सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
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चतुर्थी श्लेष्मधरा सर्वसन्धिषु प्राणभूतां भवति ॥१४॥
चौथी कला का नाम 'श्लेष्मधरा' है। यह कला प्राणियों की सब सन्धियों में रहती है ॥१४॥
स्नेहाभ्यक्ते यथा ह्युत्ते चक्रं साधु प्रवर्तते।
सन्धयः साधु वर्तन्ते संहिल्लशः श्लेष्मणा तथा ॥१५॥
जैसे चक्र के अक्ष (धुरी) के स्नेह आदि से चिकना होने पर पहिया आराम से घूमता है, इसी प्रकार श्लेष्मा से युक्त सन्धियाँ भी अपना काम भली प्रकार से करती हैं ॥१५॥
पञ्चमी पुरीषधरा नाम, याऽन्तःकोष्ठे मलमभिबिभजते पक्वाशयस्था ॥१६॥
पाँचवीं कला का नाम 'पुरीषधरा' है। कोष्ठ के अन्दर पक्वाशय में स्थित हुई अन्न को मलरूप में विभक्त करती है ॥
यकृतसमन्तात् कोष्ठं च तथाऽन्नाणि समाश्रिता ॥
उण्डु (न्दु) कस्थं विभजते मलं मलधरा कला ॥१७॥
'मलधरा' कलाकोष्ठ में यकृत से आरम्भ होकर सब आँतों में व्याप्त होती हुई उण्डुक (caccum) स्थित मल को पृथक् करती है। मल का विभाग अग्नि तथा वायु के कारण से होता है। उण्डुक तक मल के साथ अन्न का कुछ भाग मिला रहता है। परन्तु उण्डुक में पहुँचने पर सार भाग आँतों से खींचा जाता है, केवल पानी का भाग ही रहता है और कुछ नमक रहता है। बृहदंत्र का भाग इनको मल से पृथक् कर लेता है, इस प्रकार से मल ही बाहर होता है ॥१७॥
षष्ठी पित्तधरा, या चतुर्विधमन्तपानसामाशयान् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ॥१८॥
छठी कला का नाम 'पित्तधरा' है। यह कला चारों प्रकार के खाये अन्न-पान को आमाशय से निकालकर पक्वाशय में जाने के लिये धारण करती है, इसी को ग्रहणी कहते हैं ॥१८॥
१. "तथा च—अनिकृतो यथा—विवेचयति च रसमृत्रपुरोधाणि। माक्षतकृतो यथा—सोऽन्नं पचति तज्जाशविशेषान् विविनक्ति।" कोष्ठ का लक्षण—
"स्थानान्यामानिपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। हृदुण्डुकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥" पाचन के लिये 'हमारे शरीर की रचना' देखिये।
२. पित्तधरा—"षष्ठी पित्तधरा नाम। पक्वाशयामाशयमध्यस्था, सा ह्यन्तरन्यधिष्ठानतमा आमपक्वाशययोरभ्यं चतुर्विधम अन्नं बलेन विधार्य पित्ततेजसा शोषयन्ती पचति। पक्वं च विमुञ्चति। ततोऽसावन्नस्य ग्रहणात् पुत्रग्रहणी संज्ञा। बलं च तस्याः पित्तमेवात्म्यभिधानमृतः ॥" अष्टौगसंघट्टः।
अग्निं खादितं पीतं लीडं कोष्ठगतं नृणाम्।
तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा ॥१९॥
कहा भी है—अशित (खाया हुआ) पीत खादित और लीड चार प्रकार का भोजन कोष्ठ में पहुँचकर पित्त की उष्णमा से सुखाया जाकर यथासमय में सुखपूर्वक पचता है।
वि० मन्तव्य—जीर्यति—पच जाता है अर्थात् सार एवं किङ् रूप में विभक्त हो जाता है, ग्रहणी में ही आहार का सारस ग्रहीत होकर शरीर पोषणार्थ पृथक् हो जाता है ॥१९॥
सप्तमी शुक्रधरा, या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ॥
सातवीं 'शुक्रधरा' नाम कला है। यह कला सब प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है ॥२०॥
यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्वेक्षौ रसो यथा।
शरीरेषु तथा शुक्रं नृणां विद्याद्विष्वरः ॥२१॥
जिस प्रकार कि दूध में घी गन्ने में रस गूढ़ छिपा हुआ है, उसी प्रकार मनुष्यों के शरीर में शुक्र को समझना चाहिये। (शुक्र शरीर के प्रत्येक कण कण में व्याप्त है) ॥२१॥
द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः।
मूळक्षोतःपथाच्छुक्लं पुरुषस्य प्रवर्तते ॥२२॥
बस्तिद्वार के नीचे दो अंगुल दक्षिण पार्श्व में—मूत्रक्षोत के मार्ग से ही पुरुषों में शुक्र प्रवृत्त होता है।
वक्तव्य—सप्तमी शुक्रधरा द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्चयति ॥ बृद्धवामह। द्वयङ्गुले दक्षिणे इत्यादि—इत्यत्र द्वयङ्गुले दक्षिणे वामे इत्येव साधीयान् पाठः—अन्यथा प्रत्यक्षविरोधः (प्रत्यक्षशरीर उपोद्घात पृ० ७२)।
वि० मन्तव्य—शुक्रवहे द्वे क्षोतसी सु० शा० अ० ६। शुक्रवाही दो क्षोतस् हैं। ये बस्ति—मूत्राशय द्वार के दो अंगुल नीचे पुमान् के मूत्रमार्ग में खुलते हैं। अतः "दक्षिणे वामे" यह पाठ साधीयान् है। और नारी के भग की दीवारों में अनेक-सुखी होकर व्याप्त रहते हैं। मैथुन आदि के समय शुक्र समस्त शरीर से आकर इन्हीं क्षोतों में से होकर बाहर आता है, शुक्र को सर्वदा बहने से रोकनेवाली "शुक्रधरा" कला है। शेष देखिये—सु० नि० अ० १० श्लोक० १८-२२ ॥२२॥
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसतस्था।
क्षीषु न्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् संप्रवर्तते ॥२३॥
शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। प्रसन्न मन के कारण, स्त्रियों में सम्मोग करने पर, हर्ष के कारण वह शुक्र प्रवृत्त होता है।