सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५।
शारीरस्थानम्
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बड़ी मात्रा रखु चार हैं—पृष्ठ वंश के दोनों ओर पेशियों की बाँधने के लिये बाहर की तरफ दो, अन्दर की तरफ दो ॥
सप्त सेवन्यः; अग्निसि विभक्ताः पञ्च, जिह्वाशोफसोरेकैका, ताः परिहर्तव्याः शस्त्रेण ॥१५॥
सेवनी सात हैं—सिर में अलग अलग पाँच, जिह्वा और मेहन में एक एक। शस्त्रकर्म में इनको बचना चाहिये ॥१५॥
चतुर्दशास्थनां संघाताः, तेषां त्रयो गुल्फजानुवडुक्ष- गेषु, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, त्रिकञ्जिर सोरेकैकः ॥१६॥
अस्थियों के संघात चौदह हैं—इनमें से तीन संघात गुरुम, जानु और वंशण में हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं में समझना। त्रिक और सिर में एक-एक अस्थि संघात है ॥१६॥
चतुर्दशैव सीमन्ताः, ते चास्थिसङ्घातवद् गणनीयाः, यत्संयुक्ता अस्थिसंघाताः, ये ह्युक्ताः संघातास्ते खल्वष्टा- दृशेकैषाम् ॥१७॥
सीमन्त चौदह हैं—इनकी अस्थि संघात के समान गणना करनी चाहिये। क्योंकि अस्थि संघात इन से मिले हुए हैं। कई आचार्यों के मत से कहे हुए अस्थि संघात अठारह हैं।
वक्तव्य—पूर्वोक्त चौदह, श्रोणि काण्ड के ऊपर एक, उदर और उसकी सन्धि में एक, अंश कूट के ऊपर एक। भोजने—
“संघाताः सीविता येस्तु सीमन्तास्तान् प्रचक्षमेह ॥” जिनसे अस्थिसंघात सिये हुए हैं उनको सीमन्त नाम दिया है ॥
त्रौणि सप्तछीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते, शल्य- तन्त्रेषु तु त्रौण्यैव शतानि। तेषां सविश्रमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं शोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, त्रीणां प्रत्युध्वं त्रिषष्टिः, एवमस्थनां त्रौणि शतानि पूयन्ते ॥१८॥
वेदवादी (चरक, याज्ञवल्क्य आदि) लोग अस्थियों की संख्या तीन सौ साठ कहते हैं। परन्तु शल्य तन्त्र में तीन सौ ही अस्थियाँ कही हैं। इनमें से एक सौ बीस अस्थियाँ शाखाओं में, एक सौ सत्रह अस्थियाँ शोणिपार्श्व-पीठ आदि छाती में हैं। त्रीणां से ऊपर तिरसठ हैं। इस प्रकार से तीन सौ अस्थियाँ पूरी हो जाती हैं।
वक्तव्य—वेदवादी ऋषियों ने अस्थियों का विचार धार्मिक, यज्ञ कर्म की दृष्टि से किया है। जिनको छूने से प्रायश्चित्त आदि करना होता है। इसी से स्मृति में अस्थियों को गिनने की जरूरत हुई। शल्य तन्त्र में शल्य शास्त्र की दृष्टि से अस्थियों को गिना है।
वि० मन्तव्य—हमारा विचार है कि वैदिककाल में मानव शरीर में ३६० तथा शल्य तन्त्र काल में ३०० अस्थियाँ पाई
जाती होंगी। इसका कारण मानव शरीर का ह्रास है, क्योंकि-यूनानी चिकित्सा के शारीरस्थान के वर्णन में २४६ या २४४ और आज २०६ या २०० पाई जाती हैं। जो कुछ हो त्रिलोकि-नाथ वर्मा के शब्दों में यदि एक दो वर्ष के बालक की अस्थियों के सब टुकड़े गिने जायँ तो उनकी संख्या तीन सौ या उससे भी अधिक हो जायँगी। ११-१२ वर्ष के बालक के हाथ में ३८ अस्थियाँ होती हैं। अस्तु, अस्थि जैसी मोटी वस्तु के गिनने में प्राचीनों ने इतनी मूल की है यह मानने को मन नहीं चाहता। अस्थि ऊपर बाहर से श्वेत या श्वेताम होती है और भीतर से उसकी बनावट स्पष्ट जैसी होती है। इस भाग में मज्जा भरी रहती है। अस्थि भी जीवित शरीर में चेतनामय होती है, अतएव उसमें वेदना-रुजा-रूक् का अनुभव होता है। वह शरीर का सार या कठोर-सबसे कठोर भाग है। आधुनिक शरीरवेत्ता-दॉर्तो एवं नखों को अस्थि मानना उचित नहीं समझते, क्योंकि उनकी ओर अस्थियों की रचना में भेद है। हमारा विचार है कि प्राचीनों में पुनर्वसु भी ऐसा ही मानते थे। अतएव च० शा० अ० ७ में—“दॉर्तो, दन्तोत्खल्लो तथा नखों को साथ मिलाकर ३६० अस्थियाँ होती हैं” ऐसा लिखा है। यदि इनमें कोई भेद न होता तो ऐसा न लिखा जाता ॥१८॥
एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां त्रौणि त्रौणि। तानि पञ्चदश, तलकूचं गुल्फसंश्रितानि दश, पाण्यमैकं, जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूराविति, त्रिगदेवमेकस्मिन् सकिन्ध भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, श्रेण्यां पञ्च, तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकं, पार्श्वं षट्त्रिगदेकस्मिन्, द्वितीयेऽप्येवं, पृष्ठे त्रिगत्, अष्टावुरसि, द्वे असफलके, त्रीवायां नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिगत्, नासायां त्रौणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खैकैकं, षट् जिरसीति ॥१९॥
पैर के प्रत्येक अंगुली में तीन-तीन अस्थियाँ हैं, इस प्रकार से ये पन्द्रह हैं। तलुआ, कूच और गुल्फ में दश, पार्श्व में एक, जंघा में दो, जानु में एक, ऊरु में एक, इस प्रकार से एक टाँग में तीस अस्थियाँ होती हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और बाहुओं में समझनी चाहिये। शोणि प्रदेश में पाँच, जिनमें से गुदा, भग और नितम्ब में चार, त्रिक में एक, पार्श्व में छत्तीस एक तरफ, और दूसरे पार्श्व में भी छत्तीस, पीठ में तीस, उर में आठ, अंश फलक में दो, त्रीवा में नौ, कण्ठ नाड़ी में चार, हनु में दो, दाँत बत्तीस, नासा में तीन, तालु में एक, गण्ड-कर्ण और शंख में एक-एक, शिर में छे अस्थियाँ हैं।
वि० मन्तव्य—इस सूत्र द्वारा प्राचीनों ने अंगुष्ठ में भी