भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४ ]

शारीरस्थानम्

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सोना निषिद्ध नहीं है। अपवाद—प्रतिषेध में भी बालक, बूढ़, स्त्री सेवन से क्रुश, उरःक्षत रोगी, क्षीण, मद्यपान करने वाले, वाहन (चोड़े आदि की सवारी), यान (रथ रेल आदि), मुसाफिरी या मेहनत के कारण थके, भोजन न करनेवाले, मेद-स्वेद-कफ-रक्त-रस से क्षीण हुए, अजीर्ण रोगियों के लिये मुहूर्त भर (थोड़ी देर) सोना विषेध है। जिन्होंने रात में जागरण किया हो, वे भी रात्रि जागरण से आधे समय तक दिन में सो सकते हैं। दिन में सोना एक विकार है। दिन में सोने से अधर्म होता है। सप्त दोषों का प्रकोप होता है। दोषों के प्रकोप से कास, श्वास, प्रतिश्याय, सिर में भारीपन, अङ्गों का दृटना, अरोचक, ज्वर, अग्नि दुर्बलता होती है। रात में भी जागने से वात-पित्तजन्म बही कास, श्वास आदि उपद्रव होते हैं ॥३२॥

भवन्ति चात्र—

तस्मात्त जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।

द्वात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ॥ ३९ ॥

अरोगः सुमना ह्यं वलवर्णान्वितो वृषः ।

नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः रातम् ॥४०॥

इसमें श्लोक भी हैं—इसलिये ज्ञानी मनुष्य रात में न जागे और दिन में न सोये, क्योंकि ये दोनों बातें दिन में सोना और रात में जागना दोष प्रकोपक हैं। इसलिये उचित प्रमाण में नींद ले। इस प्रकार करने से मनुष्य नीरोगी, प्रसन्न-चित्त, बल-वर्णयुक्त, पुरुषत्वयुक्त, न बहुत मोटा और न बहुत क्रुश, ऐश्वर्यशाली होता है, एक सौ वर्ष जीता है।

वक्तव्य—“निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम् । वृषता म्नीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ अकालेऽतिप्रसंगाच्च न च निद्रा निषेविता । सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा ॥ सैव युक्ता पुनयुङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा । पुरुषं योगिनं विदधा सत्या बुद्धिरिवागता ॥ रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरुक्षमनमिष्यन्दि स्वासीनप्रचलायितम् ॥ देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः । स्वप्नान्नाऽऽहारसमुल्ये च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥

(निद्रा सात्स्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा ।)

दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः ।

न तेषां स्वप्तां दोषां जाग्रतां वाऽपि जायते ॥ ४१ ॥

(जिन लोगों ने रात में या दिन में सोने की आदत बना ली है) जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के आदों हो गये हैं उनको दिन में सोने या रात में जागने से

१ श्रीभूमे चादानरूचाणां वर्धमाने च मास्ते ।

रात्रीणां चातिसंक्षेपाद् दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥

चरक सू० अ० २१ ।

(यथा सिनेमा देखने के शौकीन आदि) किसी प्रकार का दोष नहीं होता ॥ ४१ ॥

निद्रानाशोऽनिलात् पिन्धान्नमनस्तापात् क्षयादपि ॥

संभवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ॥ ४२ ॥

निद्रानाशोऽभ्यङ्गयोगो मूर्ध्नं तैलनिषेवणम् ।

गात्रस्योद्गतं चैत्र हितं संवाहनानि च ॥ ४३ ॥

आलिगोधूमपिष्टान्नमद्यैरैक्षवसंस्कृतैः ॥

भोजनं मधुरं स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः ॥ ४४ ॥

रसेर्विलेशयानां च विष्किराणां तथैव च ।

द्राक्षासितैस्तुद्वय्याणामुपयोगो भवेन्निरि ॥ ४५ ॥

शयनासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च ।

निद्रानाशे तु कुर्वीत तथाऽन्यान्यपि बुद्धिमान् ॥४६॥

वायु के कारण, पित्त से, मन के संताप से, रसादि धातुओं की क्षीणता से, चोट आदि के लगने से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद के न आने पर—शरीर पर तैल का अभ्यङ्ग, शिर पर तैल लगाना, अङ्गों पर उबटन करना, शरीर का संवाहन (दबाना, चापी करना) उत्तम है। शाली, गेहूँ, पिठी से बने भोजन, गुड़ आदि से बनाये पदार्थ, मधुर एवं स्निग्ध भोजनों को दूध, मांस रस आदि के साथ खाना उत्तम है। विलेशय चूहे आदि और विष्किर (मुर्ग आदि) के मांस रस के साथ भोजन करे। रात में द्राक्षा, मिश्री, ईख आदि द्रव्यों का उपयोग करे। शय्या, आसन, सवारी—कोमल और मन को प्रिय बनाये। निद्रा नाश में दूसरे अन्य उपाय भी बुद्धिमान् करे।

वक्तव्य—“अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यान्नपौदका रसाः । शाल्यन्मं सद्धि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च । चतुष्पत्तर्पणं लेपः शिरसो बदनस्य च । स्वास्तीर्णं शयनं वेष्टम सुखं कालस्थोचितः । आनयत्यन्विरात्रिन्द्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥ ४२-४६ ॥

निद्रातियोगे वमनं हितं संशोधनानि च ।

लंघनं रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ॥ ४७ ॥

निद्रा के अतियोग में वमन और संशोधन, लंघन, रक्तमोक्षण तथा मन को व्याकुल करनेवाले साधन उत्तम हैं।

वक्तव्य—“कायस्य शिरसश्चैव विरेकशुद्धं भयम् । चिन्ता क्रोधः कथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् । उपवासोऽसुखाशय्या सल्लोदार्थं तमो जयः । निद्राप्रसङ्गमहर्तं वारयन्ति समुल्लितम् ॥ एत एव च विशेषे निद्रानाशस्य हेतवः । कार्यकालो विकारश्च प्रकृतिविरुधेव च ॥” चरक सू० अ० २७ ॥ ४७ ॥

कफमेदोविषातीनां रात्रौ जागरणं हितम् ।