सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४]
शरीरस्थानम्
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परिस्थिति पाकर—अपना शरीर बना लेता है। अतएव पिता कहता है—आत्मा वे पुत्रनामासि—तू आत्मा ही पुत्र नाम हो और शुक्र देहात् प्रसिच्यते—चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ न० वि० अ० २-४६। अंगात् अंगात् सम्भवसि अर्थात्—जो शुक्र देह से परीजता है—परीज कर शुक्रवह खोतों द्वारा गर्भाशय में पहुँचता है। वह गतिशील—ज्ञान, गमन प्रातिशील विश्वरूप—आत्मा का रूप—चतुर्प्राक्ष द्रव्य है। वे पुत्र ! तू अंग अंग से उत्पन्न होता है। अतएव न-सु०शा०अ० २-श्लो० ३३ में—बुध आदि के बीज को शुक्र की उपमा दी गई है और इसी अशय २ का ४७ श्लोक भी देखिये। हृदय—यह शरीराश्रमक रक्त एवं कफ के प्रसाद से निर्मित होता है। रक्तवाहिनी शिराओं में यहीं से धमान-धमनक्रिया का प्रारम्भ होता है, जिसको देखकर-उनको “धमनी” कहा जाता है, यह हृदय-अमर कोशिक—“हृदयं हृत्” है। इसका पाठ अमर कोश के द्वितीय काण्ड के मनुष्य वर्ग श्लो० ६४ में है। और “चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृत् मानसं मनः।” अ० को० प्र० काण्ड काल वर्ग में भी हृदय एवं हृत् शब्द का उल्लेख है। और उक्त दोनों शब्द—हृदय (हृतिण्ड) तथा (२४ तत्त्वों में १) के वाचक हैं और दोनों के लिये प्रयुक्त भी होते हैं, परन्तु प्रस्तुत हृदय या हृत् शब्द मनुष्यवर्गोक्त हृदय के वाचक हैं, मनस के नहीं और यही हृत् शब्द लैटिन भाषा में परिवर्तित होकर “हार्ट” हो गया है। इसका अर्थ है—हरति रक्तं तथा ह्विते रक्तं अनेन—जो रक्त को लेता है तथा जिसके द्वारा रक्त लिया जाता है—शरीर में प्राप्त किया जाता है, इस हृत् का यही काम है। धमानवाली शिराओं को प्राणवह। इस लिये कहा गया है कि हृत् (हार्ट) के अपने कार्य से वञ्चित (फेल) हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। मस्तिष्क के फेल होने पर मृत्यु नहीं होती। मूर्च्छा में कई घण्टों तथा अभिन्यास में कई दिनों—सप्ताहों तक मानव जीवित रहता है, क्योंकि उनमें हृदय क्रियाशील रहता है। इस सच्चाई पर ध्यान देने से मस्तिष्क को भी प्रस्तुत हृत् समझना कथमपि उचित नहीं है। अलमतिवित्स्तेरण, प्रस्तुतमनुसरासः—हाँ, तो यह हृत् जो गर्भनिर्माण के समय रक्त एवं कफ से निर्मित होता है वह—वक्षस के फुफ्फुसों के अन्तराल में स्थित है, इसकी आकृति अधोमुख पुण्डरीक (कमल) के सदृश है या मुड़ी—अँगूठा ऊपर को निकालकर बाँधी गई मुड़ी के सदृश है। बकरा के हृदय की बनावट भी मानव के हृदय जैसी होती है। इसमें चेतना का विशेष निवास है, अतः कहा जाता है कि जागने का हृदय विकसित होता है और सोने का निमीलित होता है (श्लो० ३२), क्योंकि जागते में चेतना क्रियाशील रहती है और सोते (गाढ निद्रा) में क्रियाशील नहीं रहती, हृदय को पुण्डरीक के सदृश कहा है, अतः
विकसन (खिलना) तथा निमीलन (मिचना) कहा गया है। यह हृदय शिरामर्म है। (देखिये अ० ६ सर्वाशय)। रक्त को ले जाने एवं लानेवाली शिराओं का संयोग स्थल है, या यों कहिये कि—शिरा ने “हृत्” का रूप बना लिया है या शिरा “हृत्” रूप में (आकृति में) परियत हो गई है। और यह रक्ताशय भी है। देखिये अ० ५ का सू० ८। क्योंकि इसमें आकर रक्त एक क्षण के लिये ठहरता है—रक्ता है रक्तर फिर चल पड़ता है ॥३१॥
भवति चान्न—
पुण्डरीकेण सहस्रं हृदयं स्यादधोमुखम्। जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति ॥३२॥
इसमें श्लोक भी है—हृदय कमल के समान (उलटे किये हुए कमल-अर्धविकसित) नीचे की ओर मुख किये हुये है। जागते समय यह विकसित (खिल) रहता है और सोने पर बन्द हो जाता है।
वक्तव्य—“प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते। गोपानसीनमागारं कर्णिकैवार्थचिन्तकैः ॥ तस्योपधातान्मुखार्थं भेदान्मरणमृच्छति ॥” हृदय के अर्थ में विवाद है। हृदय से वर्तमान में ‘हार्ट’ जहाँ लेते हैं, वहाँ मस्तिष्क के वैन्द्दीकल भी लेते हैं। इसके सिवाय हृदय-केन्द्र के लिये भी आयुर्वेद में आता है, यथा—गुल्म चिकित्सा में—“मृदनीयाद् गुल्ममेवैकं नत्वत्र हृदयं स्पृशेत् ॥” वर्तमान हार्ट शब्द से कहे जानेवाले हृदय का आकार कमल के अर्धविकसित फूल को उल्टा करके जिससे नोक नीचे आ जाये, सरीखा कह सकते हैं। तम की प्रवृत्ति मस्तिष्क में है। जाग्रत अवस्था में मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, और सोते समय अक्रियाशील रहता है। चेतना का विशेषकर हृदय स्थान है, क्योंकि—“वेदनानामभिष्ठां मनो-देहश्च सेन्द्रियः। केशलोमन्खाप्रान्तर्मलद्रवगुणैर्विना” ॥३१॥
निद्रां तु वैष्णवो पाप्मानसुपदिशन्ति, सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति। तत्र यदा सञ्जावहानि चोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसौ नाम निद्रा संभवत्यनवबोधिनो, सा प्रलयकाले, तमोभूयिष्ठा-नामहः सु निशासु च भवति, रजोभूयिष्ठा नामान्मिचिन्त, सन्त्वभयिष्ठा नामधरान्ने, क्षोणश्लेष्मणामानलबहुलानां मनःशरीराभितापवर्ता च तैव, सा वैकारिकी भवति ॥३२॥
निद्रा विष्णु की माया की भाँति है, इसे पाप भी कहते हैं। यह निद्रा स्वभाव से ही सब प्राणियों में होती है। जब सञ्जावह खोतों में तम की प्रधानतावाला कफ पहुँच जाता है तब तामसी निद्रा उत्पन्न होती है, इसमें प्राणी जागता नहीं, यह निद्रा