सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६
मुश्रुतसंहिता
[ ४०५ ]
की, काल एवं गर्भाशय की, आहार-विहार की, आकाश आदि महाभूतों की प्रकृति के अनुकूल बनता है, उक्त शुक्र आदि में जो दोष अधिक होता है उंस २ दोष का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। इस लिये मानव की वह २ प्रकृति कही जाती है और यह गर्भाधान काल से गर्भ पर अपना प्रभाव डालती है और जीवन भर एक सी बनी रहती है। पाठक लक्षणों पर ध्यान दें यहाँ प्रकृति-स्वभाव का नाम है स्वास्थ्थ का नहीं। जिन पञ्च-महाभूतों के समवाय से शरीर का निर्माण होता है। उनमें के तीन महाभूत १—वात (वायु), २—पित्त (अग्नि) तथा ३—कफ (जल) ही वस्तुतः क्रियाशील हैं। अतः वे ही सुख-दुःख या आरोग्य एवं रोग या उत्पत्ति एवं विनाश के हेतु—कारण माने जाते हैं और अन्य दो महाभूत निष्क्रिय अर्थात् १—पृथिवी नामक महाभूत केवल आधार तथा २—आकाश केवल अवकाश है। यह दोनों उन तीनों के क्रिया स्थल मात्र हैं, अतः वात, पित्त एवं कफ प्रकृतियों का विशद एवं विस्तृत वर्णन किया गया है और पार्थिव एवं नाभस् प्रकृतियों का संक्षेप में वर्णन किया है और शरीर का मनस् पर तथा मनस् का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, अतः दोनों के गुणधर्मों का वर्णन प्रकृति वर्णन में पाया जाता है। इन ५ के अतिरिक्त—ब्रह्म आदि सात्विक (सत्त्वगुण प्रधान), आसुर आदि रजस् (रजोगुण प्रधान) तथा पाशव आदि तामस (तमोगुण प्रधान) प्रकृतियों का भी वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि किसी एक मानव में उक्त प्रकृतियों में से कोई एक प्रकृति विशुद्धरूप से या पूर्णरूप से नहीं मिलती जैसे कोई रोग एक दोषज तथा कोई द्रव्य एकरस नहीं मिलता, तथापि जैसे वैद्य—रोग को वातिक, पैत्तिक तथा कफज और द्रव्य को मधुर एवं अम्ल आदि मानकर चिकित्सा करता है वैसे प्रकृतियों का भी निश्चय करे और तदनुसार चिकित्सा करे ॥८८, ८९॥
इति मुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भव्याकरणं शारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः शरीरसंख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शरीर संख्या व्याकरण शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—शरीर के अवयवों की संख्या-गणना तथा उनका व्याकरण-विशिष्ट आकार का वर्णन है जिसमें उस शारीर-शरीर विषयक अध्याय का वर्णन करेंगे ॥१, २॥
शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूच्छितं 'गर्भ' इत्युच्यते। तं चेतनावस्थितं वायुर्भिभजति, तेज एतं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी सहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धितः स यदा हस्तपादजिह्वागन्धानकर्णनितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा 'शरीर' इति संज्ञां लभते। तच्च षडङ्गं—शाखाश्चतस्रो, मध्यं पञ्चमं, षष्ठं शिर इति ॥३॥
गर्भाशय में स्थित शुक्र और आत्त्व, आत्मा प्रकृति (आठ) और विकार (सोलह) से मिलने पर गर्भ इस नाम से कहा जाता है। इस चेतनायुक्त गर्भ को वायु विभक्त करता है। तेज इसका परिपाक करता है, जल इसको नरम बनाता है, पृथ्वी इसको संगठित करती है, आकाश इसको ढकाता है। इस प्रकार बढ़ता हुआ यह गर्भ जब हाथ, पैर, जिह्वा, नासिका, कान, नितम्ब आदि अंगों से युक्त हो जाता है, तब 'शरीर' इस नाम से कहा जाता है। इस शरीर के छे अंग हैं—यथा चार शाखायें (दो बाहु दो टाँग), पाँचवाँ मध्यभाग और छठा शिर।
वक्तव्य—जिस प्रकार लैस या प्रीञ्चम में सूर्य किरणों प्रविष्ट होकर रूई या तिनकों को जला देती हैं, परन्तु किरणों का प्रवेश आँख से नहीं दीखता, अपितु जलने के कार्य से प्रतीत होता है, उसी प्रकार शुक्र और आत्त्व के मिलने पर चेतना धातु प्रविष्ट होती है। इसके अगले क्षण जीने-बढ़ने के कार्य से इस चेतना धातु का ज्ञान होता है। "शरीरं नाम चेतनाविधानभूतं पंचमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि।" चरक शा० अ० ६। तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः, तद्यथा द्वौ बाहुौ द्वे सक्षिनी, शिरोग्रीवमन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ चरक शा० अ० ७—५।
वि० मन्तव्य—गर्भ का नाम भ्रूण भी है। गर्भ ही जन्म होने पर बाल-बालक-बालिका कहा जाता है और वही आगे चलकर युवा एवं वृद्ध कहलाता है। शरीर—पञ्चमहाभूतात्मक है और उक्त प्रकार से इसके निर्माण में वे योगदान करते हैं और माता के रस से प्राप्त होते हैं, क्योंकि वह रस भी पञ्च-महाभूतात्मक होता है और इस आहार से आता है और आहार भी पञ्चभूतात्मक है। फलतः गर्भ सर्वाङ्ग सम्पन्न होने पर "शरीर" कहलाता है। इसमें जब तक आत्मा का संयोग रहता है तब तक शरीर, आत्मा का वियोग होने पर "शव" कहलाता है। मध्य—मध्यकाय, अन्तराधि या घड। शिर—ग्रीवा समेत शिर ॥३॥
अतः परं प्रत्यङ्गानि वदयन्ते—मस्तकोदरपृष्ठनाभि-ललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः; कर्णनेत्रभू-गङ्गासगण्डकक्षत्तनबद्धक्षणवृषणपार्श्वस्फिगजातुकंपरबाह्