भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 363

अ० ४ ]

शारीरस्थानम्

३१५

मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयो । महाप्रसवशक्तिस्त्वं कौवेरं कायलक्षणम् ॥८४॥ गन्धमाल्यप्रियस्त्वं च नृत्यवादिक्रामिता । विहारशीलता चैव गान्धर्वं कायलक्षणम् ॥८५॥ प्राप्तकारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाङ्गुलिः । रागमोहमदद्वेषैर्विजितो याभ्यसत्त्ववान् ॥८६॥ जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम् ।

ज्ञानविज्ञानसंपन्नमुपिसत्त्वं नरं विदुः ॥८७॥

सत्त्वादि गुण भेद से प्रकृति—ब्रह्मकाय-पवित्रता, आस्तिक्य, वेदों का स्वाध्याय, गुरुओं की पूजा, अतिथियों का सत्कार, यज्ञ करना—यह ब्रह्मकाय का लक्षण है । महान् आत्मत्व, श्रुता, निरन्तर आज्ञा करने की प्रवृत्ति, शास्त्र में बुद्धि, भृत्यों का पोषण करना, यह महेन्द्र काय का लक्षण है । शीतल पदार्थों में प्रीति, सहनशीलता, केश आदि में भूरापन, बालों में हरा रंग, मीठा बोलना यह वाक्य शरीर का चिह्न है । उदासीन वृत्ति, सहनशीलता, धन को प्राप्त करना और एक त्रित रखना, बहुत सन्तान पैदा करना यह कौवेर शरीर का लक्षण है । सुगन्ध (इत्र आदि) एवं माला में रुचि, नाच, गाने-बजाने का शौक, घूमने की इच्छा—ये गान्धर्व शरीर के लक्षण हैं । युक्ति से काम निकालनेवाला, दृढ़ता से काम को आरम्भ करनेवाला, भय-रहित, स्मृतिशाली, पवित्र, जप, व्रत, यज्ञ, ब्रह्मचर्य और अध्ययन के स्वभाव का, ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न मनुष्य को ऋषि सत्त्ववाला कहा है ।

वक्तव्य—वात प्रकृति आदि शरीर की दृष्टि से, सात्त्विक शरीर आदि मन की दृष्टि से कहे हैं । इसी से चरक में कहा है—“त्रिविधं खलु सत्त्वं शुद्धं राजसं तामसमिति । शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरम् । तस्मात् कतिचित्सत्त्वमे दानुक्रामिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुष्याख्यास्यामः ।” चरक शा० अ० ४।३७।८१-८७॥

समैते सात्त्विकाः काया राजसांस्तु निबोध मे ।

ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम् ॥८८॥

एकाग्रिन् चौदरिकमासुरं सत्त्वमौहम् ।

तीक्ष्णमायासिन् भीरुं चण्डं मायान्वितं तथा ॥८९॥

विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ।

विबुद्धकामसेवी चाप्यजघाहार एव च ॥९०॥

अमषणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् ।

एकाग्रतप्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाहता ॥९१॥

भुगमात्रं तमश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ।

उच्छिष्टहारता तैहृण्यं साहसप्रियता तथा ॥९२॥

श्लोलुपत्त्वं नैलज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ।

असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् ॥९३॥

लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् ।

षडैते राजसः कायाः,

ये सात सात्त्विक शरीर हैं । राजस प्रकृतियों को सुनो—ऐश्वर्यशाली, रौद्र, शूर, क्रोधी, निन्दा करनेवाला, अकेला ही खानेवाला, पेद्रू (बहुत खानेवाला) आसुर प्रकृति होता है । तीक्ष्ण परिश्रमी, डरप्रोक, क्रोधी, लुली, घूमने तथा खाने में चपल मनुष्य सर्प सत्त्व है । अतिशय विषयसेवी, निरन्तर खाने का ही विचार करनेवाला, असहनशील, अस्थिर मनवाला मनुष्य शाकुन (पक्षी) स्वभाव का है । एकाग्रता में रहनेवाला, रौद्र, निन्दा करने वाला, धर्म के विरुद्ध बरतनेवाला, अतिशय तमोगुणी मनुष्य राक्षस-प्रकृति का है । लूटा खानेवाला, तीक्ष्ण स्वभाव, साहसिक कार्यों में रुचि, श्लोलुप, लज्जा रहित मनुष्य पिशाच प्रकृति का होता है । बराबर बाँट के न खानेवाला, आलसी, दुःख भोगने का आदी, निन्दा करने वाला, लालची, किसी को न देनेवाला मनुष्य प्रेतसत्त्व होता है । ये छे राजस शरीर हैं ॥८८-९३॥

तामसांस्तु निबोध मे ॥९४॥

दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मेषुनन्तियता ।

निराकरिणुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ॥९५॥

अनवस्थितता मौख्यं भोक्तृत्वं सलिलाथिता ।

परस्परभिमर्दश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ॥९६॥

एकस्थानरतिनित्यमाहारे केवले रतः ।

वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थवर्जितः ॥९७॥

इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा ।

मुझे तामस को सुनो । बुद्धि का दूषित होना, मन्द बुद्धि, स्वप्न में मेषुन कामना, किसी भी वस्तु का प्रतिकार न करने की इच्छा पशु के गुण हैं । अस्थिरता, मूर्खता, डरप्रोकपन, पानी की चाह, एक दूसरे से लड़ना-झगड़ना, ये मत्स्य सत्त्व के लक्षण हैं । एक ही स्थान पर बैठे रहना, सदा खाने-पीने में रत रहना, धर्म, अर्थ, काम से अलग रहना, यह वानस्पत्य सत्त्व के लक्षण हैं । इस प्रकार से ये तीन तामस प्रकृतियाँ कह दी हैं । (डल्हन ने मन्दता का अर्थ जिह्वा-कृटिलता किया है) ॥

कायानां प्रकृतीर्ज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत् ॥९८॥

महाप्रकृतयस्वेता रजःसत्त्वतमःकृताः ।

प्रोक्ता लक्षणतः सन्मभिषक् तारच विभावयेत् ॥९९॥

शरीरों की प्रकृति को समझकर उसके अनुसार चिकित्सा करें । रज, सत्त्व और तमजन्म प्रकृतियों को, महाप्रकृतियों को महाप्रकृतियाँ कहते हैं । लक्षणों से इन को भली प्रकार कह दिया, वैद्य इनको अच्छी प्रकार समझ लें ।

वि० मन्तव्य—प्रकृति का विचार करके चिकित्सा करे, देखिये च० वि० अ० ८—९६ । गर्भ का शरीर—शुक्र योगित