सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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आरीरस्थानम्
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जियों में वीख पेशियाँ अधिक हैं। प्रत्येक स्तन में पाँच, पाँच, दोनों स्तनों में दस। यौवन काल में इनमें बृद्धि होती है। अपत्य मार्ग में चार पेशी हैं। इनमें से दो अन्दर की ओर फैली हैं। और दो गोलाई में बाहर की ओर अपत्य पथ के मुख में रहती हैं। गर्भद्वार के मुखपर स्थित तीन पेशियाँ हैं। शुक्र आर्तव को प्रविष्ट करनेवाली तीन और हैं। पित्ताशय और पक्वाशय के बीच में गर्भशय्या (गर्भाशय) रहता है, जहाँ पर गर्भ रहता है।
वि० मन्तव्य—अपत्यपथ—गर्भ का मार्ग—योनिमार्ग। योनिव्यापद् आदि प्रसंगों में योनि गर्भाशय का नाम है—यु मिश्रणे धातु (अदादि गण) से योनि शब्द बनता है। अर्थ—जहाँ पर शुक्र शोणित का मिश्रण हो। योनि—भगौष्ठ, भग एवं गर्भाशय का सम्मिलित नाम है, देखें अग्रिम श्लो० ४३ ॥३६॥
तासां बहलपेलवस्थूलगुपुष्युतहृस्वदीर्घस्थिरमुदु-रुल्लक्षणकर्कशभावाः सन्ध्यस्थिसिरास्तानुप्रच्छादका यथा-प्रदेशं स्वभावत एव भवन्ति ॥४०॥
पेशियों का आकार—बहल, पेलव, (तनु-पतली) स्थूल, सूक्ष्म, पुष्ट (चपटा), गोल, हृस्व, दीर्घ, स्थिर, मुदु, रुल्लक्षण, कर्कश स्वभाव का होता है। पेशियाँ सन्धि, स्नायु-अस्थि-सिरा को दाँपती हैं, अतः स्थान के अनुसार इनका स्वभाव होता है (जहाँ जैसी जरूरत होती है, वहाँ वैसा होता है)।
वि० मन्तव्य—पेशियों के उत्क बहल पेलव आदि भावों के कारण ही प्रतिप्राणी की आकृति में भेद होता है और पुष्टि एवं कार्य होता है, एक ही के शरीर के भिन्न २ अङ्गों एवं प्रत्यङ्गों में भी पुष्टि एवं कार्य होता है। इसी प्रकार अवलता-सवलता भी होती है। व्यायाम से इसी प्रकार पेशियों को पुष्ट बनाया भी जा सकता है ॥४०॥
भवति चान्न—
पुसां पेशयः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः।
श्रीणामावृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः ॥४१॥ इसमें श्लोक भी हैं—
पुरुषों के मेहन और मुष्क (वृषण) में रहनेवाली जो पेशियाँ कहीं हैं, वे ही पेशियाँ जियों में अन्तर्गत फल (डिम्ब) को दाँपे रहती हैं। (लक्षण-लिंग-डल्हण)।
वक्तव्य—भोज तीन पेशियों कम मानते हैं। यथा—पञ्चपेशीशतान्येव खीवजं विद्धि भूमिप। अतश्च तिष्ठो हीयन्ते शीणां शोफसि मुष्कयाः ॥४२॥
मर्मसिराधमनोक्षोत्तसामन्यत्र प्रविभागः ॥४३॥
मांस, सिरा, धमनी, और क्षोतों का विभाग अन्यत्र कहेंगे ॥४२॥
मङ्गनाभ्याकृतिर्योनिस्स्यावर्ता सा प्रकीर्तिता।
तस्यास्तृतीये स्वावर्तं गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥४३॥
यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः।
तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥४४॥
योनि शंखनाभि के आकार की, तीन आवर्त से युक्त होती है, उसके तीसरे आवर्त में गर्भशय्या रहती है। रोहित मत्स्य के मुख की जैसी आकृति होती है, उसी के समान उसी के आकार की गर्भशय्या होती है। (अर्थात् आगे से मुख छोटा-तंग रहता है, और पीछे बड़ा हो जाता है) ॥४३, ४४॥
आमुनरोऽभिमुखः शैते गर्भो गर्भाशये खियाः।
स योनिं शिरसा याति स्वभावात् प्रसवं प्रति ॥४५॥ गर्भ गर्भाशय में अंगों को संकुचित करके सामने की ओर से रहता है। यह गर्भ प्रसव के समय स्वभाव से ही (शिर के भारी होने के कारण) शिर के बल आता है (पहले शिर आता है) ॥४५॥
त्वकपर्यन्तस्य देहस्य योऽयमङ्गविनिश्चयः।
शल्यज्ञानादृते नैष वण्यतेऽङ्गेषु केषुचित् ॥४६॥
शरीर का त्वक पर्यन्त जो यह अंग विनिश्चय है, वह किसी भी प्रकार शल्य ज्ञान के बिना वर्णन नहीं किया जा सकता है। (शल्य ज्ञान से अंगों का निश्चय किया जा सकता है) ॥४६॥
तस्मात्निःसंशयं ज्ञानं हृत् शल्यस्य वाच्छ्रुता।
शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्योऽङ्गविनिश्चयः ॥४७॥
प्रत्यक्षतो हि यदृष्टं शास्त्रहृष्टं च यद्वेत्।
समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥४८॥
इसलिये शल्य के हरण करनेवालों को मृत शरीर का शोधन करके अच्छी प्रकार अंगों का निश्चय करना चाहिये। प्रत्यक्ष से देखा हुआ और शास्त्र से जाना हुआ ये दोनों ही बातें संक्षेप में ज्ञान की बृद्धि में कारण होती हैं। चरक में कहा है—शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्। आयुर्वेद स कात्स्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥४७, ४८॥
तस्मात् समस्तगात्रमविपोपहतमदीर्घन्याधिपीडित-मवर्षगतिकं निःसृष्टान्नपुरीषं पुरुषमावहन्त्यामापगायां निबद्धं पञ्चरसस्थं मुखवल्कलकुशजगणादीनामन्यतमेनाविष्टित्वाङ्गमप्रकाशे देशे कोथयेत्, सम्यक्प्रकृथितं चादृष्ट्य, ततो देहं समरात्रादुशीरबालवेणुबल्वजकूर्चानामन्यतमेन शनैः शनैरवर्षघर्षयस्यवादीन् सर्वानेव बाह्याभ्यन्तरानङ्ग-प्रत्यङ्गविशेषान् यथोक्तान् लक्ष्येच्छुषा ॥४९॥
इसलिये सम्पूर्ण अंगोंवाले, विष से न मरे हुए, बहुत लम्बी बीमारी से न मरे, एक सौ बरस की आयु से कम आयु के, शव में से आन्त्र और मल को निकालकर, पुरुष के शव का बहते हुए जलवाली नदी में पिझरे के अन्दर, मंजु, वल्कल, कुश, सन आदि किसी एक से लपेटकर, एकान्त स्थान में