सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
तीन अस्थियाँ मानी हैं, जो भारतीय वैद्यों में विवाद का और नवीनों में शिरःशूल का कारण बनी हुई हैं, श्री गणनाथ सेन आदि ने तो इस पर बहुत कुछ कह डाला है और इसे प्राचीनों की बहुत बड़ी भूल माना है, प्रत्यक्षदर्शन के साथ-साथ अध्रियम सूत्र २६ के सन्निगणना के “द्वौ अंगुष्ठे” पाठ का उल्लेख भी किया है, परन्तु हमारे विचार में यह सब निराधार है। कारण सुनिये—श्री डा० त्रिलोकनाथ वर्मा ने अपनी ह० श० २० के प्रथम भाग के अ० ३ में एक चित्र—३५ वर्ष की स्त्री के हाथ का एकसरे चित्र दिया है। उसमें अँगूठा में एक गोल अस्थि दिखाई दे रही है और यह सर्वथा पृथक् है। अतः अस्थियाँ तीन और सन्धियाँ दो मानना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें और सम्भव है इसी को मान कर प्राचीनों ने तीन अस्थियाँ मानी हों और यह भी सम्भव है कि उस समय यह अस्थि सब में व्यक्त रहती हो। दन्ता द्वात्रिंशत्—दाँत ३२ होते हैं, परन्तु किसी के ३० भी होते हैं, और दूध के दाँत २४ ही रहते हैं, जो छठे, सातवें वर्ष में गिर जाते हैं ॥१६॥
एतानि पञ्चविधानि भवन्ति, तद्यथा—कपालरुचकत-रुणवल्यनलकसंज्ञानि। तेषां जानुनितम्बासगण्डतालुगङ्ग-शिरःसु कपालानि दशनास्तु रुचकानि, प्राणकर्णप्रौवाक्षि-कोषेषु तरुणानि, पाश्वपृष्ठोरःसु वलयानि, शेषाणि नलक-संज्ञानि ॥२०॥
ये अस्थियाँ पाँच प्रकार की होती हैं—यथा, कपाल (मिट्टी के टीकरे समान), रुचक, तरुण, वलय (कंगन के या उसके खण्ड आकार की), नलक। इनमें जानु, नितम्ब, अंश, फलक, गण्ड, तालु, शंख और शिर में कपाल अस्थियाँ हैं। दाँतों को रुचक कहते हैं। नासिका, कान, प्रौवा, अक्षिकोष में तरुणा-स्थि हैं। पाश्व, पीठ और छाती में वलय, शेष स्थानों पर नलकास्थियाँ हैं ॥२०॥
भवन्ति चात्र—
अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः ॥
अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां प्रवम् ॥२१॥
तस्माच्चिरविनष्टेषु स्वड्मासेषु शरीरिणाम्।
अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ॥२२॥
मांसान्यत्र निवद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा।
अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ॥२३॥
इस में श्लोक भी हैं—जिस प्रकार वृक्ष अन्दर के सार भागों से स्थिर रहते हैं, उसी प्रकार अस्थि रूपी सारों से मनुष्यों के शरीर धारण किये जाते हैं। इसलिये त्वचा और मांस नष्ट होने पर भी देह की सारभूत अस्थियाँ नष्ट नहीं होतीं। मांस-शिराओं और स्नायुओं के द्वारा अस्थियों में बँधे होने से न तो फटते हैं और न गिरते हैं।
वि० मन्तव्य—अस्थि के दाँचा पर मांसपेशियाँ लिप्टी तो हैं ही, पर शिरा एवं स्नायु रूप डोरियों से बँधी भी हैं, मांसपेशियों के उचित निवेश से मानव का वर्तमान आकार (आकृति) बनता है। यदि उसे पृथक् कर दिया जाता है तो कोई नहीं कह सकता कि यह देवदत्त का अस्थिपञ्जर है कि अथवा यज्ञदत्त का। अस्थिपञ्जर का नाम “कंकाल” है ॥२१-२३॥
सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्ठावन्तः, स्थिराश्च ये ॥२४॥
शाखासु हन्वोः कट्या च चेष्ठावन्तस्तु सन्धयः।
शेषास्तु सन्धयः सर्वं विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ॥२५॥
सन्धियाँ दो प्रकार की हैं—चेष्ठावान् और स्थिर। शाखा, हनु, और कटि में चेष्ठाशील सन्धियाँ हैं। शेष सब स्थानों पर स्थिर सन्धियाँ समझनी चाहिये।
वि० मन्तव्य—अस्थियों के संयोग स्थल का नाम “सन्धि” है। यद्यपि वे परस्पर सर्वथा मिली या जुड़ी नहीं होतीं। उनके मध्य में श्लेषण नामक कफ विद्यमान रहता है। चेष्ठावान् या चल सन्धियाँ चेष्ठा—गति करनेवाली और स्थिर या अचल सन्धियाँ चेष्ठा रहित होती हैं। सन्धि को सन्धान एवं श्लेष भी कहते हैं—अस्थियों के सटने का स्थान। सन्धिस्थल में श्लेषण कफ रहने से चल सन्धियाँ घर्षण से बच जाती हैं और अचल सन्धियाँ सटी रहती हैं ॥२४-२५॥
सङ्ख्यातास्तु दशोत्तरे द्वे शते। शाखास्वष्टपष्टिः। एकोनषष्टिः कोष्ठे, प्रौवां प्रत्युध्वं ऽयगीतिः। एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रयस्त्रयः, द्वावङ्गुष्ठे, ते चतुदश, जानुगुल्फवङ्गुष्ठ-गेष्वैकैकः, एवं सप्तदशैकस्मिन् सन्धिन्त भवन्ति, एतेनेतरः सन्धि बाहु च व्याख्यताः, त्रयः कटोकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवशे, तावन्त एव पाश्वयोः, उरस्यष्टौ, तावन्त एव प्रौवायां, त्रयः कण्ठे, नाडीषु हृदयकलोमनि, बद्धास्वष्टा दश, दन्तपरिमाणे दन्तमूलेषु, एकः काकलके नासायां च, द्वौ वर्तस्मण्डलयोर्नाश्रयो, गण्डकर्णगङ्गुष्ठैकैकः, द्वौ हनु-सन्धौ, द्वावुपरिष्ठाद् भुवोः शङ्खयोश्च, पञ्च शिरःकपालेषु, एको मूर्धनि ॥२६॥
सन्धियों की संख्या दो सौ दस है। इन में शाखाओं में अङ्गुष्ठ, कोष्ठ में उनसठ, प्रौवा से ऊपर तिरासी (२३) हैं। देह की प्रत्येक अँगुली में तीन-तीन, अँगूठे में दो, ये कुल चौदह हुईं। जानु-गुल्फ और वंशण में एक-एक, इस प्रकार से एक टांग में कुल सत्रह सन्धियाँ हैं। इस प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में समझना चाहिये। कटि कपालों में तीन, पृष्ठ वंश में चौबीस-चौबीस ही पाश्वों में, उर में आठ। आठ प्रौवा में, कण्ठ में तीन, हृदय कलोम से सम्बद्ध नाखियों में अठारह, दाँतों के बराबर दन्त मूलों में अर्थात् बत्तीस,