सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअं ५]
शारोस्थानम्
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रुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्कुल्यः, स्रोतांसि बद्ध्य माणानि, एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः ॥४॥
इसके आगे प्रत्यंग कहे जाते हैं । मस्तक, उदर, पीठ, नाभि, ललाट, नासा, चिबुक, वस्ति, श्रीवा ये एक-एक हैं । कान, आँख, भू, शंख, अंस, गण्ड, कक्ष, स्तन, वंक्षण, वृषण, पार्व, नितम्ब, जानु, कोहनी, वाहु, ऊरु, आदि ये दो दो हैं । अँगुलियाँ बीस हैं, स्रोत कहे जायेंगे, यह प्रत्यङ्गों का विभाग है । (आदि शब्द से—ओठ, कुकुन्दर, सृक्कि आदि लेने चाहिये) ।
वि० मन्तव्य—प्रत्यङ्ग—जो अंग के भी अङ्ग या अंग पर अङ्ग हैं ॥४॥
तस्य पुनः संस्थानं—स्वचः कला धातवो मला दोषा यकृतस्त्रीहानौ फुफ्फुस उण्डुको हृदयमाशया अन्त्राणि वृक्को स्रोतांसि कण्डरा जालानि कूर्चो रज्ज्वः सेवन्यः सङ्घाताः सीमन्ता अस्थीनि सन्धयः स्नायवः पेश्यो सर्मीणि शिरा धमन्यो योगवहानि स्रोतांसि च ॥५॥
इनकी अब गिनती करते हैं, स्वचा, कला, धातु, मल, दोष, यकृत, स्त्रीह, फुफ्फुस, उण्डुक, हृदय, आमाशय, अन्त्र, वृक्क, स्रोत, कण्डरा, जाल, कूर्च, रज्ज्व, सेवनी, संघात, सीमन्त, अस्थियाँ, सन्धि, स्नायु, पेशी, सर्म शिरा, धमनी और योगवाही स्रोत (प्राण, उदक अन्न आदि के बाहक) ।
वि० मन्तव्य—इन सब के समूह का नाम “शरीर” है ॥
स्वचः सम, कलाः सम, आशयाः सम, धातवः सम, सम शिराशतानि, पञ्च पेशीशतानि, नव स्नायुशतानि, त्रीण्यस्थिराशतानि, द्वे दग्धोत्तरे संधिशतै, समोत्तरे सर्मशतं, चतुर्विंशतिधर्मन्यः, त्रयो दोषाः, त्रयो मलाः, नव स्रोतांसि, (पोडश कण्डराः, पोडश जालानि, षट् कूर्चाः, चतस्र रज्जवः, सम सेवन्यः चतुर्दश सङ्घाताः, चतुर्दश सीमन्ताः द्वाविंशतियोगवहानि स्रोतांसि, द्विकान्यन्त्राणि) चेति, समासः ॥६॥
स्वचार्य सत हैं, कला सत हैं, आशय सत हैं, धातु सत हैं, शिरायें सत सौ हैं । पेशी पाँच सौ हैं, स्नायु नौ सौ हैं, अस्थियाँ तीन सौ हैं, संधियाँ दो सौ दस हैं, सर्म एक सौ सत हैं, धमनियाँ चौबीस हैं, दोष तीन हैं, मल तीन हैं, स्रोत नौ हैं, कण्डरायें सोलह हैं, जालक सोलह हैं, कूर्च छै हैं, रज्ज्व चार हैं, सेवनी सत हैं, संघात चौदह हैं, सीमन्त चौदह हैं, योगवाहि स्रोत बाईस हैं, आँतें दो हैं । ये संक्षेप में हैं ।
वक्तव्य—सेवनी (सीवन)—जैसी कमीजों में दर्जा देते हैं । कूर्च—बाइन की कुर्बा जैसे । संघात—मिलना । सीमन्त—जैसे
औरतें शिर में मांग निकालती हैं । जालक—मछली पकड़ने के जाल की भाँति ॥६॥
विस्तारोऽत ऊर्ध्व—स्वचोऽभिहितः कला धातवो मला दोषा यकृतस्त्रीहानौ फुफ्फुस उण्डुको हृदय वृक्को च ॥
इसके आगे विस्तार से कहते हैं—स्वचार्य, कला, धातु, मल, दोष, यकृत, स्त्रीह, फुफ्फुस, उण्डुक, हृदय और वृक्क इनको पहले कह चुके हैं ॥७॥
आशयास्तु-वाताशयः, पिताशयः, श्लेष्माशयः, रक्ताशयः, आमाशयः, पक्वाशयः, मूत्राशयः, स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति ॥८॥
आशय-वाताशय, पिताशय, श्लेष्माशय, रक्ताशय, आमाशय, पक्वाशय, मूत्राशय ये सात हैं । स्त्रियों में आठवाँ गर्भाशय भी है ।
वि० मन्तव्य—वाताशय फुफ्फुस है, उसमें सर्वदा वायु भरा रहता है । श्वास क्रिया में जितना वायु भीतर जाता है उतना निकल जाता है । पिताशय—पित्त-द्रव पित्त का आशय—यह मांस एवं सौत्रिक तन्तु से निर्मित एक थैली है जो यकृत के नीचे के पृष्ठ के एक गड्ढे में रहती है । इसकी आकृति नासपाती जैसी होती है...इससे एक नली निकलती है...जब भोजन अन्त्र में होता है तब उसके द्वारा पित्तरस भोजन में जा पहुँचता है । जब भोजन पचाने की आवश्यकता नहीं होती, तब पित्तरस उसी थैली में ठहरता है । श्लेष्माशय—उरश्या कला का पर्याशय भाग—इस कला के दो स्तर हैं । यह दोनों कला फुफ्फुस को लपेटे अपनी गोद में लिप रहती हैं, श्वास लेने पर फुफ्फुस में वायु भरने से फूलने पर दोनों स्तर समीप आ जाते हैं और श्वास निकालने पर—फुफ्फुस संकुचित होने से अधिक दूर हो जाते हैं और लम्बी, चौड़ी तथा दोनों ओर से बन्द थैली (आशय) के समान है, दोनों स्तरों के भीतर लसीका (श्लेष्मा) रहती है यही बढ़कर “उरस्तोय” नामक रोग का रूप धारण कर लेती (देवें प्रत्यक्ष शा० आशयखण्ड) शार्ङ्गधर संहिता में श्लेष्माशय का स्थान उरस् माना भी है । रक्ताशय—हृदय है—रक्त का नाम शोणित है, अर्थ है चलने वाला—रक्त सर्वदा चलता ही रहता है, परन्तु कुछ समय के लिये हृदय में ठहरता है और ठहर कर पुनः चल पड़ता है । अतः वह आशय कहा गया है देखिये अ० ४ का सू० ३१ । आमाशय—खा लेने पर आहार आमाशय में ठहरता है, कुछ समय के पश्चात् अन्त्र में जाना प्रारम्भ करता है । पक्वाशय—पक्वस्थजातपाकस्थ आहारस्थ आशयः, अर्थात् मलाशय, अन्त्र में तो आहार चलता ही रहता है ठहरता नहीं है, ठहरता है तो मलाशय में जाकर ठहरता, अतः अन्त्र—तुलान्त्र को आशय नहीं माना जाता और न मानना ही चाहिये । मूत्रा-