भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

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अर्थ में वायु अन्त्र से स्नेह को लेकर मेद को उदर में एकत्रित करती है। इस मेद के स्नेह के मुदुपाक होने से शिरायें और खर पाक होने से स्नायु उत्पन्न होते हैं। यही वायु मांसपेशियों में सब ओर निवास करके हृदय आदि आशयों को उत्पन्न करती है। (रसयोगसागर ० पु० ११३, ११४)।

वि० मन्तव्य—अन्त्र—आमाशय एवं पक्वाशय के मध्य-वर्ती नली का नाम अन्त्र है। इसकी लम्बाई साढ़े तीन व्यास होती है, १—व्यास=४ हाथ, ३। व्यास=१४ हाथ=२१-२२ फुट। नात्रियों में यह आधा व्यास छोटी होती है। अमृ गतों धातु (भ्वादि गणीय) से अन्त्र शब्द बनता है—अर्थात् जो गति करती है या जिसके द्वारा लाया हुआ आहार गति करता है। इसी गति के कारण—आहार-आमाशय से अन्त्र में, अन्त्र से मलाशय में और मलाशय से गुद द्वारा बाहर चला जाता है। वस्ति का वर्णन सु० नि० अ० ३ में देखिये। गुद का वर्णन अ० २ में देखिये। और शा० अ० ५-६ तथा शा० अ० ६—२५ देखिये। जिह्वा—रसनेन्द्रिय तथा वाग्निन्द्रिय का अधिष्ठान है। इसके द्वारा मधुर अम्ल आदि रसों का अनुभव होता है और बोला जाता है। यह कफ शोणित तथा मांस के सार से बनी है, यथा—जिह्वा अधिकतर मांस से बनी है, मांस के ऊपर श्लेष्मिक मोटी कला चढ़ी रहती है। यह कई मांस पेशियों द्वारा अधो हन्वस्थित से जुड़ी रहती है। यह संकोच से छोटी और प्रसार से बड़ी-चौड़ी हो जाती है। इस पर छोटे २ अङ्कुर होते हैं, इन्हीं से रस का ग्रहण—अनुभव होता है। यह कफ रसन नामक कफ है, जिससे आर्द्र रहने पर इसका अनुभव होता है 'रस्यते अनेन इति रसनः'। पेशी—शरीर पर जितना भी मांस है वह मांस पेशियों में विभक्त है और मांस पेशियों के आकार भिन्न २ होते हैं। उन पर मांसधरा कला लिपटी रहती है। देखिये मांसधरा कला अ० ५ का सु० ३७-४१। शिरा—इसके लिये देखिये सु० शा० अ० ७। और स्नायु के लिये देखिये—अ० ५। आशय—इसके लिये देखिये—शा० अ० ५-८। इसका अर्थ है—जिसमें कोई वस्तु आकर शयन करती है, कुछ समय के लिये रुकती है। गर्भ निर्माण के समय केवल वायु उन स्थानों में जहाँ आशय की आवश्यकता होती है आकर रुककर आशय का निर्माण कर देता है। इस परिभाषा के अनुसार हृद्रान्त, शिरा तथा शुक्रवाही स्रोत आदि को आशय कहना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें ॥ २६-३० ॥

रक्तमेदः प्रसादाद् शुक्ती, मांसासक्तफमेदः प्रसादाद् वृषणी, शोणितकफप्रसादजं हृदयं, यदाश्रया हि धमन्यः

प्राणवहाः, तस्याधो वामनतः प्लीहा फुफ्फुसश्च, दक्षिणतो यकृतं क्लोम च, तद्विशेषेण चेतनास्थानम्, अतस्तस्मिन् स्तमसाऽऽवृते सर्वप्राणिनः स्वपन्ति ॥ ३१ ॥

रक्त और मेद के सार से वृक्क बनते हैं। मांस-रक्त-कफ मेद के सार भाग से वृषण, रक्त-कफ के सार भाग से हृदय उत्पन्न होता है। क्योंकि प्राणवहा धमनियाँ इसी हृदय के आश्रित हैं। इस हृदय के नीचे वाम पार्श्व में प्लीहा और फेफड़े, दक्षिण पार्श्व में यकृत और क्लोम है। यह हृदय विशेष रूप में चेतना का स्थान है। इसीलिये इस हृदय के तम से द्यं जानने पर सब प्राणी सोते हैं।

वि० मन्तव्य—वृक्क—गर्भ के वृक्क—रक्त एवं मेद से के प्रसाद—स्वच्छ सार भाग से निर्मित होते हैं। अतएव वे-रक्त में से अनुपयोगी अंश को छानकर मूत्र का निर्माण करते और मेद से रक्षा करते हैं—बहने से रोकते हैं। ये दो होते हैं, जन्म हो जाने पर क्रियाशील होते हैं, उदर के भीतर-पिल्ली और पृष्ठवंश के दाहिनी एवं बाईं ओर रहते हैं, उनके सामने अन्त्र गेण्डली मारे पड़ी रहती है, ये दोनों ओर की बारहवों पशुकाओं के नीचे फलतः सुरक्षित भी रहते हैं। इनकी आकृति लोबिये के बीज जैसी होती है, यौवन में—इनकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई २३ इञ्च, मोटाई १ इञ्च (लगभग) होती है, भार २ छुट्टाई से कुछ कम, रङ्ग बैंगनी होता है। इसीसे मूत्रवाही स्रोत—(गवोनी) निकलकर मूत्राशय में पहुँचते हैं। वृषण—वर्षति शुक्र—जो शुक्र को बरसाता है, इसका नाम मुष्क भी है, जो शरीर से शुक्र को सुरक्षा है—सुपके से ले लेता है, अण्ड—अयति अस्मात् शुक्रम् इति जहाँ से शुक्र चलता है, अण्डकोष—अण्डों का कोश-थेला। यह वृषण दो हैं, गर्भ के अण्डकोष में नहीं उत्तरते, शिरन मूल के दोनों ओर पड़े रहते हैं, जन्म के कई दिन पश्चात् कोष में आ जाते हैं। कोष एक सूक्ष्म झिल्ली द्वारा दो भागों में विभक्त रहता है, उनमें दोनों अण्ड (अण्डाकार ग्रन्थियाँ) शिराओं तथा लसीका वाहिनियों द्वारा अवलम्बित होकर लटके रहते हैं, इतना ही नहीं, उक्त शिरा तथा लसीका वाहिनियाँ नालियों द्वारा उनका पोषण भी होता है और उनमें शुक्र का निर्माण भी, उनमें से दो नालियाँ आकर 'शुक्रवहे द्वे'—शुक्रवाही दोनों स्रोतों से सम्बद्ध रहती हैं, जिनके द्वारा शुक्र शुक्र-स्रोतों में पहुँचता है। इन सब अवयवों की क्रिया भी यौवन में पूर्णरूप से सम्पन्न होती है। गर्भनिर्माण काल में इनका निर्माण—मांस, रक्त, कफ एवं मेद से होता है। जैसे सूर्या आदि के अण्डों में जीव रहता है वैसे ही इनमें भी जीव रहता है जो शुक्र के साथ आकर—शोणित से मिलकर—उत्पन्न