सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
कफ, मेद और विष से पीड़ित मनुष्यों को रात में जागना हितकारी है ।
द्विवास्वप्नश्च तृट्शूलहिक्राजोर्णितिसारिणाम् ॥४२॥ प्लास, शूल, हिका, अजीर्ण और अतिसार के रोगियों को दिन में सोना हितकारी है ॥ ४२ ॥
इन्द्रियार्थेष्वसंग्रासिगौरवं जूम्भणं कलमः ।
निद्रातस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ ४९ ॥
तन्द्रा—इन्द्रियों के विषयों की अप्राप्ति, भारीपन, जम्माई आना, कलम, नींद से पीड़ित मनुष्य के समान (हाथ पैर टूटना, मोड़ना) जिसकी चेष्टायें हों, उसको तन्द्रा समझना चाहिये ॥ ४९ ॥
पीतवैकमनिलोच्चासमुद्देश्व विवृताननः ।
यं मुखति सनेत्रास्वं स जूम्भ इति संज्ञितः ॥ ५० ॥
मुख को खोलकर वायु का एक उच्छ्वास (बूँट) पीकर, हाथों को और शरीर को ऐंटता (मोड़ता) हुआ जिस वायु को मुख से नेत्रों में आँसुओं के साथ बाहर करता है, उसे जम्माई कहते हैं ।
वक्तव्य—छौंक का लक्षण—“प्राणोदानौ समो स्यातां मूर्धनं खोतःपथि स्थितौ । नस्तः प्रवर्तते शब्दः क्षवथुं तं विनिर्दिशेत्” ॥ ५० ॥
योऽनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।
कलमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रवाधकः ॥ ५१ ॥
जो यकान बिना किसी मेहनत के, बिना किसी श्वास की गति के बंदे, उत्पन्न होती है, उसको कलम कहते हैं । यह इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में रुकावट उत्पन्न करता है ॥
मुखस्पर्शप्रसङ्गिरवं दुःखद्वेषणलोत्ता ।
शक्तस्य चाप्यनुत्साहः कर्मस्वालयमुच्यते ॥ ५२ ॥
मुख स्पर्श की चाह, दुःख के कारणों से बचने की लालसा, सामर्थ्य होने पर भी कार्य करने में उत्साह का न होना आलस्य कहा जाता है ॥ ५२ ॥
उत्किलदयान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकघोषनेरितम् ।
हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्कलं विनिर्दिशेत् ॥ ५३ ॥
वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्देश्व भ्रमः ।
न चान्नमभिकाङ्क्षते ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत् ॥ ५४ ॥
मुख में पानी आने एवं थूक से प्रेरित हुआ अन्न उत्कले-शित (बाहर आने की प्रवृत्ति का) होकर, न निकले हृदय पर (आमाशयिक प्रदेश पर) दबाव प्रतीत हो, उसे उत्कलेश कहना चाहिये । मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंटन, चक्कर आना, अन्न में रुचि न होना, इसको ग्लानि कहना चाहिये ॥ ५३, ५४ ॥
आर्द्रवर्मावनद्वं वा यो गात्रं मन्यते नरः ।
तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद्विनिर्दिशेत् ॥ ५५ ॥
जो मनुष्य शरीर को गीले चमड़े से जकड़ा हुआ सा मानता है, तथा शिर में बहुत भारीपन अनुभव करता हो, उसे गौरव कहना चाहिये ॥ ५५ ॥
मूच्छां पित्ततमः प्राया, रजःपित्तानिलाद् भ्रमः ।
तमोबातकफातन्द्रा, निद्रा श्लेष्मतमोभवः ॥ ५६ ॥
प्रायः करके मूच्छा में पित्त-तम की अधिकता रहती है, भ्रम, रजोगुण, पित्त और वायु से होती है । तन्द्रा तमोगुण वायु और कफ से होती है । निद्रा-कफ और तम से उत्पन्न होती है ।
गर्भस्य खलु रसनिमित्ता साहात्माधमाननिमित्ता च परिवृद्धिर्भवति ॥ ५७ ॥
गर्भ की वृद्धि-अन्न रस के कारण से और वायु के आध्मान (फूलने) से होती है ।
वि० मन्तव्य—गर्भाधान होते ही जो शुक्रशोणित के मिश्रण में स्फुरण होता है, (देखिये शा० अ० २ सू० १३) वह वायु का आध्मान—फूलाना ही है । इससे शुक्र शोणित का मिश्रण फूलता है और उसमें रस प्रविष्ट हो जाता है । फलतः आध्मान होते २ और आध्मात-अवकाश में रस का प्रवेश होते २ गर्भ की परि—सब प्रकार या उचित प्रकार से वृद्धि होती जाती है । यह रस—रसमय रक्त माता से मिलता रहता है । इसीका स्पष्टीकरण निम्न श्लोकों में किया गया है ॥ ५७ ॥
भवन्ति चात्र—
तस्यान्तरेण नाभेस्तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् ।
तदाधमति वातस्तु देहस्तेनास्य वधते ॥ ५८ ॥
ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य साहतः ।
ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्छ स्रोतांस्थपि यथा तथा ॥ ५९ ॥
इसमें श्लोक भी हैं—गर्भ की नाभि के बीच में ज्योति-स्थान (अग्निस्थान) है । इस स्थान को वायु फूँकती है, इससे इस गर्भ का शरीर बढ़ता है, उष्म (पित्त) के साथ मिली वायु इस गर्भ के ऊपर, तिरछे और नीचे गये स्रोतों को खोलती है । इससे भी यह बढ़ता है ।
वक्तव्य यहाँ पर यह स्मरण रखना चाहिये कि गर्भ में सारा काम यकृत को ही करना पड़ता है । गर्भ का हृदय फेफड़े बिल्कुल काम नहीं करते । इनको काम भोजन पवाने का काम यकृत ही करता रहता है । इसीसे यह बढ़ा भी होता है । जो पीछे घटता जाता है । यही यकृत आयुर्वेद में पित्त (अग्नि) का स्थान है । इस पित्त को ले जानेवाला, गति देनेवाला वायु है । इस पित्त के कारण पाचन ठीक होने से गर्भ के सब अङ्ग-प्रत्यङ्ग बढ़ते हैं ।
वि० मन्तव्य—यह दोनों श्लोक पाराशर्य महर्षि के प्रतीत होते हैं—आपने अध्याय ४ सू० ३२ में—कहा है कि उत्पन्न