सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १]
शारीरस्थानम्
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उत्पन्न करती है। जिस स्त्री की मृग मांस में रुचि होती है वह विक्रांत (उद्योगी), जंचाल (जोर से दौड़नेवाला) तथा सदा वन में घूमनेवाले पुत्र को उत्पन्न करती है। सुमर (मृग भेद या चंवर) मांस की इच्छावाली स्त्री चंचल मनवाली संतान को, तीतर के मांस की इच्छावाली स्त्री डरपोक संतान को उत्पन्न करती है इनसे अनुक्त = न कहे पदार्थों में गर्भवती स्त्री जिस जिस प्रकार की कामना करती है, वह उन्हीं पदार्थों के समान शरीर-आचार और स्वभाववाली संतान को उत्पन्न करती है।
वि० मन्तव्य—विक्रान्त—लम्बी डग भरनेवाला या छलांग मारनेवाला, जङ्गाल—लम्बी टाँगोंवाला ॥२२-२८॥
कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुत्रर्भवत्।
यथा तथा दैवयोगाहौर्हृदं जनयेद्बुद्धिं ॥२९॥
पूर्वजन्म के कर्मों के कारण से ही बालक का भविष्य (जन्म अगल शरीर) बनता है। इसी प्रकार दैवयोग (प्राकृत कर्मों के कारण) से ही हृदय में दौहद (इच्छा) उत्पन्न होती है ॥२९॥
पञ्चमे मन्त्रः प्रतिबुद्धतरं भवति, षष्ठे बुद्धिः, सप्तमे सर्वज्ञप्रत्यक्षविभागः प्रत्यक्षतरः, अष्टमेऽस्थिरीभवस्योजः, तत्र जातश्चेन्न जीवेश्विरोजस्त्वात्तैर्नृत्तभागत्वाच्च ततो वलिं मांसौदनमस्मै दापयेत्, नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन्जायते अतोऽन्यथा विकारी भवति ॥३०॥
पांचवें मास में मन अधिक प्रबुद्ध हो जाता है (क्रियाशील हो जाता है)। छठे मास में बुद्धि और सातवें मास में सब अंग-प्रत्यंग का विभाजन अत्यंत स्पष्ट हो जाता है। आठवें मास में ओज अस्थिर रहता है। इस मास में यदि बालक उत्पन्न हो जाये तो वह जीता नहीं क्योंकि इसके ओज को निष्क्रिय (राक्षस) छीन लेते हैं, अतः मांस और चाबलों की बलि निष्क्रिय के लिये देनी चाहिये। आठवें मास के बाद नवम-दशम-ग्यारह और बारहवें किसी एक मास में प्रसव हो जाता है। इसके आगे गर्भ की विकृति समझनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—ज्यों ही आठवें मास में प्रसव होने लगे लोहौ मांसोदन की बलि दे देना चाहिये। कोमारभृत्य का कथन है अष्टम मास में जन्म लेनेवाले के ओज को राक्षस खा
१ ओज—जब माता में पहुँचा हो तब यदि शिशु का प्रसव होता है तो मरा होता है। यदि ओज शिशु में हो, तब प्रसव होता है तो वह निर्बल होने के कारण अधिक समय नहीं जीता। इसलिए यह कहा है कि—
“अष्टमे मासि जातस्य हरन्त्योजो निशाचराः।”
२ गर्भावस्था के विस्तृत लक्षणों के लिये—घात्रीशिक्षा, युष्मृत-शारीर (जयदेव) देखिये।
जाते हैं शेष देखिये उ० तं० अ० २७। चरक का कथन है कि—अष्टम मास में गर्भ माता से और माता गर्भ से—रस-वाहिनियों द्वारा बार-बार ओजस् को परस्पर आदान-प्रदान करते रहते हैं, फलतः ओजस् के अनवस्थित रहने के कारण उस मास में गर्भ का जन्म व्यापत्तिमान् होता है। च० शा० अ० ४। सातवें मास में जन्मा जीवित रहता है भले ही कुछ दुर्बल एवं कृश रहता है। १२ मास के पश्चात् भी उपविष्टक एवं नागोदर नामक गर्भ गर्भाशय में पड़े रहते हैं, चिकित्सा करने अथवा स्वतः पोषण प्राप्त होने पर—कई वर्ष पश्चात् जन्मते हैं। देखिये च० शा० अ० २ तथा अ० ८ ॥३०॥
मातुस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाडीप्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहाररसवीर्यमभिवहति। तेनोपस्तेहेनास्याभिबुद्धिर्भवति। असंजाताङ्गप्रत्यङ्गप्रविभागमानिषेकात् प्रभृति सर्वशरीरावयवानुसारिणोनां रसवहानां तिर्गभगतानां धमनीनामुपस्तेहो जीवयति ॥३१॥
माता की रसवहा नाड़ी में गर्भ की नाभिनाड़ी बँधी होती है। यह गर्भनाभि-नाड़ी माता के आहार-रस-वीर्य को बालक में पहुँचाती है। इस नाड़ी द्वारा उपस्तेहन-पोषण मिलने के कारण गर्भ बढ़ता है। योनि में शुक्लचिन्तनरूपी गर्भाधान किया से प्रारम्भ करके जब तक संपूर्ण अंग-प्रत्यंगों का विभाग पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक शरीर के सम्पूर्ण अवयवों में—तियंग रूप में व्याप्त रसवहा धमनियों द्वारा ही उपस्तेहन होने से गर्भ जीवित रहता है।
वि० मन्तव्य—रसवहा-रसमय रक्तवहा नाड़ी-नाली सिरा—जो गर्भाशय का तर्पण करती है और जो “त एव रक्तं अभिवहतः विसृजतः च नारीणां आर्त्तवसंज्ञम्” सु० शा० अ० ६-७ में वर्णित है यह वाम दक्षिण भाग में दो हैं। जो गर्भ के पूर्व तथा पश्चात् आर्त्तव का वहन एवं विसर्जन करती हैं वे ही गर्भाधान हो जाने पर—गर्भ का पोषण करती हैं। भोज के शब्दों में—गर्भ उन रसमय रक्त के स्रोतों को रोक देता है—फलतः मासिक रजःस्त्राव नहीं होता परन्तु उस रसमय रक्त से—जरायु का
१ उपस्तेहन का अर्थ—“यथा पूर्णं सरः सलिलोपस्तेहः चत्वरं जाततश्कदम्बकं जीवयति तद्भूत् प्राणधारणं करोति। तथा च भोजः—गर्भो रूण्द्रि स्रोतांसि रसरक्तवहानि वै। रक्ताज्जरायुर्भवति नाडी चैव रसात्मिका ॥ सा नाडी गर्भमाप्नोति तथा गर्भस्य वर्त्तनम् ॥ यद्यदस्नाति मातास्य भोजनं हि चतुर्विधम्। तस्मादस्नाद्रीसीभूतं वीर्यं द्रष्टा प्रवर्तते। भागः शरीरं पुष्णाति स्तन्यं भागेन वर्धते ॥ गर्भः पुष्यति भागेन वर्धसे च यथाक्रमम् ॥ गर्भकुल्येव केदारं नाडी प्रीणाति तर्पिता ॥ उपासन्नं निष्पन्देन स्नेहयतीत्युपस्तेहः।