भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ४ ]

मध्यम आयु का होता है। यह मनुष्य बुद्धिशाली, चतुर-अकल-वाला, जबरदस्त बोलनेवाला, तेजस्वी, सभाओं में न हारने-वाला होता है। सोते हुए स्वर्ण, टाक, अमलताप, अग्नि, विद्युत्, उत्काषात् को देखता है। भय से किसी के आगे नहीं झुकता, न झुकनेवालों के लिये कठोर, झुकनेवालों के लिये सान्त्वना दान देने की प्रकृति का, इसकी गति सदा चंचल रहती है। इस प्रकार का मनुष्य पित्तप्रकृति होता है। (साँप उलूद गन्धर्व-यक्ष विही वन्दर, व्याघ्र-रीछ-नकुल के स्वभाववाले पित्तप्रकृति के मनुष्य होते हैं) ॥७१॥

श्लेषप्रकृतिस्तु दुर्बन्धोवरति विश्विशाद्रीष्टिकरकाण्डा-नामन्यतमवर्णः सुभगः प्रियदर्शनी मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलबाधिरम्राही दृढवैरश्च भवति ॥७२॥

शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलालिनीलकेशो लक्ष्मीवान् जठदुष्कृसिंहवोधः । सुप्तः सन् सकमलहंसचक्रवाकान् सपश्येदपि च जलाशयान् मनोज्ञान् ॥७३॥

रक्तान्तेनैः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सन्धगुणोपपन्नः । कलेशस्मो मानयिता गुरुणां ज्ञेयो बलासप्रकृतिमंजुष्यः ॥७४॥

(दृढगाव्रमति स्थिरमित्रधनः परिगण्य चिरात् प्रददाति बहु । परिनिश्चितवाक्यपदः सततं

गुरुमानकश्य भवेत् स सदा ॥७५॥

ब्रह्मरुद्रवर्णः सिंहाङ्गजगोवृषैः । तार्क्यहंससमानूकाः श्लेषप्रकृतयो नराः ॥७६॥

कफ प्रकृति के मनुष्य श्वेत दुर्वा-नीलाकमल-तलवार, गीला अरीटा, शरकाण्डे का काण्ड, इनमें से किसी एक के समान वर्णवाले, देखने में सुन्दर (भाग्यवान्), प्रिय दर्शन, मधुर रस को चाहनेवाले, कृतज्ञ, धैर्यशाली, सहनशील, लोभरहित, बलवान्, देर में समझनेवाले (देर में निर्णय करनेवाले), और दृढवैरवाले होते हैं। इनकी आँखें श्वेत रहती हैं, बाल दृढ़ धृष्टवाले, भ्रमर के समान नीलवर्ण होते हैं। मनुष्य लक्ष्मीशाली, इसकी आवाज बादल, मृदंग या सिंद् की गर्जना की भाँति गम्भीर होती है। सोते हुए कमल, हंस, चक्रवाक एवं सुन्दर जलाशयों को देखता है। आँखें किनारों से छाल, अंगों की रचना पृथक् पृथक्, स्निग्ध कान्तिवाला, सन्धगुण से युक्त, क्लेश को सहनेवाला, गुरुओं का आदर करनेवाला मनुष्य कफ प्रकृति का होता है। इसका शाख शान दृढ होता है, मित्र और धन स्थिर रहते हैं। बहुत विचारकर, देर में बहुत देता

है। इसके वाक्य-पद (बोलने की भाषा) सदा नियमित रहते हैं। यह व्यक्ति सदा ही गुरुओं का आदर करता है। इसका स्वभाव ब्रह्म-इन्द्र-वरुण, सिंद्, घोड़ा, हाथी, गाय, वैल, राक्ष, हंस के समान होता है ॥७२-७६॥

द्रव्योर्वा तिसृणां वाऽपि प्रकृतीनां तु लक्षणेः । ज्ञात्वा संसगजा वैद्यः प्रकृतीरभित्तिदिशेत् ॥७७॥ वैद्य दो या तीन दोषों के मिलित लक्षणों से संसर्ग प्रकृतियों को समझे ॥७७॥

प्रकोपो वाऽन्यथाभावो क्षयो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥७८॥ स्वभाव से ही प्रकृतियों का प्रकोप (बहुत बढ़ना), अथवा बदल जाना या घट जाना नहीं होता (ये स्वस्थ अवस्था में नहीं होते), अपितु ये तब होते हैं जब मनुष्य मरनेवाले होते हैं। वक्तव्य—चरक में—शीलं व्यावर्त्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्त्तते । चरक ॥ ३० ॥ १२।४६ ॥७८॥

विषजातो यथा कीटो न विषेण विषद्यते । तद्वत्प्रकृत्यो मर्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ॥७९॥ विष से उत्पन्न कीड़ा जिस प्रकार विष से नहीं मरता, उसी प्रकार ये प्रकृतियाँ मनुष्य को किसी प्रकार का कष्ट नहीं करातीं। इसी से कहा है चरक में—

“त्रयस्तु पुरुषा भवन्ति आतुराः, ते त्वनातुराः तंवांनतुरा-याणां भिषजाम् । तद्यथा वातलः, पित्तलः, श्लेषमलक्षेति ॥” चरक ॥ ३० ॥ ६ ॥

समपित्तानिलकफाः केचिद् गर्भादि मानवाः । दृश्यन्ते वातलाः केचिद् पित्तलाः श्लेषमलास्तथा ॥ तेषामनातुराः पूर्वा वातलाद्याः सदातुराः । दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिकल्प्यते ॥ चरक ॥७९॥

प्रकृतिमिह नराणां भौतिकीं केचिदाहुः पवनदहनतोयैः कीर्तितास्तास्तु तिस्रः ।

स्थिरविपुलशरीरः पार्थिवश्च क्षमाबाव- शुचिरथ चिरजीवी नाभसः स्वैर्महद्भिः ॥८०॥ कोई आचार्य मनुष्यों की प्रकृति को पंचमहाभूतवाली कहते हैं। इनमें से वायु, अग्नि और जल की प्रकृतियाँ बल, पित्त, कफ से कह दी हैं। पार्थिव प्रकृति का मनुष्य स्थिर, बड़े शरीर का और क्षमाशील होता है। आकाश प्रकृति का मनुष्य पवित्र, दीर्घायु और इसके कान, नाक के छेद (अंग) बड़े होते हैं ॥८०॥

शौचमास्त्रिकयमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् । प्रियातिथिर्वसिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ॥८१॥ माहात्म्यं शौचमाज्ञा च सततं शास्त्रबुद्धिता । श्रुत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ॥८२॥ शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्कल्य हरिकेगता । प्रियबादिर्विमिश्येतद्धारुणं कायलक्षणम् ॥८३॥