सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ अ० ५ ]
२३ का सूत्र १२ यथा “शण्त्तुलवत्-स्नायुजालवस्ती” अर्थात् शण के तन्तुओं जैसे स्नायु जाल से युक्त ब्रण। स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसाऽस्थिमेदसाम् (शा० ध० सं० अ० ५)। मांसायन्त्र निबद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा (सू० शा० अ० ५ श्लो० २५) स्नायु के द्वारा ब्रण को सिला भी जाता है (सू० अ० २५ श्लो० २१) १-प्रतानवती-शण्त्तुल के जाल जैसी, २-वृत्त-गोल तथा ठोस-अशुषिर, ३-पृथु चौड़ी या चपटी, ४-शुषिर-खोखली-कठोर सिरा रूप, क्योंकि जिन सिराओं का खरपाक होता है वे स्नायु कही जाती हैं। उपादान दोनों का समान है, देखिये सू० शा० अ० ४ श्लोक ३० ॥२६॥
भवन्ति चात्र—
स्नायुश्चतुर्बिधा विद्यात्तास्तु सर्वा निबोध मे।
प्रतानवस्यो वृत्ताश्च पृथ्वयश्च शुषिरास्तथा ॥२०॥
प्रतानवस्यः शाखासु सर्वसन्धिषु चाप्यथ।
वृत्तास्तु कण्डराः सर्वा विन्नयाः कुशलेरिह ॥२१॥
आमपक्वाशयान्तेषु वस्तौ च शुषिराः खलु।
पार्श्वोरसि तथा पृष्ठे पृथुलाश्च शिरस्यथ ॥२२॥
नौर्यथा फलकास्तीर्णां बन्धनेबहुभिर्मुता।
भारक्षमा भवेदप्यु न्युक्ता सुसमाहिता ॥२३॥
एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः।
स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२४॥
न ह्यस्थीनि न वा पेशयो न सिरा न च सन्धयः।
व्यापादितास्तथा हन्युयथा स्नायुः शरीरिणम् ॥२५॥
यः स्नायुः प्रविजानाति बाह्याश्चाभ्यन्तरास्तथा।
स गृहं अत्यमाहतु देहाच्छकनोति देहिनाम् ॥२६॥
इसमें श्लोक भी हैं—स्नायु चार प्रकार की हैं, यथा
प्रतानवती, वृत्त, पृथु और शुषिर (खोखली)। इनमें प्रतानवती स्नायु शाखाओं में और सब सन्धियों में हैं। वृत्त (गोल) स्नायु को कण्डरायें समझना चाहिये। आमाशय, पक्वाशय और वस्ति में शुषिर स्नायु हैं। पार्श्व छाती, पीठ और शिर पर पृथु (चपटी) स्नायु हैं। जिस प्रकार लकड़ी के तख्तों से तैयार की, बहुत से बन्धनों से बँधी हुई नाव पानी में बहुत से आइ-मियों के बोझ को उठाने में समर्थ होती है, उसी प्रकार इस शरीर में जितनी भी सन्धियाँ हैं, वे सब स्नायुओं से बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्य भार को उठाने में समर्थ होते हैं। न तो अस्थियाँ न पेशी, न सिरा, न सन्धियाँ आहत होने पर इतना कष्ट नहीं देतीं (निकम्मा नहीं करतीं) जितना कि स्नायु के आघात से बेकार हो जाता है। जो अन्दर और बाहर के स्नायु को जानता है, वह मनुष्य प्राणियों के शरीर में से गहराई में गये शल्य को भी निकाल सकता है ॥३०-३६॥
पञ्च पेशीशतानि भवन्ति। तासां चत्वारि शवानि
शाखासु, कोष्ठे षट् षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुर्चिन्नात्। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां तिलस्तिलस्तः पञ्चदश। दश प्रपदे, पादोपरि कूचसन्निविष्टास्तावत्य एव दश गुल्फतल्योः, गुल्फजान्वन्तरे विज्ञातिः पञ्च जानुनि, विज्ञातिरूरी दश वङ्गक्षणे, शतमेवमेकस्मिन् सकिध्न भवति, एतेनैतत्सकियबाहुं च व्याख्यातौ, तिलः पायो, एका मेढ्रं, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः, स्फिचोः पञ्च पञ्च, द्वे बस्तिगिरसि, पञ्चोदरे, नाभ्यामेका पृष्ठोर्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्षकांसो प्रति समन्तात् सम, द्वे हृदयाभाशययोः, षट् यकृत्लीहोण्डु (न्दु)केषु, ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वाः, एकैका काकलकगल्योः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायां, द्वे ओष्ठयोः, द्वे नासायां, द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः, कणयोर्द्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति, एवमेतानि पञ्च पेशीशतानि ॥३७॥
पेशियाँ पाँच सौ हैं। इनमें से शाखाओं में चार सौ, कोष्ठ में छः सठ, ग्रीवा से ऊपर चौतीस। पैर की प्रत्येक अंगुली में तीन, कुल पन्द्रह। प्रपद में दस, पैर के ऊपर कूच में लगी हुई भी दस। गुल्फ तल में दस। गुल्फ और जानु के बीच में बीस। जानु में पाँच। ऊरु में बीस, वंक्षण में दस। इस प्रकार से एक टांग में एक सौ पेशियाँ हैं। इसी प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में गिननी चाहिये। पासु में तीन, मेहन में एक, सेवनी में एक, वृषणों में दो, प्रत्येक नितम्ब में पाँच, पाँच, वस्तिशिर में दो, उदर में पाँच, नाभि में एक, पीठ के ऊपर के भाग में लगी हुई लम्बी पाँच-पाँच, पार्श्वों में छै, वक्ष में दस, अक्षक और अंस के चारों ओर सात, हृदय और आमाशय में दो, यकृत, प्लीहा, उण्डुक में छः, ग्रीवा में दो, जिह्वा में एक, काकलक और गले में एक-एक, तालु में दो, जिह्वा में एक, ओष्ठ में दो, नासा में दो, नेत्र में दो, गण्ड में चार, कान में दो, ललाट में चार, शिर में एक। इस प्रकार से पाँच सौ पेशियाँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३७॥
भवति चात्र—
शिरास्तान्यवस्थिपर्वणि सन्धयश्च शरीरिणाम्।
पेशीभिः सद्युतान्यत्र बल्वन्ति भवन्त्यतः ॥३८॥
इसमें श्लोक भी हैं—
मनुष्यों की सिरायें, स्नायु, अस्थि, पर्व और सन्धियाँ पेशियों से ढँपी हुई हैं। इसलिये ये बलवान् रहती हैं ॥३८॥
स्त्रीणां तु विशतिरधिका। दश तासां स्तनयोरेकैकस्मिन् पञ्चपठवेति, यौवने तासां परिवृद्धिः, अपत्यपये चतस्रः—तासां प्रसूते अभ्यन्तरतो द्वे, मुखान्नित्रे बाह्ये च वृत्ते द्वे, गर्भच्छिद्रसन्नितास्तिस्रः, शुक्रार्तवप्रवेगिन्त्यस्तिस्र एव। पित्तपक्वाशययोमध्ये गर्भशय्या, यत्र गर्भस्तितृति।