तमोगुण की अधिकता से जो निद्रा होती है वह अव-पाप का मूल है तथा रोग रूप है।
अनवबोधिनी—जिसके आने पर पुनः जागरण नहीं होता, यह प्रलय काल-मृत्यु के समय आती है।
अनिमित्त—जब जागने का कोई निमित्त-कारण नहीं होता तभी आ जाती है। यह रजोगुणी—संसार के कामों में संलग्न प्राणी को आनेवाली निद्रा है, वह प्राणी जब कार्य में लीन रहता है तब नहीं आती, जब खाली होता है तब खट से आ जाती है ॥३३॥
भवतश्चात्र—
हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत ! देहिनाम्। तमोभिभूते तस्मिन्स्तु निद्रा विशति देहिनाम् ॥३४॥ निद्रा हेतुस्तमः, सत्त्व बोधने हेतुरुच्यते। स्वभाव एव वा हेतुर्गरीयान् परिकीर्यते ॥३५॥ इसमें श्लोक हैं—हे सुश्रुत ! मनुष्यों की चेतना का स्थान हृदय कहा है। उस हृदय के तम से आक्रान्त होने पर मनुष्यों को निद्रा आती है। निद्रा का कारण तम है, और जागरण में सत्त्व गुण कारण है। अथवा स्वभाव को ही श्रेष्ठ कारण कहा जाता है। अर्थात् स्वभाव से ही निद्रा आती है। वि० मन्तव्य—तमोगुण से निद्रा आती है और कफ भी तमोगुणी है, अतः कफ से निद्रा आती है। तमोभवा, र्लेभ्समुद्भववा च (च० सू० अ० २१)। यथा भोजन करते ही कफ बढ़ने पर निद्रा आ जाती है या जब जब कफ की वृद्धि होती है, यथा कफ ज्वर में तब तब निद्रा आ जाती है ॥३४,३५॥
पूर्वदेहानुभूतास्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः। रजोगुक्तं मनसा गुह्यतथ्योर्गुभुमाशुभान् ॥३६॥ सोते हुए व्यक्ति का स्वामी भूतात्मा है। यह भूतात्मा रजोगुण युक्त मन के साथ मिलकर पूर्व शरीर में अनुभूत शुभ-अशुभ विषयों का ग्रहण करता है ॥३६॥
करणानां तु वैकल्प्ये तमसाऽभिप्रवर्धिते। अस्वपन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ॥३७॥ तम के कारण इन्द्रियों में विकलता बढ़ जाने से न सोता हुआ भी भूतात्मा सोया हुआ कहा जाता है ॥३७॥
वक्तव्य—भूतात्मा कभी सोता नहीं, केवल इन्द्रियों के तम के कारण विषयों का ग्रहण न करने से हम आत्मा को सोया हुआ कहते हैं। इसीलिये उपनिषद् में कहा है कि—यही आत्मा है कि जो सोते हुए भी जागता रहता है ॥३७॥
सर्वतुष दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र शोभ्यात्, प्रतिषिद्धेष्वपि तु बालबुद्ध्यां कर्त्रितक्षतक्षीणमद्यनित्ययानवाह-नाध्वकर्मपरिश्रान्तानाममुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरकृष्णि-णानामजीणिनां च सुहृतं दिवास्वपनमप्रतिषिद्धम्। रात्रावपि जागरितवतां जागरितकालादधेमिष्यते दिवास्वपनम्। विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम, तत्र स्वपतामधर्मः। सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच्छ कासश्चासप्रतिशयशिरोगौरवाङ्गमर्दासेचकञ्चराग्निर्दौर्बल्यानि भवन्ति, रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तिनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति ॥३८॥
सब श्रुतुओं में दिन के समय सोना निषिद्ध है। परन्तु शीघ्र श्रुतु में (रातों के छोटी होने से) दिन में
अ० ४ ]
शारीरस्थानम्
३११
सोना निषिद्ध नहीं है। अपवाद—प्रतिषेध में भी बालक, बूढ़, स्त्री सेवन से क्रुश, उरःक्षत रोगी, क्षीण, मद्यपान करने वाले, वाहन (चोड़े आदि की सवारी), यान (रथ रेल आदि), मुसाफिरी या मेहनत के कारण थके, भोजन न करनेवाले, मेद-स्वेद-कफ-रक्त-रस से क्षीण हुए, अजीर्ण रोगियों के लिये मुहूर्त भर (थोड़ी देर) सोना विषेध है। जिन्होंने रात में जागरण किया हो, वे भी रात्रि जागरण से आधे समय तक दिन में सो सकते हैं। दिन में सोना एक विकार है। दिन में सोने से अधर्म होता है। सप्त दोषों का प्रकोप होता है। दोषों के प्रकोप से कास, श्वास, प्रतिश्याय, सिर में भारीपन, अङ्गों का दृटना, अरोचक, ज्वर, अग्नि दुर्बलता होती है। रात में भी जागने से वात-पित्तजन्म बही कास, श्वास आदि उपद्रव होते हैं ॥३२॥
भवन्ति चात्र—
तस्मात्त जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।
द्वात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ॥ ३९ ॥
अरोगः सुमना ह्यं वलवर्णान्वितो वृषः ।
नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः रातम् ॥४०॥
इसमें श्लोक भी हैं—इसलिये ज्ञानी मनुष्य रात में न जागे और दिन में न सोये, क्योंकि ये दोनों बातें दिन में सोना और रात में जागना दोष प्रकोपक हैं। इसलिये उचित प्रमाण में नींद ले। इस प्रकार करने से मनुष्य नीरोगी, प्रसन्न-चित्त, बल-वर्णयुक्त, पुरुषत्वयुक्त, न बहुत मोटा और न बहुत क्रुश, ऐश्वर्यशाली होता है, एक सौ वर्ष जीता है।
वक्तव्य—“निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम् । वृषता म्नीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ अकालेऽतिप्रसंगाच्च न च निद्रा निषेविता । सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा ॥ सैव युक्ता पुनयुङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा । पुरुषं योगिनं विदधा सत्या बुद्धिरिवागता ॥ रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरुक्षमनमिष्यन्दि स्वासीनप्रचलायितम् ॥ देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः । स्वप्नान्नाऽऽहारसमुल्ये च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥
(निद्रा सात्स्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा ।)
दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः ।
न तेषां स्वप्तां दोषां जाग्रतां वाऽपि जायते ॥ ४१ ॥
(जिन लोगों ने रात में या दिन में सोने की आदत बना ली है) जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के आदों हो गये हैं उनको दिन में सोने या रात में जागने से
१ श्रीभूमे चादानरूचाणां वर्धमाने च मास्ते ।
रात्रीणां चातिसंक्षेपाद् दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥
चरक सू० अ० २१ ।
(यथा सिनेमा देखने के शौकीन आदि) किसी प्रकार का दोष नहीं होता ॥ ४१ ॥
निद्रानाशोऽनिलात् पिन्धान्नमनस्तापात् क्षयादपि ॥
संभवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ॥ ४२ ॥
निद्रानाशोऽभ्यङ्गयोगो मूर्ध्नं तैलनिषेवणम् ।
गात्रस्योद्गतं चैत्र हितं संवाहनानि च ॥ ४३ ॥
आलिगोधूमपिष्टान्नमद्यैरैक्षवसंस्कृतैः ॥
भोजनं मधुरं स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः ॥ ४४ ॥
रसेर्विलेशयानां च विष्किराणां तथैव च ।
द्राक्षासितैस्तुद्वय्याणामुपयोगो भवेन्निरि ॥ ४५ ॥
शयनासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च ।
निद्रानाशे तु कुर्वीत तथाऽन्यान्यपि बुद्धिमान् ॥४६॥
वायु के कारण, पित्त से, मन के संताप से, रसादि धातुओं की क्षीणता से, चोट आदि के लगने से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद के न आने पर—शरीर पर तैल का अभ्यङ्ग, शिर पर तैल लगाना, अङ्गों पर उबटन करना, शरीर का संवाहन (दबाना, चापी करना) उत्तम है। शाली, गेहूँ, पिठी से बने भोजन, गुड़ आदि से बनाये पदार्थ, मधुर एवं स्निग्ध भोजनों को दूध, मांस रस आदि के साथ खाना उत्तम है। विलेशय चूहे आदि और विष्किर (मुर्ग आदि) के मांस रस के साथ भोजन करे। रात में द्राक्षा, मिश्री, ईख आदि द्रव्यों का उपयोग करे। शय्या, आसन, सवारी—कोमल और मन को प्रिय बनाये। निद्रा नाश में दूसरे अन्य उपाय भी बुद्धिमान् करे।
वक्तव्य—“अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यान्नपौदका रसाः । शाल्यन्मं सद्धि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च । चतुष्पत्तर्पणं लेपः शिरसो बदनस्य च । स्वास्तीर्णं शयनं वेष्टम सुखं कालस्थोचितः । आनयत्यन्विरात्रिन्द्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥ ४२-४६ ॥
निद्रातियोगे वमनं हितं संशोधनानि च ।
लंघनं रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ॥ ४७ ॥
निद्रा के अतियोग में वमन और संशोधन, लंघन, रक्तमोक्षण तथा मन को व्याकुल करनेवाले साधन उत्तम हैं।
वक्तव्य—“कायस्य शिरसश्चैव विरेकशुद्धं भयम् । चिन्ता क्रोधः कथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् । उपवासोऽसुखाशय्या सल्लोदार्थं तमो जयः । निद्राप्रसङ्गमहर्तं वारयन्ति समुल्लितम् ॥ एत एव च विशेषे निद्रानाशस्य हेतवः । कार्यकालो विकारश्च प्रकृतिविरुधेव च ॥” चरक सू० अ० २७ ॥ ४७ ॥
कफमेदोविषातीनां रात्रौ जागरणं हितम् ।
३१२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
कफ, मेद और विष से पीड़ित मनुष्यों को रात में जागना हितकारी है ।
द्विवास्वप्नश्च तृट्शूलहिक्राजोर्णितिसारिणाम् ॥४२॥ प्लास, शूल, हिका, अजीर्ण और अतिसार के रोगियों को दिन में सोना हितकारी है ॥ ४२ ॥
इन्द्रियार्थेष्वसंग्रासिगौरवं जूम्भणं कलमः ।
निद्रातस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ ४९ ॥
तन्द्रा—इन्द्रियों के विषयों की अप्राप्ति, भारीपन, जम्माई आना, कलम, नींद से पीड़ित मनुष्य के समान (हाथ पैर टूटना, मोड़ना) जिसकी चेष्टायें हों, उसको तन्द्रा समझना चाहिये ॥ ४९ ॥
पीतवैकमनिलोच्चासमुद्देश्व विवृताननः ।
यं मुखति सनेत्रास्वं स जूम्भ इति संज्ञितः ॥ ५० ॥
मुख को खोलकर वायु का एक उच्छ्वास (बूँट) पीकर, हाथों को और शरीर को ऐंटता (मोड़ता) हुआ जिस वायु को मुख से नेत्रों में आँसुओं के साथ बाहर करता है, उसे जम्माई कहते हैं ।
वक्तव्य—छौंक का लक्षण—“प्राणोदानौ समो स्यातां मूर्धनं खोतःपथि स्थितौ । नस्तः प्रवर्तते शब्दः क्षवथुं तं विनिर्दिशेत्” ॥ ५० ॥
योऽनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।
कलमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रवाधकः ॥ ५१ ॥
जो यकान बिना किसी मेहनत के, बिना किसी श्वास की गति के बंदे, उत्पन्न होती है, उसको कलम कहते हैं । यह इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में रुकावट उत्पन्न करता है ॥
मुखस्पर्शप्रसङ्गिरवं दुःखद्वेषणलोत्ता ।
शक्तस्य चाप्यनुत्साहः कर्मस्वालयमुच्यते ॥ ५२ ॥
मुख स्पर्श की चाह, दुःख के कारणों से बचने की लालसा, सामर्थ्य होने पर भी कार्य करने में उत्साह का न होना आलस्य कहा जाता है ॥ ५२ ॥
उत्किलदयान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकघोषनेरितम् ।
हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्कलं विनिर्दिशेत् ॥ ५३ ॥
वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्देश्व भ्रमः ।
न चान्नमभिकाङ्क्षते ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत् ॥ ५४ ॥
मुख में पानी आने एवं थूक से प्रेरित हुआ अन्न उत्कले-शित (बाहर आने की प्रवृत्ति का) होकर, न निकले हृदय पर (आमाशयिक प्रदेश पर) दबाव प्रतीत हो, उसे उत्कलेश कहना चाहिये । मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंटन, चक्कर आना, अन्न में रुचि न होना, इसको ग्लानि कहना चाहिये ॥ ५३, ५४ ॥
आर्द्रवर्मावनद्वं वा यो गात्रं मन्यते नरः ।
तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद्विनिर्दिशेत् ॥ ५५ ॥
जो मनुष्य शरीर को गीले चमड़े से जकड़ा हुआ सा मानता है, तथा शिर में बहुत भारीपन अनुभव करता हो, उसे गौरव कहना चाहिये ॥ ५५ ॥
मूच्छां पित्ततमः प्राया, रजःपित्तानिलाद् भ्रमः ।
तमोबातकफातन्द्रा, निद्रा श्लेष्मतमोभवः ॥ ५६ ॥
प्रायः करके मूच्छा में पित्त-तम की अधिकता रहती है, भ्रम, रजोगुण, पित्त और वायु से होती है । तन्द्रा तमोगुण वायु और कफ से होती है । निद्रा-कफ और तम से उत्पन्न होती है ।
गर्भस्य खलु रसनिमित्ता साहात्माधमाननिमित्ता च परिवृद्धिर्भवति ॥ ५७ ॥
गर्भ की वृद्धि-अन्न रस के कारण से और वायु के आध्मान (फूलने) से होती है ।
वि० मन्तव्य—गर्भाधान होते ही जो शुक्रशोणित के मिश्रण में स्फुरण होता है, (देखिये शा० अ० २ सू० १३) वह वायु का आध्मान—फूलाना ही है । इससे शुक्र शोणित का मिश्रण फूलता है और उसमें रस प्रविष्ट हो जाता है । फलतः आध्मान होते २ और आध्मात-अवकाश में रस का प्रवेश होते २ गर्भ की परि—सब प्रकार या उचित प्रकार से वृद्धि होती जाती है । यह रस—रसमय रक्त माता से मिलता रहता है । इसीका स्पष्टीकरण निम्न श्लोकों में किया गया है ॥ ५७ ॥
भवन्ति चात्र—
तस्यान्तरेण नाभेस्तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् ।
तदाधमति वातस्तु देहस्तेनास्य वधते ॥ ५८ ॥
ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य साहतः ।
ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्छ स्रोतांस्थपि यथा तथा ॥ ५९ ॥
इसमें श्लोक भी हैं—गर्भ की नाभि के बीच में ज्योति-स्थान (अग्निस्थान) है । इस स्थान को वायु फूँकती है, इससे इस गर्भ का शरीर बढ़ता है, उष्म (पित्त) के साथ मिली वायु इस गर्भ के ऊपर, तिरछे और नीचे गये स्रोतों को खोलती है । इससे भी यह बढ़ता है ।
वक्तव्य यहाँ पर यह स्मरण रखना चाहिये कि गर्भ में सारा काम यकृत को ही करना पड़ता है । गर्भ का हृदय फेफड़े बिल्कुल काम नहीं करते । इनको काम भोजन पवाने का काम यकृत ही करता रहता है । इसीसे यह बढ़ा भी होता है । जो पीछे घटता जाता है । यही यकृत आयुर्वेद में पित्त (अग्नि) का स्थान है । इस पित्त को ले जानेवाला, गति देनेवाला वायु है । इस पित्त के कारण पाचन ठीक होने से गर्भ के सब अङ्ग-प्रत्यङ्ग बढ़ते हैं ।
वि० मन्तव्य—यह दोनों श्लोक पाराशर्य महर्षि के प्रतीत होते हैं—आपने अध्याय ४ सू० ३२ में—कहा है कि उत्पन्न
अ० ४] ४०
शारीरस्थानम्
११३
होते हुए गम का सर्व प्रथम "नाभि" नामक अवयव बनता है—पूर्ण नाभि नहीं, नाभि का पूर्वरूप बनता है, वही से देही का देह बढ़ता है यही इन श्लोकों में भी कहा गया है—इन नाभि में ज्योति—अग्नि का स्थान है, जो उस आगत रस का उचित परिपाक करता रहता है। इसके साथ वायु मिलकर आगे २ श्लोकों का दारण करता जाता है और उक्त अग्नि उनका पाक करता है। फलतः दारण होने पर भी रस का अनुचित प्रवहण नहीं होता और रस को मार्ग मिलता जाता है, देह बढ़ता जाता है। वह सौंदर्य का सा शुक्र-शोणित का मिश्रणकर एक दिन करारविन्द से पदारविन्द को मुखारविन्द में धरते हुए बालमुकुन्द का रूप धारण कर लेता है, जो वटपत्र के दोनों के आकारवाले गर्भाशय में शयन करता है। च० वि० अ० ५ में कुछ आचार्यों ने श्लोकों के समुदाय को ही पुष्प—प्राणी माना है। यही उक्त दो श्लोकों में कहा गया है।
दृष्टिष्व रोमकृपाश्च न वर्धन्ते कदाचन ।
ध्रुवाण्येतानि मर्त्योनामिति धन्वन्तरैमतम् ॥६०॥
मनुष्य की दृष्टि और रोमकृपा कभी भी नहीं बढ़ते। ये दोनों वस्तुएँ ध्रुव (स्थिर) हैं, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥६०॥
शरीरे क्षौयमाणेऽपि वर्धते द्राविषौ सदा ।
स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ॥६१॥
शरीर के क्षौण होने पर भी नख और केश-स्वभाव एवं प्रकृति के कारण सदा ही बढ़ते रहते हैं ॥६१॥
सप्त प्रकृतयो भवन्ति—दोषैः पृथक् द्विशः, समस्तैश्च ॥
प्रकृतियाँ सात प्रकार की हैं—पृथक्-पृथक् दोषों से दो दोषों के मिलने से, और सब दोषों के मिलने से, सात प्रकृतियाँ बनती हैं ॥६२॥
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेदोष उरुक्तः ॥
प्रकृतिजोयते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ॥६३॥
शुक्र और आर्त्तव के मिलने के समय जो दोष प्रबल होता है, उस दोष से प्रकृति उत्पन्न होती है, उस प्रकृति के लक्षणों को मुझसे सुनो।
वक्तव्य —“समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः ।
यतः प्रकृतिश्चारीर्यम्, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः । सा चेष्ट-रूपा । तस्माद् भवन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । ननु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः, श्लेष्मप्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोषश्च हि आधिक्यभावात्सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम्, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नेताः प्रकृतयः सन्ति । सन्ति खलु वातलाः, पित्तलाः, श्लेष्मलाश्चाऽप्रकृतिस्था-लु ते ज्ञेयाः ॥” चरक वि० अ० ६ ॥६३॥
तत्र वातप्रकृतिः प्रजागरुकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्स्यजंयायौ गन्धर्वचित्रः स्फुटितकरचरणोऽल्परुक्षश्चरमश्रु नखकेशः क्राथी दन्तखादी च भवति ॥६४॥
इसमें वातप्रकृति मनुष्य जागनेवाला (रात में नींद कम आती है), शीत से द्रव करनेवाला, देखने में कुरुर, चौर, द्रव बुद्धिवाला, अनार्य, गन्धर्वचित्र (इधर उधर घूमने के मन का) हाथ-पर फटे हुए, शमश्रु-नख और केश, छोटे एवं रूक्ष, क्राथि (हिंसाशील) सौते हुए दांतों को कटकटानेवाला होता है। (क्राथी के स्थान पर क्रोधी भी पाठ है) ॥६४॥
अधुतिरट्टसौहृदः कृतघ्नः क्रुशपरुषो धमनोतः प्रलापी । द्रुतगतिरटनोऽनवस्थितात्मा वियति च गच्छति संभ्रमेण सुप्तः ॥६५॥
अठ्यवस्थितमतिश्वलट्टध्रिर्मन्दरन्धनसंचयमित्रः ।
किंचिदेव विलपत्यनिबद्धं मासृतप्रकृतिरेष मनुष्यः ॥६६॥
(वातिकाइवाजगोमायुग्माशस्त्रं ध्रुवनां तथा ।
गुध्रकाकखरादीनामनूकैः कीर्तिता नराः ॥६७॥)
वातप्रकृति मनुष्य धैर्य रहित, कच्ची मित्रतावाला, कृतघ्न, क्रुश, कठोर धमनियाँ (शिरायें) दीखती हैं, बहुत बोलनेवाला, जल्दी चलनेवाला, इधर उधर घूमने के स्वभाव का, अस्थिर चित्त होता है। सौते हुए एकदम से आकाश में जाता है (खाड़ी न्यर्थ की कल्पना करता है—आकाश में हवाई महल बनाता रहता है)। अस्थिर बुद्धि, चंचलदृष्टि, इसके रत्न, धन-संचय और मित्र कम होते हैं, कुछ न कुछ बिना मतलब और बिना प्रसंग के बोलता रहता है, ऐसा मनुष्य वातप्रकृति होता है। (वातप्रकृति का मनुष्य बकरी, गौदड़, खरगोश, चूहा, ऊंट, कुत्ता, गीध, कौआ, गधे के स्वभाववाला होता है) ॥६७॥
पित्तप्रकृतिस्तु स्वेदनां दुर्गन्धः पीतशिलिहाङ्गस्ताम्रनखनयन्तालुजिह्वाघ्राणिपादतलो दुर्भगो वलौपलितस्वालि-त्यजुष्टो बहुमुगुणद्वेषी क्षिप्रकोपप्रसादो मध्यबलो मध्या-युश्च भवति ॥६८॥
मेधावी निपुणमतिर्विगुह्य वक्ता तेजस्वी समितिषु दुर्निवारवीर्यः । सुप्तः सन् कनकपलागकर्णिकारात् संपश्येदपि च हुताशविद्युत्तुकाः ॥६९॥
न भयात् प्रणमेदन्तेष्वमुदुः
प्रणतेष्वपि सान्त्वनदानरुचिः ।
भवतीह सदा व्यथितास्यागतः
स भवेदिह पित्तकृतप्रकृतिः ॥७०॥
(मुजङ्कोल्लुङ्गन्धवयक्षमाजैरवानरैः ।
न्याघ्रक्षन्तकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराः स्मृताः ॥७१॥)
पित्तप्रकृति मनुष्य को पसीना बहुत आता है, शरीर से दुर्गन्ध आती है, इसके अंग पीले और ढीले रहते हैं। नख-आँख-तालु जिह्वा-ओष्ठ-पैर हाथ के तलुए ताम्रवर्ण, देखने में बहुत सुन्दर नहीं (योद्धा भाग्यवान्), ह्र्दिर्ग्राह्य, बालों का श्वेत होना, बालों का गिरना, बहुत खानेवाला, उष्ण से द्रव रखनेवाला, जल्दी कुपित एवं प्रसन्न होनेवाला, मध्यम बल और
३१४
मुमुक्षुसंहिता
[ अ० ४ ]
मध्यम आयु का होता है। यह मनुष्य बुद्धिशाली, चतुर-अकल-वाला, जबरदस्त बोलनेवाला, तेजस्वी, सभाओं में न हारने-वाला होता है। सोते हुए स्वर्ण, टाक, अमलताप, अग्नि, विद्युत्, उत्काषात् को देखता है। भय से किसी के आगे नहीं झुकता, न झुकनेवालों के लिये कठोर, झुकनेवालों के लिये सान्त्वना दान देने की प्रकृति का, इसकी गति सदा चंचल रहती है। इस प्रकार का मनुष्य पित्तप्रकृति होता है। (साँप उलूद गन्धर्व-यक्ष विही वन्दर, व्याघ्र-रीछ-नकुल के स्वभाववाले पित्तप्रकृति के मनुष्य होते हैं) ॥७१॥
श्लेषप्रकृतिस्तु दुर्बन्धोवरति विश्विशाद्रीष्टिकरकाण्डा-नामन्यतमवर्णः सुभगः प्रियदर्शनी मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलबाधिरम्राही दृढवैरश्च भवति ॥७२॥
शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलालिनीलकेशो लक्ष्मीवान् जठदुष्कृसिंहवोधः । सुप्तः सन् सकमलहंसचक्रवाकान् सपश्येदपि च जलाशयान् मनोज्ञान् ॥७३॥
रक्तान्तेनैः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सन्धगुणोपपन्नः । कलेशस्मो मानयिता गुरुणां ज्ञेयो बलासप्रकृतिमंजुष्यः ॥७४॥
(दृढगाव्रमति स्थिरमित्रधनः परिगण्य चिरात् प्रददाति बहु । परिनिश्चितवाक्यपदः सततं
गुरुमानकश्य भवेत् स सदा ॥७५॥
ब्रह्मरुद्रवर्णः सिंहाङ्गजगोवृषैः । तार्क्यहंससमानूकाः श्लेषप्रकृतयो नराः ॥७६॥
कफ प्रकृति के मनुष्य श्वेत दुर्वा-नीलाकमल-तलवार, गीला अरीटा, शरकाण्डे का काण्ड, इनमें से किसी एक के समान वर्णवाले, देखने में सुन्दर (भाग्यवान्), प्रिय दर्शन, मधुर रस को चाहनेवाले, कृतज्ञ, धैर्यशाली, सहनशील, लोभरहित, बलवान्, देर में समझनेवाले (देर में निर्णय करनेवाले), और दृढवैरवाले होते हैं। इनकी आँखें श्वेत रहती हैं, बाल दृढ़ धृष्टवाले, भ्रमर के समान नीलवर्ण होते हैं। मनुष्य लक्ष्मीशाली, इसकी आवाज बादल, मृदंग या सिंद् की गर्जना की भाँति गम्भीर होती है। सोते हुए कमल, हंस, चक्रवाक एवं सुन्दर जलाशयों को देखता है। आँखें किनारों से छाल, अंगों की रचना पृथक् पृथक्, स्निग्ध कान्तिवाला, सन्धगुण से युक्त, क्लेश को सहनेवाला, गुरुओं का आदर करनेवाला मनुष्य कफ प्रकृति का होता है। इसका शाख शान दृढ होता है, मित्र और धन स्थिर रहते हैं। बहुत विचारकर, देर में बहुत देता
है। इसके वाक्य-पद (बोलने की भाषा) सदा नियमित रहते हैं। यह व्यक्ति सदा ही गुरुओं का आदर करता है। इसका स्वभाव ब्रह्म-इन्द्र-वरुण, सिंद्, घोड़ा, हाथी, गाय, वैल, राक्ष, हंस के समान होता है ॥७२-७६॥
द्रव्योर्वा तिसृणां वाऽपि प्रकृतीनां तु लक्षणेः । ज्ञात्वा संसगजा वैद्यः प्रकृतीरभित्तिदिशेत् ॥७७॥ वैद्य दो या तीन दोषों के मिलित लक्षणों से संसर्ग प्रकृतियों को समझे ॥७७॥
प्रकोपो वाऽन्यथाभावो क्षयो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥७८॥ स्वभाव से ही प्रकृतियों का प्रकोप (बहुत बढ़ना), अथवा बदल जाना या घट जाना नहीं होता (ये स्वस्थ अवस्था में नहीं होते), अपितु ये तब होते हैं जब मनुष्य मरनेवाले होते हैं। वक्तव्य—चरक में—शीलं व्यावर्त्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्त्तते । चरक ॥ ३० ॥ १२।४६ ॥७८॥
विषजातो यथा कीटो न विषेण विषद्यते । तद्वत्प्रकृत्यो मर्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ॥७९॥ विष से उत्पन्न कीड़ा जिस प्रकार विष से नहीं मरता, उसी प्रकार ये प्रकृतियाँ मनुष्य को किसी प्रकार का कष्ट नहीं करातीं। इसी से कहा है चरक में—
“त्रयस्तु पुरुषा भवन्ति आतुराः, ते त्वनातुराः तंवांनतुरा-याणां भिषजाम् । तद्यथा वातलः, पित्तलः, श्लेषमलक्षेति ॥” चरक ॥ ३० ॥ ६ ॥
समपित्तानिलकफाः केचिद् गर्भादि मानवाः । दृश्यन्ते वातलाः केचिद् पित्तलाः श्लेषमलास्तथा ॥ तेषामनातुराः पूर्वा वातलाद्याः सदातुराः । दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिकल्प्यते ॥ चरक ॥७९॥
प्रकृतिमिह नराणां भौतिकीं केचिदाहुः पवनदहनतोयैः कीर्तितास्तास्तु तिस्रः ।
स्थिरविपुलशरीरः पार्थिवश्च क्षमाबाव- शुचिरथ चिरजीवी नाभसः स्वैर्महद्भिः ॥८०॥ कोई आचार्य मनुष्यों की प्रकृति को पंचमहाभूतवाली कहते हैं। इनमें से वायु, अग्नि और जल की प्रकृतियाँ बल, पित्त, कफ से कह दी हैं। पार्थिव प्रकृति का मनुष्य स्थिर, बड़े शरीर का और क्षमाशील होता है। आकाश प्रकृति का मनुष्य पवित्र, दीर्घायु और इसके कान, नाक के छेद (अंग) बड़े होते हैं ॥८०॥
शौचमास्त्रिकयमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् । प्रियातिथिर्वसिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ॥८१॥ माहात्म्यं शौचमाज्ञा च सततं शास्त्रबुद्धिता । श्रुत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ॥८२॥ शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्कल्य हरिकेगता । प्रियबादिर्विमिश्येतद्धारुणं कायलक्षणम् ॥८३॥
अ० ४ ]
शारीरस्थानम्
३१५
मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयो । महाप्रसवशक्तिस्त्वं कौवेरं कायलक्षणम् ॥८४॥ गन्धमाल्यप्रियस्त्वं च नृत्यवादिक्रामिता । विहारशीलता चैव गान्धर्वं कायलक्षणम् ॥८५॥ प्राप्तकारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाङ्गुलिः । रागमोहमदद्वेषैर्विजितो याभ्यसत्त्ववान् ॥८६॥ जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम् ।
ज्ञानविज्ञानसंपन्नमुपिसत्त्वं नरं विदुः ॥८७॥
सत्त्वादि गुण भेद से प्रकृति—ब्रह्मकाय-पवित्रता, आस्तिक्य, वेदों का स्वाध्याय, गुरुओं की पूजा, अतिथियों का सत्कार, यज्ञ करना—यह ब्रह्मकाय का लक्षण है । महान् आत्मत्व, श्रुता, निरन्तर आज्ञा करने की प्रवृत्ति, शास्त्र में बुद्धि, भृत्यों का पोषण करना, यह महेन्द्र काय का लक्षण है । शीतल पदार्थों में प्रीति, सहनशीलता, केश आदि में भूरापन, बालों में हरा रंग, मीठा बोलना यह वाक्य शरीर का चिह्न है । उदासीन वृत्ति, सहनशीलता, धन को प्राप्त करना और एक त्रित रखना, बहुत सन्तान पैदा करना यह कौवेर शरीर का लक्षण है । सुगन्ध (इत्र आदि) एवं माला में रुचि, नाच, गाने-बजाने का शौक, घूमने की इच्छा—ये गान्धर्व शरीर के लक्षण हैं । युक्ति से काम निकालनेवाला, दृढ़ता से काम को आरम्भ करनेवाला, भय-रहित, स्मृतिशाली, पवित्र, जप, व्रत, यज्ञ, ब्रह्मचर्य और अध्ययन के स्वभाव का, ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न मनुष्य को ऋषि सत्त्ववाला कहा है ।
वक्तव्य—वात प्रकृति आदि शरीर की दृष्टि से, सात्त्विक शरीर आदि मन की दृष्टि से कहे हैं । इसी से चरक में कहा है—“त्रिविधं खलु सत्त्वं शुद्धं राजसं तामसमिति । शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरम् । तस्मात् कतिचित्सत्त्वमे दानुक्रामिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुष्याख्यास्यामः ।” चरक शा० अ० ४।३७।८१-८७॥
समैते सात्त्विकाः काया राजसांस्तु निबोध मे ।
ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम् ॥८८॥
एकाग्रिन् चौदरिकमासुरं सत्त्वमौहम् ।
तीक्ष्णमायासिन् भीरुं चण्डं मायान्वितं तथा ॥८९॥
विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ।
विबुद्धकामसेवी चाप्यजघाहार एव च ॥९०॥
अमषणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् ।
एकाग्रतप्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाहता ॥९१॥
भुगमात्रं तमश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ।
उच्छिष्टहारता तैहृण्यं साहसप्रियता तथा ॥९२॥
श्लोलुपत्त्वं नैलज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ।
असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् ॥९३॥
लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् ।
षडैते राजसः कायाः,
ये सात सात्त्विक शरीर हैं । राजस प्रकृतियों को सुनो—ऐश्वर्यशाली, रौद्र, शूर, क्रोधी, निन्दा करनेवाला, अकेला ही खानेवाला, पेद्रू (बहुत खानेवाला) आसुर प्रकृति होता है । तीक्ष्ण परिश्रमी, डरप्रोक, क्रोधी, लुली, घूमने तथा खाने में चपल मनुष्य सर्प सत्त्व है । अतिशय विषयसेवी, निरन्तर खाने का ही विचार करनेवाला, असहनशील, अस्थिर मनवाला मनुष्य शाकुन (पक्षी) स्वभाव का है । एकाग्रता में रहनेवाला, रौद्र, निन्दा करने वाला, धर्म के विरुद्ध बरतनेवाला, अतिशय तमोगुणी मनुष्य राक्षस-प्रकृति का है । लूटा खानेवाला, तीक्ष्ण स्वभाव, साहसिक कार्यों में रुचि, श्लोलुप, लज्जा रहित मनुष्य पिशाच प्रकृति का होता है । बराबर बाँट के न खानेवाला, आलसी, दुःख भोगने का आदी, निन्दा करने वाला, लालची, किसी को न देनेवाला मनुष्य प्रेतसत्त्व होता है । ये छे राजस शरीर हैं ॥८८-९३॥
तामसांस्तु निबोध मे ॥९४॥
दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मेषुनन्तियता ।
निराकरिणुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ॥९५॥
अनवस्थितता मौख्यं भोक्तृत्वं सलिलाथिता ।
परस्परभिमर्दश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ॥९६॥
एकस्थानरतिनित्यमाहारे केवले रतः ।
वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थवर्जितः ॥९७॥
इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा ।
मुझे तामस को सुनो । बुद्धि का दूषित होना, मन्द बुद्धि, स्वप्न में मेषुन कामना, किसी भी वस्तु का प्रतिकार न करने की इच्छा पशु के गुण हैं । अस्थिरता, मूर्खता, डरप्रोकपन, पानी की चाह, एक दूसरे से लड़ना-झगड़ना, ये मत्स्य सत्त्व के लक्षण हैं । एक ही स्थान पर बैठे रहना, सदा खाने-पीने में रत रहना, धर्म, अर्थ, काम से अलग रहना, यह वानस्पत्य सत्त्व के लक्षण हैं । इस प्रकार से ये तीन तामस प्रकृतियाँ कह दी हैं । (डल्हन ने मन्दता का अर्थ जिह्वा-कृटिलता किया है) ॥
कायानां प्रकृतीर्ज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत् ॥९८॥
महाप्रकृतयस्वेता रजःसत्त्वतमःकृताः ।
प्रोक्ता लक्षणतः सन्मभिषक् तारच विभावयेत् ॥९९॥
शरीरों की प्रकृति को समझकर उसके अनुसार चिकित्सा करें । रज, सत्त्व और तमजन्म प्रकृतियों को, महाप्रकृतियों को महाप्रकृतियाँ कहते हैं । लक्षणों से इन को भली प्रकार कह दिया, वैद्य इनको अच्छी प्रकार समझ लें ।
वि० मन्तव्य—प्रकृति का विचार करके चिकित्सा करे, देखिये च० वि० अ० ८—९६ । गर्भ का शरीर—शुक्र योगित
३१६
मुश्रुतसंहिता
[ ४०५ ]
की, काल एवं गर्भाशय की, आहार-विहार की, आकाश आदि महाभूतों की प्रकृति के अनुकूल बनता है, उक्त शुक्र आदि में जो दोष अधिक होता है उंस २ दोष का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। इस लिये मानव की वह २ प्रकृति कही जाती है और यह गर्भाधान काल से गर्भ पर अपना प्रभाव डालती है और जीवन भर एक सी बनी रहती है। पाठक लक्षणों पर ध्यान दें यहाँ प्रकृति-स्वभाव का नाम है स्वास्थ्थ का नहीं। जिन पञ्च-महाभूतों के समवाय से शरीर का निर्माण होता है। उनमें के तीन महाभूत १—वात (वायु), २—पित्त (अग्नि) तथा ३—कफ (जल) ही वस्तुतः क्रियाशील हैं। अतः वे ही सुख-दुःख या आरोग्य एवं रोग या उत्पत्ति एवं विनाश के हेतु—कारण माने जाते हैं और अन्य दो महाभूत निष्क्रिय अर्थात् १—पृथिवी नामक महाभूत केवल आधार तथा २—आकाश केवल अवकाश है। यह दोनों उन तीनों के क्रिया स्थल मात्र हैं, अतः वात, पित्त एवं कफ प्रकृतियों का विशद एवं विस्तृत वर्णन किया गया है और पार्थिव एवं नाभस् प्रकृतियों का संक्षेप में वर्णन किया है और शरीर का मनस् पर तथा मनस् का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, अतः दोनों के गुणधर्मों का वर्णन प्रकृति वर्णन में पाया जाता है। इन ५ के अतिरिक्त—ब्रह्म आदि सात्विक (सत्त्वगुण प्रधान), आसुर आदि रजस् (रजोगुण प्रधान) तथा पाशव आदि तामस (तमोगुण प्रधान) प्रकृतियों का भी वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि किसी एक मानव में उक्त प्रकृतियों में से कोई एक प्रकृति विशुद्धरूप से या पूर्णरूप से नहीं मिलती जैसे कोई रोग एक दोषज तथा कोई द्रव्य एकरस नहीं मिलता, तथापि जैसे वैद्य—रोग को वातिक, पैत्तिक तथा कफज और द्रव्य को मधुर एवं अम्ल आदि मानकर चिकित्सा करता है वैसे प्रकृतियों का भी निश्चय करे और तदनुसार चिकित्सा करे ॥८८, ८९॥
इति मुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भव्याकरणं शारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः शरीरसंख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शरीर संख्या व्याकरण शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—शरीर के अवयवों की संख्या-गणना तथा उनका व्याकरण-विशिष्ट आकार का वर्णन है जिसमें उस शारीर-शरीर विषयक अध्याय का वर्णन करेंगे ॥१, २॥
शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूच्छितं 'गर्भ' इत्युच्यते। तं चेतनावस्थितं वायुर्भिभजति, तेज एतं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी सहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धितः स यदा हस्तपादजिह्वागन्धानकर्णनितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा 'शरीर' इति संज्ञां लभते। तच्च षडङ्गं—शाखाश्चतस्रो, मध्यं पञ्चमं, षष्ठं शिर इति ॥३॥
गर्भाशय में स्थित शुक्र और आत्त्व, आत्मा प्रकृति (आठ) और विकार (सोलह) से मिलने पर गर्भ इस नाम से कहा जाता है। इस चेतनायुक्त गर्भ को वायु विभक्त करता है। तेज इसका परिपाक करता है, जल इसको नरम बनाता है, पृथ्वी इसको संगठित करती है, आकाश इसको ढकाता है। इस प्रकार बढ़ता हुआ यह गर्भ जब हाथ, पैर, जिह्वा, नासिका, कान, नितम्ब आदि अंगों से युक्त हो जाता है, तब 'शरीर' इस नाम से कहा जाता है। इस शरीर के छे अंग हैं—यथा चार शाखायें (दो बाहु दो टाँग), पाँचवाँ मध्यभाग और छठा शिर।
वक्तव्य—जिस प्रकार लैस या प्रीञ्चम में सूर्य किरणों प्रविष्ट होकर रूई या तिनकों को जला देती हैं, परन्तु किरणों का प्रवेश आँख से नहीं दीखता, अपितु जलने के कार्य से प्रतीत होता है, उसी प्रकार शुक्र और आत्त्व के मिलने पर चेतना धातु प्रविष्ट होती है। इसके अगले क्षण जीने-बढ़ने के कार्य से इस चेतना धातु का ज्ञान होता है। "शरीरं नाम चेतनाविधानभूतं पंचमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि।" चरक शा० अ० ६। तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः, तद्यथा द्वौ बाहुौ द्वे सक्षिनी, शिरोग्रीवमन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ चरक शा० अ० ७—५।
वि० मन्तव्य—गर्भ का नाम भ्रूण भी है। गर्भ ही जन्म होने पर बाल-बालक-बालिका कहा जाता है और वही आगे चलकर युवा एवं वृद्ध कहलाता है। शरीर—पञ्चमहाभूतात्मक है और उक्त प्रकार से इसके निर्माण में वे योगदान करते हैं और माता के रस से प्राप्त होते हैं, क्योंकि वह रस भी पञ्च-महाभूतात्मक होता है और इस आहार से आता है और आहार भी पञ्चभूतात्मक है। फलतः गर्भ सर्वाङ्ग सम्पन्न होने पर "शरीर" कहलाता है। इसमें जब तक आत्मा का संयोग रहता है तब तक शरीर, आत्मा का वियोग होने पर "शव" कहलाता है। मध्य—मध्यकाय, अन्तराधि या घड। शिर—ग्रीवा समेत शिर ॥३॥
अतः परं प्रत्यङ्गानि वदयन्ते—मस्तकोदरपृष्ठनाभि-ललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः; कर्णनेत्रभू-गङ्गासगण्डकक्षत्तनबद्धक्षणवृषणपार्श्वस्फिगजातुकंपरबाह्