सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
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तथा गर्भनाल का निर्माण होता है और गर्भ का वर्चन-वृत्ति-भरण-पोषण होता है। गर्भिणी जो २ आहार खाती है उसका रस नामक वीर्य (सार) दो भागों में विभक्त हो जाता है १—से उक्त कार्य होता है और २—से स्तनों में स्तन्य की वृद्धि होने लगती है स्तन पुष्ट होने लगते हैं। गर्भ भी गर्भिणी का एक अवयव ही होता है।
रसबहा गर्भाशय का तर्पण करती है और गर्भाशय के भीतर चिपका हुआ गर्भ भी तृप्त होता रहता है आगे चलकर गर्भनाल बनने लगती है और गर्भनाल के अप्रभाग से बढ़ होने से गर्भाशय की दीवार से दूर होता जाता है और गर्भाशय में गर्भोदक भी उत्पन्न होने लगता है, अब गर्भ को गर्भनाल द्वारा जो गर्भ की नाभि में संसक्त रहती है और उधर गर्भाशय की दीवार में संसक्त रहती है—रसरूप पोषण पदार्थ मिलता रहता है और उसका वर्चन-भरण-पोषण होता रहता है। गर्भ को प्रथम मूल प्यास नहीं लगती माता (गर्भिणी) का ही आश्रय लेकर जीवित रहता है निर्वाह करता रहता है ॥३१॥
गर्भस्य खलु संभवतः पूर्व शिरः संभवतीत्याह शौनकः शिरोमूलत्वात् प्रधानेन्द्रियाणां, हृदयमिति कृतवीर्यं, बुद्धेर्मेनसश्च स्थानत्वात्, नाभिरिति पाराशर्यः, ततो हि बधते देहो देहिनः पाणिपादमितां मार्कण्डेयः, तन्मूलत्वाच्चेष्टाया गर्भस्य, मध्यशरीरमिति सुभूतिगौतमः, तन्निबद्धत्वात् सर्वगात्रसंभवस्य। तत्तु न सम्यक्, सर्वाण्यङ्गप्रत्यङ्गानि युगपत् संभवन्तीत्याह धन्वन्तरिः, गर्भस्य सूक्ष्मत्वात्पोष्यन्ते वंशाङ्कुरवच्छूतफलवच्च, तथाथा-चूतफले परिपक्वे केशरमांसस्थिमज्जानः पृथक् पृथक् दृश्यन्ते काष्ठप्रकर्षात् तान्येव तरुणे नोपलभ्यन्ते सूक्ष्मत्वात् तेषां सूक्ष्माणां केशरादीनां कालः प्रव्यक्तां करोति, एतेनैव वंशाङ्कुरोऽपि व्याख्यातः। एवं गर्भस्य तारुण्ये सर्वेष्वङ्गप्रत्यङ्गेषु सत्त्वपि सौक्ष्म्यादुपलब्धिः, तान्येव कालप्रकर्षात् प्रव्यक्तानि भवन्ति ॥३२॥
शौनक ऋषि का विचार है कि गर्भ का सबसे प्रथम शिर बनता है, क्योंकि सब इन्द्रियों में शिर ही मूल है। कृतवीर्य ऋषि का विचार है कि सबसे प्रथम हृदय बनता है, क्योंकि यह बुद्धि और मन का स्थान है। पाराशर्य ऋषि का कथन है कि नाभि सबसे प्रथम बनती है, चूँकि सब प्राणी इसी से बढ़ते हैं (यही केंद्र है)। मार्कण्डेय ऋषि का कथन है कि हाथ पाँव सबसे प्रथम बनते हैं, चूँकि गर्भ की सब चेष्टाएँ इन्हीं के वश में हैं। सुभूति गौतम का मत है कि मध्य शरीर सबसे प्रथम बनता है, चूँकि सम्पूर्ण शरीर का आश्रय यही है।
भगवान् धन्वन्तरि का कथन है कि ये सब विचार ठीक नहीं हैं, गर्भ के सब अंग-प्रत्यंग एक साथ बनते हैं, परन्तु अतिसूक्ष्म होने के कारण पता नहीं लगता। जिस प्रकार बाँस के अंकुर तथा आम के फल में होता है। यथा—आम फल के पक जाने पर केशर, मांस (गुदा), अस्थि (गुटली), मज्जा (गिरी) प्रथम प्रथम दीखने लगते हैं, यह सब कालवश से हो जाता है, परन्तु यही वस्तुयें कन्चे फल में उपलब्ध नहीं होतीं—क्योंकि ये सूक्ष्म होती हैं। समय पर ये सूक्ष्म केशरादि स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार से वंशांकुर को भी समझना चाहिये। इसी तरह गर्भ की तरुणावस्था में सब अङ्ग-प्रत्यंग होने पर भी सूक्ष्म होने के कारण ही उपलब्ध नहीं होते। यही अङ्ग-प्रत्यंग समय आने पर स्पष्ट हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—चेतनामय शुक्र शोणित का मिश्रण-बीज उक्त सब ऋषियों के मत में शिर आदि अवयवों का उपादान होता है और अपने २ मत की पुष्टि में सबने हेतु भी दिये हैं और यह सब मत उनके दृढ़ मत हैं अतः भगवान् धन्वन्तरि ने उनका स्मरण किया है और सबल खण्डन भी नहीं किया है केवल ‘तत्तु न सम्यक्’ अर्थात् वह बहुत ठीक नहीं कहकर अपने मत का प्रतिपादन किया है। उन मतों की अपेक्षा धन्वन्तरि का मत अधिक युक्तिसंगत है इसी का समर्थन श्री पुनर्वसु ने भी (च० शा० अ० ६ में) किया है। बीज में समस्त शिर आदि अवयव सूक्ष्म रूप से विद्यमान होते हैं जो काल पाकर कुछ गर्भाशय में और कुछ जन्म के पश्चात् व्यक्त होते हैं यथा जन्म से ७-१२ मास में २४ दाँत उत्पन्न होते हैं और उनके गिर जाने पर पुनः ३२ दन्त उगते हैं, यौवन में दाढ़ी मोठ आदि व्यक्त होते हैं ॥३३॥
तत्र गर्भस्य पितृजमातृजसजात्मजसत्त्वजसाल्यजानि शारीरलक्षणानि व्याख्यास्यामः। गर्भस्य केशरमांसश्रुलोमास्थिनखदन्तशिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि, मांसशोणितमेदोमज्जहृन्मिथ्यकृतलीहान्त्रगुदप्रभृतीनि सृद्गनि मातृजानि, शरीरोपचयो बलवर्णः स्थितिहानिश्च रसजानि, इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः मुखदुःखादिकं चात्मजानि, सत्त्वजान्युत्तरवद्यमः, वीर्यमारोग्यं बलवर्णो मेधा च सात्म्यजानि ॥३३॥
अब गर्भ के पितृज, मातृज, रसज, आत्मज, सत्त्वज, सात्म्यज-शरीर लक्षणों की व्याख्या करते हैं। गर्भ के केशर, मांस, श्रु, लोम, नख, अस्थि, दांत, शिरा, स्नायु, धमनी और वीर्य आदि स्थिर वस्तुयें पिता के अंश से उत्पन्न होती हैं। मांस, रक्त, मेद, मज्जा, हृदय, नाभि, यकृत, प्लीहा, आँतें, गुदा आदि कामक वस्तुयें माता से उत्पन्न होती हैं। शरीर का उपचय (गठन), बल, वर्ण, स्थिति, हानि रसजन्य हैं। इन्द्रियाँ,