भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४] ४०

शारीरस्थानम्

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होते हुए गम का सर्व प्रथम "नाभि" नामक अवयव बनता है—पूर्ण नाभि नहीं, नाभि का पूर्वरूप बनता है, वही से देही का देह बढ़ता है यही इन श्लोकों में भी कहा गया है—इन नाभि में ज्योति—अग्नि का स्थान है, जो उस आगत रस का उचित परिपाक करता रहता है। इसके साथ वायु मिलकर आगे २ श्लोकों का दारण करता जाता है और उक्त अग्नि उनका पाक करता है। फलतः दारण होने पर भी रस का अनुचित प्रवहण नहीं होता और रस को मार्ग मिलता जाता है, देह बढ़ता जाता है। वह सौंदर्य का सा शुक्र-शोणित का मिश्रणकर एक दिन करारविन्द से पदारविन्द को मुखारविन्द में धरते हुए बालमुकुन्द का रूप धारण कर लेता है, जो वटपत्र के दोनों के आकारवाले गर्भाशय में शयन करता है। च० वि० अ० ५ में कुछ आचार्यों ने श्लोकों के समुदाय को ही पुष्प—प्राणी माना है। यही उक्त दो श्लोकों में कहा गया है।

दृष्टिष्व रोमकृपाश्च न वर्धन्ते कदाचन ।

ध्रुवाण्येतानि मर्त्योनामिति धन्वन्तरैमतम् ॥६०॥

मनुष्य की दृष्टि और रोमकृपा कभी भी नहीं बढ़ते। ये दोनों वस्तुएँ ध्रुव (स्थिर) हैं, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥६०॥

शरीरे क्षौयमाणेऽपि वर्धते द्राविषौ सदा ।

स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ॥६१॥

शरीर के क्षौण होने पर भी नख और केश-स्वभाव एवं प्रकृति के कारण सदा ही बढ़ते रहते हैं ॥६१॥

सप्त प्रकृतयो भवन्ति—दोषैः पृथक् द्विशः, समस्तैश्च ॥

प्रकृतियाँ सात प्रकार की हैं—पृथक्-पृथक् दोषों से दो दोषों के मिलने से, और सब दोषों के मिलने से, सात प्रकृतियाँ बनती हैं ॥६२॥

शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेदोष उरुक्तः ॥

प्रकृतिजोयते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ॥६३॥

शुक्र और आर्त्तव के मिलने के समय जो दोष प्रबल होता है, उस दोष से प्रकृति उत्पन्न होती है, उस प्रकृति के लक्षणों को मुझसे सुनो।

वक्तव्य —“समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः ।

यतः प्रकृतिश्चारीर्यम्, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः । सा चेष्ट-रूपा । तस्माद् भवन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । ननु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः, श्लेष्मप्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोषश्च हि आधिक्यभावात्सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम्, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नेताः प्रकृतयः सन्ति । सन्ति खलु वातलाः, पित्तलाः, श्लेष्मलाश्चाऽप्रकृतिस्था-लु ते ज्ञेयाः ॥” चरक वि० अ० ६ ॥६३॥

तत्र वातप्रकृतिः प्रजागरुकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्स्यजंयायौ गन्धर्वचित्रः स्फुटितकरचरणोऽल्परुक्षश्चरमश्रु नखकेशः क्राथी दन्तखादी च भवति ॥६४॥

इसमें वातप्रकृति मनुष्य जागनेवाला (रात में नींद कम आती है), शीत से द्रव करनेवाला, देखने में कुरुर, चौर, द्रव बुद्धिवाला, अनार्य, गन्धर्वचित्र (इधर उधर घूमने के मन का) हाथ-पर फटे हुए, शमश्रु-नख और केश, छोटे एवं रूक्ष, क्राथि (हिंसाशील) सौते हुए दांतों को कटकटानेवाला होता है। (क्राथी के स्थान पर क्रोधी भी पाठ है) ॥६४॥

अधुतिरट्टसौहृदः कृतघ्नः क्रुशपरुषो धमनोतः प्रलापी । द्रुतगतिरटनोऽनवस्थितात्मा वियति च गच्छति संभ्रमेण सुप्तः ॥६५॥

अठ्यवस्थितमतिश्वलट्टध्रिर्मन्दरन्धनसंचयमित्रः ।

किंचिदेव विलपत्यनिबद्धं मासृतप्रकृतिरेष मनुष्यः ॥६६॥

(वातिकाइवाजगोमायुग्माशस्त्रं ध्रुवनां तथा ।

गुध्रकाकखरादीनामनूकैः कीर्तिता नराः ॥६७॥)

वातप्रकृति मनुष्य धैर्य रहित, कच्ची मित्रतावाला, कृतघ्न, क्रुश, कठोर धमनियाँ (शिरायें) दीखती हैं, बहुत बोलनेवाला, जल्दी चलनेवाला, इधर उधर घूमने के स्वभाव का, अस्थिर चित्त होता है। सौते हुए एकदम से आकाश में जाता है (खाड़ी न्यर्थ की कल्पना करता है—आकाश में हवाई महल बनाता रहता है)। अस्थिर बुद्धि, चंचलदृष्टि, इसके रत्न, धन-संचय और मित्र कम होते हैं, कुछ न कुछ बिना मतलब और बिना प्रसंग के बोलता रहता है, ऐसा मनुष्य वातप्रकृति होता है। (वातप्रकृति का मनुष्य बकरी, गौदड़, खरगोश, चूहा, ऊंट, कुत्ता, गीध, कौआ, गधे के स्वभाववाला होता है) ॥६७॥

पित्तप्रकृतिस्तु स्वेदनां दुर्गन्धः पीतशिलिहाङ्गस्ताम्रनखनयन्तालुजिह्वाघ्राणिपादतलो दुर्भगो वलौपलितस्वालि-त्यजुष्टो बहुमुगुणद्वेषी क्षिप्रकोपप्रसादो मध्यबलो मध्या-युश्च भवति ॥६८॥

मेधावी निपुणमतिर्विगुह्य वक्ता तेजस्वी समितिषु दुर्निवारवीर्यः । सुप्तः सन् कनकपलागकर्णिकारात् संपश्येदपि च हुताशविद्युत्तुकाः ॥६९॥

न भयात् प्रणमेदन्तेष्वमुदुः

प्रणतेष्वपि सान्त्वनदानरुचिः ।

भवतीह सदा व्यथितास्यागतः

स भवेदिह पित्तकृतप्रकृतिः ॥७०॥

(मुजङ्कोल्लुङ्गन्धवयक्षमाजैरवानरैः ।

न्याघ्रक्षन्तकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराः स्मृताः ॥७१॥)

पित्तप्रकृति मनुष्य को पसीना बहुत आता है, शरीर से दुर्गन्ध आती है, इसके अंग पीले और ढीले रहते हैं। नख-आँख-तालु जिह्वा-ओष्ठ-पैर हाथ के तलुए ताम्रवर्ण, देखने में बहुत सुन्दर नहीं (योद्धा भाग्यवान्), ह्र्दिर्ग्राह्य, बालों का श्वेत होना, बालों का गिरना, बहुत खानेवाला, उष्ण से द्रव रखनेवाला, जल्दी कुपित एवं प्रसन्न होनेवाला, मध्यम बल और