सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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शान-विज्ञान, आयु, मुख, दुःख आदि आत्माजन्य हैं। सत्व-जन्य वस्तुओं की आगे व्याख्या करेंगे। वीर्य, आरोग्यता, बल, वर्ण, मेषा यह सत्यजन्य हैं ॥ ३३ ॥
तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति दक्षिण-कुक्षिमहत्वं च पूर्णं च दक्षिणं सकथ्युत्कर्षति बाहु-त्याच्च पुन्नामवेयेषु द्रव्येषु दौर्द्वदमभिव्यापति, स्वप्नेषु चोपलभते पञ्चोत्पलकुमुदाघ्रातकादीनि पुत्रामान्येष्व प्रसन्नमुखवर्णा च भवति तां व्रूयात् पुत्रमियं जनयिष्य-तीति, तद्विपश्ये कन्यां, यस्याः पार्श्वद्वयमवन्तं पुरस्ता-निर्गतमुद्गरं प्रागभिहितं लक्षणं च तस्या नपुंसकमिति विद्यात्, यस्या मध्ये निम्नं द्रोणीभूतमुद्गरं सा युग्मं प्रसूयत इति ॥ ३४ ॥
जिस स्त्री के दक्षिण स्तन में सब से प्रथम दूध का दर्शन होता है, दक्षिण कुक्षि भारी रहती है, प्रथम दक्षिण टांग में उत्कर्ष (रोमांच) आता है, प्रायः करके पुंलिङ्ग नामवाले पदार्थों की चाह करती है, स्वप्नावस्था में पद्म, उत्पल, कुमुद, आमातक (अम्बाड़ा) आदि पुंलिङ्ग वस्तुओं को प्राप्त करती है। जिसका मुखवर्ण स्वच्छ प्रसन्न हो, वह पुत्र को उत्पन्न करेगी ऐसा समझना चाहिये। इसके विपरीत, लक्षणवाली स्त्री कन्या को उत्पन्न करती है। जिस स्त्री के दोनों पार्श्व उठे होते हैं, पेट आगे को निकला होता है पूर्वोक्त नपुंसक गर्भ के लक्षण उपस्थित हों, वह नपुंसक सन्तान उत्पन्न करती है। जिस स्त्री का पेट बीच से दबा एवं द्रोणी (गूत) के समान होता है वह जोड़िये बच्चों को उत्पन्न करती है १।
वि० मन्तव्य—दक्षिण सकृिय उत्कर्षति—चलते समय या पलंग आदि पर चढ़ते समय प्रथम दाहिना पाँव उठाती है। चौथे पाँवनें आदि मासों में स्तनों से श्वेत द्रव-सा बहने लगता है उसी को स्तन्य कहा गया है। पुत्र गर्भवती का गर्भ-गर्भाशय के दक्षिण पार्श्व से संस्कृत होता है। द्रोणीभूत-द्रोणी-गूत या गोणी का नाम है जो वस्तु भर कर गधे-खच्चर आदि पर लादी जाती है वह दो भागों में भरी रहती है। उद्गर जितना बड़ा होता है वस्तुतः उतना बड़ा गर्भ नहीं होता उसमें (गर्भाशयमें) गर्भादक भरा रहता है जिसमें जरायु में लिपटा गर्भ तैरता रहता है। प्रसव के समय प्रथम यही निकलता है और फिर गर्भ, कभी-कभी गर्भ जरायु को साथ लिये भी निकलता है
१ चरक में भी कहा है—
(१) सव्यांगचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वन्तपानाशानशीलचेष्टा। सव्यातगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यप्रदुष्ठा स्त्रियमेव सूते ॥
पुनः त्वतो लिगविपश्येण व्याभिश्रंलिगां प्रकृतिं तृतीयाम् ॥
(२) रोमराजी भवेन्तिम्ना यस्याः सा सूर्यते यमी।
किन्तु प्रायः वह भीतर ही रह जाता है जैसे पके आम को जोर से दबाने पर छिलका हाथ में ही रह जाता है, यह प्रसव के पश्चात् स्वयं गिर जाती है परन्तु कभी कभी गिराने का प्रयत्न भी करना पड़ता है इसी में नाल भी लगी रहती है जो खिचकर गर्भ के साथ बाहर आ जाती है और उधर जरायु से भी लगी रहती है। गर्भादक १-२ सेर होता है। नाल की लम्बाई १-१। हाथ होती है। कभी कभी जरायु इतनी नहीं फटती जिसमें से गर्भ बाहर आ सके इस दशा में उसे अधिक फाड़ना पड़ता है। प्रसव के समय को वेदना का नाम “आवी” है उस समय गर्भाशय में एँठन या खिड़कन होने लगती है इसी एँठन का नाम आवी है, अकाल में आवी होने से गर्भखाव अथवा गर्भ-पात हो जाता है ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र—
देवताब्राह्मणपराः औचाचारहिते रताः।
महागुणान् प्रसूयन्ते विपरीतास्तु निर्गुणान् ॥ ३५ ॥
कहा भी है—जो माता-पिता, देवता, ब्राह्मण की पूजा (सत्कार) करने में तत्पर रहते हैं, शौच (पवित्रता) तथा आचार का पालन करते हैं, वे महागुणशाली पुत्रों को उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत आचरणवाले माता-पिता निर्गुण संतान उत्पन्न करते हैं।
वि० मन्तव्य—माता के उक्त पवित्र आचरण का प्रभाव सन्तान पर पड़ता है ॥ ३५ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गनिर्गुतिः स्वभावोदेव जायते।
अङ्गप्रत्यङ्गनिर्गुत्तो ये भवन्ति गुणागुणाः।
ते ते गर्भस्य विज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः ॥ ३६ ॥
अङ्ग-प्रत्यङ्गों का निर्माण स्वभाव से ही होता है परन्तु अङ्गप्रत्यङ्गों के निर्माण में जो गुण या अवगुण होते हैं, वे गर्भ के धर्म-अधर्म के कारण से होते हैं।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद दर्शन में स्वभाव को भी कारण माना है (दे० शा० अ० १-११) ॥ ३६ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भावक्रान्तिशारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातो गर्भव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
पूर्व अध्याय में वर्णित गर्भ की रचना को विस्तार में कहने के अभिप्राय से गर्भव्याकरण नाम अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था—