सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शरीरस्थानम्
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इधर उधर वह जाने से रोकता है वह त्वचा ही है। वही काल एकर उक्त रूप धारण कर लेती है। इन स्तरो की मोटाई का उल्लेख पूर्ण स्वस्थ के लिये है ॥४॥
कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः ॥५॥
धातुओं (रस-रक्तादि तथा कफ, पित्त, मलादि) के आशयों में सीमा (मर्यादाभूत) कलायें (Membrans) भी सात हैं।
वि० मन्तव्य—धातु-पदार्थ तथा धातु के आशय के अन्तर मध्य की मर्यादा “कला” कहलाती है। जैसे कटोरा में कागज धरकर कोई वस्तु धरी जाती है वैसे ही आशय में कला रहती है, मांसधरा कला मांस पेशियों पर लिपटी रहती है ॥५॥
भवतश्चात्र—
यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।
तथा हि धातुमार्गेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ॥६॥
स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्च जरायुणा।
श्लेष्मणा वेष्टितान्नापि कलाभागान्स्तु तान् विदुः ॥७॥
कहा भी है—जिस प्रकार वृक्ष के काष्ठ को काटने से सार दीखने लगता है (रस बहने लगता है), उसी प्रकार मांस के काटने पर धातु (रस-रक्तादि) दीखने लगते हैं। जो स्नायुओं द्वारा मली प्रकार से ढँपे होते हैं, जरायु (उल्वा शिल्ली) से सम्यक् प्रकार से व्याप्त होते हैं, तथा कफ से घिरे रहते हैं, उनको कला कहते हैं १।
वि० मन्तव्य—हमारे विचार में छठे श्लोक का उत्तरार्ध “तथा कलासु धातुर्हि छिद्यमानासु दृश्यते” होना चाहिये अर्थात् वैसे ही कला के कट-फट जाने पर धातु—उसके भीतर का पदार्थ दिखाई पड़ता है—आशय के कट जाने पर भी यदि उसके भीतर की कला न कटे तो उसके भीतर का पदार्थ दिखाई नहीं पड़ता। और छठे श्लोक के आगे—‘धात्वाशयान्तरं दृश्यं यः क्लेदस्त्वथितिक्षति। देहोष्मणा विपक्वस्तु सा कला इत्यभिधीयते ॥’ पाठ होना चाहिये। अर्थात् धातु एवं आशय के मध्य में जो क्लेद—पिच्छल द्रव रहता है वह शरीर की उष्मा से परिपक्व होकर—कागज का सा होकर “कला” कहलाता है। यह माड़ी एवं सोम से पालिश किये रेशमी कपड़ा की सी होती है। कपड़ा के धागे स्नायु, माँड़ी जरायु तथा सोम श्लेष्मा कहा जा सकता है ॥६,७॥
१. वृद्ध वामभट्ट ने कहा है—“यस्तु धात्वाशयान्तरेषु क्लेदोऽवलिष्ठो यथा स्वमूषमभिर्विपक्वः स्नायुश्लेष्म जरायुच्छनः काष्ठ इव सारो धातुरससोषाल्पत्वात् कलासंज्ञः।”
तासां प्रथमा मांसधरा यस्या मांसे शिरास्तानु-धमनीसौन्तासां प्रताना भवन्ति ॥८॥
सात कलाओं में प्रथम कला का नाम ‘मांसधरा’ है। इसमें से होकर ही शिरा, धमनी, स्नायु और स्रोत—इनकी शाखायें मांस में पहुँचती हैं।
वि० मन्तव्य—यह मांसपेशियों पर लिपटी रहती है। इसी के कारण मांस मांसपेशियों में विभक्त रहता है ॥८॥
यथा विसमृणालानि विवर्धन्ते समन्ततः।
भूमौ पङ्कोदकस्थानि तथा मांसे सिरादयः ॥९॥
कहा भी है—जिस प्रकार से विस और मृणाल कीचड़-भूमि तथा पानी में रहकर चारों ओर बढ़ते हैं, इसी प्रकार से मांस में शिरा आदि (Blood vessels) चारों ओर फैलते हैं ॥९॥
द्वितीया रक्तधरा मांसस्याभ्यन्तरतः, तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतः प्लोहोश्च भवति ॥१०॥
दूसरी कला का नाम ‘रक्तधरा’ है, यह कला मांस के अन्दर रहती है। इसमें रक्त का संवहन होता है। यह कला विशेषकर शिराओं में, यकृत और प्लीहा में रहती है ॥१०॥
वृक्षावथाभिप्रहृतात् क्षोरिणः क्षोरमावहेत्। मांसादेवं क्षतान् क्षिप्रं शोणितं संप्रसिच्यते ॥११॥
कहा भी है—वृक्षवाले वृक्षों पर चोट लगने से जैसे उनमें से दूष बहने लगता है, इसी प्रकार मांस पर आघात होने से रक्त शीघ्र बहने लगता है ॥११॥
तृतीया मेदोधरा, मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च, महत्सु च मज्जा भवति ॥१२॥
तीसरी कला का नाम ‘मेदोधरा’ है। सब प्राणियों के उदर में तथा सूक्ष्म अस्थियों में मेद, तथा बड़ी अस्थियों में मज्जा रहती है। यह कला मेद और मज्जा को धारण करती है ॥१२॥
स्थूलस्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः।
अथैतरेषु सर्वेषु सरक्तं मेद उच्यते।
शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ॥१३॥
विशेषकर स्थूलस्थियों के मध्य में मज्जा रहती है, छोटी अस्थियों में रक्तयुक्त मेद रहता है। शुद्ध मांस के स्नेह को वसा कहते हैं ॥१३॥
१. कविराज गणनाथ सेनजी ने इनमें, निम्न मेद किये हैं।
यथा—‘मेदो नाम सान्द्रसिन्धुल्यः स्नेहधातुः शरीरस्य। वसा तु—मांसान्तरानुप्रविष्टः स्नेहः। मज्जा—अस्थिमध्यगतः स्नेहः। स द्विविधो पीतो रक्तश्च ॥’ प्रत्यक्षं शा० पू० १०।