भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

वि० मन्तव्य—आकरणं—आकारः—आकृतिः, विशिष्टानां विविधानां वा आकरणं—व्याकरणम् तच्च अस्ति अस्मिन् इति तत्। अर्थात् इव अध्याय में—शरीर के विशिष्ट या विविध अवयवों के आकारों-आकृतियों का वर्णन किया गया है ॥१-२॥

अग्निः सोमो वायुः सत्त्वं रजस्तमः पञ्चेन्द्रियाणि भूतास्मेति प्राणाः ॥ ३ ॥

अग्नि (पित्त के पाँचों भेद), सोम (कफ, रस, शुक्र द्रव भाग), वायु, सत्त्व, रज, तम, पाँचों इन्द्रियों और भूतात्मा (जीव) ये प्राण हैं। शरीर का प्राणन इनके कारण ही होता है ॥ ३ ॥

तस्य खल्वेवंप्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य क्षीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति। तासां प्रथमा-द्वभासिनी नाम, या सर्वान् वर्णान्वभासयति पञ्चविधां च छायां प्रकाशयति, सा ब्रीहिरष्टादशभागप्रमाण, सिध्मपद्मकण्टकाधिष्ठानाः द्वितीया लोहिता नाम, पोडश-भागप्रमाण, तिलकालकन्यच्छृङ्गङ्गाधिष्ठाना; तृतीया श्वेता नाम, द्वादशभागप्रमाण, चर्मदलाजगल्लीषप्रका-धिष्ठाना; चतुर्थी ताम्रा नामाष्टभागप्रमाण, विविधकिला-सकुष्ठाधिष्ठाना; पंचमी वेदिनी नाम पंचभागप्रमाण, कुष्ठविस्पर्षाधिष्ठाना; षष्ठी रोहिणी नाम ब्रीहिप्रमाण, प्रन्ध्यपच्यवृंदरलीपदगलगण्डाधिष्ठाना, सप्तमी मांसधरा नाम ब्रीहिद्रवप्रमाण; भगन्दरविद्रध्यशोऽधिष्ठाना। यदेतत् प्रमाणं निर्दिष्टं तन्मांसलेष्ववकाशेषु, न ललाटे सूक्ष्माङ्गुल्यादिषु च, यतो वक्ष्यत्युदरेषु—‘ब्रीहिमुखेनाङ्गुष्ठोदरप्रमाणमवगाढं विध्येत’ (चि०अ०१४) इति ॥४॥

भूतात्मा से अधिष्ठित शुक्रशोणित के परिपाक होने से सात त्वचार्ये उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार दूध के परिपाक करने पर मलाई जमती है। इनमें सब से प्रथम त्वचा का नाम अव-भासिनी है। यह प्रथम त्वचा—गौरादि सब वर्णों को तथा पाँचों प्रकार की छाया (कान्ति-आसन्न लक्ष्यते छाया) को प्रकाशित करती है। इस त्वचा की मोटाई जो के अठारहवें भाग के बराबर है। इसी त्वचा में सिध्म तथा पद्मकण्टक रोग होते हैं। दूसरी त्वचा (स्तर) का नाम ‘लोहिता’ है। यह ब्रीहि के सोलहवें भाग के बराबर मोटी है। इस त्वचा में तिलकालक, न्यच्छ, व्यञ्ज आदि रोग होते हैं। तीसरी त्वचा का नाम ‘श्वेता’ है। इसकी मोटाई ब्रीहि का बारहवों भाग है। चर्मदल, अजगल्ली, मशक आदि रोग इसमें होते हैं। चौथी त्वचा का नाम ‘ताम्रा’ है, यह ब्रीहि का आठवों भाग मोटी है। इसमें नाना प्रकार के किलाष और कुष्ठ (त्वचा के रोग) होते हैं। पाँचवीं त्वचा का नाम वेदिनी है, यह ब्रीहि

का पाँचवों भाग मोटी है। इसमें कुष्ठ-बीसर्प रोग होते हैं। छठी रोहिणी नामक है, यह ब्रीहि के बराबर मोटी है। इसमें ग्रन्थि, अपचनी, अबुर्द, श्लीपद, गलगण्ड रोग होते हैं। सातवीं त्वचा का नाम मांसधरा है। यह दो जो के बराबर मोटी है। इसमें भगन्दर, विद्रधि, अर्श रोग होते हैं। यहाँ पर जो मोटाई का प्रमाण कहा है, वह उदर आदि मध्य शरीर तथा मांसल-स्थानों से समझना चाहिये। ललाट, सूक्ष्म अंगुलि आदियों में नहीं। चूँकि आगे उदर रोग में कहेंगे कि ब्रीहिमुख श्लक्ष द्वारा अंगुष्ठोदर के बराबर गहरा वेधन करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—त्वचा—त्वच् संवरणे धातु (तु० प०) से त्वचा शब्द का निर्माण होता है—जो शरीर का संवरण (सम्यक् प्रकार से ढकना) करती है, इसका पर्याय है अस्-धरा जो रक्त को बहने से रोकती है। यह शीतोष्ण (सरदी गर्मी) से बचाती है जैसे वस्त्र। “तनु विस्तारे” से भी त्वचा शब्द बनाया जा सकता है अर्थ है जो शरीर पर फैली हुई है। इसमें रोमकूप रहते है उनकी जड़ वेदिनी त्वचा तक होती है। इसमें से स्वेद निकलता है। त्वचा के सात स्तर हैं—१—अव-भासिनी—अवभासयति—प्रकाशयति वर्ण इति। गौर श्यामादि वर्ण इसी में रहते हैं। २—लोहिता—लाल, ३—श्वेता—श्वेत, ४—तामा—ताम्र की सी लाल, ५—वेदिनी—वेदयति स्पर्श-स्पर्शान् इसी से होता है, कण्टक जब चारों त्वचाओं को पार कर जाता है तब अनुभव होता है, शीत-उष्ण आदि का अनु-भव भी इसी से होता है अतः इसका नाम वेदिनी-विदित अवगत करनेवाली। ६—रोहिणी—इस पर रोह-प्ररोह होते हैं—रोहाः सन्ति अस्यां इति रोहिणी। ७—मांसधरा—जो मांस को धारण करती है उससे सम्बद्ध है उस पर लिप्टी है यह त्वचा का भीतरी अन्तिम स्तर है। शुक्र शोणित के मिश्रण पर सर्व प्रथम जो आवरण बनता है उसे

१ चरक में छै ही त्वचा कहो हैं। यथा—उदकधरा, अस्-धरा, सिध्मकिलाससंभवाधिष्ठाना, ददृ-कुष्ठसम्भवाधिष्ठाना, अलजी-विद्रधिसम्भवाधिष्ठाना, यस्यां छिन्नायां ताम्रत्यम्ब इव च तमः प्रविशति।

कविराज गणनाथ सेन जी ने स्थूल दृष्टि से दीखनेवाली त्वचा के दो ही स्तर माने हैं। (१) एक उपरि त्वचा (Epidermis) और दूसरी अन्तः त्वचा (DerMis)। परन्तु यदि अणु-बीक्षण यन्त्र से देखें तो प्रथम त्वचा पाँच स्तरों में तथा अन्तः त्वचा दो भागों में विभक्त दीखती है। इस प्रकार से ये सात स्तर मिलकर त्वचा को बनाती हैं।

(२) छाया और प्रभा में भेद है। यथा—आसन्ना लक्ष्यते छाया, प्रभा दूरप्रकाशिनी।