भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुक्तसंहिता

[ अ० ]

प्रलय काल में होती है। तम की प्रधानतावाले प्राणियों में दिन में और रात में नींद आती है। रजोगुण की अधिकतावालों को बिना कारण के नींद आती है—(किसी समय नींद आ जाती है)। सत्वगुण की प्रधानतावालों को आधी रात के समय आती है। क्षीण कफवाले, वात प्रधानतावाले, मानसिक और शारीरिक दुःख से पीड़ित व्यक्तियों को नींद नहीं भी आती। यह वैकारिकी (विकारजन्य) निद्रा है।

वक्तव्य—चरक में—“यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः। विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥” नींद सात प्रकार की है, यथा—“तमोभवा र्लेभ्समुद्भववा च, मनःशरीरश्रमसंभवा च। आगन्तुकी व्याधनुवर्तिनी च रात्रि-स्वभावप्रभवा च निद्रा ॥” चरक ० सू ० २१। तामसिक पशु-रात-दिन सोते रहते हैं, यथा भैंस या सिंह। राजस-व्यक्ति—किसी भी समय रात या दिन में नींद पूरी कर लेते हैं। सत्वप्रकृति आधी रात में सोते हैं। प्रातः काल-उपाकाल में सत्व गुण की अधिकता रहने से सब देशों के मनुष्य पूजा-पाठ में, मन्दिरों में जाने की प्रवृत्ति रखते हैं। रात में—सार्थकाल में तमोगुण की अधिकता होने से सब देशों में पापाचार के घर, मदिरालय खुलते हैं, लोग उनका उपभोग करते हैं। प्रातःकाल मद्यपान करता हुआ कोई बिरला ही देखा जाता है। यह स्वभाव से है, सारे संसार के देशों में र्वाज है।

वि० मन्तव्य—निद्रा २ प्रकार की होती है १—वैष्णवी-विष्णु पालन (भरण-पोषण) के अधिष्ठाता हैं, (भारतीय भावना के अनुसार पालक हैं) और वह निद्रा—“रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां मूतधात्रीं प्रबदन्ति निद्राम्” जो रात्रि में स्वभाव से उत्पन्न होती है उसको मूतधात्री—मूत-प्राणी की धात्री—धात्र दूध पिलनेवाली—धारण पोषण करनेवाली निद्रा कही जाती है। और-२-पाप्मा-पाप है—धर्म विरुद्ध है—अध का मूल है—तमो-भवामराहुअवस्थ मूल शेषाः पुनः व्याधिषु निर्दिशन्ति (च० सू० अ० २१) अर्थात् तमोगुण की अधिकता से जो निद्रा होती है वह अव-पाप का मूल है तथा रोग रूप है।

अनवबोधिनी—जिसके आने पर पुनः जागरण नहीं होता, यह प्रलय काल-मृत्यु के समय आती है।

अनिमित्त—जब जागने का कोई निमित्त-कारण नहीं होता तभी आ जाती है। यह रजोगुणी—संसार के कामों में संलग्न प्राणी को आनेवाली निद्रा है, वह प्राणी जब कार्य में लीन रहता है तब नहीं आती, जब खाली होता है तब खट से आ जाती है ॥३३॥

भवतश्चात्र—

हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत ! देहिनाम्। तमोभिभूते तस्मिन्स्तु निद्रा विशति देहिनाम् ॥३४॥ निद्रा हेतुस्तमः, सत्त्व बोधने हेतुरुच्यते। स्वभाव एव वा हेतुर्गरीयान् परिकीर्यते ॥३५॥ इसमें श्लोक हैं—हे सुश्रुत ! मनुष्यों की चेतना का स्थान हृदय कहा है। उस हृदय के तम से आक्रान्त होने पर मनुष्यों को निद्रा आती है। निद्रा का कारण तम है, और जागरण में सत्त्व गुण कारण है। अथवा स्वभाव को ही श्रेष्ठ कारण कहा जाता है। अर्थात् स्वभाव से ही निद्रा आती है। वि० मन्तव्य—तमोगुण से निद्रा आती है और कफ भी तमोगुणी है, अतः कफ से निद्रा आती है। तमोभवा, र्लेभ्समुद्भववा च (च० सू० अ० २१)। यथा भोजन करते ही कफ बढ़ने पर निद्रा आ जाती है या जब जब कफ की वृद्धि होती है, यथा कफ ज्वर में तब तब निद्रा आ जाती है ॥३४,३५॥

पूर्वदेहानुभूतास्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः। रजोगुक्तं मनसा गुह्यतथ्योर्गुभुमाशुभान् ॥३६॥ सोते हुए व्यक्ति का स्वामी भूतात्मा है। यह भूतात्मा रजोगुण युक्त मन के साथ मिलकर पूर्व शरीर में अनुभूत शुभ-अशुभ विषयों का ग्रहण करता है ॥३६॥

करणानां तु वैकल्प्ये तमसाऽभिप्रवर्धिते। अस्वपन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ॥३७॥ तम के कारण इन्द्रियों में विकलता बढ़ जाने से न सोता हुआ भी भूतात्मा सोया हुआ कहा जाता है ॥३७॥

वक्तव्य—भूतात्मा कभी सोता नहीं, केवल इन्द्रियों के तम के कारण विषयों का ग्रहण न करने से हम आत्मा को सोया हुआ कहते हैं। इसीलिये उपनिषद् में कहा है कि—यही आत्मा है कि जो सोते हुए भी जागता रहता है ॥३७॥

सर्वतुष दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र शोभ्यात्, प्रतिषिद्धेष्वपि तु बालबुद्ध्यां कर्त्रितक्षतक्षीणमद्यनित्ययानवाह-नाध्वकर्मपरिश्रान्तानाममुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरकृष्णि-णानामजीणिनां च सुहृतं दिवास्वपनमप्रतिषिद्धम्। रात्रावपि जागरितवतां जागरितकालादधेमिष्यते दिवास्वपनम्। विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम, तत्र स्वपतामधर्मः। सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच्छ कासश्चासप्रतिशयशिरोगौरवाङ्गमर्दासेचकञ्चराग्निर्दौर्बल्यानि भवन्ति, रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तिनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति ॥३८॥

सब श्रुतुओं में दिन के समय सोना निषिद्ध है। परन्तु शीघ्र श्रुतु में (रातों के छोटी होने से) दिन में