सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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वक्तव्य—संकल्पो वृष्याणाम् श्रेष्ठतमः, चरक । हर्षात्तर्घा- त्सरवाच्च पेक्खिल्याद् गौरवादपि । अणुप्रवणभावान्च द्रुतत्वा- न्माक्षतस्य च ॥ अष्टाध्याय एभ्यो हेतुभ्यः शुक्लं देहात् प्रसिच्यते ॥ तत् क्षीणुषसंयोगे च्छेदा-संकल्प-पीडनात् । शुक्लं प्रच्यवते स्थानाज्बलमाद्वि पटादिव ॥ चरक-० वि० अ० २ ॥ २३ ॥
गृहीतगर्भाणामातृत्ववहानां स्त्रोतसां वत्सोऽन्यवदृश्यन्ते गर्भेण, तस्माद् गृहीतगर्भाणामातृत्वं न दृश्यते; ततस्तद्वधः प्रतिहतमूर्ध्वमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभिधीयते, शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोऽन्ततपयोधरा भवन्ति ॥ २४ ॥
स्त्री के गर्भवती होने पर गर्भ के कारण आर्तत्ववह स्त्रोत बन्द हो जाते हैं। इसलिये गर्भवती स्त्री में आर्तत्व का दर्शन नहीं होता। यह आर्तत्व नीचे रुक जाने से ऊपर की ओर आकर और अन्य आर्तत्व उपचित-सञ्चित होते २ बढ़ते जाने पर, 'अपरा' शब्द से कहा जाता है। शेष बचा आर्तत्व ऊपर आकर स्तनों में पहुँचता है। इसलिये गर्भवती के स्तन मोटे और भारी तथा उन्नत हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—तात्पर्य—आर्तत्व-मासिक रजस्वी रुककर सञ्चित होता हुआ "अपरा" जरायु तथा नालिका रूप धारण कर लेता है और उसका कुछ भाग स्तनों को पुष्ट करने लगता है ॥
गर्भस्य यकृतप्लीहानौ शोणितजौ, शोणितफेनप्रभवः फुफ्फुसः, शोणितकिट्टप्रभव उण्डुकः ॥ २५ ॥
गर्भ के यकृत-प्लीहा रक्तजन्य हैं। फेफड़े रक्त की क्षाग से बनते हैं उण्डुक रक्त के किट्ट से बनता है।
वि० मन्तव्य—गर्भ यकृत एवं प्लीहा का निर्माण रक्त से होता है और रक्त का निर्माण भी ये ही करते हैं। 'स खलु आप्यो रसो यकृत प्लीहानो प्राप्य रागमुपैति' (सू० सू० अ० १४)। जन्म से २-३ मास तक तत्पश्चात् बालक ज्यों २ बड़ा होता है यकृत पशुकाओं से बाहर उदर में स्पशॉपलभ्य रहता है यकृत पशुकाओं के पञ्जर के अन्दर हो जाता है, फिर कभी ज्वर आदि कारणों से बढ़कर उदर में स्पशॉपलभ्य हो जाता है, प्लीहा की दशा भी ऐसी ही रहती है। ज्वर आदि से वह भी बढ़ जाती है। फुफ्फुस या फुफ्फुस- रक्त की फेन से निर्मित होता है, और स्वरूपतः भी फेन-क्षाग के गुप्क जैसा ही होता है, यह उदान-प्राण मिश्रित— श्वास उच्छ्वास का साधन है, "उदानवायोः आधारः फुफ्फुस गोच्यते बुधैः ॥" कण्ठ से श्वास मार्ग का प्रारम्भ होता है और आगे जाकर वह दो भागों में विभक्त हो जाता है और दोनों फुफ्फुसों में चला जाता है और आगे फुफ्फुसों में जाकर फेन- सदृश असंख्य कोष्ठ प्रकोष्ठों में विभक्त होकर समस्त फुफ्फुसों
में व्याप्त हो जाता है। फलतः श्वास द्वारा गृहीत वायु फुफ्फुस के कोने-कोने में जा सकता है। इन्हीं का नाम-फेफड़ा है, यह वायु के प्रवेश से कुछ फूलते और निकलने से कुछ संकुचित होते रहते हैं। फुफ्फुसों को गर्भ का वर्णन करते हुए श्री धन्व- न्तरि ने—अध्याय ६ में स्तनमूल, स्तनरोहित, अपलाप नामक ३ अवयवों में विभक्त माना है और श्वास मार्ग के फुफ्फुसों में जानेवाले दोनों मार्गों को अपस्तम्भ कहा है। देखिये शा० अ० ६-२५। फुफ्फुसायते इति फुफ्फुसः-श्वासक्रिया में फुफ्फु- साते हैं—अतः फुफ्फुस कहे जाते हैं। आशयों का वर्णन करते समय इनको वाताशय कहा गया है (सू० शा० अ० ५)। फुफ्फुसों में सर्वदा वायु भरा रहता है, जितना श्वास में भीतर जाता है उतना उच्छ्वास में निकल जाता है। उण्डुक या उन्दुक—उन्दी-कलेदने धातु (वधादिगण) से उन्दुक शब्द बनता है। अर्थ है जो आर्द्र करता है या जिसके द्वारा आर्द्र किया जाता है—मलद्रव का जलांश यहीं से समस्त शरीर में पहुँचता है, जिससे शरीर आर्द्र बना रहता है। देखिये इसी अध्याय का श्लोक १७ ॥ २५ ॥
असृजः श्लेष्मगन्धश्चापि यः प्रसादः परो मतः। तं पञ्चयमानं पित्रेन वायुश्चाप्यनुवावति ॥ २६ ॥ ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुदं बस्तिश्च देहिनः। उदरे पञ्चयमानानामाधमानादुक्तमसारवत् ॥ २७ ॥ कफशोणितमांसानां साराज्जिह्वा प्रजायते। यथार्थमृदमणा युक्तो वायुः स्त्रोतांसि दारयेत् ॥ २८ ॥ अनुप्रविश्य पिशितं पेशीविभजते तथा। मेदसः स्नेहमाद्याय सिरा स्नायुत्वमानुयात् ॥ २९ ॥ सिराणां तु मृदुः पाकः स्नायूनां च ततः खरः। आशयाभ्यासयोगेन करोत्याशयसंभवम् ॥ ३० ॥
रक्त और कफ का जो अति उत्तम भाग है, उसका पित्र से परिपाक होते समय वायु भी इसमें भाग लेता है। इससे गर्भ के अन्त्र, गुदा, बस्ति बनते हैं। उदर में पचते हुए कफ, रक्त और मांस के सार से जिह्वा उत्पन्न होती है। जिस प्रकार घोंकने पर स्वर्ण का सार मात्र ही बचता है, जिस प्रकार यथा- योग्य उष्णिमा से युक्त वायु स्त्रोतों को विभक्त करता है उसी प्रकार वायु मांस में प्रविष्ट होकर पेशियों को विभक्त करता है। शिरा मेद से स्नेह को लेकर स्नायुरूप बनती है। शिराओं का पाक मृदु रहता है, और स्नायुओं का इनसे खर (कठोर) रहता है। बारम्बार स्थिर रहने का अभ्यास करने से वायु आशयों को उत्पन्न करती है।
वक्तव्य—श्री पं० हरिप्रभञ्जी ने 'शिरा स्नायुत्वमानुयात्' के स्थान पर 'शिरा स्नायुत्वमप्यथ' पाठ बदला है। उनके