सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शारीरस्थानम्
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काकलक में एक, नासा में एक, नेत्राश्रित वर्त्म मण्डल में दो, गण्ड में एक, कान में एक, शंख में एक, हनुमन्त्रि में दो, भ्रुकुटी के ऊपर दो, शंखों के ऊपर दो, शिरःकपालों में पाँच, मूर्धनि (शिर) में एक।
त्रि० मन्तव्य—दो अंगुष्ठे—अंगूठा में चरणकास्थि समेत तीन अस्थियाँ होने पर भी सन्धियाँ दो ही हैं, क्योंकि तीसरी चणकास्थि कण्डरा में पृथक् रहती है। दन्तमूलेषु—दन्त के मूल में ऊबलाकार, इन में दन्त धंसे-धरे रहते हैं या जुड़े रहते हैं ॥२६॥
त एते सन्धयोऽष्टविधाः—कोरोलुखलसामुद्रगप्रतर-तुलसेवनवायसतुण्डमण्डलशङ्खावर्त्ताः। तेषामङ्कुलिमणिबन्धगुरुफजानुकूपरेषु कोराः सन्धयः, कश्चावङ्गक्षणदग्नेषु लूखलाः, अंसपीठगुदभगनितम्बेषु सामुद्रगाः, ग्रीवापुष्टवंगयोः प्रतराः, शिरःकटीरूपाण्येषु, तुलसेबन्धः, हन्वोक्भयतस्तु वायसतुण्डाः, कण्ठहृदयनेत्रकलोमनाडीषु मण्डलाः, श्रोत्रशृण्वातकेषु शङ्खावर्त्ताः। तेषां नामभिरिवाकृततयः प्रायेण व्याख्याताः ॥२७॥
ये सन्धियाँ आठ प्रकार की हैं। यथा कोर (कोन किनारे की-इस लकड़ी की कोर मार देना), उल्लखल, सामुद्रग, प्रतर, तुलसेवनी, वायसतुण्ड, मण्डल, शंखावर्त्त—इनमें से अंगुली, कलई, गुरुफ, जानु और कोहनी में कोर सन्धि है। कक्षा, वंक्षण और दांतों में उल्लखल सन्धि, अंसपीठ, गुदा, भग, नितम्ब में सामुद्रग, ग्रीवा और पुष्टवर्श में प्रतर, शिर और कटि कपालों में तुलसेवनी, हनु के दोनों ओर वायसतुण्ड, कण्ठ-हृदय नेत्र-कलोम नाड़ी में मण्डल, श्रोत्र शृण्वातकों में शंखावर्त्त। नाम से ही इनकी आकृति बता दी है।
सकल्य—कोर—किनारेवाली, उल्लखल-ओखली के आकार की, सामुद्रग संपुट के आकार की, प्रतर-तैरनेनाली, तुलसेवनी-एक दूसरी के बीच में फँसी, वायसतुण्ड—कोवे की चौंच के समान, मण्डल—गोलाकार, शंखावर्त्त—शंख के ऊपर के चक्रों की भाँति।
वि० मन्तव्य—कोरसन्धि कोरनामक सन्धि-सन्धान-जोड़-कोर कलिका-कली (अविकसित फूल) का नाम है। जहाँ दो अस्थियों के खिरे कोर जैसे रहते हैं और वे दोनों अस्थियाँ जहाँ जुड़ी रहती हैं उस सन्धि का नाम कोर सन्धि है। ये सब चल होती हैं। उल्लखल-सन्धि-एक अस्थि में ऊखली का गढ़ा या थाला रहता है और दूसरी अस्थि का खिरा मूल के समान उसमें पड़ा या धँसा रहता है। यह भी दो प्रकार की होती है १—अचल जैसे दन्त एवं दन्तोल्खल की और २—चल जैसे—कक्षा एवं वंक्षण की। सामुद्रग—जो मली प्रकार ऊपर टिकी रहती है या संपुट के समान बनी रहती है—दोनों अस्थियों के खिरों में गर्त रहता है और गर्त के किनारे मिले
रहते हैं जैसे संपुट में दो खिकोरो के। प्रतर—जहाँ दो अस्थियाँ तरपतर धरी-जुड़ी रहनी हैं, प्रतर-तले ऊपर—नीचे ऊपर। तुलसेवनी—जहाँ दो अस्थियों के दाँते काटे फँसे रहते हैं, ध्यान से देखने पर दोनों अस्थियाँ, परस्पर मिली हुईं प्रतीत होती हैं जैसे शिरःकपालों में कपालों के दाँते फँसे रहते हैं, जैसे परस्पर मिले हों। वायसतुण्ड—इस में एक अस्थि का सिग काक की तुण्ड—चौंच का सा होता है दूसरी से जुड़ा रहता है। जैसे अधोइनका सिरा शंखास्थि से जुड़ा है। मण्डल—जहाँ अस्थियाँ मण्डल या चक्र के आकार में परिणत हो जाती हैं या जिनसे घेरा बन जाता है। जैसे कण्ठ अर्थात् श्वास मार्ग-नलिका में। शंखावर्त्त—शंख के भीतरी आवर्त्तों-घुमावों के समान ॥२७॥
अस्थन्तु सन्धयो ह्येते केवलाः परिकीर्तिताः। पेशीस्तायुसिराणां तु सन्धिसमङ्गख्या न विद्यते ॥२८॥ ये केवल अस्थियों की हो सन्धियाँ कही गई हैं। पेशी, स्नायु और खिराओं की सन्धियों की गिनती नहीं है ॥२८॥
नव स्नायुगतानि। तासां आख्यासु षट्शतानि, द्वे शते त्रिशब्द कोषे, ग्रीवां प्रत्युर्ध्वं समर्पितः। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां पणिनचित्तास्तादिजन्तु, तावत्येव तल्लकृच-गुरुफेषु, तावत्येव एव जह्यायां, दश जानुनि, चत्वारिज-दूरी, दश वङ्गक्षणे, शतमधधर्मेवमेकरिमन् सकिन्धन् भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्याताः, षष्टिः कट्यां, षष्ठेऽगोतिः, पार्श्वयोः षष्टिः, उरसि त्रिजन्तु, षट्-त्रिशद ग्रीवायां, मूर्धनि चतुर्दिशतः एवं नव स्नायुगतानि व्याख्यातानि भवन्ति ॥२९॥
स्नायु नौ सौ हैं। इनमें से शाखाओं में छे सौ हैं। कोष्ठ में दो सौ तीस। ग्रीवा से ऊपर सत्तर हैं। पैर की एक एक अंगुली में छे छे स्नायु हैं, कुल तीस हैं। तल्ल, कूर्च और गुरुफ में भी तीस, जंघा में भी तीस, जानु में दस, ऊरु में चालीस, वंक्षण में दस, इस प्रकार टाँग में एक सौ पचास स्नायु हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दानों बाहुओं को समझना। कटि में साठ, पीठ में अस्सी, पार्श्वों में साठ (छाती में तीस) ग्रीवा में छत्तीस, शिर में चौतीस। इस प्रकार से नौ सौ स्नायु कह दिये।
वि० मन्तव्य—स्नायु को पड़ाव में सड़ी या सड़ी कहते हैं। यह शण के रेशों-तन्तुओं जैसी श्वेत एवं लम्बी होती हैं और अत्यन्त हृद भौ, इनसे (पशु की स्नायु से) धनुष की ज्या (डोरी) तथा रूई धुनने की तांत बनाई जाती हैं। इनसे शरीर की सन्धियाँ बँधी रहती हैं (दे० श्लो० ४२) और इसके जाल (प्रतान—ताना बाना के रूप में) मांसपेशियों में भी तने रहते हैं और वे सड़े गले ढ़गों में—दिलाई पड़ते हैं (दे० सू० अ०