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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शरीरस्थानम्

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इधर उधर वह जाने से रोकता है वह त्वचा ही है। वही काल एकर उक्त रूप धारण कर लेती है। इन स्तरो की मोटाई का उल्लेख पूर्ण स्वस्थ के लिये है ॥४॥

कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तरमर्यादाः ॥५॥

धातुओं (रस-रक्तादि तथा कफ, पित्त, मलादि) के आशयों में सीमा (मर्यादाभूत) कलायें (Membrans) भी सात हैं।

वि० मन्तव्य—धातु-पदार्थ तथा धातु के आशय के अन्तर मध्य की मर्यादा “कला” कहलाती है। जैसे कटोरा में कागज धरकर कोई वस्तु धरी जाती है वैसे ही आशय में कला रहती है, मांसधरा कला मांस पेशियों पर लिपटी रहती है ॥५॥

भवतश्चात्र—

यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते।

तथा हि धातुमार्गेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ॥६॥

स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नान् सन्ततांश्च जरायुणा।

श्लेष्मणा वेष्टितान्नापि कलाभागान्स्तु तान् विदुः ॥७॥

कहा भी है—जिस प्रकार वृक्ष के काष्ठ को काटने से सार दीखने लगता है (रस बहने लगता है), उसी प्रकार मांस के काटने पर धातु (रस-रक्तादि) दीखने लगते हैं। जो स्नायुओं द्वारा मली प्रकार से ढँपे होते हैं, जरायु (उल्वा शिल्ली) से सम्यक् प्रकार से व्याप्त होते हैं, तथा कफ से घिरे रहते हैं, उनको कला कहते हैं १।

वि० मन्तव्य—हमारे विचार में छठे श्लोक का उत्तरार्ध “तथा कलासु धातुर्हि छिद्यमानासु दृश्यते” होना चाहिये अर्थात् वैसे ही कला के कट-फट जाने पर धातु—उसके भीतर का पदार्थ दिखाई पड़ता है—आशय के कट जाने पर भी यदि उसके भीतर की कला न कटे तो उसके भीतर का पदार्थ दिखाई नहीं पड़ता। और छठे श्लोक के आगे—‘धात्वाशयान्तरं दृश्यं यः क्लेदस्त्वथितिक्षति। देहोष्मणा विपक्वस्तु सा कला इत्यभिधीयते ॥’ पाठ होना चाहिये। अर्थात् धातु एवं आशय के मध्य में जो क्लेद—पिच्छल द्रव रहता है वह शरीर की उष्मा से परिपक्व होकर—कागज का सा होकर “कला” कहलाता है। यह माड़ी एवं सोम से पालिश किये रेशमी कपड़ा की सी होती है। कपड़ा के धागे स्नायु, माँड़ी जरायु तथा सोम श्लेष्मा कहा जा सकता है ॥६,७॥

१. वृद्ध वामभट्ट ने कहा है—“यस्तु धात्वाशयान्तरेषु क्लेदोऽवलिष्ठो यथा स्वमूषमभिर्विपक्वः स्नायुश्लेष्म जरायुच्छनः काष्ठ इव सारो धातुरससोषाल्पत्वात् कलासंज्ञः।”

तासां प्रथमा मांसधरा यस्या मांसे शिरास्तानु-धमनीसौन्तासां प्रताना भवन्ति ॥८॥

सात कलाओं में प्रथम कला का नाम ‘मांसधरा’ है। इसमें से होकर ही शिरा, धमनी, स्नायु और स्रोत—इनकी शाखायें मांस में पहुँचती हैं।

वि० मन्तव्य—यह मांसपेशियों पर लिपटी रहती है। इसी के कारण मांस मांसपेशियों में विभक्त रहता है ॥८॥

यथा विसमृणालानि विवर्धन्ते समन्ततः।

भूमौ पङ्कोदकस्थानि तथा मांसे सिरादयः ॥९॥

कहा भी है—जिस प्रकार से विस और मृणाल कीचड़-भूमि तथा पानी में रहकर चारों ओर बढ़ते हैं, इसी प्रकार से मांस में शिरा आदि (Blood vessels) चारों ओर फैलते हैं ॥९॥

द्वितीया रक्तधरा मांसस्याभ्यन्तरतः, तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतः प्लोहोश्च भवति ॥१०॥

दूसरी कला का नाम ‘रक्तधरा’ है, यह कला मांस के अन्दर रहती है। इसमें रक्त का संवहन होता है। यह कला विशेषकर शिराओं में, यकृत और प्लीहा में रहती है ॥१०॥

वृक्षावथाभिप्रहृतात् क्षोरिणः क्षोरमावहेत्। मांसादेवं क्षतान् क्षिप्रं शोणितं संप्रसिच्यते ॥११॥

कहा भी है—वृक्षवाले वृक्षों पर चोट लगने से जैसे उनमें से दूष बहने लगता है, इसी प्रकार मांस पर आघात होने से रक्त शीघ्र बहने लगता है ॥११॥

तृतीया मेदोधरा, मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च, महत्सु च मज्जा भवति ॥१२॥

तीसरी कला का नाम ‘मेदोधरा’ है। सब प्राणियों के उदर में तथा सूक्ष्म अस्थियों में मेद, तथा बड़ी अस्थियों में मज्जा रहती है। यह कला मेद और मज्जा को धारण करती है ॥१२॥

स्थूलस्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तराश्रितः।

अथैतरेषु सर्वेषु सरक्तं मेद उच्यते।

शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ॥१३॥

विशेषकर स्थूलस्थियों के मध्य में मज्जा रहती है, छोटी अस्थियों में रक्तयुक्त मेद रहता है। शुद्ध मांस के स्नेह को वसा कहते हैं ॥१३॥

१. कविराज गणनाथ सेनजी ने इनमें, निम्न मेद किये हैं।

यथा—‘मेदो नाम सान्द्रसिन्धुल्यः स्नेहधातुः शरीरस्य। वसा तु—मांसान्तरानुप्रविष्टः स्नेहः। मज्जा—अस्थिमध्यगतः स्नेहः। स द्विविधो पीतो रक्तश्च ॥’ प्रत्यक्षं शा० पू० १०।

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सुश्रुतसंहिता

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चतुर्थी श्लेष्मधरा सर्वसन्धिषु प्राणभूतां भवति ॥१४॥

चौथी कला का नाम 'श्लेष्मधरा' है। यह कला प्राणियों की सब सन्धियों में रहती है ॥१४॥

स्नेहाभ्यक्ते यथा ह्युत्ते चक्रं साधु प्रवर्तते।

सन्धयः साधु वर्तन्ते संहिल्लशः श्लेष्मणा तथा ॥१५॥

जैसे चक्र के अक्ष (धुरी) के स्नेह आदि से चिकना होने पर पहिया आराम से घूमता है, इसी प्रकार श्लेष्मा से युक्त सन्धियाँ भी अपना काम भली प्रकार से करती हैं ॥१५॥

पञ्चमी पुरीषधरा नाम, याऽन्तःकोष्ठे मलमभिबिभजते पक्वाशयस्था ॥१६॥

पाँचवीं कला का नाम 'पुरीषधरा' है। कोष्ठ के अन्दर पक्वाशय में स्थित हुई अन्न को मलरूप में विभक्त करती है ॥

यकृतसमन्तात् कोष्ठं च तथाऽन्नाणि समाश्रिता ॥

उण्डु (न्दु) कस्थं विभजते मलं मलधरा कला ॥१७॥

'मलधरा' कलाकोष्ठ में यकृत से आरम्भ होकर सब आँतों में व्याप्त होती हुई उण्डुक (caccum) स्थित मल को पृथक् करती है। मल का विभाग अग्नि तथा वायु के कारण से होता है। उण्डुक तक मल के साथ अन्न का कुछ भाग मिला रहता है। परन्तु उण्डुक में पहुँचने पर सार भाग आँतों से खींचा जाता है, केवल पानी का भाग ही रहता है और कुछ नमक रहता है। बृहदंत्र का भाग इनको मल से पृथक् कर लेता है, इस प्रकार से मल ही बाहर होता है ॥१७॥

षष्ठी पित्तधरा, या चतुर्विधमन्तपानसामाशयान् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ॥१८॥

छठी कला का नाम 'पित्तधरा' है। यह कला चारों प्रकार के खाये अन्न-पान को आमाशय से निकालकर पक्वाशय में जाने के लिये धारण करती है, इसी को ग्रहणी कहते हैं ॥१८॥

१. "तथा च—अनिकृतो यथा—विवेचयति च रसमृत्रपुरोधाणि। माक्षतकृतो यथा—सोऽन्नं पचति तज्जाशविशेषान् विविनक्ति।" कोष्ठ का लक्षण—

"स्थानान्यामानिपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। हृदुण्डुकः फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥" पाचन के लिये 'हमारे शरीर की रचना' देखिये।

२. पित्तधरा—"षष्ठी पित्तधरा नाम। पक्वाशयामाशयमध्यस्था, सा ह्यन्तरन्यधिष्ठानतमा आमपक्वाशययोरभ्यं चतुर्विधम अन्नं बलेन विधार्य पित्ततेजसा शोषयन्ती पचति। पक्वं च विमुञ्चति। ततोऽसावन्नस्य ग्रहणात् पुत्रग्रहणी संज्ञा। बलं च तस्याः पित्तमेवात्म्यभिधानमृतः ॥" अष्टौगसंघट्टः।

अग्निं खादितं पीतं लीडं कोष्ठगतं नृणाम्।

तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा ॥१९॥

कहा भी है—अशित (खाया हुआ) पीत खादित और लीड चार प्रकार का भोजन कोष्ठ में पहुँचकर पित्त की उष्णमा से सुखाया जाकर यथासमय में सुखपूर्वक पचता है।

वि० मन्तव्य—जीर्यति—पच जाता है अर्थात् सार एवं किङ् रूप में विभक्त हो जाता है, ग्रहणी में ही आहार का सारस ग्रहीत होकर शरीर पोषणार्थ पृथक् हो जाता है ॥१९॥

सप्तमी शुक्रधरा, या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ॥

सातवीं 'शुक्रधरा' नाम कला है। यह कला सब प्राणियों के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है ॥२०॥

यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्वेक्षौ रसो यथा।

शरीरेषु तथा शुक्रं नृणां विद्याद्विष्वरः ॥२१॥

जिस प्रकार कि दूध में घी गन्ने में रस गूढ़ छिपा हुआ है, उसी प्रकार मनुष्यों के शरीर में शुक्र को समझना चाहिये। (शुक्र शरीर के प्रत्येक कण कण में व्याप्त है) ॥२१॥

द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः।

मूळक्षोतःपथाच्छुक्लं पुरुषस्य प्रवर्तते ॥२२॥

बस्तिद्वार के नीचे दो अंगुल दक्षिण पार्श्व में—मूत्रक्षोत के मार्ग से ही पुरुषों में शुक्र प्रवृत्त होता है।

वक्तव्य—सप्तमी शुक्रधरा द्वयङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाधो मूत्रमार्गमाश्रिता सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्चयति ॥ बृद्धवामह। द्वयङ्गुले दक्षिणे इत्यादि—इत्यत्र द्वयङ्गुले दक्षिणे वामे इत्येव साधीयान् पाठः—अन्यथा प्रत्यक्षविरोधः (प्रत्यक्षशरीर उपोद्घात पृ० ७२)।

वि० मन्तव्य—शुक्रवहे द्वे क्षोतसी सु० शा० अ० ६। शुक्रवाही दो क्षोतस् हैं। ये बस्ति—मूत्राशय द्वार के दो अंगुल नीचे पुमान् के मूत्रमार्ग में खुलते हैं। अतः "दक्षिणे वामे" यह पाठ साधीयान् है। और नारी के भग की दीवारों में अनेक-सुखी होकर व्याप्त रहते हैं। मैथुन आदि के समय शुक्र समस्त शरीर से आकर इन्हीं क्षोतों में से होकर बाहर आता है, शुक्र को सर्वदा बहने से रोकनेवाली "शुक्रधरा" कला है। शेष देखिये—सु० नि० अ० १० श्लोक० १८-२२ ॥२२॥

कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसतस्था।

क्षीषु न्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् संप्रवर्तते ॥२३॥

शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। प्रसन्न मन के कारण, स्त्रियों में सम्मोग करने पर, हर्ष के कारण वह शुक्र प्रवृत्त होता है।

अं. ४ ]

शारीरस्थानम्

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वक्तव्य—संकल्पो वृष्याणाम् श्रेष्ठतमः, चरक । हर्षात्तर्घा- त्सरवाच्च पेक्खिल्याद् गौरवादपि । अणुप्रवणभावान्च द्रुतत्वा- न्माक्षतस्य च ॥ अष्टाध्याय एभ्यो हेतुभ्यः शुक्लं देहात् प्रसिच्यते ॥ तत् क्षीणुषसंयोगे च्छेदा-संकल्प-पीडनात् । शुक्लं प्रच्यवते स्थानाज्बलमाद्वि पटादिव ॥ चरक-० वि० अ० २ ॥ २३ ॥

गृहीतगर्भाणामातृत्ववहानां स्त्रोतसां वत्सोऽन्यवदृश्यन्ते गर्भेण, तस्माद् गृहीतगर्भाणामातृत्वं न दृश्यते; ततस्तद्वधः प्रतिहतमूर्ध्वमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभिधीयते, शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोऽन्ततपयोधरा भवन्ति ॥ २४ ॥

स्त्री के गर्भवती होने पर गर्भ के कारण आर्तत्ववह स्त्रोत बन्द हो जाते हैं। इसलिये गर्भवती स्त्री में आर्तत्व का दर्शन नहीं होता। यह आर्तत्व नीचे रुक जाने से ऊपर की ओर आकर और अन्य आर्तत्व उपचित-सञ्चित होते २ बढ़ते जाने पर, 'अपरा' शब्द से कहा जाता है। शेष बचा आर्तत्व ऊपर आकर स्तनों में पहुँचता है। इसलिये गर्भवती के स्तन मोटे और भारी तथा उन्नत हो जाते हैं।

वि० मन्तव्य—तात्पर्य—आर्तत्व-मासिक रजस्वी रुककर सञ्चित होता हुआ "अपरा" जरायु तथा नालिका रूप धारण कर लेता है और उसका कुछ भाग स्तनों को पुष्ट करने लगता है ॥

गर्भस्य यकृतप्लीहानौ शोणितजौ, शोणितफेनप्रभवः फुफ्फुसः, शोणितकिट्टप्रभव उण्डुकः ॥ २५ ॥

गर्भ के यकृत-प्लीहा रक्तजन्य हैं। फेफड़े रक्त की क्षाग से बनते हैं उण्डुक रक्त के किट्ट से बनता है।

वि० मन्तव्य—गर्भ यकृत एवं प्लीहा का निर्माण रक्त से होता है और रक्त का निर्माण भी ये ही करते हैं। 'स खलु आप्यो रसो यकृत प्लीहानो प्राप्य रागमुपैति' (सू० सू० अ० १४)। जन्म से २-३ मास तक तत्पश्चात् बालक ज्यों २ बड़ा होता है यकृत पशुकाओं से बाहर उदर में स्पशॉपलभ्य रहता है यकृत पशुकाओं के पञ्जर के अन्दर हो जाता है, फिर कभी ज्वर आदि कारणों से बढ़कर उदर में स्पशॉपलभ्य हो जाता है, प्लीहा की दशा भी ऐसी ही रहती है। ज्वर आदि से वह भी बढ़ जाती है। फुफ्फुस या फुफ्फुस- रक्त की फेन से निर्मित होता है, और स्वरूपतः भी फेन-क्षाग के गुप्क जैसा ही होता है, यह उदान-प्राण मिश्रित— श्वास उच्छ्वास का साधन है, "उदानवायोः आधारः फुफ्फुस गोच्यते बुधैः ॥" कण्ठ से श्वास मार्ग का प्रारम्भ होता है और आगे जाकर वह दो भागों में विभक्त हो जाता है और दोनों फुफ्फुसों में चला जाता है और आगे फुफ्फुसों में जाकर फेन- सदृश असंख्य कोष्ठ प्रकोष्ठों में विभक्त होकर समस्त फुफ्फुसों

में व्याप्त हो जाता है। फलतः श्वास द्वारा गृहीत वायु फुफ्फुस के कोने-कोने में जा सकता है। इन्हीं का नाम-फेफड़ा है, यह वायु के प्रवेश से कुछ फूलते और निकलने से कुछ संकुचित होते रहते हैं। फुफ्फुसों को गर्भ का वर्णन करते हुए श्री धन्व- न्तरि ने—अध्याय ६ में स्तनमूल, स्तनरोहित, अपलाप नामक ३ अवयवों में विभक्त माना है और श्वास मार्ग के फुफ्फुसों में जानेवाले दोनों मार्गों को अपस्तम्भ कहा है। देखिये शा० अ० ६-२५। फुफ्फुसायते इति फुफ्फुसः-श्वासक्रिया में फुफ्फु- साते हैं—अतः फुफ्फुस कहे जाते हैं। आशयों का वर्णन करते समय इनको वाताशय कहा गया है (सू० शा० अ० ५)। फुफ्फुसों में सर्वदा वायु भरा रहता है, जितना श्वास में भीतर जाता है उतना उच्छ्वास में निकल जाता है। उण्डुक या उन्दुक—उन्दी-कलेदने धातु (वधादिगण) से उन्दुक शब्द बनता है। अर्थ है जो आर्द्र करता है या जिसके द्वारा आर्द्र किया जाता है—मलद्रव का जलांश यहीं से समस्त शरीर में पहुँचता है, जिससे शरीर आर्द्र बना रहता है। देखिये इसी अध्याय का श्लोक १७ ॥ २५ ॥

असृजः श्लेष्मगन्धश्चापि यः प्रसादः परो मतः। तं पञ्चयमानं पित्रेन वायुश्चाप्यनुवावति ॥ २६ ॥ ततोऽस्यान्त्राणि जायन्ते गुदं बस्तिश्च देहिनः। उदरे पञ्चयमानानामाधमानादुक्तमसारवत् ॥ २७ ॥ कफशोणितमांसानां साराज्जिह्वा प्रजायते। यथार्थमृदमणा युक्तो वायुः स्त्रोतांसि दारयेत् ॥ २८ ॥ अनुप्रविश्य पिशितं पेशीविभजते तथा। मेदसः स्नेहमाद्याय सिरा स्नायुत्वमानुयात् ॥ २९ ॥ सिराणां तु मृदुः पाकः स्नायूनां च ततः खरः। आशयाभ्यासयोगेन करोत्याशयसंभवम् ॥ ३० ॥

रक्त और कफ का जो अति उत्तम भाग है, उसका पित्र से परिपाक होते समय वायु भी इसमें भाग लेता है। इससे गर्भ के अन्त्र, गुदा, बस्ति बनते हैं। उदर में पचते हुए कफ, रक्त और मांस के सार से जिह्वा उत्पन्न होती है। जिस प्रकार घोंकने पर स्वर्ण का सार मात्र ही बचता है, जिस प्रकार यथा- योग्य उष्णिमा से युक्त वायु स्त्रोतों को विभक्त करता है उसी प्रकार वायु मांस में प्रविष्ट होकर पेशियों को विभक्त करता है। शिरा मेद से स्नेह को लेकर स्नायुरूप बनती है। शिराओं का पाक मृदु रहता है, और स्नायुओं का इनसे खर (कठोर) रहता है। बारम्बार स्थिर रहने का अभ्यास करने से वायु आशयों को उत्पन्न करती है।

वक्तव्य—श्री पं० हरिप्रभञ्जी ने 'शिरा स्नायुत्वमानुयात्' के स्थान पर 'शिरा स्नायुत्वमप्यथ' पाठ बदला है। उनके

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सुश्रुतसंहिता

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अर्थ में वायु अन्त्र से स्नेह को लेकर मेद को उदर में एकत्रित करती है। इस मेद के स्नेह के मुदुपाक होने से शिरायें और खर पाक होने से स्नायु उत्पन्न होते हैं। यही वायु मांसपेशियों में सब ओर निवास करके हृदय आदि आशयों को उत्पन्न करती है। (रसयोगसागर ० पु० ११३, ११४)।

वि० मन्तव्य—अन्त्र—आमाशय एवं पक्वाशय के मध्य-वर्ती नली का नाम अन्त्र है। इसकी लम्बाई साढ़े तीन व्यास होती है, १—व्यास=४ हाथ, ३। व्यास=१४ हाथ=२१-२२ फुट। नात्रियों में यह आधा व्यास छोटी होती है। अमृ गतों धातु (भ्वादि गणीय) से अन्त्र शब्द बनता है—अर्थात् जो गति करती है या जिसके द्वारा लाया हुआ आहार गति करता है। इसी गति के कारण—आहार-आमाशय से अन्त्र में, अन्त्र से मलाशय में और मलाशय से गुद द्वारा बाहर चला जाता है। वस्ति का वर्णन सु० नि० अ० ३ में देखिये। गुद का वर्णन अ० २ में देखिये। और शा० अ० ५-६ तथा शा० अ० ६—२५ देखिये। जिह्वा—रसनेन्द्रिय तथा वाग्निन्द्रिय का अधिष्ठान है। इसके द्वारा मधुर अम्ल आदि रसों का अनुभव होता है और बोला जाता है। यह कफ शोणित तथा मांस के सार से बनी है, यथा—जिह्वा अधिकतर मांस से बनी है, मांस के ऊपर श्लेष्मिक मोटी कला चढ़ी रहती है। यह कई मांस पेशियों द्वारा अधो हन्वस्थित से जुड़ी रहती है। यह संकोच से छोटी और प्रसार से बड़ी-चौड़ी हो जाती है। इस पर छोटे २ अङ्कुर होते हैं, इन्हीं से रस का ग्रहण—अनुभव होता है। यह कफ रसन नामक कफ है, जिससे आर्द्र रहने पर इसका अनुभव होता है 'रस्यते अनेन इति रसनः'। पेशी—शरीर पर जितना भी मांस है वह मांस पेशियों में विभक्त है और मांस पेशियों के आकार भिन्न २ होते हैं। उन पर मांसधरा कला लिपटी रहती है। देखिये मांसधरा कला अ० ५ का सु० ३७-४१। शिरा—इसके लिये देखिये सु० शा० अ० ७। और स्नायु के लिये देखिये—अ० ५। आशय—इसके लिये देखिये—शा० अ० ५-८। इसका अर्थ है—जिसमें कोई वस्तु आकर शयन करती है, कुछ समय के लिये रुकती है। गर्भ निर्माण के समय केवल वायु उन स्थानों में जहाँ आशय की आवश्यकता होती है आकर रुककर आशय का निर्माण कर देता है। इस परिभाषा के अनुसार हृद्रान्त, शिरा तथा शुक्रवाही स्रोत आदि को आशय कहना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें ॥ २६-३० ॥

रक्तमेदः प्रसादाद् शुक्ती, मांसासक्तफमेदः प्रसादाद् वृषणी, शोणितकफप्रसादजं हृदयं, यदाश्रया हि धमन्यः

प्राणवहाः, तस्याधो वामनतः प्लीहा फुफ्फुसश्च, दक्षिणतो यकृतं क्लोम च, तद्विशेषेण चेतनास्थानम्, अतस्तस्मिन् स्तमसाऽऽवृते सर्वप्राणिनः स्वपन्ति ॥ ३१ ॥

रक्त और मेद के सार से वृक्क बनते हैं। मांस-रक्त-कफ मेद के सार भाग से वृषण, रक्त-कफ के सार भाग से हृदय उत्पन्न होता है। क्योंकि प्राणवहा धमनियाँ इसी हृदय के आश्रित हैं। इस हृदय के नीचे वाम पार्श्व में प्लीहा और फेफड़े, दक्षिण पार्श्व में यकृत और क्लोम है। यह हृदय विशेष रूप में चेतना का स्थान है। इसीलिये इस हृदय के तम से द्यं जानने पर सब प्राणी सोते हैं।

वि० मन्तव्य—वृक्क—गर्भ के वृक्क—रक्त एवं मेद से के प्रसाद—स्वच्छ सार भाग से निर्मित होते हैं। अतएव वे-रक्त में से अनुपयोगी अंश को छानकर मूत्र का निर्माण करते और मेद से रक्षा करते हैं—बहने से रोकते हैं। ये दो होते हैं, जन्म हो जाने पर क्रियाशील होते हैं, उदर के भीतर-पिल्ली और पृष्ठवंश के दाहिनी एवं बाईं ओर रहते हैं, उनके सामने अन्त्र गेण्डली मारे पड़ी रहती है, ये दोनों ओर की बारहवों पशुकाओं के नीचे फलतः सुरक्षित भी रहते हैं। इनकी आकृति लोबिये के बीज जैसी होती है, यौवन में—इनकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई २३ इञ्च, मोटाई १ इञ्च (लगभग) होती है, भार २ छुट्टाई से कुछ कम, रङ्ग बैंगनी होता है। इसीसे मूत्रवाही स्रोत—(गवोनी) निकलकर मूत्राशय में पहुँचते हैं। वृषण—वर्षति शुक्र—जो शुक्र को बरसाता है, इसका नाम मुष्क भी है, जो शरीर से शुक्र को सुरक्षा है—सुपके से ले लेता है, अण्ड—अयति अस्मात् शुक्रम् इति जहाँ से शुक्र चलता है, अण्डकोष—अण्डों का कोश-थेला। यह वृषण दो हैं, गर्भ के अण्डकोष में नहीं उत्तरते, शिरन मूल के दोनों ओर पड़े रहते हैं, जन्म के कई दिन पश्चात् कोष में आ जाते हैं। कोष एक सूक्ष्म झिल्ली द्वारा दो भागों में विभक्त रहता है, उनमें दोनों अण्ड (अण्डाकार ग्रन्थियाँ) शिराओं तथा लसीका वाहिनियों द्वारा अवलम्बित होकर लटके रहते हैं, इतना ही नहीं, उक्त शिरा तथा लसीका वाहिनियाँ नालियों द्वारा उनका पोषण भी होता है और उनमें शुक्र का निर्माण भी, उनमें से दो नालियाँ आकर 'शुक्रवहे द्वे'—शुक्रवाही दोनों स्रोतों से सम्बद्ध रहती हैं, जिनके द्वारा शुक्र शुक्र-स्रोतों में पहुँचता है। इन सब अवयवों की क्रिया भी यौवन में पूर्णरूप से सम्पन्न होती है। गर्भनिर्माण काल में इनका निर्माण—मांस, रक्त, कफ एवं मेद से होता है। जैसे सूर्या आदि के अण्डों में जीव रहता है वैसे ही इनमें भी जीव रहता है जो शुक्र के साथ आकर—शोणित से मिलकर—उत्पन्न

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शरीरस्थानम्

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परिस्थिति पाकर—अपना शरीर बना लेता है। अतएव पिता कहता है—आत्मा वे पुत्रनामासि—तू आत्मा ही पुत्र नाम हो और शुक्र देहात् प्रसिच्यते—चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यं यदुच्यते ॥ न० वि० अ० २-४६। अंगात् अंगात् सम्भवसि अर्थात्—जो शुक्र देह से परीजता है—परीज कर शुक्रवह खोतों द्वारा गर्भाशय में पहुँचता है। वह गतिशील—ज्ञान, गमन प्रातिशील विश्वरूप—आत्मा का रूप—चतुर्प्राक्ष द्रव्य है। वे पुत्र ! तू अंग अंग से उत्पन्न होता है। अतएव न-सु०शा०अ० २-श्लो० ३३ में—बुध आदि के बीज को शुक्र की उपमा दी गई है और इसी अशय २ का ४७ श्लोक भी देखिये। हृदय—यह शरीराश्रमक रक्त एवं कफ के प्रसाद से निर्मित होता है। रक्तवाहिनी शिराओं में यहीं से धमान-धमनक्रिया का प्रारम्भ होता है, जिसको देखकर-उनको “धमनी” कहा जाता है, यह हृदय-अमर कोशिक—“हृदयं हृत्” है। इसका पाठ अमर कोश के द्वितीय काण्ड के मनुष्य वर्ग श्लो० ६४ में है। और “चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृत् मानसं मनः।” अ० को० प्र० काण्ड काल वर्ग में भी हृदय एवं हृत् शब्द का उल्लेख है। और उक्त दोनों शब्द—हृदय (हृतिण्ड) तथा (२४ तत्त्वों में १) के वाचक हैं और दोनों के लिये प्रयुक्त भी होते हैं, परन्तु प्रस्तुत हृदय या हृत् शब्द मनुष्यवर्गोक्त हृदय के वाचक हैं, मनस के नहीं और यही हृत् शब्द लैटिन भाषा में परिवर्तित होकर “हार्ट” हो गया है। इसका अर्थ है—हरति रक्तं तथा ह्विते रक्तं अनेन—जो रक्त को लेता है तथा जिसके द्वारा रक्त लिया जाता है—शरीर में प्राप्त किया जाता है, इस हृत् का यही काम है। धमानवाली शिराओं को प्राणवह। इस लिये कहा गया है कि हृत् (हार्ट) के अपने कार्य से वञ्चित (फेल) हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। मस्तिष्क के फेल होने पर मृत्यु नहीं होती। मूर्च्छा में कई घण्टों तथा अभिन्यास में कई दिनों—सप्ताहों तक मानव जीवित रहता है, क्योंकि उनमें हृदय क्रियाशील रहता है। इस सच्चाई पर ध्यान देने से मस्तिष्क को भी प्रस्तुत हृत् समझना कथमपि उचित नहीं है। अलमतिवित्स्तेरण, प्रस्तुतमनुसरासः—हाँ, तो यह हृत् जो गर्भनिर्माण के समय रक्त एवं कफ से निर्मित होता है वह—वक्षस के फुफ्फुसों के अन्तराल में स्थित है, इसकी आकृति अधोमुख पुण्डरीक (कमल) के सदृश है या मुड़ी—अँगूठा ऊपर को निकालकर बाँधी गई मुड़ी के सदृश है। बकरा के हृदय की बनावट भी मानव के हृदय जैसी होती है। इसमें चेतना का विशेष निवास है, अतः कहा जाता है कि जागने का हृदय विकसित होता है और सोने का निमीलित होता है (श्लो० ३२), क्योंकि जागते में चेतना क्रियाशील रहती है और सोते (गाढ निद्रा) में क्रियाशील नहीं रहती, हृदय को पुण्डरीक के सदृश कहा है, अतः

विकसन (खिलना) तथा निमीलन (मिचना) कहा गया है। यह हृदय शिरामर्म है। (देखिये अ० ६ सर्वाशय)। रक्त को ले जाने एवं लानेवाली शिराओं का संयोग स्थल है, या यों कहिये कि—शिरा ने “हृत्” का रूप बना लिया है या शिरा “हृत्” रूप में (आकृति में) परियत हो गई है। और यह रक्ताशय भी है। देखिये अ० ५ का सू० ८। क्योंकि इसमें आकर रक्त एक क्षण के लिये ठहरता है—रक्ता है रक्तर फिर चल पड़ता है ॥३१॥

भवति चान्न—

पुण्डरीकेण सहस्रं हृदयं स्यादधोमुखम्। जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमीलति ॥३२॥

इसमें श्लोक भी है—हृदय कमल के समान (उलटे किये हुए कमल-अर्धविकसित) नीचे की ओर मुख किये हुये है। जागते समय यह विकसित (खिल) रहता है और सोने पर बन्द हो जाता है।

वक्तव्य—“प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते। गोपानसीनमागारं कर्णिकैवार्थचिन्तकैः ॥ तस्योपधातान्मुखार्थं भेदान्मरणमृच्छति ॥” हृदय के अर्थ में विवाद है। हृदय से वर्तमान में ‘हार्ट’ जहाँ लेते हैं, वहाँ मस्तिष्क के वैन्द्दीकल भी लेते हैं। इसके सिवाय हृदय-केन्द्र के लिये भी आयुर्वेद में आता है, यथा—गुल्म चिकित्सा में—“मृदनीयाद् गुल्ममेवैकं नत्वत्र हृदयं स्पृशेत् ॥” वर्तमान हार्ट शब्द से कहे जानेवाले हृदय का आकार कमल के अर्धविकसित फूल को उल्टा करके जिससे नोक नीचे आ जाये, सरीखा कह सकते हैं। तम की प्रवृत्ति मस्तिष्क में है। जाग्रत अवस्था में मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, और सोते समय अक्रियाशील रहता है। चेतना का विशेषकर हृदय स्थान है, क्योंकि—“वेदनानामभिष्ठां मनो-देहश्च सेन्द्रियः। केशलोमन्खाप्रान्तर्मलद्रवगुणैर्विना” ॥३१॥

निद्रां तु वैष्णवो पाप्मानसुपदिशन्ति, सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति। तत्र यदा सञ्जावहानि चोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसौ नाम निद्रा संभवत्यनवबोधिनो, सा प्रलयकाले, तमोभूयिष्ठा-नामहः सु निशासु च भवति, रजोभूयिष्ठा नामान्मिचिन्त, सन्त्वभयिष्ठा नामधरान्ने, क्षोणश्लेष्मणामानलबहुलानां मनःशरीराभितापवर्ता च तैव, सा वैकारिकी भवति ॥३२॥

निद्रा विष्णु की माया की भाँति है, इसे पाप भी कहते हैं। यह निद्रा स्वभाव से ही सब प्राणियों में होती है। जब सञ्जावह खोतों में तम की प्रधानतावाला कफ पहुँच जाता है तब तामसी निद्रा उत्पन्न होती है, इसमें प्राणी जागता नहीं, यह निद्रा

११०

मुक्तसंहिता

[ अ० ]

प्रलय काल में होती है। तम की प्रधानतावाले प्राणियों में दिन में और रात में नींद आती है। रजोगुण की अधिकतावालों को बिना कारण के नींद आती है—(किसी समय नींद आ जाती है)। सत्वगुण की प्रधानतावालों को आधी रात के समय आती है। क्षीण कफवाले, वात प्रधानतावाले, मानसिक और शारीरिक दुःख से पीड़ित व्यक्तियों को नींद नहीं भी आती। यह वैकारिकी (विकारजन्य) निद्रा है।

वक्तव्य—चरक में—“यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः। विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥” नींद सात प्रकार की है, यथा—“तमोभवा र्लेभ्समुद्भववा च, मनःशरीरश्रमसंभवा च। आगन्तुकी व्याधनुवर्तिनी च रात्रि-स्वभावप्रभवा च निद्रा ॥” चरक ० सू ० २१। तामसिक पशु-रात-दिन सोते रहते हैं, यथा भैंस या सिंह। राजस-व्यक्ति—किसी भी समय रात या दिन में नींद पूरी कर लेते हैं। सत्वप्रकृति आधी रात में सोते हैं। प्रातः काल-उपाकाल में सत्व गुण की अधिकता रहने से सब देशों के मनुष्य पूजा-पाठ में, मन्दिरों में जाने की प्रवृत्ति रखते हैं। रात में—सार्थकाल में तमोगुण की अधिकता होने से सब देशों में पापाचार के घर, मदिरालय खुलते हैं, लोग उनका उपभोग करते हैं। प्रातःकाल मद्यपान करता हुआ कोई बिरला ही देखा जाता है। यह स्वभाव से है, सारे संसार के देशों में र्वाज है।

वि० मन्तव्य—निद्रा २ प्रकार की होती है १—वैष्णवी-विष्णु पालन (भरण-पोषण) के अधिष्ठाता हैं, (भारतीय भावना के अनुसार पालक हैं) और वह निद्रा—“रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां मूतधात्रीं प्रबदन्ति निद्राम्” जो रात्रि में स्वभाव से उत्पन्न होती है उसको मूतधात्री—मूत-प्राणी की धात्री—धात्र दूध पिलनेवाली—धारण पोषण करनेवाली निद्रा कही जाती है। और-२-पाप्मा-पाप है—धर्म विरुद्ध है—अध का मूल है—तमो-भवामराहुअवस्थ मूल शेषाः पुनः व्याधिषु निर्दिशन्ति (च० सू० अ० २१) अर्थात् तमोगुण की अधिकता से जो निद्रा होती है वह अव-पाप का मूल है तथा रोग रूप है।

अनवबोधिनी—जिसके आने पर पुनः जागरण नहीं होता, यह प्रलय काल-मृत्यु के समय आती है।

अनिमित्त—जब जागने का कोई निमित्त-कारण नहीं होता तभी आ जाती है। यह रजोगुणी—संसार के कामों में संलग्न प्राणी को आनेवाली निद्रा है, वह प्राणी जब कार्य में लीन रहता है तब नहीं आती, जब खाली होता है तब खट से आ जाती है ॥३३॥

भवतश्चात्र—

हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत ! देहिनाम्। तमोभिभूते तस्मिन्स्तु निद्रा विशति देहिनाम् ॥३४॥ निद्रा हेतुस्तमः, सत्त्व बोधने हेतुरुच्यते। स्वभाव एव वा हेतुर्गरीयान् परिकीर्यते ॥३५॥ इसमें श्लोक हैं—हे सुश्रुत ! मनुष्यों की चेतना का स्थान हृदय कहा है। उस हृदय के तम से आक्रान्त होने पर मनुष्यों को निद्रा आती है। निद्रा का कारण तम है, और जागरण में सत्त्व गुण कारण है। अथवा स्वभाव को ही श्रेष्ठ कारण कहा जाता है। अर्थात् स्वभाव से ही निद्रा आती है। वि० मन्तव्य—तमोगुण से निद्रा आती है और कफ भी तमोगुणी है, अतः कफ से निद्रा आती है। तमोभवा, र्लेभ्समुद्भववा च (च० सू० अ० २१)। यथा भोजन करते ही कफ बढ़ने पर निद्रा आ जाती है या जब जब कफ की वृद्धि होती है, यथा कफ ज्वर में तब तब निद्रा आ जाती है ॥३४,३५॥

पूर्वदेहानुभूतास्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः। रजोगुक्तं मनसा गुह्यतथ्योर्गुभुमाशुभान् ॥३६॥ सोते हुए व्यक्ति का स्वामी भूतात्मा है। यह भूतात्मा रजोगुण युक्त मन के साथ मिलकर पूर्व शरीर में अनुभूत शुभ-अशुभ विषयों का ग्रहण करता है ॥३६॥

करणानां तु वैकल्प्ये तमसाऽभिप्रवर्धिते। अस्वपन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ॥३७॥ तम के कारण इन्द्रियों में विकलता बढ़ जाने से न सोता हुआ भी भूतात्मा सोया हुआ कहा जाता है ॥३७॥

वक्तव्य—भूतात्मा कभी सोता नहीं, केवल इन्द्रियों के तम के कारण विषयों का ग्रहण न करने से हम आत्मा को सोया हुआ कहते हैं। इसीलिये उपनिषद् में कहा है कि—यही आत्मा है कि जो सोते हुए भी जागता रहता है ॥३७॥

सर्वतुष दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र शोभ्यात्, प्रतिषिद्धेष्वपि तु बालबुद्ध्यां कर्त्रितक्षतक्षीणमद्यनित्ययानवाह-नाध्वकर्मपरिश्रान्तानाममुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरकृष्णि-णानामजीणिनां च सुहृतं दिवास्वपनमप्रतिषिद्धम्। रात्रावपि जागरितवतां जागरितकालादधेमिष्यते दिवास्वपनम्। विकृतिर्हि दिवास्वप्नो नाम, तत्र स्वपतामधर्मः। सर्वदोषप्रकोपश्च, तत्प्रकोपाच्छ कासश्चासप्रतिशयशिरोगौरवाङ्गमर्दासेचकञ्चराग्निर्दौर्बल्यानि भवन्ति, रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तिनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति ॥३८॥

सब श्रुतुओं में दिन के समय सोना निषिद्ध है। परन्तु शीघ्र श्रुतु में (रातों के छोटी होने से) दिन में

अ० ४ ]

शारीरस्थानम्

३११

सोना निषिद्ध नहीं है। अपवाद—प्रतिषेध में भी बालक, बूढ़, स्त्री सेवन से क्रुश, उरःक्षत रोगी, क्षीण, मद्यपान करने वाले, वाहन (चोड़े आदि की सवारी), यान (रथ रेल आदि), मुसाफिरी या मेहनत के कारण थके, भोजन न करनेवाले, मेद-स्वेद-कफ-रक्त-रस से क्षीण हुए, अजीर्ण रोगियों के लिये मुहूर्त भर (थोड़ी देर) सोना विषेध है। जिन्होंने रात में जागरण किया हो, वे भी रात्रि जागरण से आधे समय तक दिन में सो सकते हैं। दिन में सोना एक विकार है। दिन में सोने से अधर्म होता है। सप्त दोषों का प्रकोप होता है। दोषों के प्रकोप से कास, श्वास, प्रतिश्याय, सिर में भारीपन, अङ्गों का दृटना, अरोचक, ज्वर, अग्नि दुर्बलता होती है। रात में भी जागने से वात-पित्तजन्म बही कास, श्वास आदि उपद्रव होते हैं ॥३२॥

भवन्ति चात्र—

तस्मात्त जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।

द्वात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ॥ ३९ ॥

अरोगः सुमना ह्यं वलवर्णान्वितो वृषः ।

नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः रातम् ॥४०॥

इसमें श्लोक भी हैं—इसलिये ज्ञानी मनुष्य रात में न जागे और दिन में न सोये, क्योंकि ये दोनों बातें दिन में सोना और रात में जागना दोष प्रकोपक हैं। इसलिये उचित प्रमाण में नींद ले। इस प्रकार करने से मनुष्य नीरोगी, प्रसन्न-चित्त, बल-वर्णयुक्त, पुरुषत्वयुक्त, न बहुत मोटा और न बहुत क्रुश, ऐश्वर्यशाली होता है, एक सौ वर्ष जीता है।

वक्तव्य—“निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम् । वृषता म्नीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ अकालेऽतिप्रसंगाच्च न च निद्रा निषेविता । सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा ॥ सैव युक्ता पुनयुङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा । पुरुषं योगिनं विदधा सत्या बुद्धिरिवागता ॥ रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरुक्षमनमिष्यन्दि स्वासीनप्रचलायितम् ॥ देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः । स्वप्नान्नाऽऽहारसमुल्ये च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥

(निद्रा सात्स्यीकृता यैस्तु रात्रौ च यदि वा दिवा ।)

दिवारात्रौ च ये नित्यं स्वप्नजागरणोचिताः ।

न तेषां स्वप्तां दोषां जाग्रतां वाऽपि जायते ॥ ४१ ॥

(जिन लोगों ने रात में या दिन में सोने की आदत बना ली है) जो मनुष्य दिन या रात में सोने या जागने के आदों हो गये हैं उनको दिन में सोने या रात में जागने से

१ श्रीभूमे चादानरूचाणां वर्धमाने च मास्ते ।

रात्रीणां चातिसंक्षेपाद् दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥

चरक सू० अ० २१ ।

(यथा सिनेमा देखने के शौकीन आदि) किसी प्रकार का दोष नहीं होता ॥ ४१ ॥

निद्रानाशोऽनिलात् पिन्धान्नमनस्तापात् क्षयादपि ॥

संभवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ॥ ४२ ॥

निद्रानाशोऽभ्यङ्गयोगो मूर्ध्नं तैलनिषेवणम् ।

गात्रस्योद्गतं चैत्र हितं संवाहनानि च ॥ ४३ ॥

आलिगोधूमपिष्टान्नमद्यैरैक्षवसंस्कृतैः ॥

भोजनं मधुरं स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः ॥ ४४ ॥

रसेर्विलेशयानां च विष्किराणां तथैव च ।

द्राक्षासितैस्तुद्वय्याणामुपयोगो भवेन्निरि ॥ ४५ ॥

शयनासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च ।

निद्रानाशे तु कुर्वीत तथाऽन्यान्यपि बुद्धिमान् ॥४६॥

वायु के कारण, पित्त से, मन के संताप से, रसादि धातुओं की क्षीणता से, चोट आदि के लगने से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद नहीं आती। विपरीत कारणों से नींद के न आने पर—शरीर पर तैल का अभ्यङ्ग, शिर पर तैल लगाना, अङ्गों पर उबटन करना, शरीर का संवाहन (दबाना, चापी करना) उत्तम है। शाली, गेहूँ, पिठी से बने भोजन, गुड़ आदि से बनाये पदार्थ, मधुर एवं स्निग्ध भोजनों को दूध, मांस रस आदि के साथ खाना उत्तम है। विलेशय चूहे आदि और विष्किर (मुर्ग आदि) के मांस रस के साथ भोजन करे। रात में द्राक्षा, मिश्री, ईख आदि द्रव्यों का उपयोग करे। शय्या, आसन, सवारी—कोमल और मन को प्रिय बनाये। निद्रा नाश में दूसरे अन्य उपाय भी बुद्धिमान् करे।

वक्तव्य—“अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यान्नपौदका रसाः । शाल्यन्मं सद्धि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च । चतुष्पत्तर्पणं लेपः शिरसो बदनस्य च । स्वास्तीर्णं शयनं वेष्टम सुखं कालस्थोचितः । आनयत्यन्विरात्रिन्द्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥” चरक सू० अ० २१ ॥ ४२-४६ ॥

निद्रातियोगे वमनं हितं संशोधनानि च ।

लंघनं रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ॥ ४७ ॥

निद्रा के अतियोग में वमन और संशोधन, लंघन, रक्तमोक्षण तथा मन को व्याकुल करनेवाले साधन उत्तम हैं।

वक्तव्य—“कायस्य शिरसश्चैव विरेकशुद्धं भयम् । चिन्ता क्रोधः कथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् । उपवासोऽसुखाशय्या सल्लोदार्थं तमो जयः । निद्राप्रसङ्गमहर्तं वारयन्ति समुल्लितम् ॥ एत एव च विशेषे निद्रानाशस्य हेतवः । कार्यकालो विकारश्च प्रकृतिविरुधेव च ॥” चरक सू० अ० २७ ॥ ४७ ॥

कफमेदोविषातीनां रात्रौ जागरणं हितम् ।

३१२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

कफ, मेद और विष से पीड़ित मनुष्यों को रात में जागना हितकारी है ।

द्विवास्वप्नश्च तृट्शूलहिक्राजोर्णितिसारिणाम् ॥४२॥ प्लास, शूल, हिका, अजीर्ण और अतिसार के रोगियों को दिन में सोना हितकारी है ॥ ४२ ॥

इन्द्रियार्थेष्वसंग्रासिगौरवं जूम्भणं कलमः ।

निद्रातस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ ४९ ॥

तन्द्रा—इन्द्रियों के विषयों की अप्राप्ति, भारीपन, जम्माई आना, कलम, नींद से पीड़ित मनुष्य के समान (हाथ पैर टूटना, मोड़ना) जिसकी चेष्टायें हों, उसको तन्द्रा समझना चाहिये ॥ ४९ ॥

पीतवैकमनिलोच्चासमुद्देश्व विवृताननः ।

यं मुखति सनेत्रास्वं स जूम्भ इति संज्ञितः ॥ ५० ॥

मुख को खोलकर वायु का एक उच्छ्वास (बूँट) पीकर, हाथों को और शरीर को ऐंटता (मोड़ता) हुआ जिस वायु को मुख से नेत्रों में आँसुओं के साथ बाहर करता है, उसे जम्माई कहते हैं ।

वक्तव्य—छौंक का लक्षण—“प्राणोदानौ समो स्यातां मूर्धनं खोतःपथि स्थितौ । नस्तः प्रवर्तते शब्दः क्षवथुं तं विनिर्दिशेत्” ॥ ५० ॥

योऽनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।

कलमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रवाधकः ॥ ५१ ॥

जो यकान बिना किसी मेहनत के, बिना किसी श्वास की गति के बंदे, उत्पन्न होती है, उसको कलम कहते हैं । यह इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने में रुकावट उत्पन्न करता है ॥

मुखस्पर्शप्रसङ्गिरवं दुःखद्वेषणलोत्ता ।

शक्तस्य चाप्यनुत्साहः कर्मस्वालयमुच्यते ॥ ५२ ॥

मुख स्पर्श की चाह, दुःख के कारणों से बचने की लालसा, सामर्थ्य होने पर भी कार्य करने में उत्साह का न होना आलस्य कहा जाता है ॥ ५२ ॥

उत्किलदयान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकघोषनेरितम् ।

हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्कलं विनिर्दिशेत् ॥ ५३ ॥

वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्देश्व भ्रमः ।

न चान्नमभिकाङ्क्षते ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत् ॥ ५४ ॥

मुख में पानी आने एवं थूक से प्रेरित हुआ अन्न उत्कले-शित (बाहर आने की प्रवृत्ति का) होकर, न निकले हृदय पर (आमाशयिक प्रदेश पर) दबाव प्रतीत हो, उसे उत्कलेश कहना चाहिये । मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंटन, चक्कर आना, अन्न में रुचि न होना, इसको ग्लानि कहना चाहिये ॥ ५३, ५४ ॥

आर्द्रवर्मावनद्वं वा यो गात्रं मन्यते नरः ।

तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद्विनिर्दिशेत् ॥ ५५ ॥

जो मनुष्य शरीर को गीले चमड़े से जकड़ा हुआ सा मानता है, तथा शिर में बहुत भारीपन अनुभव करता हो, उसे गौरव कहना चाहिये ॥ ५५ ॥

मूच्छां पित्ततमः प्राया, रजःपित्तानिलाद् भ्रमः ।

तमोबातकफातन्द्रा, निद्रा श्लेष्मतमोभवः ॥ ५६ ॥

प्रायः करके मूच्छा में पित्त-तम की अधिकता रहती है, भ्रम, रजोगुण, पित्त और वायु से होती है । तन्द्रा तमोगुण वायु और कफ से होती है । निद्रा-कफ और तम से उत्पन्न होती है ।

गर्भस्य खलु रसनिमित्ता साहात्माधमाननिमित्ता च परिवृद्धिर्भवति ॥ ५७ ॥

गर्भ की वृद्धि-अन्न रस के कारण से और वायु के आध्मान (फूलने) से होती है ।

वि० मन्तव्य—गर्भाधान होते ही जो शुक्रशोणित के मिश्रण में स्फुरण होता है, (देखिये शा० अ० २ सू० १३) वह वायु का आध्मान—फूलाना ही है । इससे शुक्र शोणित का मिश्रण फूलता है और उसमें रस प्रविष्ट हो जाता है । फलतः आध्मान होते २ और आध्मात-अवकाश में रस का प्रवेश होते २ गर्भ की परि—सब प्रकार या उचित प्रकार से वृद्धि होती जाती है । यह रस—रसमय रक्त माता से मिलता रहता है । इसीका स्पष्टीकरण निम्न श्लोकों में किया गया है ॥ ५७ ॥

भवन्ति चात्र—

तस्यान्तरेण नाभेस्तु ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम् ।

तदाधमति वातस्तु देहस्तेनास्य वधते ॥ ५८ ॥

ऊष्मणा सहितश्चापि दारयत्यस्य साहतः ।

ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्छ स्रोतांस्थपि यथा तथा ॥ ५९ ॥

इसमें श्लोक भी हैं—गर्भ की नाभि के बीच में ज्योति-स्थान (अग्निस्थान) है । इस स्थान को वायु फूँकती है, इससे इस गर्भ का शरीर बढ़ता है, उष्म (पित्त) के साथ मिली वायु इस गर्भ के ऊपर, तिरछे और नीचे गये स्रोतों को खोलती है । इससे भी यह बढ़ता है ।

वक्तव्य यहाँ पर यह स्मरण रखना चाहिये कि गर्भ में सारा काम यकृत को ही करना पड़ता है । गर्भ का हृदय फेफड़े बिल्कुल काम नहीं करते । इनको काम भोजन पवाने का काम यकृत ही करता रहता है । इसीसे यह बढ़ा भी होता है । जो पीछे घटता जाता है । यही यकृत आयुर्वेद में पित्त (अग्नि) का स्थान है । इस पित्त को ले जानेवाला, गति देनेवाला वायु है । इस पित्त के कारण पाचन ठीक होने से गर्भ के सब अङ्ग-प्रत्यङ्ग बढ़ते हैं ।

वि० मन्तव्य—यह दोनों श्लोक पाराशर्य महर्षि के प्रतीत होते हैं—आपने अध्याय ४ सू० ३२ में—कहा है कि उत्पन्न

अ० ४] ४०

शारीरस्थानम्

११३

होते हुए गम का सर्व प्रथम "नाभि" नामक अवयव बनता है—पूर्ण नाभि नहीं, नाभि का पूर्वरूप बनता है, वही से देही का देह बढ़ता है यही इन श्लोकों में भी कहा गया है—इन नाभि में ज्योति—अग्नि का स्थान है, जो उस आगत रस का उचित परिपाक करता रहता है। इसके साथ वायु मिलकर आगे २ श्लोकों का दारण करता जाता है और उक्त अग्नि उनका पाक करता है। फलतः दारण होने पर भी रस का अनुचित प्रवहण नहीं होता और रस को मार्ग मिलता जाता है, देह बढ़ता जाता है। वह सौंदर्य का सा शुक्र-शोणित का मिश्रणकर एक दिन करारविन्द से पदारविन्द को मुखारविन्द में धरते हुए बालमुकुन्द का रूप धारण कर लेता है, जो वटपत्र के दोनों के आकारवाले गर्भाशय में शयन करता है। च० वि० अ० ५ में कुछ आचार्यों ने श्लोकों के समुदाय को ही पुष्प—प्राणी माना है। यही उक्त दो श्लोकों में कहा गया है।

दृष्टिष्व रोमकृपाश्च न वर्धन्ते कदाचन ।

ध्रुवाण्येतानि मर्त्योनामिति धन्वन्तरैमतम् ॥६०॥

मनुष्य की दृष्टि और रोमकृपा कभी भी नहीं बढ़ते। ये दोनों वस्तुएँ ध्रुव (स्थिर) हैं, ऐसा धन्वन्तरि का मत है ॥६०॥

शरीरे क्षौयमाणेऽपि वर्धते द्राविषौ सदा ।

स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाविति स्थितिः ॥६१॥

शरीर के क्षौण होने पर भी नख और केश-स्वभाव एवं प्रकृति के कारण सदा ही बढ़ते रहते हैं ॥६१॥

सप्त प्रकृतयो भवन्ति—दोषैः पृथक् द्विशः, समस्तैश्च ॥

प्रकृतियाँ सात प्रकार की हैं—पृथक्-पृथक् दोषों से दो दोषों के मिलने से, और सब दोषों के मिलने से, सात प्रकृतियाँ बनती हैं ॥६२॥

शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेदोष उरुक्तः ॥

प्रकृतिजोयते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ॥६३॥

शुक्र और आर्त्तव के मिलने के समय जो दोष प्रबल होता है, उस दोष से प्रकृति उत्पन्न होती है, उस प्रकृति के लक्षणों को मुझसे सुनो।

वक्तव्य —“समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः ।

यतः प्रकृतिश्चारीर्यम्, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः । सा चेष्ट-रूपा । तस्माद् भवन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । ननु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः, श्लेष्मप्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोषश्च हि आधिक्यभावात्सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम्, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नेताः प्रकृतयः सन्ति । सन्ति खलु वातलाः, पित्तलाः, श्लेष्मलाश्चाऽप्रकृतिस्था-लु ते ज्ञेयाः ॥” चरक वि० अ० ६ ॥६३॥

तत्र वातप्रकृतिः प्रजागरुकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्स्यजंयायौ गन्धर्वचित्रः स्फुटितकरचरणोऽल्परुक्षश्चरमश्रु नखकेशः क्राथी दन्तखादी च भवति ॥६४॥

इसमें वातप्रकृति मनुष्य जागनेवाला (रात में नींद कम आती है), शीत से द्रव करनेवाला, देखने में कुरुर, चौर, द्रव बुद्धिवाला, अनार्य, गन्धर्वचित्र (इधर उधर घूमने के मन का) हाथ-पर फटे हुए, शमश्रु-नख और केश, छोटे एवं रूक्ष, क्राथि (हिंसाशील) सौते हुए दांतों को कटकटानेवाला होता है। (क्राथी के स्थान पर क्रोधी भी पाठ है) ॥६४॥

अधुतिरट्टसौहृदः कृतघ्नः क्रुशपरुषो धमनोतः प्रलापी । द्रुतगतिरटनोऽनवस्थितात्मा वियति च गच्छति संभ्रमेण सुप्तः ॥६५॥

अठ्यवस्थितमतिश्वलट्टध्रिर्मन्दरन्धनसंचयमित्रः ।

किंचिदेव विलपत्यनिबद्धं मासृतप्रकृतिरेष मनुष्यः ॥६६॥

(वातिकाइवाजगोमायुग्माशस्त्रं ध्रुवनां तथा ।

गुध्रकाकखरादीनामनूकैः कीर्तिता नराः ॥६७॥)

वातप्रकृति मनुष्य धैर्य रहित, कच्ची मित्रतावाला, कृतघ्न, क्रुश, कठोर धमनियाँ (शिरायें) दीखती हैं, बहुत बोलनेवाला, जल्दी चलनेवाला, इधर उधर घूमने के स्वभाव का, अस्थिर चित्त होता है। सौते हुए एकदम से आकाश में जाता है (खाड़ी न्यर्थ की कल्पना करता है—आकाश में हवाई महल बनाता रहता है)। अस्थिर बुद्धि, चंचलदृष्टि, इसके रत्न, धन-संचय और मित्र कम होते हैं, कुछ न कुछ बिना मतलब और बिना प्रसंग के बोलता रहता है, ऐसा मनुष्य वातप्रकृति होता है। (वातप्रकृति का मनुष्य बकरी, गौदड़, खरगोश, चूहा, ऊंट, कुत्ता, गीध, कौआ, गधे के स्वभाववाला होता है) ॥६७॥

पित्तप्रकृतिस्तु स्वेदनां दुर्गन्धः पीतशिलिहाङ्गस्ताम्रनखनयन्तालुजिह्वाघ्राणिपादतलो दुर्भगो वलौपलितस्वालि-त्यजुष्टो बहुमुगुणद्वेषी क्षिप्रकोपप्रसादो मध्यबलो मध्या-युश्च भवति ॥६८॥

मेधावी निपुणमतिर्विगुह्य वक्ता तेजस्वी समितिषु दुर्निवारवीर्यः । सुप्तः सन् कनकपलागकर्णिकारात् संपश्येदपि च हुताशविद्युत्तुकाः ॥६९॥

न भयात् प्रणमेदन्तेष्वमुदुः

प्रणतेष्वपि सान्त्वनदानरुचिः ।

भवतीह सदा व्यथितास्यागतः

स भवेदिह पित्तकृतप्रकृतिः ॥७०॥

(मुजङ्कोल्लुङ्गन्धवयक्षमाजैरवानरैः ।

न्याघ्रक्षन्तकुलानूकैः पैत्तिकास्तु नराः स्मृताः ॥७१॥)

पित्तप्रकृति मनुष्य को पसीना बहुत आता है, शरीर से दुर्गन्ध आती है, इसके अंग पीले और ढीले रहते हैं। नख-आँख-तालु जिह्वा-ओष्ठ-पैर हाथ के तलुए ताम्रवर्ण, देखने में बहुत सुन्दर नहीं (योद्धा भाग्यवान्), ह्र्दिर्ग्राह्य, बालों का श्वेत होना, बालों का गिरना, बहुत खानेवाला, उष्ण से द्रव रखनेवाला, जल्दी कुपित एवं प्रसन्न होनेवाला, मध्यम बल और

३१४

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ४ ]

मध्यम आयु का होता है। यह मनुष्य बुद्धिशाली, चतुर-अकल-वाला, जबरदस्त बोलनेवाला, तेजस्वी, सभाओं में न हारने-वाला होता है। सोते हुए स्वर्ण, टाक, अमलताप, अग्नि, विद्युत्, उत्काषात् को देखता है। भय से किसी के आगे नहीं झुकता, न झुकनेवालों के लिये कठोर, झुकनेवालों के लिये सान्त्वना दान देने की प्रकृति का, इसकी गति सदा चंचल रहती है। इस प्रकार का मनुष्य पित्तप्रकृति होता है। (साँप उलूद गन्धर्व-यक्ष विही वन्दर, व्याघ्र-रीछ-नकुल के स्वभाववाले पित्तप्रकृति के मनुष्य होते हैं) ॥७१॥

श्लेषप्रकृतिस्तु दुर्बन्धोवरति विश्विशाद्रीष्टिकरकाण्डा-नामन्यतमवर्णः सुभगः प्रियदर्शनी मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलबाधिरम्राही दृढवैरश्च भवति ॥७२॥

शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलालिनीलकेशो लक्ष्मीवान् जठदुष्कृसिंहवोधः । सुप्तः सन् सकमलहंसचक्रवाकान् सपश्येदपि च जलाशयान् मनोज्ञान् ॥७३॥

रक्तान्तेनैः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सन्धगुणोपपन्नः । कलेशस्मो मानयिता गुरुणां ज्ञेयो बलासप्रकृतिमंजुष्यः ॥७४॥

(दृढगाव्रमति स्थिरमित्रधनः परिगण्य चिरात् प्रददाति बहु । परिनिश्चितवाक्यपदः सततं

गुरुमानकश्य भवेत् स सदा ॥७५॥

ब्रह्मरुद्रवर्णः सिंहाङ्गजगोवृषैः । तार्क्यहंससमानूकाः श्लेषप्रकृतयो नराः ॥७६॥

कफ प्रकृति के मनुष्य श्वेत दुर्वा-नीलाकमल-तलवार, गीला अरीटा, शरकाण्डे का काण्ड, इनमें से किसी एक के समान वर्णवाले, देखने में सुन्दर (भाग्यवान्), प्रिय दर्शन, मधुर रस को चाहनेवाले, कृतज्ञ, धैर्यशाली, सहनशील, लोभरहित, बलवान्, देर में समझनेवाले (देर में निर्णय करनेवाले), और दृढवैरवाले होते हैं। इनकी आँखें श्वेत रहती हैं, बाल दृढ़ धृष्टवाले, भ्रमर के समान नीलवर्ण होते हैं। मनुष्य लक्ष्मीशाली, इसकी आवाज बादल, मृदंग या सिंद् की गर्जना की भाँति गम्भीर होती है। सोते हुए कमल, हंस, चक्रवाक एवं सुन्दर जलाशयों को देखता है। आँखें किनारों से छाल, अंगों की रचना पृथक् पृथक्, स्निग्ध कान्तिवाला, सन्धगुण से युक्त, क्लेश को सहनेवाला, गुरुओं का आदर करनेवाला मनुष्य कफ प्रकृति का होता है। इसका शाख शान दृढ होता है, मित्र और धन स्थिर रहते हैं। बहुत विचारकर, देर में बहुत देता

है। इसके वाक्य-पद (बोलने की भाषा) सदा नियमित रहते हैं। यह व्यक्ति सदा ही गुरुओं का आदर करता है। इसका स्वभाव ब्रह्म-इन्द्र-वरुण, सिंद्, घोड़ा, हाथी, गाय, वैल, राक्ष, हंस के समान होता है ॥७२-७६॥

द्रव्योर्वा तिसृणां वाऽपि प्रकृतीनां तु लक्षणेः । ज्ञात्वा संसगजा वैद्यः प्रकृतीरभित्तिदिशेत् ॥७७॥ वैद्य दो या तीन दोषों के मिलित लक्षणों से संसर्ग प्रकृतियों को समझे ॥७७॥

प्रकोपो वाऽन्यथाभावो क्षयो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥७८॥ स्वभाव से ही प्रकृतियों का प्रकोप (बहुत बढ़ना), अथवा बदल जाना या घट जाना नहीं होता (ये स्वस्थ अवस्था में नहीं होते), अपितु ये तब होते हैं जब मनुष्य मरनेवाले होते हैं। वक्तव्य—चरक में—शीलं व्यावर्त्ततेऽत्यर्थं भक्तिश्च परिवर्त्तते । चरक ॥ ३० ॥ १२।४६ ॥७८॥

विषजातो यथा कीटो न विषेण विषद्यते । तद्वत्प्रकृत्यो मर्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ॥७९॥ विष से उत्पन्न कीड़ा जिस प्रकार विष से नहीं मरता, उसी प्रकार ये प्रकृतियाँ मनुष्य को किसी प्रकार का कष्ट नहीं करातीं। इसी से कहा है चरक में—

“त्रयस्तु पुरुषा भवन्ति आतुराः, ते त्वनातुराः तंवांनतुरा-याणां भिषजाम् । तद्यथा वातलः, पित्तलः, श्लेषमलक्षेति ॥” चरक ॥ ३० ॥ ६ ॥

समपित्तानिलकफाः केचिद् गर्भादि मानवाः । दृश्यन्ते वातलाः केचिद् पित्तलाः श्लेषमलास्तथा ॥ तेषामनातुराः पूर्वा वातलाद्याः सदातुराः । दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिकल्प्यते ॥ चरक ॥७९॥

प्रकृतिमिह नराणां भौतिकीं केचिदाहुः पवनदहनतोयैः कीर्तितास्तास्तु तिस्रः ।

स्थिरविपुलशरीरः पार्थिवश्च क्षमाबाव- शुचिरथ चिरजीवी नाभसः स्वैर्महद्भिः ॥८०॥ कोई आचार्य मनुष्यों की प्रकृति को पंचमहाभूतवाली कहते हैं। इनमें से वायु, अग्नि और जल की प्रकृतियाँ बल, पित्त, कफ से कह दी हैं। पार्थिव प्रकृति का मनुष्य स्थिर, बड़े शरीर का और क्षमाशील होता है। आकाश प्रकृति का मनुष्य पवित्र, दीर्घायु और इसके कान, नाक के छेद (अंग) बड़े होते हैं ॥८०॥

शौचमास्त्रिकयमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् । प्रियातिथिर्वसिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ॥८१॥ माहात्म्यं शौचमाज्ञा च सततं शास्त्रबुद्धिता । श्रुत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ॥८२॥ शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्कल्य हरिकेगता । प्रियबादिर्विमिश्येतद्धारुणं कायलक्षणम् ॥८३॥

अ० ४ ]

शारीरस्थानम्

३१५

मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयो । महाप्रसवशक्तिस्त्वं कौवेरं कायलक्षणम् ॥८४॥ गन्धमाल्यप्रियस्त्वं च नृत्यवादिक्रामिता । विहारशीलता चैव गान्धर्वं कायलक्षणम् ॥८५॥ प्राप्तकारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाङ्गुलिः । रागमोहमदद्वेषैर्विजितो याभ्यसत्त्ववान् ॥८६॥ जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम् ।

ज्ञानविज्ञानसंपन्नमुपिसत्त्वं नरं विदुः ॥८७॥

सत्त्वादि गुण भेद से प्रकृति—ब्रह्मकाय-पवित्रता, आस्तिक्य, वेदों का स्वाध्याय, गुरुओं की पूजा, अतिथियों का सत्कार, यज्ञ करना—यह ब्रह्मकाय का लक्षण है । महान् आत्मत्व, श्रुता, निरन्तर आज्ञा करने की प्रवृत्ति, शास्त्र में बुद्धि, भृत्यों का पोषण करना, यह महेन्द्र काय का लक्षण है । शीतल पदार्थों में प्रीति, सहनशीलता, केश आदि में भूरापन, बालों में हरा रंग, मीठा बोलना यह वाक्य शरीर का चिह्न है । उदासीन वृत्ति, सहनशीलता, धन को प्राप्त करना और एक त्रित रखना, बहुत सन्तान पैदा करना यह कौवेर शरीर का लक्षण है । सुगन्ध (इत्र आदि) एवं माला में रुचि, नाच, गाने-बजाने का शौक, घूमने की इच्छा—ये गान्धर्व शरीर के लक्षण हैं । युक्ति से काम निकालनेवाला, दृढ़ता से काम को आरम्भ करनेवाला, भय-रहित, स्मृतिशाली, पवित्र, जप, व्रत, यज्ञ, ब्रह्मचर्य और अध्ययन के स्वभाव का, ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न मनुष्य को ऋषि सत्त्ववाला कहा है ।

वक्तव्य—वात प्रकृति आदि शरीर की दृष्टि से, सात्त्विक शरीर आदि मन की दृष्टि से कहे हैं । इसी से चरक में कहा है—“त्रिविधं खलु सत्त्वं शुद्धं राजसं तामसमिति । शरीरमपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरम् । तस्मात् कतिचित्सत्त्वमे दानुक्रामिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुष्याख्यास्यामः ।” चरक शा० अ० ४।३७।८१-८७॥

समैते सात्त्विकाः काया राजसांस्तु निबोध मे ।

ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम् ॥८८॥

एकाग्रिन् चौदरिकमासुरं सत्त्वमौहम् ।

तीक्ष्णमायासिन् भीरुं चण्डं मायान्वितं तथा ॥८९॥

विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ।

विबुद्धकामसेवी चाप्यजघाहार एव च ॥९०॥

अमषणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् ।

एकाग्रतप्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाहता ॥९१॥

भुगमात्रं तमश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ।

उच्छिष्टहारता तैहृण्यं साहसप्रियता तथा ॥९२॥

श्लोलुपत्त्वं नैलज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ।

असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् ॥९३॥

लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् ।

षडैते राजसः कायाः,

ये सात सात्त्विक शरीर हैं । राजस प्रकृतियों को सुनो—ऐश्वर्यशाली, रौद्र, शूर, क्रोधी, निन्दा करनेवाला, अकेला ही खानेवाला, पेद्रू (बहुत खानेवाला) आसुर प्रकृति होता है । तीक्ष्ण परिश्रमी, डरप्रोक, क्रोधी, लुली, घूमने तथा खाने में चपल मनुष्य सर्प सत्त्व है । अतिशय विषयसेवी, निरन्तर खाने का ही विचार करनेवाला, असहनशील, अस्थिर मनवाला मनुष्य शाकुन (पक्षी) स्वभाव का है । एकाग्रता में रहनेवाला, रौद्र, निन्दा करने वाला, धर्म के विरुद्ध बरतनेवाला, अतिशय तमोगुणी मनुष्य राक्षस-प्रकृति का है । लूटा खानेवाला, तीक्ष्ण स्वभाव, साहसिक कार्यों में रुचि, श्लोलुप, लज्जा रहित मनुष्य पिशाच प्रकृति का होता है । बराबर बाँट के न खानेवाला, आलसी, दुःख भोगने का आदी, निन्दा करने वाला, लालची, किसी को न देनेवाला मनुष्य प्रेतसत्त्व होता है । ये छे राजस शरीर हैं ॥८८-९३॥

तामसांस्तु निबोध मे ॥९४॥

दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मेषुनन्तियता ।

निराकरिणुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ॥९५॥

अनवस्थितता मौख्यं भोक्तृत्वं सलिलाथिता ।

परस्परभिमर्दश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ॥९६॥

एकस्थानरतिनित्यमाहारे केवले रतः ।

वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थवर्जितः ॥९७॥

इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा ।

मुझे तामस को सुनो । बुद्धि का दूषित होना, मन्द बुद्धि, स्वप्न में मेषुन कामना, किसी भी वस्तु का प्रतिकार न करने की इच्छा पशु के गुण हैं । अस्थिरता, मूर्खता, डरप्रोकपन, पानी की चाह, एक दूसरे से लड़ना-झगड़ना, ये मत्स्य सत्त्व के लक्षण हैं । एक ही स्थान पर बैठे रहना, सदा खाने-पीने में रत रहना, धर्म, अर्थ, काम से अलग रहना, यह वानस्पत्य सत्त्व के लक्षण हैं । इस प्रकार से ये तीन तामस प्रकृतियाँ कह दी हैं । (डल्हन ने मन्दता का अर्थ जिह्वा-कृटिलता किया है) ॥

कायानां प्रकृतीर्ज्ञात्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत् ॥९८॥

महाप्रकृतयस्वेता रजःसत्त्वतमःकृताः ।

प्रोक्ता लक्षणतः सन्मभिषक् तारच विभावयेत् ॥९९॥

शरीरों की प्रकृति को समझकर उसके अनुसार चिकित्सा करें । रज, सत्त्व और तमजन्म प्रकृतियों को, महाप्रकृतियों को महाप्रकृतियाँ कहते हैं । लक्षणों से इन को भली प्रकार कह दिया, वैद्य इनको अच्छी प्रकार समझ लें ।

वि० मन्तव्य—प्रकृति का विचार करके चिकित्सा करे, देखिये च० वि० अ० ८—९६ । गर्भ का शरीर—शुक्र योगित

३१६

मुश्रुतसंहिता

[ ४०५ ]

की, काल एवं गर्भाशय की, आहार-विहार की, आकाश आदि महाभूतों की प्रकृति के अनुकूल बनता है, उक्त शुक्र आदि में जो दोष अधिक होता है उंस २ दोष का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। इस लिये मानव की वह २ प्रकृति कही जाती है और यह गर्भाधान काल से गर्भ पर अपना प्रभाव डालती है और जीवन भर एक सी बनी रहती है। पाठक लक्षणों पर ध्यान दें यहाँ प्रकृति-स्वभाव का नाम है स्वास्थ्थ का नहीं। जिन पञ्च-महाभूतों के समवाय से शरीर का निर्माण होता है। उनमें के तीन महाभूत १—वात (वायु), २—पित्त (अग्नि) तथा ३—कफ (जल) ही वस्तुतः क्रियाशील हैं। अतः वे ही सुख-दुःख या आरोग्य एवं रोग या उत्पत्ति एवं विनाश के हेतु—कारण माने जाते हैं और अन्य दो महाभूत निष्क्रिय अर्थात् १—पृथिवी नामक महाभूत केवल आधार तथा २—आकाश केवल अवकाश है। यह दोनों उन तीनों के क्रिया स्थल मात्र हैं, अतः वात, पित्त एवं कफ प्रकृतियों का विशद एवं विस्तृत वर्णन किया गया है और पार्थिव एवं नाभस् प्रकृतियों का संक्षेप में वर्णन किया है और शरीर का मनस् पर तथा मनस् का शरीर पर प्रभाव पड़ता है, अतः दोनों के गुणधर्मों का वर्णन प्रकृति वर्णन में पाया जाता है। इन ५ के अतिरिक्त—ब्रह्म आदि सात्विक (सत्त्वगुण प्रधान), आसुर आदि रजस् (रजोगुण प्रधान) तथा पाशव आदि तामस (तमोगुण प्रधान) प्रकृतियों का भी वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि किसी एक मानव में उक्त प्रकृतियों में से कोई एक प्रकृति विशुद्धरूप से या पूर्णरूप से नहीं मिलती जैसे कोई रोग एक दोषज तथा कोई द्रव्य एकरस नहीं मिलता, तथापि जैसे वैद्य—रोग को वातिक, पैत्तिक तथा कफज और द्रव्य को मधुर एवं अम्ल आदि मानकर चिकित्सा करता है वैसे प्रकृतियों का भी निश्चय करे और तदनुसार चिकित्सा करे ॥८८, ८९॥

इति मुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भव्याकरणं शारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

पञ्चमोऽध्यायः

अथातः शरीरसंख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे शरीर संख्या व्याकरण शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—शरीर के अवयवों की संख्या-गणना तथा उनका व्याकरण-विशिष्ट आकार का वर्णन है जिसमें उस शारीर-शरीर विषयक अध्याय का वर्णन करेंगे ॥१, २॥

शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृतिविकारसंमूच्छितं 'गर्भ' इत्युच्यते। तं चेतनावस्थितं वायुर्भिभजति, तेज एतं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथिवी सहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धितः स यदा हस्तपादजिह्वागन्धानकर्णनितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा 'शरीर' इति संज्ञां लभते। तच्च षडङ्गं—शाखाश्चतस्रो, मध्यं पञ्चमं, षष्ठं शिर इति ॥३॥

गर्भाशय में स्थित शुक्र और आत्त्व, आत्मा प्रकृति (आठ) और विकार (सोलह) से मिलने पर गर्भ इस नाम से कहा जाता है। इस चेतनायुक्त गर्भ को वायु विभक्त करता है। तेज इसका परिपाक करता है, जल इसको नरम बनाता है, पृथ्वी इसको संगठित करती है, आकाश इसको ढकाता है। इस प्रकार बढ़ता हुआ यह गर्भ जब हाथ, पैर, जिह्वा, नासिका, कान, नितम्ब आदि अंगों से युक्त हो जाता है, तब 'शरीर' इस नाम से कहा जाता है। इस शरीर के छे अंग हैं—यथा चार शाखायें (दो बाहु दो टाँग), पाँचवाँ मध्यभाग और छठा शिर।

वक्तव्य—जिस प्रकार लैस या प्रीञ्चम में सूर्य किरणों प्रविष्ट होकर रूई या तिनकों को जला देती हैं, परन्तु किरणों का प्रवेश आँख से नहीं दीखता, अपितु जलने के कार्य से प्रतीत होता है, उसी प्रकार शुक्र और आत्त्व के मिलने पर चेतना धातु प्रविष्ट होती है। इसके अगले क्षण जीने-बढ़ने के कार्य से इस चेतना धातु का ज्ञान होता है। "शरीरं नाम चेतनाविधानभूतं पंचमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि।" चरक शा० अ० ६। तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः, तद्यथा द्वौ बाहुौ द्वे सक्षिनी, शिरोग्रीवमन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ चरक शा० अ० ७—५।

वि० मन्तव्य—गर्भ का नाम भ्रूण भी है। गर्भ ही जन्म होने पर बाल-बालक-बालिका कहा जाता है और वही आगे चलकर युवा एवं वृद्ध कहलाता है। शरीर—पञ्चमहाभूतात्मक है और उक्त प्रकार से इसके निर्माण में वे योगदान करते हैं और माता के रस से प्राप्त होते हैं, क्योंकि वह रस भी पञ्च-महाभूतात्मक होता है और इस आहार से आता है और आहार भी पञ्चभूतात्मक है। फलतः गर्भ सर्वाङ्ग सम्पन्न होने पर "शरीर" कहलाता है। इसमें जब तक आत्मा का संयोग रहता है तब तक शरीर, आत्मा का वियोग होने पर "शव" कहलाता है। मध्य—मध्यकाय, अन्तराधि या घड। शिर—ग्रीवा समेत शिर ॥३॥

अतः परं प्रत्यङ्गानि वदयन्ते—मस्तकोदरपृष्ठनाभि-ललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः; कर्णनेत्रभू-गङ्गासगण्डकक्षत्तनबद्धक्षणवृषणपार्श्वस्फिगजातुकंपरबाह्

अं ५]

शारोस्थानम्

११७

रुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्कुल्यः, स्रोतांसि बद्ध्य माणानि, एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः ॥४॥

इसके आगे प्रत्यंग कहे जाते हैं । मस्तक, उदर, पीठ, नाभि, ललाट, नासा, चिबुक, वस्ति, श्रीवा ये एक-एक हैं । कान, आँख, भू, शंख, अंस, गण्ड, कक्ष, स्तन, वंक्षण, वृषण, पार्व, नितम्ब, जानु, कोहनी, वाहु, ऊरु, आदि ये दो दो हैं । अँगुलियाँ बीस हैं, स्रोत कहे जायेंगे, यह प्रत्यङ्गों का विभाग है । (आदि शब्द से—ओठ, कुकुन्दर, सृक्कि आदि लेने चाहिये) ।

वि० मन्तव्य—प्रत्यङ्ग—जो अंग के भी अङ्ग या अंग पर अङ्ग हैं ॥४॥

तस्य पुनः संस्थानं—स्वचः कला धातवो मला दोषा यकृतस्त्रीहानौ फुफ्फुस उण्डुको हृदयमाशया अन्त्राणि वृक्को स्रोतांसि कण्डरा जालानि कूर्चो रज्ज्वः सेवन्यः सङ्घाताः सीमन्ता अस्थीनि सन्धयः स्नायवः पेश्यो सर्मीणि शिरा धमन्यो योगवहानि स्रोतांसि च ॥५॥

इनकी अब गिनती करते हैं, स्वचा, कला, धातु, मल, दोष, यकृत, स्त्रीह, फुफ्फुस, उण्डुक, हृदय, आमाशय, अन्त्र, वृक्क, स्रोत, कण्डरा, जाल, कूर्च, रज्ज्व, सेवनी, संघात, सीमन्त, अस्थियाँ, सन्धि, स्नायु, पेशी, सर्म शिरा, धमनी और योगवाही स्रोत (प्राण, उदक अन्न आदि के बाहक) ।

वि० मन्तव्य—इन सब के समूह का नाम “शरीर” है ॥

स्वचः सम, कलाः सम, आशयाः सम, धातवः सम, सम शिराशतानि, पञ्च पेशीशतानि, नव स्नायुशतानि, त्रीण्यस्थिराशतानि, द्वे दग्धोत्तरे संधिशतै, समोत्तरे सर्मशतं, चतुर्विंशतिधर्मन्यः, त्रयो दोषाः, त्रयो मलाः, नव स्रोतांसि, (पोडश कण्डराः, पोडश जालानि, षट् कूर्चाः, चतस्र रज्जवः, सम सेवन्यः चतुर्दश सङ्घाताः, चतुर्दश सीमन्ताः द्वाविंशतियोगवहानि स्रोतांसि, द्विकान्यन्त्राणि) चेति, समासः ॥६॥

स्वचार्य सत हैं, कला सत हैं, आशय सत हैं, धातु सत हैं, शिरायें सत सौ हैं । पेशी पाँच सौ हैं, स्नायु नौ सौ हैं, अस्थियाँ तीन सौ हैं, संधियाँ दो सौ दस हैं, सर्म एक सौ सत हैं, धमनियाँ चौबीस हैं, दोष तीन हैं, मल तीन हैं, स्रोत नौ हैं, कण्डरायें सोलह हैं, जालक सोलह हैं, कूर्च छै हैं, रज्ज्व चार हैं, सेवनी सत हैं, संघात चौदह हैं, सीमन्त चौदह हैं, योगवाहि स्रोत बाईस हैं, आँतें दो हैं । ये संक्षेप में हैं ।

वक्तव्य—सेवनी (सीवन)—जैसी कमीजों में दर्जा देते हैं । कूर्च—बाइन की कुर्बा जैसे । संघात—मिलना । सीमन्त—जैसे

औरतें शिर में मांग निकालती हैं । जालक—मछली पकड़ने के जाल की भाँति ॥६॥

विस्तारोऽत ऊर्ध्व—स्वचोऽभिहितः कला धातवो मला दोषा यकृतस्त्रीहानौ फुफ्फुस उण्डुको हृदय वृक्को च ॥

इसके आगे विस्तार से कहते हैं—स्वचार्य, कला, धातु, मल, दोष, यकृत, स्त्रीह, फुफ्फुस, उण्डुक, हृदय और वृक्क इनको पहले कह चुके हैं ॥७॥

आशयास्तु-वाताशयः, पिताशयः, श्लेष्माशयः, रक्ताशयः, आमाशयः, पक्वाशयः, मूत्राशयः, स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति ॥८॥

आशय-वाताशय, पिताशय, श्लेष्माशय, रक्ताशय, आमाशय, पक्वाशय, मूत्राशय ये सात हैं । स्त्रियों में आठवाँ गर्भाशय भी है ।

वि० मन्तव्य—वाताशय फुफ्फुस है, उसमें सर्वदा वायु भरा रहता है । श्वास क्रिया में जितना वायु भीतर जाता है उतना निकल जाता है । पिताशय—पित्त-द्रव पित्त का आशय—यह मांस एवं सौत्रिक तन्तु से निर्मित एक थैली है जो यकृत के नीचे के पृष्ठ के एक गड्ढे में रहती है । इसकी आकृति नासपाती जैसी होती है...इससे एक नली निकलती है...जब भोजन अन्त्र में होता है तब उसके द्वारा पित्तरस भोजन में जा पहुँचता है । जब भोजन पचाने की आवश्यकता नहीं होती, तब पित्तरस उसी थैली में ठहरता है । श्लेष्माशय—उरश्या कला का पर्याशय भाग—इस कला के दो स्तर हैं । यह दोनों कला फुफ्फुस को लपेटे अपनी गोद में लिप रहती हैं, श्वास लेने पर फुफ्फुस में वायु भरने से फूलने पर दोनों स्तर समीप आ जाते हैं और श्वास निकालने पर—फुफ्फुस संकुचित होने से अधिक दूर हो जाते हैं और लम्बी, चौड़ी तथा दोनों ओर से बन्द थैली (आशय) के समान है, दोनों स्तरों के भीतर लसीका (श्लेष्मा) रहती है यही बढ़कर “उरस्तोय” नामक रोग का रूप धारण कर लेती (देवें प्रत्यक्ष शा० आशयखण्ड) शार्ङ्गधर संहिता में श्लेष्माशय का स्थान उरस् माना भी है । रक्ताशय—हृदय है—रक्त का नाम शोणित है, अर्थ है चलने वाला—रक्त सर्वदा चलता ही रहता है, परन्तु कुछ समय के लिये हृदय में ठहरता है और ठहर कर पुनः चल पड़ता है । अतः वह आशय कहा गया है देखिये अ० ४ का सू० ३१ । आमाशय—खा लेने पर आहार आमाशय में ठहरता है, कुछ समय के पश्चात् अन्त्र में जाना प्रारम्भ करता है । पक्वाशय—पक्वस्थजातपाकस्थ आहारस्थ आशयः, अर्थात् मलाशय, अन्त्र में तो आहार चलता ही रहता है ठहरता नहीं है, ठहरता है तो मलाशय में जाकर ठहरता, अतः अन्त्र—तुलान्त्र को आशय नहीं माना जाता और न मानना ही चाहिये । मूत्रा-

३१४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

शय—मलद्रव में से चल कर जलीयांश मूत्राशय अर्थात् वस्ति में ही ठहरता है। गर्भाशय—गर्भ गर्भाशय में कई मास पर्यन्त ठहरता है। आशय का अर्थ है जिसमें आकर ठहरा जाता है। शुक्रशोणित गर्भाशय में आकर ठहरते हैं, अतः वह आशय कहलाता है। अधाङ्गहृदयशा० स्था० अ० ३ में—‘सप्त च आधारा रक्तस्य आधः क्रमात् परे। कफामपित्तपक्वानां वायोः मूत्रस्य च स्मृताः। गर्भाशयोऽष्टमः स्त्रीणां।’ आशय का नाम आधार है, इसका भी वही अर्थ है आगत को धारण करनेवाला। शाङ्खधर संहिता में स्तनों को भी दो आशय माना है। ये आशय माने जा सकते हैं, परन्तु क्लिष्ट कल्पना से। आशय को ‘स्थान’ भी कहते हैं—स्थानान्यामानिपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। स्थान शब्द का अर्थ है—जहाँ गति—गमन की निवृत्ति हो जाय—चलते २ ठहरा जाय। इस प्रकार आशय, आधार तथा पर्याय वाचक हैं ॥८॥

सार्धत्रिज्यामान्यन्त्राणि पुंसां,

स्त्रीणांमर्धव्यामहीनानि ॥९॥

पुरुषों की आंत की लम्बाई साठे तीन व्याम है, स्त्रियों में आंतों की लम्बाई तीन व्याम है।

वक्तव्य—व्याम—हाथों को कन्धों के बराबर फैलाकर मध्यमांगुली से दूसरी मध्यमांगुली तक की लम्बाई व्याम है।

वि० मन्तव्य—व्याम ४ हाथ का होता है। पुमान् की अन्त्र की लम्बाई लगभग १४ हाथ, स्त्री की अन्त्र की लम्बाई लगभग १२ हाथ होती है। रक्त का प्रदाद—सार भाग ही मांस का रूप धारण करता है, अतः यह मांस से बनी कोमल नाली है, मोटाई अँगूठा जैसी। यह १४ हाथ लम्बी अँगूठा जैसी मोटी रबड़ की नाली की सी लचकीली और गेण्डली मारे सप के समान उदर में पड़ी रहती है, इसका प्रारम्भ आमाशय से और अन्त्र मलाशय के प्रारम्भिक भाग पर होता है, वस्तुतः आमाशय भी इसी का प्रारम्भिक भाग है और मलाशय अन्तिम भाग। इसके भीतरी भाग पर जो कला चिपकी रहती है उसमें आहार रस को ग्रहण करनेवाले अवयव होते हैं, अतः उसको ग्रहणी कहते हैं। अन्त्रोलपति के वर्णन में—(अ०४ सू० २६ २०) बतलाया गया है। अन्त्र शब्द ‘अम्’—गती धातु से बना है। जब आमाशय में आहार जाता है तब उसमें गति होने लगती है। फलतः विलोइन होने से आहार घुलने लगता है। जितना घुलता जाता है उतना अन्त्र में गिरने लगता है। अन्त्र के प्रारम्भिक भाग में पिताशय की नली का मुख लगा है उसके द्वारा पाचक पित्त आकर अन्त्र में मिलने लगता है और उसके प्रभाव से—आहार का रस—सार-भाग रस धातु पृथक् होने

लगता है और अन्त्र भर में ग्रहणी नामक कला के अवयवों द्वारा ग्रहीत-आन्वृषित हो जाता है। अबशिष्ट मलद्रव पक्वाशय अर्थात् मलाशय में चला जाता है। वहाँ जलांश आन्वृषित होकर मूत्र बनने के लिये रक्त में चला जाता है और गाढ़ा भाग पुरीष रूप में वहाँ रह जाता है ॥१॥

श्रवणनयनवदनघ्राणगुदमेढाणि नव स्तोतांसि नराणां वहिर्मुखाणि, एतान्येव स्त्रीणामपेराणि च त्रीणि द्वे स्तनयोरेधस्ताद्रक्तवहं च ॥१०॥

दो कान, दो नयन, मुख, २ नासिका, गुदा, मेहन में नौ स्तोत मनुष्यों में वहिर्मुख होते हैं। स्त्रियों में ये नौ स्तोत तो हैं ही, परन्तु तीन और अधिक हैं, इनमें दो स्तनों में और एक अपत्यपथ नीचे ॥१०॥

षोडश कण्डराः—तासां चतस्रः पादयोः, तावत्यो हस्तग्रीवापृष्ठेषु, तत्र हस्तपादगतानां कण्डराणां नखा अप्रप्ररोहाः, ग्रीवाहृदयनिबन्धिनोनामधोभागगतानां मेदः, श्रोणिपृष्ठनिबन्धिनोनामधोभागगतानां विम्बं, मूर्धोरुव-क्षोऽसपिण्डादीनां च ॥११॥

कण्डरायें सोलह हैं—इनमें चार कण्डरायें पैरों में, हाथ, ग्रीवा, पीठ में भी चार-चार हैं। इनमें हाथ पैर की कण्डराओं के अप्रप्ररोह (आगे निकले अंकुर रूप) नख हैं। ग्रीवा हृदय को बाँधनेवाली, नीचे की ओर गई हुई कण्डराओं का अप्रप्ररोह मेहन है। श्रोणि-पीठ-को बाँधनेवाली-नीचे (पीछे) की ओर जानेवाली कण्डराओं का प्ररोह विम्ब (नितम्ब) हैं। ऊरु, वक्ष, अंशपिण्ड इत्यादि की कण्डराओं का प्ररोह शिर है ॥११॥

मांसशिरास्नायवस्थिजालानि प्रत्येकं चत्वारि, तानि मणिबन्धगुरुफसंश्रितानि परस्परनिबद्धानि परस्परगवांक्षितानि चेति, यैर्गवांक्षितमिदं शरीरम् ॥१२॥

जालकों का वर्णन—मांस, शिरा, स्नायु और अस्थि प्रत्येक के चार चार जाल हैं। ये जाल मणिबन्ध (कलई), गुरुफ(गिद्ध) में स्थित हैं। एक दूसरे से परस्पर बंधे हुए हैं, और एक दूसरे में गवाक्ष (वातायन) की भाँति है। जिनसे कि यह शरीर गवांक्षित (छिद्रित) बना हुआ है, (मांस-शिरा स्नायु और अस्थि इनके जाल परस्पर फँसे हुए हैं) ॥१२॥

षट् कूर्चाः, ते हस्तपादग्रीवामेदेषु, हस्तयोर्द्वौ, पादयोर्द्वौ, ग्रीवामेद्वयोरेकैकः ॥१३॥

कूर्च छेः हैं—ये हाथ, पैर, ग्रीवा और मेहन में हैं। इनमें हाथ में दो, पैरों में दो, ग्रीवा में एक, मेहन में एक ॥१३॥

महत्यो मांसरज्जवश्चतस्रः—षुष्ठवंशमुभयतः पेक्षितिबन्धनाथ द्वे बाह्ये, आभ्यन्तरे च द्वे ॥१४॥

अ० ५।

शारीरस्थानम्

११७

बड़ी मात्रा रखु चार हैं—पृष्ठ वंश के दोनों ओर पेशियों की बाँधने के लिये बाहर की तरफ दो, अन्दर की तरफ दो ॥

सप्त सेवन्यः; अग्निसि विभक्ताः पञ्च, जिह्वाशोफसोरेकैका, ताः परिहर्तव्याः शस्त्रेण ॥१५॥

सेवनी सात हैं—सिर में अलग अलग पाँच, जिह्वा और मेहन में एक एक। शस्त्रकर्म में इनको बचना चाहिये ॥१५॥

चतुर्दशास्थनां संघाताः, तेषां त्रयो गुल्फजानुवडुक्ष- गेषु, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, त्रिकञ्जिर सोरेकैकः ॥१६॥

अस्थियों के संघात चौदह हैं—इनमें से तीन संघात गुरुम, जानु और वंशण में हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं में समझना। त्रिक और सिर में एक-एक अस्थि संघात है ॥१६॥

चतुर्दशैव सीमन्ताः, ते चास्थिसङ्घातवद् गणनीयाः, यत्संयुक्ता अस्थिसंघाताः, ये ह्युक्ताः संघातास्ते खल्वष्टा- दृशेकैषाम् ॥१७॥

सीमन्त चौदह हैं—इनकी अस्थि संघात के समान गणना करनी चाहिये। क्योंकि अस्थि संघात इन से मिले हुए हैं। कई आचार्यों के मत से कहे हुए अस्थि संघात अठारह हैं।

वक्तव्य—पूर्वोक्त चौदह, श्रोणि काण्ड के ऊपर एक, उदर और उसकी सन्धि में एक, अंश कूट के ऊपर एक। भोजने—

“संघाताः सीविता येस्तु सीमन्तास्तान् प्रचक्षमेह ॥” जिनसे अस्थिसंघात सिये हुए हैं उनको सीमन्त नाम दिया है ॥

त्रौणि सप्तछीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते, शल्य- तन्त्रेषु तु त्रौण्यैव शतानि। तेषां सविश्रमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं शोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, त्रीणां प्रत्युध्वं त्रिषष्टिः, एवमस्थनां त्रौणि शतानि पूयन्ते ॥१८॥

वेदवादी (चरक, याज्ञवल्क्य आदि) लोग अस्थियों की संख्या तीन सौ साठ कहते हैं। परन्तु शल्य तन्त्र में तीन सौ ही अस्थियाँ कही हैं। इनमें से एक सौ बीस अस्थियाँ शाखाओं में, एक सौ सत्रह अस्थियाँ शोणिपार्श्व-पीठ आदि छाती में हैं। त्रीणां से ऊपर तिरसठ हैं। इस प्रकार से तीन सौ अस्थियाँ पूरी हो जाती हैं।

वक्तव्य—वेदवादी ऋषियों ने अस्थियों का विचार धार्मिक, यज्ञ कर्म की दृष्टि से किया है। जिनको छूने से प्रायश्चित्त आदि करना होता है। इसी से स्मृति में अस्थियों को गिनने की जरूरत हुई। शल्य तन्त्र में शल्य शास्त्र की दृष्टि से अस्थियों को गिना है।

वि० मन्तव्य—हमारा विचार है कि वैदिककाल में मानव शरीर में ३६० तथा शल्य तन्त्र काल में ३०० अस्थियाँ पाई

जाती होंगी। इसका कारण मानव शरीर का ह्रास है, क्योंकि-यूनानी चिकित्सा के शारीरस्थान के वर्णन में २४६ या २४४ और आज २०६ या २०० पाई जाती हैं। जो कुछ हो त्रिलोकि-नाथ वर्मा के शब्दों में यदि एक दो वर्ष के बालक की अस्थियों के सब टुकड़े गिने जायँ तो उनकी संख्या तीन सौ या उससे भी अधिक हो जायँगी। ११-१२ वर्ष के बालक के हाथ में ३८ अस्थियाँ होती हैं। अस्तु, अस्थि जैसी मोटी वस्तु के गिनने में प्राचीनों ने इतनी मूल की है यह मानने को मन नहीं चाहता। अस्थि ऊपर बाहर से श्वेत या श्वेताम होती है और भीतर से उसकी बनावट स्पष्ट जैसी होती है। इस भाग में मज्जा भरी रहती है। अस्थि भी जीवित शरीर में चेतनामय होती है, अतएव उसमें वेदना-रुजा-रूक् का अनुभव होता है। वह शरीर का सार या कठोर-सबसे कठोर भाग है। आधुनिक शरीरवेत्ता-दॉर्तो एवं नखों को अस्थि मानना उचित नहीं समझते, क्योंकि उनकी ओर अस्थियों की रचना में भेद है। हमारा विचार है कि प्राचीनों में पुनर्वसु भी ऐसा ही मानते थे। अतएव च० शा० अ० ७ में—“दॉर्तो, दन्तोत्खल्लो तथा नखों को साथ मिलाकर ३६० अस्थियाँ होती हैं” ऐसा लिखा है। यदि इनमें कोई भेद न होता तो ऐसा न लिखा जाता ॥१८॥

एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां त्रौणि त्रौणि। तानि पञ्चदश, तलकूचं गुल्फसंश्रितानि दश, पाण्यमैकं, जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूराविति, त्रिगदेवमेकस्मिन् सकिन्ध भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, श्रेण्यां पञ्च, तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकं, पार्श्वं षट्त्रिगदेकस्मिन्, द्वितीयेऽप्येवं, पृष्ठे त्रिगत्, अष्टावुरसि, द्वे असफलके, त्रीवायां नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिगत्, नासायां त्रौणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खैकैकं, षट् जिरसीति ॥१९॥

पैर के प्रत्येक अंगुली में तीन-तीन अस्थियाँ हैं, इस प्रकार से ये पन्द्रह हैं। तलुआ, कूच और गुल्फ में दश, पार्श्व में एक, जंघा में दो, जानु में एक, ऊरु में एक, इस प्रकार से एक टाँग में तीस अस्थियाँ होती हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और बाहुओं में समझनी चाहिये। शोणि प्रदेश में पाँच, जिनमें से गुदा, भग और नितम्ब में चार, त्रिक में एक, पार्श्व में छत्तीस एक तरफ, और दूसरे पार्श्व में भी छत्तीस, पीठ में तीस, उर में आठ, अंश फलक में दो, त्रीवा में नौ, कण्ठ नाड़ी में चार, हनु में दो, दाँत बत्तीस, नासा में तीन, तालु में एक, गण्ड-कर्ण और शंख में एक-एक, शिर में छे अस्थियाँ हैं।

वि० मन्तव्य—इस सूत्र द्वारा प्राचीनों ने अंगुष्ठ में भी

३२०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

तीन अस्थियाँ मानी हैं, जो भारतीय वैद्यों में विवाद का और नवीनों में शिरःशूल का कारण बनी हुई हैं, श्री गणनाथ सेन आदि ने तो इस पर बहुत कुछ कह डाला है और इसे प्राचीनों की बहुत बड़ी भूल माना है, प्रत्यक्षदर्शन के साथ-साथ अध्रियम सूत्र २६ के सन्निगणना के “द्वौ अंगुष्ठे” पाठ का उल्लेख भी किया है, परन्तु हमारे विचार में यह सब निराधार है। कारण सुनिये—श्री डा० त्रिलोकनाथ वर्मा ने अपनी ह० श० २० के प्रथम भाग के अ० ३ में एक चित्र—३५ वर्ष की स्त्री के हाथ का एकसरे चित्र दिया है। उसमें अँगूठा में एक गोल अस्थि दिखाई दे रही है और यह सर्वथा पृथक् है। अतः अस्थियाँ तीन और सन्धियाँ दो मानना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें और सम्भव है इसी को मान कर प्राचीनों ने तीन अस्थियाँ मानी हों और यह भी सम्भव है कि उस समय यह अस्थि सब में व्यक्त रहती हो। दन्ता द्वात्रिंशत्—दाँत ३२ होते हैं, परन्तु किसी के ३० भी होते हैं, और दूध के दाँत २४ ही रहते हैं, जो छठे, सातवें वर्ष में गिर जाते हैं ॥१६॥

एतानि पञ्चविधानि भवन्ति, तद्यथा—कपालरुचकत-रुणवल्यनलकसंज्ञानि। तेषां जानुनितम्बासगण्डतालुगङ्ग-शिरःसु कपालानि दशनास्तु रुचकानि, प्राणकर्णप्रौवाक्षि-कोषेषु तरुणानि, पाश्वपृष्ठोरःसु वलयानि, शेषाणि नलक-संज्ञानि ॥२०॥

ये अस्थियाँ पाँच प्रकार की होती हैं—यथा, कपाल (मिट्टी के टीकरे समान), रुचक, तरुण, वलय (कंगन के या उसके खण्ड आकार की), नलक। इनमें जानु, नितम्ब, अंश, फलक, गण्ड, तालु, शंख और शिर में कपाल अस्थियाँ हैं। दाँतों को रुचक कहते हैं। नासिका, कान, प्रौवा, अक्षिकोष में तरुणा-स्थि हैं। पाश्व, पीठ और छाती में वलय, शेष स्थानों पर नलकास्थियाँ हैं ॥२०॥

भवन्ति चात्र—

अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः ॥

अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां प्रवम् ॥२१॥

तस्माच्चिरविनष्टेषु स्वड्मासेषु शरीरिणाम्।

अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ॥२२॥

मांसान्यत्र निवद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा।

अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ॥२३॥

इस में श्लोक भी हैं—जिस प्रकार वृक्ष अन्दर के सार भागों से स्थिर रहते हैं, उसी प्रकार अस्थि रूपी सारों से मनुष्यों के शरीर धारण किये जाते हैं। इसलिये त्वचा और मांस नष्ट होने पर भी देह की सारभूत अस्थियाँ नष्ट नहीं होतीं। मांस-शिराओं और स्नायुओं के द्वारा अस्थियों में बँधे होने से न तो फटते हैं और न गिरते हैं।

वि० मन्तव्य—अस्थि के दाँचा पर मांसपेशियाँ लिप्टी तो हैं ही, पर शिरा एवं स्नायु रूप डोरियों से बँधी भी हैं, मांसपेशियों के उचित निवेश से मानव का वर्तमान आकार (आकृति) बनता है। यदि उसे पृथक् कर दिया जाता है तो कोई नहीं कह सकता कि यह देवदत्त का अस्थिपञ्जर है कि अथवा यज्ञदत्त का। अस्थिपञ्जर का नाम “कंकाल” है ॥२१-२३॥

सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्ठावन्तः, स्थिराश्च ये ॥२४॥

शाखासु हन्वोः कट्या च चेष्ठावन्तस्तु सन्धयः।

शेषास्तु सन्धयः सर्वं विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ॥२५॥

सन्धियाँ दो प्रकार की हैं—चेष्ठावान् और स्थिर। शाखा, हनु, और कटि में चेष्ठाशील सन्धियाँ हैं। शेष सब स्थानों पर स्थिर सन्धियाँ समझनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—अस्थियों के संयोग स्थल का नाम “सन्धि” है। यद्यपि वे परस्पर सर्वथा मिली या जुड़ी नहीं होतीं। उनके मध्य में श्लेषण नामक कफ विद्यमान रहता है। चेष्ठावान् या चल सन्धियाँ चेष्ठा—गति करनेवाली और स्थिर या अचल सन्धियाँ चेष्ठा रहित होती हैं। सन्धि को सन्धान एवं श्लेष भी कहते हैं—अस्थियों के सटने का स्थान। सन्धिस्थल में श्लेषण कफ रहने से चल सन्धियाँ घर्षण से बच जाती हैं और अचल सन्धियाँ सटी रहती हैं ॥२४-२५॥

सङ्ख्यातास्तु दशोत्तरे द्वे शते। शाखास्वष्टपष्टिः। एकोनषष्टिः कोष्ठे, प्रौवां प्रत्युध्वं ऽयगीतिः। एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रयस्त्रयः, द्वावङ्गुष्ठे, ते चतुदश, जानुगुल्फवङ्गुष्ठ-गेष्वैकैकः, एवं सप्तदशैकस्मिन् सन्धिन्त भवन्ति, एतेनेतरः सन्धि बाहु च व्याख्यताः, त्रयः कटोकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवशे, तावन्त एव पाश्वयोः, उरस्यष्टौ, तावन्त एव प्रौवायां, त्रयः कण्ठे, नाडीषु हृदयकलोमनि, बद्धास्वष्टा दश, दन्तपरिमाणे दन्तमूलेषु, एकः काकलके नासायां च, द्वौ वर्तस्मण्डलयोर्नाश्रयो, गण्डकर्णगङ्गुष्ठैकैकः, द्वौ हनु-सन्धौ, द्वावुपरिष्ठाद् भुवोः शङ्खयोश्च, पञ्च शिरःकपालेषु, एको मूर्धनि ॥२६॥

सन्धियों की संख्या दो सौ दस है। इन में शाखाओं में अङ्गुष्ठ, कोष्ठ में उनसठ, प्रौवा से ऊपर तिरासी (२३) हैं। देह की प्रत्येक अँगुली में तीन-तीन, अँगूठे में दो, ये कुल चौदह हुईं। जानु-गुल्फ और वंशण में एक-एक, इस प्रकार से एक टांग में कुल सत्रह सन्धियाँ हैं। इस प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में समझना चाहिये। कटि कपालों में तीन, पृष्ठ वंश में चौबीस-चौबीस ही पाश्वों में, उर में आठ। आठ प्रौवा में, कण्ठ में तीन, हृदय कलोम से सम्बद्ध नाखियों में अठारह, दाँतों के बराबर दन्त मूलों में अर्थात् बत्तीस,

अ० ५ ] ४१

शारीरस्थानम्

३२१

काकलक में एक, नासा में एक, नेत्राश्रित वर्त्म मण्डल में दो, गण्ड में एक, कान में एक, शंख में एक, हनुमन्त्रि में दो, भ्रुकुटी के ऊपर दो, शंखों के ऊपर दो, शिरःकपालों में पाँच, मूर्धनि (शिर) में एक।

त्रि० मन्तव्य—दो अंगुष्ठे—अंगूठा में चरणकास्थि समेत तीन अस्थियाँ होने पर भी सन्धियाँ दो ही हैं, क्योंकि तीसरी चणकास्थि कण्डरा में पृथक् रहती है। दन्तमूलेषु—दन्त के मूल में ऊबलाकार, इन में दन्त धंसे-धरे रहते हैं या जुड़े रहते हैं ॥२६॥

त एते सन्धयोऽष्टविधाः—कोरोलुखलसामुद्रगप्रतर-तुलसेवनवायसतुण्डमण्डलशङ्खावर्त्ताः। तेषामङ्कुलिमणिबन्धगुरुफजानुकूपरेषु कोराः सन्धयः, कश्चावङ्गक्षणदग्नेषु लूखलाः, अंसपीठगुदभगनितम्बेषु सामुद्रगाः, ग्रीवापुष्टवंगयोः प्रतराः, शिरःकटीरूपाण्येषु, तुलसेबन्धः, हन्वोक्भयतस्तु वायसतुण्डाः, कण्ठहृदयनेत्रकलोमनाडीषु मण्डलाः, श्रोत्रशृण्वातकेषु शङ्खावर्त्ताः। तेषां नामभिरिवाकृततयः प्रायेण व्याख्याताः ॥२७॥

ये सन्धियाँ आठ प्रकार की हैं। यथा कोर (कोन किनारे की-इस लकड़ी की कोर मार देना), उल्लखल, सामुद्रग, प्रतर, तुलसेवनी, वायसतुण्ड, मण्डल, शंखावर्त्त—इनमें से अंगुली, कलई, गुरुफ, जानु और कोहनी में कोर सन्धि है। कक्षा, वंक्षण और दांतों में उल्लखल सन्धि, अंसपीठ, गुदा, भग, नितम्ब में सामुद्रग, ग्रीवा और पुष्टवर्श में प्रतर, शिर और कटि कपालों में तुलसेवनी, हनु के दोनों ओर वायसतुण्ड, कण्ठ-हृदय नेत्र-कलोम नाड़ी में मण्डल, श्रोत्र शृण्वातकों में शंखावर्त्त। नाम से ही इनकी आकृति बता दी है।

सकल्य—कोर—किनारेवाली, उल्लखल-ओखली के आकार की, सामुद्रग संपुट के आकार की, प्रतर-तैरनेनाली, तुलसेवनी-एक दूसरी के बीच में फँसी, वायसतुण्ड—कोवे की चौंच के समान, मण्डल—गोलाकार, शंखावर्त्त—शंख के ऊपर के चक्रों की भाँति।

वि० मन्तव्य—कोरसन्धि कोरनामक सन्धि-सन्धान-जोड़-कोर कलिका-कली (अविकसित फूल) का नाम है। जहाँ दो अस्थियों के खिरे कोर जैसे रहते हैं और वे दोनों अस्थियाँ जहाँ जुड़ी रहती हैं उस सन्धि का नाम कोर सन्धि है। ये सब चल होती हैं। उल्लखल-सन्धि-एक अस्थि में ऊखली का गढ़ा या थाला रहता है और दूसरी अस्थि का खिरा मूल के समान उसमें पड़ा या धँसा रहता है। यह भी दो प्रकार की होती है १—अचल जैसे दन्त एवं दन्तोल्खल की और २—चल जैसे—कक्षा एवं वंक्षण की। सामुद्रग—जो मली प्रकार ऊपर टिकी रहती है या संपुट के समान बनी रहती है—दोनों अस्थियों के खिरों में गर्त रहता है और गर्त के किनारे मिले

रहते हैं जैसे संपुट में दो खिकोरो के। प्रतर—जहाँ दो अस्थियाँ तरपतर धरी-जुड़ी रहनी हैं, प्रतर-तले ऊपर—नीचे ऊपर। तुलसेवनी—जहाँ दो अस्थियों के दाँते काटे फँसे रहते हैं, ध्यान से देखने पर दोनों अस्थियाँ, परस्पर मिली हुईं प्रतीत होती हैं जैसे शिरःकपालों में कपालों के दाँते फँसे रहते हैं, जैसे परस्पर मिले हों। वायसतुण्ड—इस में एक अस्थि का सिग काक की तुण्ड—चौंच का सा होता है दूसरी से जुड़ा रहता है। जैसे अधोइनका सिरा शंखास्थि से जुड़ा है। मण्डल—जहाँ अस्थियाँ मण्डल या चक्र के आकार में परिणत हो जाती हैं या जिनसे घेरा बन जाता है। जैसे कण्ठ अर्थात् श्वास मार्ग-नलिका में। शंखावर्त्त—शंख के भीतरी आवर्त्तों-घुमावों के समान ॥२७॥

अस्थन्तु सन्धयो ह्येते केवलाः परिकीर्तिताः। पेशीस्तायुसिराणां तु सन्धिसमङ्गख्या न विद्यते ॥२८॥ ये केवल अस्थियों की हो सन्धियाँ कही गई हैं। पेशी, स्नायु और खिराओं की सन्धियों की गिनती नहीं है ॥२८॥

नव स्नायुगतानि। तासां आख्यासु षट्शतानि, द्वे शते त्रिशब्द कोषे, ग्रीवां प्रत्युर्ध्वं समर्पितः। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां पणिनचित्तास्तादिजन्तु, तावत्येव तल्लकृच-गुरुफेषु, तावत्येव एव जह्यायां, दश जानुनि, चत्वारिज-दूरी, दश वङ्गक्षणे, शतमधधर्मेवमेकरिमन् सकिन्धन् भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्याताः, षष्टिः कट्यां, षष्ठेऽगोतिः, पार्श्वयोः षष्टिः, उरसि त्रिजन्तु, षट्-त्रिशद ग्रीवायां, मूर्धनि चतुर्दिशतः एवं नव स्नायुगतानि व्याख्यातानि भवन्ति ॥२९॥

स्नायु नौ सौ हैं। इनमें से शाखाओं में छे सौ हैं। कोष्ठ में दो सौ तीस। ग्रीवा से ऊपर सत्तर हैं। पैर की एक एक अंगुली में छे छे स्नायु हैं, कुल तीस हैं। तल्ल, कूर्च और गुरुफ में भी तीस, जंघा में भी तीस, जानु में दस, ऊरु में चालीस, वंक्षण में दस, इस प्रकार टाँग में एक सौ पचास स्नायु हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दानों बाहुओं को समझना। कटि में साठ, पीठ में अस्सी, पार्श्वों में साठ (छाती में तीस) ग्रीवा में छत्तीस, शिर में चौतीस। इस प्रकार से नौ सौ स्नायु कह दिये।

वि० मन्तव्य—स्नायु को पड़ाव में सड़ी या सड़ी कहते हैं। यह शण के रेशों-तन्तुओं जैसी श्वेत एवं लम्बी होती हैं और अत्यन्त हृद भौ, इनसे (पशु की स्नायु से) धनुष की ज्या (डोरी) तथा रूई धुनने की तांत बनाई जाती हैं। इनसे शरीर की सन्धियाँ बँधी रहती हैं (दे० श्लो० ४२) और इसके जाल (प्रतान—ताना बाना के रूप में) मांसपेशियों में भी तने रहते हैं और वे सड़े गले ढ़गों में—दिलाई पड़ते हैं (दे० सू० अ०

३२२

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ५ ]

२३ का सूत्र १२ यथा “शण्त्तुलवत्-स्नायुजालवस्ती” अर्थात् शण के तन्तुओं जैसे स्नायु जाल से युक्त ब्रण। स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसाऽस्थिमेदसाम् (शा० ध० सं० अ० ५)। मांसायन्त्र निबद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा (सू० शा० अ० ५ श्लो० २५) स्नायु के द्वारा ब्रण को सिला भी जाता है (सू० अ० २५ श्लो० २१) १-प्रतानवती-शण्त्तुल के जाल जैसी, २-वृत्त-गोल तथा ठोस-अशुषिर, ३-पृथु चौड़ी या चपटी, ४-शुषिर-खोखली-कठोर सिरा रूप, क्योंकि जिन सिराओं का खरपाक होता है वे स्नायु कही जाती हैं। उपादान दोनों का समान है, देखिये सू० शा० अ० ४ श्लोक ३० ॥२६॥

भवन्ति चात्र—

स्नायुश्चतुर्बिधा विद्यात्तास्तु सर्वा निबोध मे।

प्रतानवस्यो वृत्ताश्च पृथ्वयश्च शुषिरास्तथा ॥२०॥

प्रतानवस्यः शाखासु सर्वसन्धिषु चाप्यथ।

वृत्तास्तु कण्डराः सर्वा विन्नयाः कुशलेरिह ॥२१॥

आमपक्वाशयान्तेषु वस्तौ च शुषिराः खलु।

पार्श्वोरसि तथा पृष्ठे पृथुलाश्च शिरस्यथ ॥२२॥

नौर्यथा फलकास्तीर्णां बन्धनेबहुभिर्मुता।

भारक्षमा भवेदप्यु न्युक्ता सुसमाहिता ॥२३॥

एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः।

स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२४॥

न ह्यस्थीनि न वा पेशयो न सिरा न च सन्धयः।

व्यापादितास्तथा हन्युयथा स्नायुः शरीरिणम् ॥२५॥

यः स्नायुः प्रविजानाति बाह्याश्चाभ्यन्तरास्तथा।

स गृहं अत्यमाहतु देहाच्छकनोति देहिनाम् ॥२६॥

इसमें श्लोक भी हैं—स्नायु चार प्रकार की हैं, यथा

प्रतानवती, वृत्त, पृथु और शुषिर (खोखली)। इनमें प्रतानवती स्नायु शाखाओं में और सब सन्धियों में हैं। वृत्त (गोल) स्नायु को कण्डरायें समझना चाहिये। आमाशय, पक्वाशय और वस्ति में शुषिर स्नायु हैं। पार्श्व छाती, पीठ और शिर पर पृथु (चपटी) स्नायु हैं। जिस प्रकार लकड़ी के तख्तों से तैयार की, बहुत से बन्धनों से बँधी हुई नाव पानी में बहुत से आइ-मियों के बोझ को उठाने में समर्थ होती है, उसी प्रकार इस शरीर में जितनी भी सन्धियाँ हैं, वे सब स्नायुओं से बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्य भार को उठाने में समर्थ होते हैं। न तो अस्थियाँ न पेशी, न सिरा, न सन्धियाँ आहत होने पर इतना कष्ट नहीं देतीं (निकम्मा नहीं करतीं) जितना कि स्नायु के आघात से बेकार हो जाता है। जो अन्दर और बाहर के स्नायु को जानता है, वह मनुष्य प्राणियों के शरीर में से गहराई में गये शल्य को भी निकाल सकता है ॥३०-३६॥

पञ्च पेशीशतानि भवन्ति। तासां चत्वारि शवानि

शाखासु, कोष्ठे षट् षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुर्चिन्नात्। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां तिलस्तिलस्तः पञ्चदश। दश प्रपदे, पादोपरि कूचसन्निविष्टास्तावत्य एव दश गुल्फतल्योः, गुल्फजान्वन्तरे विज्ञातिः पञ्च जानुनि, विज्ञातिरूरी दश वङ्गक्षणे, शतमेवमेकस्मिन् सकिध्न भवति, एतेनैतत्सकियबाहुं च व्याख्यातौ, तिलः पायो, एका मेढ्रं, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः, स्फिचोः पञ्च पञ्च, द्वे बस्तिगिरसि, पञ्चोदरे, नाभ्यामेका पृष्ठोर्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्षकांसो प्रति समन्तात् सम, द्वे हृदयाभाशययोः, षट् यकृत्लीहोण्डु (न्दु)केषु, ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वाः, एकैका काकलकगल्योः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायां, द्वे ओष्ठयोः, द्वे नासायां, द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः, कणयोर्द्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति, एवमेतानि पञ्च पेशीशतानि ॥३७॥

पेशियाँ पाँच सौ हैं। इनमें से शाखाओं में चार सौ, कोष्ठ में छः सठ, ग्रीवा से ऊपर चौतीस। पैर की प्रत्येक अंगुली में तीन, कुल पन्द्रह। प्रपद में दस, पैर के ऊपर कूच में लगी हुई भी दस। गुल्फ तल में दस। गुल्फ और जानु के बीच में बीस। जानु में पाँच। ऊरु में बीस, वंक्षण में दस। इस प्रकार से एक टांग में एक सौ पेशियाँ हैं। इसी प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में गिननी चाहिये। पासु में तीन, मेहन में एक, सेवनी में एक, वृषणों में दो, प्रत्येक नितम्ब में पाँच, पाँच, वस्तिशिर में दो, उदर में पाँच, नाभि में एक, पीठ के ऊपर के भाग में लगी हुई लम्बी पाँच-पाँच, पार्श्वों में छै, वक्ष में दस, अक्षक और अंस के चारों ओर सात, हृदय और आमाशय में दो, यकृत, प्लीहा, उण्डुक में छः, ग्रीवा में दो, जिह्वा में एक, काकलक और गले में एक-एक, तालु में दो, जिह्वा में एक, ओष्ठ में दो, नासा में दो, नेत्र में दो, गण्ड में चार, कान में दो, ललाट में चार, शिर में एक। इस प्रकार से पाँच सौ पेशियाँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३७॥

भवति चात्र—

शिरास्तान्यवस्थिपर्वणि सन्धयश्च शरीरिणाम्।

पेशीभिः सद्युतान्यत्र बल्वन्ति भवन्त्यतः ॥३८॥

इसमें श्लोक भी हैं—

मनुष्यों की सिरायें, स्नायु, अस्थि, पर्व और सन्धियाँ पेशियों से ढँपी हुई हैं। इसलिये ये बलवान् रहती हैं ॥३८॥

स्त्रीणां तु विशतिरधिका। दश तासां स्तनयोरेकैकस्मिन् पञ्चपठवेति, यौवने तासां परिवृद्धिः, अपत्यपये चतस्रः—तासां प्रसूते अभ्यन्तरतो द्वे, मुखान्नित्रे बाह्ये च वृत्ते द्वे, गर्भच्छिद्रसन्नितास्तिस्रः, शुक्रार्तवप्रवेगिन्त्यस्तिस्र एव। पित्तपक्वाशययोमध्ये गर्भशय्या, यत्र गर्भस्तितृति।

३५ ]

आरीरस्थानम्

३२३

जियों में वीख पेशियाँ अधिक हैं। प्रत्येक स्तन में पाँच, पाँच, दोनों स्तनों में दस। यौवन काल में इनमें बृद्धि होती है। अपत्य मार्ग में चार पेशी हैं। इनमें से दो अन्दर की ओर फैली हैं। और दो गोलाई में बाहर की ओर अपत्य पथ के मुख में रहती हैं। गर्भद्वार के मुखपर स्थित तीन पेशियाँ हैं। शुक्र आर्तव को प्रविष्ट करनेवाली तीन और हैं। पित्ताशय और पक्वाशय के बीच में गर्भशय्या (गर्भाशय) रहता है, जहाँ पर गर्भ रहता है।

वि० मन्तव्य—अपत्यपथ—गर्भ का मार्ग—योनिमार्ग। योनिव्यापद् आदि प्रसंगों में योनि गर्भाशय का नाम है—यु मिश्रणे धातु (अदादि गण) से योनि शब्द बनता है। अर्थ—जहाँ पर शुक्र शोणित का मिश्रण हो। योनि—भगौष्ठ, भग एवं गर्भाशय का सम्मिलित नाम है, देखें अग्रिम श्लो० ४३ ॥३६॥

तासां बहलपेलवस्थूलगुपुष्युतहृस्वदीर्घस्थिरमुदु-रुल्लक्षणकर्कशभावाः सन्ध्यस्थिसिरास्तानुप्रच्छादका यथा-प्रदेशं स्वभावत एव भवन्ति ॥४०॥

पेशियों का आकार—बहल, पेलव, (तनु-पतली) स्थूल, सूक्ष्म, पुष्ट (चपटा), गोल, हृस्व, दीर्घ, स्थिर, मुदु, रुल्लक्षण, कर्कश स्वभाव का होता है। पेशियाँ सन्धि, स्नायु-अस्थि-सिरा को दाँपती हैं, अतः स्थान के अनुसार इनका स्वभाव होता है (जहाँ जैसी जरूरत होती है, वहाँ वैसा होता है)।

वि० मन्तव्य—पेशियों के उत्क बहल पेलव आदि भावों के कारण ही प्रतिप्राणी की आकृति में भेद होता है और पुष्टि एवं कार्य होता है, एक ही के शरीर के भिन्न २ अङ्गों एवं प्रत्यङ्गों में भी पुष्टि एवं कार्य होता है। इसी प्रकार अवलता-सवलता भी होती है। व्यायाम से इसी प्रकार पेशियों को पुष्ट बनाया भी जा सकता है ॥४०॥

भवति चान्न—

पुसां पेशयः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः।

श्रीणामावृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः ॥४१॥ इसमें श्लोक भी हैं—

पुरुषों के मेहन और मुष्क (वृषण) में रहनेवाली जो पेशियाँ कहीं हैं, वे ही पेशियाँ जियों में अन्तर्गत फल (डिम्ब) को दाँपे रहती हैं। (लक्षण-लिंग-डल्हण)।

वक्तव्य—भोज तीन पेशियों कम मानते हैं। यथा—पञ्चपेशीशतान्येव खीवजं विद्धि भूमिप। अतश्च तिष्ठो हीयन्ते शीणां शोफसि मुष्कयाः ॥४२॥

मर्मसिराधमनोक्षोत्तसामन्यत्र प्रविभागः ॥४३॥

मांस, सिरा, धमनी, और क्षोतों का विभाग अन्यत्र कहेंगे ॥४२॥

मङ्गनाभ्याकृतिर्योनिस्स्यावर्ता सा प्रकीर्तिता।

तस्यास्तृतीये स्वावर्तं गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥४३॥

यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः।

तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥४४॥

योनि शंखनाभि के आकार की, तीन आवर्त से युक्त होती है, उसके तीसरे आवर्त में गर्भशय्या रहती है। रोहित मत्स्य के मुख की जैसी आकृति होती है, उसी के समान उसी के आकार की गर्भशय्या होती है। (अर्थात् आगे से मुख छोटा-तंग रहता है, और पीछे बड़ा हो जाता है) ॥४३, ४४॥

आमुनरोऽभिमुखः शैते गर्भो गर्भाशये खियाः।

स योनिं शिरसा याति स्वभावात् प्रसवं प्रति ॥४५॥ गर्भ गर्भाशय में अंगों को संकुचित करके सामने की ओर से रहता है। यह गर्भ प्रसव के समय स्वभाव से ही (शिर के भारी होने के कारण) शिर के बल आता है (पहले शिर आता है) ॥४५॥

त्वकपर्यन्तस्य देहस्य योऽयमङ्गविनिश्चयः।

शल्यज्ञानादृते नैष वण्यतेऽङ्गेषु केषुचित् ॥४६॥

शरीर का त्वक पर्यन्त जो यह अंग विनिश्चय है, वह किसी भी प्रकार शल्य ज्ञान के बिना वर्णन नहीं किया जा सकता है। (शल्य ज्ञान से अंगों का निश्चय किया जा सकता है) ॥४६॥

तस्मात्निःसंशयं ज्ञानं हृत् शल्यस्य वाच्छ्रुता।

शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्योऽङ्गविनिश्चयः ॥४७॥

प्रत्यक्षतो हि यदृष्टं शास्त्रहृष्टं च यद्वेत्।

समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥४८॥

इसलिये शल्य के हरण करनेवालों को मृत शरीर का शोधन करके अच्छी प्रकार अंगों का निश्चय करना चाहिये। प्रत्यक्ष से देखा हुआ और शास्त्र से जाना हुआ ये दोनों ही बातें संक्षेप में ज्ञान की बृद्धि में कारण होती हैं। चरक में कहा है—शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्। आयुर्वेद स कात्स्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥४७, ४८॥

तस्मात् समस्तगात्रमविपोपहतमदीर्घन्याधिपीडित-मवर्षगतिकं निःसृष्टान्नपुरीषं पुरुषमावहन्त्यामापगायां निबद्धं पञ्चरसस्थं मुखवल्कलकुशजगणादीनामन्यतमेनाविष्टित्वाङ्गमप्रकाशे देशे कोथयेत्, सम्यक्प्रकृथितं चादृष्ट्य, ततो देहं समरात्रादुशीरबालवेणुबल्वजकूर्चानामन्यतमेन शनैः शनैरवर्षघर्षयस्यवादीन् सर्वानेव बाह्याभ्यन्तरानङ्ग-प्रत्यङ्गविशेषान् यथोक्तान् लक्ष्येच्छुषा ॥४९॥

इसलिये सम्पूर्ण अंगोंवाले, विष से न मरे हुए, बहुत लम्बी बीमारी से न मरे, एक सौ बरस की आयु से कम आयु के, शव में से आन्त्र और मल को निकालकर, पुरुष के शव का बहते हुए जलवाली नदी में पिझरे के अन्दर, मंजु, वल्कल, कुश, सन आदि किसी एक से लपेटकर, एकान्त स्थान में

३२४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

रक्तर सङ्घाये (नरम करे)। भली प्रकार नरम बन जाने पर इसको निकालकर इस शरीर को सात दिन तक खस, बाल, बाँस, बल्बज की बनाई किसी एक की कूची से धीरे धीरे रगड़ता हुआ त्वचा से लेकर सब ही बाहर और अंदर के अंग-प्रत्यंग भागों को, उनकी विशेषताओं को कहे हुये अनुसार आँख से देखे। (अप्रकाशे का अर्थ अँधेरे में भी करते हैं)।

वि० मन्तव्य—आजकल आयुर्वेदिक तथा एलोपैथिक विद्यालयों में शवच्छेद किया जाता है वहाँ—शव में—फुमालिन एवं संखिया का इन्जेक्शन कर दिया जाता है। फलतः वह सड़ता नहीं है, सूख अवश्य जाता है और उसमें रंग भी चढ़ा दिया जाता है, जिससे रक्त खिराएँ लाल बनी रहती हैं। धीरे २ महीनों चौर २ कर अङ्ग प्रत्यङ्ग देख लिये जाते हैं ॥

न शक्यश्चलुषा द्रष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः।

दृश्यते ज्ञानचक्षुभिस्तपश्चक्षुभिरेव च ॥५०॥

शरीर में अतिसूक्ष्म विभु-परमात्मा को आँख से नहीं देख सकते। यह आत्मा तो ज्ञान चक्षु से और तप की आँखों से ही देखा जा सकता है। इसीसे कहा है—

‘यद्वदुध्करं यद्वदुरापं यच्च दुर्गं यद् दुस्तरम्।

तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥’

वि० मन्तव्य—विभुः-विविधो भवति, विकृतो—विकार-युक्तो भवति इति अर्थात् जो विश्वरूप है या जो शरीर धारण करता है वह आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, एवमरे से भी नहीं देखा जा सकता, शुक्र में जो सर्पाकार कीटाणु देखा भी जाता है वह आत्मा नहीं, अपितु उसका पाञ्चभौतिक शरीर है। मले ही वह भी सूक्ष्म है परन्तु सूक्ष्मतम नहीं। वह तो ज्ञान चक्षु-सुख दुःख आदि गुणों-लक्षणों से देखा जाता है। अथवा तपःप्राप्त दृष्टि—विष्य दृष्टि से ॥५०॥

शरीरे चैव शाखे च दृष्टार्थः स्याद्विशारदः।

दृष्टश्रुताभ्यां सदेहभवपोहाचरेत् क्रियाः ॥५१॥

शरीर के विषय में और शास्त्र के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। देखकर और सुनकर-संदेह को मिटाकर ही चिकित्सा कार्य आरम्भ करें।

वि० मन्तव्य—विशारद-प्रगल्भ—जो शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों को भली माँत देख लेता है और शास्त्र को समझ लेता है, वह विशिष्ट शारदा वाणी यस्य सः—विशारद—प्राध्यापक शरीर का व्याख्याता हो सकता है ॥५१॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शरीरसंख्याध्याकरण-

शारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५१॥

पञ्चोऽध्यायः

अथातः प्रत्येकममनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे प्रत्येक सर्मनिर्देश शरीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—प्रत्येक (२०७) सर्म का निर्देश—वर्णन है, जिसमें सर्म का लक्षण देखिये २२ वें सूत्र में ॥१,२॥

समोत्तरं सर्मशतम् तानि सर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति, तद्यथा—मांसमर्माणि, स्निग्धमर्माणि, स्नायु-मर्माणि, अस्थिमर्माणि सन्धिमर्माणि चेति। न खलु मांसस्निग्धस्नायुअस्थिसन्धिष्वयतिरेकेणान्यानि सर्माणि भवन्ति, यस्मात्त्रोपलभ्यन्ते ॥३॥

सर्म एक सौ सात हैं। ये सर्म पाँच प्रकार के हैं, यथा—मांस सर्म, स्निग्ध सर्म, स्नायु सर्म, अस्थि सर्म और सन्धि सर्म। मांस, स्निग्ध, स्नायु, अस्थि और सन्धि से पृथक् कोई सर्म नहीं होते, क्योंकि इनसे पृथक् और नहीं मिलते। (सारयन्तीति सर्माणि)।

वि० मन्तव्य—पञ्चात्मक—मांस आदि मय अर्थात् उनसे निर्मित यथा मांसमर्म—मांस मय मर्म, स्निग्धमर्म—स्निग्धमय मर्म, स्नायुमर्म—स्नायुमय मर्म, अस्थिमर्म—अस्थिमय मर्म और सन्धिमर्म—सन्धिमय मर्म। यथा मृन्मय—मिट्टी से बना—निर्मित घट आदि। क्योंकि मांस आदि के अतिरिक्त—रहित मर्मस्थल उपलब्ध नहीं होते ॥३॥

तत्रैकादश मांसमर्माणि, एकचत्वारिंशत् स्निग्धमर्माणि, सप्तविंशतिः स्नायुमर्माणि अष्टावस्थिमर्माणि, त्रिंशतिः सन्धिमर्माणि चेति। तदेतत् समोत्तरं मर्मशतम् ॥४॥

इनमें ग्यारह मांसमर्म, इकतीस स्निग्धमर्म, सत्ताईस स्नायु-मर्म आठ अस्थिमर्म, और बीस सन्धि मर्म हैं। इस प्रकार से ये एक सौ सात मर्म हैं।

वि० मन्तव्य—विधि मेद से मर्मों की संख्या इस प्रकार है ॥४॥

तेषामेकादशैकस्मिन् सन्धिभन्वन्ति। एतेनेतरसन्धि-बाहु च व्याख्याती, उद्वरोस्त्रोद्गिदश, चतुर्दश पुष्टे, प्रौवा प्रत्युध्वं समन्त्रिशत् ॥५॥

इनमें से ग्यारह मर्म एक टाँग में होते हैं। इस प्रकार से दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं को समझना चाहिये। पेट और छाती में बारह, पीठ में चौदह, प्रौवा से ऊपर के भाग में सैंत स मर्म हैं ॥५॥

तत्र सकथिमर्माणि क्षिप्रतलहृदं प्रकृचं कूर्च शिरोगुल्फं न्द्रवस्तिजान्वाणुयुर्वोलोहिताक्षणि क्षिप्रं चेति, एतेनेतरत्