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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

अ० ५।

शारीरस्थानम्

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बड़ी मात्रा रखु चार हैं—पृष्ठ वंश के दोनों ओर पेशियों की बाँधने के लिये बाहर की तरफ दो, अन्दर की तरफ दो ॥

सप्त सेवन्यः; अग्निसि विभक्ताः पञ्च, जिह्वाशोफसोरेकैका, ताः परिहर्तव्याः शस्त्रेण ॥१५॥

सेवनी सात हैं—सिर में अलग अलग पाँच, जिह्वा और मेहन में एक एक। शस्त्रकर्म में इनको बचना चाहिये ॥१५॥

चतुर्दशास्थनां संघाताः, तेषां त्रयो गुल्फजानुवडुक्ष- गेषु, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, त्रिकञ्जिर सोरेकैकः ॥१६॥

अस्थियों के संघात चौदह हैं—इनमें से तीन संघात गुरुम, जानु और वंशण में हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं में समझना। त्रिक और सिर में एक-एक अस्थि संघात है ॥१६॥

चतुर्दशैव सीमन्ताः, ते चास्थिसङ्घातवद् गणनीयाः, यत्संयुक्ता अस्थिसंघाताः, ये ह्युक्ताः संघातास्ते खल्वष्टा- दृशेकैषाम् ॥१७॥

सीमन्त चौदह हैं—इनकी अस्थि संघात के समान गणना करनी चाहिये। क्योंकि अस्थि संघात इन से मिले हुए हैं। कई आचार्यों के मत से कहे हुए अस्थि संघात अठारह हैं।

वक्तव्य—पूर्वोक्त चौदह, श्रोणि काण्ड के ऊपर एक, उदर और उसकी सन्धि में एक, अंश कूट के ऊपर एक। भोजने—

“संघाताः सीविता येस्तु सीमन्तास्तान् प्रचक्षमेह ॥” जिनसे अस्थिसंघात सिये हुए हैं उनको सीमन्त नाम दिया है ॥

त्रौणि सप्तछीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते, शल्य- तन्त्रेषु तु त्रौण्यैव शतानि। तेषां सविश्रमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं शोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, त्रीणां प्रत्युध्वं त्रिषष्टिः, एवमस्थनां त्रौणि शतानि पूयन्ते ॥१८॥

वेदवादी (चरक, याज्ञवल्क्य आदि) लोग अस्थियों की संख्या तीन सौ साठ कहते हैं। परन्तु शल्य तन्त्र में तीन सौ ही अस्थियाँ कही हैं। इनमें से एक सौ बीस अस्थियाँ शाखाओं में, एक सौ सत्रह अस्थियाँ शोणिपार्श्व-पीठ आदि छाती में हैं। त्रीणां से ऊपर तिरसठ हैं। इस प्रकार से तीन सौ अस्थियाँ पूरी हो जाती हैं।

वक्तव्य—वेदवादी ऋषियों ने अस्थियों का विचार धार्मिक, यज्ञ कर्म की दृष्टि से किया है। जिनको छूने से प्रायश्चित्त आदि करना होता है। इसी से स्मृति में अस्थियों को गिनने की जरूरत हुई। शल्य तन्त्र में शल्य शास्त्र की दृष्टि से अस्थियों को गिना है।

वि० मन्तव्य—हमारा विचार है कि वैदिककाल में मानव शरीर में ३६० तथा शल्य तन्त्र काल में ३०० अस्थियाँ पाई

जाती होंगी। इसका कारण मानव शरीर का ह्रास है, क्योंकि-यूनानी चिकित्सा के शारीरस्थान के वर्णन में २४६ या २४४ और आज २०६ या २०० पाई जाती हैं। जो कुछ हो त्रिलोकि-नाथ वर्मा के शब्दों में यदि एक दो वर्ष के बालक की अस्थियों के सब टुकड़े गिने जायँ तो उनकी संख्या तीन सौ या उससे भी अधिक हो जायँगी। ११-१२ वर्ष के बालक के हाथ में ३८ अस्थियाँ होती हैं। अस्तु, अस्थि जैसी मोटी वस्तु के गिनने में प्राचीनों ने इतनी मूल की है यह मानने को मन नहीं चाहता। अस्थि ऊपर बाहर से श्वेत या श्वेताम होती है और भीतर से उसकी बनावट स्पष्ट जैसी होती है। इस भाग में मज्जा भरी रहती है। अस्थि भी जीवित शरीर में चेतनामय होती है, अतएव उसमें वेदना-रुजा-रूक् का अनुभव होता है। वह शरीर का सार या कठोर-सबसे कठोर भाग है। आधुनिक शरीरवेत्ता-दॉर्तो एवं नखों को अस्थि मानना उचित नहीं समझते, क्योंकि उनकी ओर अस्थियों की रचना में भेद है। हमारा विचार है कि प्राचीनों में पुनर्वसु भी ऐसा ही मानते थे। अतएव च० शा० अ० ७ में—“दॉर्तो, दन्तोत्खल्लो तथा नखों को साथ मिलाकर ३६० अस्थियाँ होती हैं” ऐसा लिखा है। यदि इनमें कोई भेद न होता तो ऐसा न लिखा जाता ॥१८॥

एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां त्रौणि त्रौणि। तानि पञ्चदश, तलकूचं गुल्फसंश्रितानि दश, पाण्यमैकं, जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूराविति, त्रिगदेवमेकस्मिन् सकिन्ध भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्यातौ, श्रेण्यां पञ्च, तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकं, पार्श्वं षट्त्रिगदेकस्मिन्, द्वितीयेऽप्येवं, पृष्ठे त्रिगत्, अष्टावुरसि, द्वे असफलके, त्रीवायां नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिगत्, नासायां त्रौणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खैकैकं, षट् जिरसीति ॥१९॥

पैर के प्रत्येक अंगुली में तीन-तीन अस्थियाँ हैं, इस प्रकार से ये पन्द्रह हैं। तलुआ, कूच और गुल्फ में दश, पार्श्व में एक, जंघा में दो, जानु में एक, ऊरु में एक, इस प्रकार से एक टाँग में तीस अस्थियाँ होती हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और बाहुओं में समझनी चाहिये। शोणि प्रदेश में पाँच, जिनमें से गुदा, भग और नितम्ब में चार, त्रिक में एक, पार्श्व में छत्तीस एक तरफ, और दूसरे पार्श्व में भी छत्तीस, पीठ में तीस, उर में आठ, अंश फलक में दो, त्रीवा में नौ, कण्ठ नाड़ी में चार, हनु में दो, दाँत बत्तीस, नासा में तीन, तालु में एक, गण्ड-कर्ण और शंख में एक-एक, शिर में छे अस्थियाँ हैं।

वि० मन्तव्य—इस सूत्र द्वारा प्राचीनों ने अंगुष्ठ में भी

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

तीन अस्थियाँ मानी हैं, जो भारतीय वैद्यों में विवाद का और नवीनों में शिरःशूल का कारण बनी हुई हैं, श्री गणनाथ सेन आदि ने तो इस पर बहुत कुछ कह डाला है और इसे प्राचीनों की बहुत बड़ी भूल माना है, प्रत्यक्षदर्शन के साथ-साथ अध्रियम सूत्र २६ के सन्निगणना के “द्वौ अंगुष्ठे” पाठ का उल्लेख भी किया है, परन्तु हमारे विचार में यह सब निराधार है। कारण सुनिये—श्री डा० त्रिलोकनाथ वर्मा ने अपनी ह० श० २० के प्रथम भाग के अ० ३ में एक चित्र—३५ वर्ष की स्त्री के हाथ का एकसरे चित्र दिया है। उसमें अँगूठा में एक गोल अस्थि दिखाई दे रही है और यह सर्वथा पृथक् है। अतः अस्थियाँ तीन और सन्धियाँ दो मानना उचित है कि अनुचित पाठक स्वयं विचार करें और सम्भव है इसी को मान कर प्राचीनों ने तीन अस्थियाँ मानी हों और यह भी सम्भव है कि उस समय यह अस्थि सब में व्यक्त रहती हो। दन्ता द्वात्रिंशत्—दाँत ३२ होते हैं, परन्तु किसी के ३० भी होते हैं, और दूध के दाँत २४ ही रहते हैं, जो छठे, सातवें वर्ष में गिर जाते हैं ॥१६॥

एतानि पञ्चविधानि भवन्ति, तद्यथा—कपालरुचकत-रुणवल्यनलकसंज्ञानि। तेषां जानुनितम्बासगण्डतालुगङ्ग-शिरःसु कपालानि दशनास्तु रुचकानि, प्राणकर्णप्रौवाक्षि-कोषेषु तरुणानि, पाश्वपृष्ठोरःसु वलयानि, शेषाणि नलक-संज्ञानि ॥२०॥

ये अस्थियाँ पाँच प्रकार की होती हैं—यथा, कपाल (मिट्टी के टीकरे समान), रुचक, तरुण, वलय (कंगन के या उसके खण्ड आकार की), नलक। इनमें जानु, नितम्ब, अंश, फलक, गण्ड, तालु, शंख और शिर में कपाल अस्थियाँ हैं। दाँतों को रुचक कहते हैं। नासिका, कान, प्रौवा, अक्षिकोष में तरुणा-स्थि हैं। पाश्व, पीठ और छाती में वलय, शेष स्थानों पर नलकास्थियाँ हैं ॥२०॥

भवन्ति चात्र—

अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः ॥

अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां प्रवम् ॥२१॥

तस्माच्चिरविनष्टेषु स्वड्मासेषु शरीरिणाम्।

अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ॥२२॥

मांसान्यत्र निवद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा।

अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ॥२३॥

इस में श्लोक भी हैं—जिस प्रकार वृक्ष अन्दर के सार भागों से स्थिर रहते हैं, उसी प्रकार अस्थि रूपी सारों से मनुष्यों के शरीर धारण किये जाते हैं। इसलिये त्वचा और मांस नष्ट होने पर भी देह की सारभूत अस्थियाँ नष्ट नहीं होतीं। मांस-शिराओं और स्नायुओं के द्वारा अस्थियों में बँधे होने से न तो फटते हैं और न गिरते हैं।

वि० मन्तव्य—अस्थि के दाँचा पर मांसपेशियाँ लिप्टी तो हैं ही, पर शिरा एवं स्नायु रूप डोरियों से बँधी भी हैं, मांसपेशियों के उचित निवेश से मानव का वर्तमान आकार (आकृति) बनता है। यदि उसे पृथक् कर दिया जाता है तो कोई नहीं कह सकता कि यह देवदत्त का अस्थिपञ्जर है कि अथवा यज्ञदत्त का। अस्थिपञ्जर का नाम “कंकाल” है ॥२१-२३॥

सन्धयस्तु द्विविधाश्चेष्ठावन्तः, स्थिराश्च ये ॥२४॥

शाखासु हन्वोः कट्या च चेष्ठावन्तस्तु सन्धयः।

शेषास्तु सन्धयः सर्वं विज्ञेया हि स्थिरा बुधैः ॥२५॥

सन्धियाँ दो प्रकार की हैं—चेष्ठावान् और स्थिर। शाखा, हनु, और कटि में चेष्ठाशील सन्धियाँ हैं। शेष सब स्थानों पर स्थिर सन्धियाँ समझनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—अस्थियों के संयोग स्थल का नाम “सन्धि” है। यद्यपि वे परस्पर सर्वथा मिली या जुड़ी नहीं होतीं। उनके मध्य में श्लेषण नामक कफ विद्यमान रहता है। चेष्ठावान् या चल सन्धियाँ चेष्ठा—गति करनेवाली और स्थिर या अचल सन्धियाँ चेष्ठा रहित होती हैं। सन्धि को सन्धान एवं श्लेष भी कहते हैं—अस्थियों के सटने का स्थान। सन्धिस्थल में श्लेषण कफ रहने से चल सन्धियाँ घर्षण से बच जाती हैं और अचल सन्धियाँ सटी रहती हैं ॥२४-२५॥

सङ्ख्यातास्तु दशोत्तरे द्वे शते। शाखास्वष्टपष्टिः। एकोनषष्टिः कोष्ठे, प्रौवां प्रत्युध्वं ऽयगीतिः। एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रयस्त्रयः, द्वावङ्गुष्ठे, ते चतुदश, जानुगुल्फवङ्गुष्ठ-गेष्वैकैकः, एवं सप्तदशैकस्मिन् सन्धिन्त भवन्ति, एतेनेतरः सन्धि बाहु च व्याख्यताः, त्रयः कटोकपालेषु, चतुर्विंशतिः पृष्ठवशे, तावन्त एव पाश्वयोः, उरस्यष्टौ, तावन्त एव प्रौवायां, त्रयः कण्ठे, नाडीषु हृदयकलोमनि, बद्धास्वष्टा दश, दन्तपरिमाणे दन्तमूलेषु, एकः काकलके नासायां च, द्वौ वर्तस्मण्डलयोर्नाश्रयो, गण्डकर्णगङ्गुष्ठैकैकः, द्वौ हनु-सन्धौ, द्वावुपरिष्ठाद् भुवोः शङ्खयोश्च, पञ्च शिरःकपालेषु, एको मूर्धनि ॥२६॥

सन्धियों की संख्या दो सौ दस है। इन में शाखाओं में अङ्गुष्ठ, कोष्ठ में उनसठ, प्रौवा से ऊपर तिरासी (२३) हैं। देह की प्रत्येक अँगुली में तीन-तीन, अँगूठे में दो, ये कुल चौदह हुईं। जानु-गुल्फ और वंशण में एक-एक, इस प्रकार से एक टांग में कुल सत्रह सन्धियाँ हैं। इस प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में समझना चाहिये। कटि कपालों में तीन, पृष्ठ वंश में चौबीस-चौबीस ही पाश्वों में, उर में आठ। आठ प्रौवा में, कण्ठ में तीन, हृदय कलोम से सम्बद्ध नाखियों में अठारह, दाँतों के बराबर दन्त मूलों में अर्थात् बत्तीस,

अ० ५ ] ४१

शारीरस्थानम्

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काकलक में एक, नासा में एक, नेत्राश्रित वर्त्म मण्डल में दो, गण्ड में एक, कान में एक, शंख में एक, हनुमन्त्रि में दो, भ्रुकुटी के ऊपर दो, शंखों के ऊपर दो, शिरःकपालों में पाँच, मूर्धनि (शिर) में एक।

त्रि० मन्तव्य—दो अंगुष्ठे—अंगूठा में चरणकास्थि समेत तीन अस्थियाँ होने पर भी सन्धियाँ दो ही हैं, क्योंकि तीसरी चणकास्थि कण्डरा में पृथक् रहती है। दन्तमूलेषु—दन्त के मूल में ऊबलाकार, इन में दन्त धंसे-धरे रहते हैं या जुड़े रहते हैं ॥२६॥

त एते सन्धयोऽष्टविधाः—कोरोलुखलसामुद्रगप्रतर-तुलसेवनवायसतुण्डमण्डलशङ्खावर्त्ताः। तेषामङ्कुलिमणिबन्धगुरुफजानुकूपरेषु कोराः सन्धयः, कश्चावङ्गक्षणदग्नेषु लूखलाः, अंसपीठगुदभगनितम्बेषु सामुद्रगाः, ग्रीवापुष्टवंगयोः प्रतराः, शिरःकटीरूपाण्येषु, तुलसेबन्धः, हन्वोक्भयतस्तु वायसतुण्डाः, कण्ठहृदयनेत्रकलोमनाडीषु मण्डलाः, श्रोत्रशृण्वातकेषु शङ्खावर्त्ताः। तेषां नामभिरिवाकृततयः प्रायेण व्याख्याताः ॥२७॥

ये सन्धियाँ आठ प्रकार की हैं। यथा कोर (कोन किनारे की-इस लकड़ी की कोर मार देना), उल्लखल, सामुद्रग, प्रतर, तुलसेवनी, वायसतुण्ड, मण्डल, शंखावर्त्त—इनमें से अंगुली, कलई, गुरुफ, जानु और कोहनी में कोर सन्धि है। कक्षा, वंक्षण और दांतों में उल्लखल सन्धि, अंसपीठ, गुदा, भग, नितम्ब में सामुद्रग, ग्रीवा और पुष्टवर्श में प्रतर, शिर और कटि कपालों में तुलसेवनी, हनु के दोनों ओर वायसतुण्ड, कण्ठ-हृदय नेत्र-कलोम नाड़ी में मण्डल, श्रोत्र शृण्वातकों में शंखावर्त्त। नाम से ही इनकी आकृति बता दी है।

सकल्य—कोर—किनारेवाली, उल्लखल-ओखली के आकार की, सामुद्रग संपुट के आकार की, प्रतर-तैरनेनाली, तुलसेवनी-एक दूसरी के बीच में फँसी, वायसतुण्ड—कोवे की चौंच के समान, मण्डल—गोलाकार, शंखावर्त्त—शंख के ऊपर के चक्रों की भाँति।

वि० मन्तव्य—कोरसन्धि कोरनामक सन्धि-सन्धान-जोड़-कोर कलिका-कली (अविकसित फूल) का नाम है। जहाँ दो अस्थियों के खिरे कोर जैसे रहते हैं और वे दोनों अस्थियाँ जहाँ जुड़ी रहती हैं उस सन्धि का नाम कोर सन्धि है। ये सब चल होती हैं। उल्लखल-सन्धि-एक अस्थि में ऊखली का गढ़ा या थाला रहता है और दूसरी अस्थि का खिरा मूल के समान उसमें पड़ा या धँसा रहता है। यह भी दो प्रकार की होती है १—अचल जैसे दन्त एवं दन्तोल्खल की और २—चल जैसे—कक्षा एवं वंक्षण की। सामुद्रग—जो मली प्रकार ऊपर टिकी रहती है या संपुट के समान बनी रहती है—दोनों अस्थियों के खिरों में गर्त रहता है और गर्त के किनारे मिले

रहते हैं जैसे संपुट में दो खिकोरो के। प्रतर—जहाँ दो अस्थियाँ तरपतर धरी-जुड़ी रहनी हैं, प्रतर-तले ऊपर—नीचे ऊपर। तुलसेवनी—जहाँ दो अस्थियों के दाँते काटे फँसे रहते हैं, ध्यान से देखने पर दोनों अस्थियाँ, परस्पर मिली हुईं प्रतीत होती हैं जैसे शिरःकपालों में कपालों के दाँते फँसे रहते हैं, जैसे परस्पर मिले हों। वायसतुण्ड—इस में एक अस्थि का सिग काक की तुण्ड—चौंच का सा होता है दूसरी से जुड़ा रहता है। जैसे अधोइनका सिरा शंखास्थि से जुड़ा है। मण्डल—जहाँ अस्थियाँ मण्डल या चक्र के आकार में परिणत हो जाती हैं या जिनसे घेरा बन जाता है। जैसे कण्ठ अर्थात् श्वास मार्ग-नलिका में। शंखावर्त्त—शंख के भीतरी आवर्त्तों-घुमावों के समान ॥२७॥

अस्थन्तु सन्धयो ह्येते केवलाः परिकीर्तिताः। पेशीस्तायुसिराणां तु सन्धिसमङ्गख्या न विद्यते ॥२८॥ ये केवल अस्थियों की हो सन्धियाँ कही गई हैं। पेशी, स्नायु और खिराओं की सन्धियों की गिनती नहीं है ॥२८॥

नव स्नायुगतानि। तासां आख्यासु षट्शतानि, द्वे शते त्रिशब्द कोषे, ग्रीवां प्रत्युर्ध्वं समर्पितः। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां पणिनचित्तास्तादिजन्तु, तावत्येव तल्लकृच-गुरुफेषु, तावत्येव एव जह्यायां, दश जानुनि, चत्वारिज-दूरी, दश वङ्गक्षणे, शतमधधर्मेवमेकरिमन् सकिन्धन् भवन्ति, एतेनेतरसकिय बाहू च व्याख्याताः, षष्टिः कट्यां, षष्ठेऽगोतिः, पार्श्वयोः षष्टिः, उरसि त्रिजन्तु, षट्-त्रिशद ग्रीवायां, मूर्धनि चतुर्दिशतः एवं नव स्नायुगतानि व्याख्यातानि भवन्ति ॥२९॥

स्नायु नौ सौ हैं। इनमें से शाखाओं में छे सौ हैं। कोष्ठ में दो सौ तीस। ग्रीवा से ऊपर सत्तर हैं। पैर की एक एक अंगुली में छे छे स्नायु हैं, कुल तीस हैं। तल्ल, कूर्च और गुरुफ में भी तीस, जंघा में भी तीस, जानु में दस, ऊरु में चालीस, वंक्षण में दस, इस प्रकार टाँग में एक सौ पचास स्नायु हैं। इसी प्रकार दूसरी टाँग और दानों बाहुओं को समझना। कटि में साठ, पीठ में अस्सी, पार्श्वों में साठ (छाती में तीस) ग्रीवा में छत्तीस, शिर में चौतीस। इस प्रकार से नौ सौ स्नायु कह दिये।

वि० मन्तव्य—स्नायु को पड़ाव में सड़ी या सड़ी कहते हैं। यह शण के रेशों-तन्तुओं जैसी श्वेत एवं लम्बी होती हैं और अत्यन्त हृद भौ, इनसे (पशु की स्नायु से) धनुष की ज्या (डोरी) तथा रूई धुनने की तांत बनाई जाती हैं। इनसे शरीर की सन्धियाँ बँधी रहती हैं (दे० श्लो० ४२) और इसके जाल (प्रतान—ताना बाना के रूप में) मांसपेशियों में भी तने रहते हैं और वे सड़े गले ढ़गों में—दिलाई पड़ते हैं (दे० सू० अ०

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ५ ]

२३ का सूत्र १२ यथा “शण्त्तुलवत्-स्नायुजालवस्ती” अर्थात् शण के तन्तुओं जैसे स्नायु जाल से युक्त ब्रण। स्नायवो बन्धनं प्रोक्ता देहे मांसाऽस्थिमेदसाम् (शा० ध० सं० अ० ५)। मांसायन्त्र निबद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा (सू० शा० अ० ५ श्लो० २५) स्नायु के द्वारा ब्रण को सिला भी जाता है (सू० अ० २५ श्लो० २१) १-प्रतानवती-शण्त्तुल के जाल जैसी, २-वृत्त-गोल तथा ठोस-अशुषिर, ३-पृथु चौड़ी या चपटी, ४-शुषिर-खोखली-कठोर सिरा रूप, क्योंकि जिन सिराओं का खरपाक होता है वे स्नायु कही जाती हैं। उपादान दोनों का समान है, देखिये सू० शा० अ० ४ श्लोक ३० ॥२६॥

भवन्ति चात्र—

स्नायुश्चतुर्बिधा विद्यात्तास्तु सर्वा निबोध मे।

प्रतानवस्यो वृत्ताश्च पृथ्वयश्च शुषिरास्तथा ॥२०॥

प्रतानवस्यः शाखासु सर्वसन्धिषु चाप्यथ।

वृत्तास्तु कण्डराः सर्वा विन्नयाः कुशलेरिह ॥२१॥

आमपक्वाशयान्तेषु वस्तौ च शुषिराः खलु।

पार्श्वोरसि तथा पृष्ठे पृथुलाश्च शिरस्यथ ॥२२॥

नौर्यथा फलकास्तीर्णां बन्धनेबहुभिर्मुता।

भारक्षमा भवेदप्यु न्युक्ता सुसमाहिता ॥२३॥

एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः।

स्नायुभिर्बहुभिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥२४॥

न ह्यस्थीनि न वा पेशयो न सिरा न च सन्धयः।

व्यापादितास्तथा हन्युयथा स्नायुः शरीरिणम् ॥२५॥

यः स्नायुः प्रविजानाति बाह्याश्चाभ्यन्तरास्तथा।

स गृहं अत्यमाहतु देहाच्छकनोति देहिनाम् ॥२६॥

इसमें श्लोक भी हैं—स्नायु चार प्रकार की हैं, यथा

प्रतानवती, वृत्त, पृथु और शुषिर (खोखली)। इनमें प्रतानवती स्नायु शाखाओं में और सब सन्धियों में हैं। वृत्त (गोल) स्नायु को कण्डरायें समझना चाहिये। आमाशय, पक्वाशय और वस्ति में शुषिर स्नायु हैं। पार्श्व छाती, पीठ और शिर पर पृथु (चपटी) स्नायु हैं। जिस प्रकार लकड़ी के तख्तों से तैयार की, बहुत से बन्धनों से बँधी हुई नाव पानी में बहुत से आइ-मियों के बोझ को उठाने में समर्थ होती है, उसी प्रकार इस शरीर में जितनी भी सन्धियाँ हैं, वे सब स्नायुओं से बँधी हुई हैं, इसी से मनुष्य भार को उठाने में समर्थ होते हैं। न तो अस्थियाँ न पेशी, न सिरा, न सन्धियाँ आहत होने पर इतना कष्ट नहीं देतीं (निकम्मा नहीं करतीं) जितना कि स्नायु के आघात से बेकार हो जाता है। जो अन्दर और बाहर के स्नायु को जानता है, वह मनुष्य प्राणियों के शरीर में से गहराई में गये शल्य को भी निकाल सकता है ॥३०-३६॥

पञ्च पेशीशतानि भवन्ति। तासां चत्वारि शवानि

शाखासु, कोष्ठे षट् षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुर्चिन्नात्। एकैकस्यां तु पादाङ्गुल्यां तिलस्तिलस्तः पञ्चदश। दश प्रपदे, पादोपरि कूचसन्निविष्टास्तावत्य एव दश गुल्फतल्योः, गुल्फजान्वन्तरे विज्ञातिः पञ्च जानुनि, विज्ञातिरूरी दश वङ्गक्षणे, शतमेवमेकस्मिन् सकिध्न भवति, एतेनैतत्सकियबाहुं च व्याख्यातौ, तिलः पायो, एका मेढ्रं, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः, स्फिचोः पञ्च पञ्च, द्वे बस्तिगिरसि, पञ्चोदरे, नाभ्यामेका पृष्ठोर्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्षकांसो प्रति समन्तात् सम, द्वे हृदयाभाशययोः, षट् यकृत्लीहोण्डु (न्दु)केषु, ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वाः, एकैका काकलकगल्योः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायां, द्वे ओष्ठयोः, द्वे नासायां, द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः, कणयोर्द्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति, एवमेतानि पञ्च पेशीशतानि ॥३७॥

पेशियाँ पाँच सौ हैं। इनमें से शाखाओं में चार सौ, कोष्ठ में छः सठ, ग्रीवा से ऊपर चौतीस। पैर की प्रत्येक अंगुली में तीन, कुल पन्द्रह। प्रपद में दस, पैर के ऊपर कूच में लगी हुई भी दस। गुल्फ तल में दस। गुल्फ और जानु के बीच में बीस। जानु में पाँच। ऊरु में बीस, वंक्षण में दस। इस प्रकार से एक टांग में एक सौ पेशियाँ हैं। इसी प्रकार दूसरी टांग और दोनों बाहुओं में गिननी चाहिये। पासु में तीन, मेहन में एक, सेवनी में एक, वृषणों में दो, प्रत्येक नितम्ब में पाँच, पाँच, वस्तिशिर में दो, उदर में पाँच, नाभि में एक, पीठ के ऊपर के भाग में लगी हुई लम्बी पाँच-पाँच, पार्श्वों में छै, वक्ष में दस, अक्षक और अंस के चारों ओर सात, हृदय और आमाशय में दो, यकृत, प्लीहा, उण्डुक में छः, ग्रीवा में दो, जिह्वा में एक, काकलक और गले में एक-एक, तालु में दो, जिह्वा में एक, ओष्ठ में दो, नासा में दो, नेत्र में दो, गण्ड में चार, कान में दो, ललाट में चार, शिर में एक। इस प्रकार से पाँच सौ पेशियाँ पूर्ण हो जाती हैं ॥३७॥

भवति चात्र—

शिरास्तान्यवस्थिपर्वणि सन्धयश्च शरीरिणाम्।

पेशीभिः सद्युतान्यत्र बल्वन्ति भवन्त्यतः ॥३८॥

इसमें श्लोक भी हैं—

मनुष्यों की सिरायें, स्नायु, अस्थि, पर्व और सन्धियाँ पेशियों से ढँपी हुई हैं। इसलिये ये बलवान् रहती हैं ॥३८॥

स्त्रीणां तु विशतिरधिका। दश तासां स्तनयोरेकैकस्मिन् पञ्चपठवेति, यौवने तासां परिवृद्धिः, अपत्यपये चतस्रः—तासां प्रसूते अभ्यन्तरतो द्वे, मुखान्नित्रे बाह्ये च वृत्ते द्वे, गर्भच्छिद्रसन्नितास्तिस्रः, शुक्रार्तवप्रवेगिन्त्यस्तिस्र एव। पित्तपक्वाशययोमध्ये गर्भशय्या, यत्र गर्भस्तितृति।

३५ ]

आरीरस्थानम्

३२३

जियों में वीख पेशियाँ अधिक हैं। प्रत्येक स्तन में पाँच, पाँच, दोनों स्तनों में दस। यौवन काल में इनमें बृद्धि होती है। अपत्य मार्ग में चार पेशी हैं। इनमें से दो अन्दर की ओर फैली हैं। और दो गोलाई में बाहर की ओर अपत्य पथ के मुख में रहती हैं। गर्भद्वार के मुखपर स्थित तीन पेशियाँ हैं। शुक्र आर्तव को प्रविष्ट करनेवाली तीन और हैं। पित्ताशय और पक्वाशय के बीच में गर्भशय्या (गर्भाशय) रहता है, जहाँ पर गर्भ रहता है।

वि० मन्तव्य—अपत्यपथ—गर्भ का मार्ग—योनिमार्ग। योनिव्यापद् आदि प्रसंगों में योनि गर्भाशय का नाम है—यु मिश्रणे धातु (अदादि गण) से योनि शब्द बनता है। अर्थ—जहाँ पर शुक्र शोणित का मिश्रण हो। योनि—भगौष्ठ, भग एवं गर्भाशय का सम्मिलित नाम है, देखें अग्रिम श्लो० ४३ ॥३६॥

तासां बहलपेलवस्थूलगुपुष्युतहृस्वदीर्घस्थिरमुदु-रुल्लक्षणकर्कशभावाः सन्ध्यस्थिसिरास्तानुप्रच्छादका यथा-प्रदेशं स्वभावत एव भवन्ति ॥४०॥

पेशियों का आकार—बहल, पेलव, (तनु-पतली) स्थूल, सूक्ष्म, पुष्ट (चपटा), गोल, हृस्व, दीर्घ, स्थिर, मुदु, रुल्लक्षण, कर्कश स्वभाव का होता है। पेशियाँ सन्धि, स्नायु-अस्थि-सिरा को दाँपती हैं, अतः स्थान के अनुसार इनका स्वभाव होता है (जहाँ जैसी जरूरत होती है, वहाँ वैसा होता है)।

वि० मन्तव्य—पेशियों के उत्क बहल पेलव आदि भावों के कारण ही प्रतिप्राणी की आकृति में भेद होता है और पुष्टि एवं कार्य होता है, एक ही के शरीर के भिन्न २ अङ्गों एवं प्रत्यङ्गों में भी पुष्टि एवं कार्य होता है। इसी प्रकार अवलता-सवलता भी होती है। व्यायाम से इसी प्रकार पेशियों को पुष्ट बनाया भी जा सकता है ॥४०॥

भवति चान्न—

पुसां पेशयः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः।

श्रीणामावृत्य तिष्ठन्ति फलमन्तर्गतं हि ताः ॥४१॥ इसमें श्लोक भी हैं—

पुरुषों के मेहन और मुष्क (वृषण) में रहनेवाली जो पेशियाँ कहीं हैं, वे ही पेशियाँ जियों में अन्तर्गत फल (डिम्ब) को दाँपे रहती हैं। (लक्षण-लिंग-डल्हण)।

वक्तव्य—भोज तीन पेशियों कम मानते हैं। यथा—पञ्चपेशीशतान्येव खीवजं विद्धि भूमिप। अतश्च तिष्ठो हीयन्ते शीणां शोफसि मुष्कयाः ॥४२॥

मर्मसिराधमनोक्षोत्तसामन्यत्र प्रविभागः ॥४३॥

मांस, सिरा, धमनी, और क्षोतों का विभाग अन्यत्र कहेंगे ॥४२॥

मङ्गनाभ्याकृतिर्योनिस्स्यावर्ता सा प्रकीर्तिता।

तस्यास्तृतीये स्वावर्तं गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥४३॥

यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः।

तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥४४॥

योनि शंखनाभि के आकार की, तीन आवर्त से युक्त होती है, उसके तीसरे आवर्त में गर्भशय्या रहती है। रोहित मत्स्य के मुख की जैसी आकृति होती है, उसी के समान उसी के आकार की गर्भशय्या होती है। (अर्थात् आगे से मुख छोटा-तंग रहता है, और पीछे बड़ा हो जाता है) ॥४३, ४४॥

आमुनरोऽभिमुखः शैते गर्भो गर्भाशये खियाः।

स योनिं शिरसा याति स्वभावात् प्रसवं प्रति ॥४५॥ गर्भ गर्भाशय में अंगों को संकुचित करके सामने की ओर से रहता है। यह गर्भ प्रसव के समय स्वभाव से ही (शिर के भारी होने के कारण) शिर के बल आता है (पहले शिर आता है) ॥४५॥

त्वकपर्यन्तस्य देहस्य योऽयमङ्गविनिश्चयः।

शल्यज्ञानादृते नैष वण्यतेऽङ्गेषु केषुचित् ॥४६॥

शरीर का त्वक पर्यन्त जो यह अंग विनिश्चय है, वह किसी भी प्रकार शल्य ज्ञान के बिना वर्णन नहीं किया जा सकता है। (शल्य ज्ञान से अंगों का निश्चय किया जा सकता है) ॥४६॥

तस्मात्निःसंशयं ज्ञानं हृत् शल्यस्य वाच्छ्रुता।

शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्योऽङ्गविनिश्चयः ॥४७॥

प्रत्यक्षतो हि यदृष्टं शास्त्रहृष्टं च यद्वेत्।

समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥४८॥

इसलिये शल्य के हरण करनेवालों को मृत शरीर का शोधन करके अच्छी प्रकार अंगों का निश्चय करना चाहिये। प्रत्यक्ष से देखा हुआ और शास्त्र से जाना हुआ ये दोनों ही बातें संक्षेप में ज्ञान की बृद्धि में कारण होती हैं। चरक में कहा है—शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्। आयुर्वेद स कात्स्येन वेद लोकसुखप्रदम् ॥४७, ४८॥

तस्मात् समस्तगात्रमविपोपहतमदीर्घन्याधिपीडित-मवर्षगतिकं निःसृष्टान्नपुरीषं पुरुषमावहन्त्यामापगायां निबद्धं पञ्चरसस्थं मुखवल्कलकुशजगणादीनामन्यतमेनाविष्टित्वाङ्गमप्रकाशे देशे कोथयेत्, सम्यक्प्रकृथितं चादृष्ट्य, ततो देहं समरात्रादुशीरबालवेणुबल्वजकूर्चानामन्यतमेन शनैः शनैरवर्षघर्षयस्यवादीन् सर्वानेव बाह्याभ्यन्तरानङ्ग-प्रत्यङ्गविशेषान् यथोक्तान् लक्ष्येच्छुषा ॥४९॥

इसलिये सम्पूर्ण अंगोंवाले, विष से न मरे हुए, बहुत लम्बी बीमारी से न मरे, एक सौ बरस की आयु से कम आयु के, शव में से आन्त्र और मल को निकालकर, पुरुष के शव का बहते हुए जलवाली नदी में पिझरे के अन्दर, मंजु, वल्कल, कुश, सन आदि किसी एक से लपेटकर, एकान्त स्थान में

३२४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

रक्तर सङ्घाये (नरम करे)। भली प्रकार नरम बन जाने पर इसको निकालकर इस शरीर को सात दिन तक खस, बाल, बाँस, बल्बज की बनाई किसी एक की कूची से धीरे धीरे रगड़ता हुआ त्वचा से लेकर सब ही बाहर और अंदर के अंग-प्रत्यंग भागों को, उनकी विशेषताओं को कहे हुये अनुसार आँख से देखे। (अप्रकाशे का अर्थ अँधेरे में भी करते हैं)।

वि० मन्तव्य—आजकल आयुर्वेदिक तथा एलोपैथिक विद्यालयों में शवच्छेद किया जाता है वहाँ—शव में—फुमालिन एवं संखिया का इन्जेक्शन कर दिया जाता है। फलतः वह सड़ता नहीं है, सूख अवश्य जाता है और उसमें रंग भी चढ़ा दिया जाता है, जिससे रक्त खिराएँ लाल बनी रहती हैं। धीरे २ महीनों चौर २ कर अङ्ग प्रत्यङ्ग देख लिये जाते हैं ॥

न शक्यश्चलुषा द्रष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः।

दृश्यते ज्ञानचक्षुभिस्तपश्चक्षुभिरेव च ॥५०॥

शरीर में अतिसूक्ष्म विभु-परमात्मा को आँख से नहीं देख सकते। यह आत्मा तो ज्ञान चक्षु से और तप की आँखों से ही देखा जा सकता है। इसीसे कहा है—

‘यद्वदुध्करं यद्वदुरापं यच्च दुर्गं यद् दुस्तरम्।

तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥’

वि० मन्तव्य—विभुः-विविधो भवति, विकृतो—विकार-युक्तो भवति इति अर्थात् जो विश्वरूप है या जो शरीर धारण करता है वह आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, एवमरे से भी नहीं देखा जा सकता, शुक्र में जो सर्पाकार कीटाणु देखा भी जाता है वह आत्मा नहीं, अपितु उसका पाञ्चभौतिक शरीर है। मले ही वह भी सूक्ष्म है परन्तु सूक्ष्मतम नहीं। वह तो ज्ञान चक्षु-सुख दुःख आदि गुणों-लक्षणों से देखा जाता है। अथवा तपःप्राप्त दृष्टि—विष्य दृष्टि से ॥५०॥

शरीरे चैव शाखे च दृष्टार्थः स्याद्विशारदः।

दृष्टश्रुताभ्यां सदेहभवपोहाचरेत् क्रियाः ॥५१॥

शरीर के विषय में और शास्त्र के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। देखकर और सुनकर-संदेह को मिटाकर ही चिकित्सा कार्य आरम्भ करें।

वि० मन्तव्य—विशारद-प्रगल्भ—जो शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों को भली माँत देख लेता है और शास्त्र को समझ लेता है, वह विशिष्ट शारदा वाणी यस्य सः—विशारद—प्राध्यापक शरीर का व्याख्याता हो सकता है ॥५१॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शरीरसंख्याध्याकरण-

शारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५१॥

पञ्चोऽध्यायः

अथातः प्रत्येकममनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे प्रत्येक सर्मनिर्देश शरीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—प्रत्येक (२०७) सर्म का निर्देश—वर्णन है, जिसमें सर्म का लक्षण देखिये २२ वें सूत्र में ॥१,२॥

समोत्तरं सर्मशतम् तानि सर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति, तद्यथा—मांसमर्माणि, स्निग्धमर्माणि, स्नायु-मर्माणि, अस्थिमर्माणि सन्धिमर्माणि चेति। न खलु मांसस्निग्धस्नायुअस्थिसन्धिष्वयतिरेकेणान्यानि सर्माणि भवन्ति, यस्मात्त्रोपलभ्यन्ते ॥३॥

सर्म एक सौ सात हैं। ये सर्म पाँच प्रकार के हैं, यथा—मांस सर्म, स्निग्ध सर्म, स्नायु सर्म, अस्थि सर्म और सन्धि सर्म। मांस, स्निग्ध, स्नायु, अस्थि और सन्धि से पृथक् कोई सर्म नहीं होते, क्योंकि इनसे पृथक् और नहीं मिलते। (सारयन्तीति सर्माणि)।

वि० मन्तव्य—पञ्चात्मक—मांस आदि मय अर्थात् उनसे निर्मित यथा मांसमर्म—मांस मय मर्म, स्निग्धमर्म—स्निग्धमय मर्म, स्नायुमर्म—स्नायुमय मर्म, अस्थिमर्म—अस्थिमय मर्म और सन्धिमर्म—सन्धिमय मर्म। यथा मृन्मय—मिट्टी से बना—निर्मित घट आदि। क्योंकि मांस आदि के अतिरिक्त—रहित मर्मस्थल उपलब्ध नहीं होते ॥३॥

तत्रैकादश मांसमर्माणि, एकचत्वारिंशत् स्निग्धमर्माणि, सप्तविंशतिः स्नायुमर्माणि अष्टावस्थिमर्माणि, त्रिंशतिः सन्धिमर्माणि चेति। तदेतत् समोत्तरं मर्मशतम् ॥४॥

इनमें ग्यारह मांसमर्म, इकतीस स्निग्धमर्म, सत्ताईस स्नायु-मर्म आठ अस्थिमर्म, और बीस सन्धि मर्म हैं। इस प्रकार से ये एक सौ सात मर्म हैं।

वि० मन्तव्य—विधि मेद से मर्मों की संख्या इस प्रकार है ॥४॥

तेषामेकादशैकस्मिन् सन्धिभन्वन्ति। एतेनेतरसन्धि-बाहु च व्याख्याती, उद्वरोस्त्रोद्गिदश, चतुर्दश पुष्टे, प्रौवा प्रत्युध्वं समन्त्रिशत् ॥५॥

इनमें से ग्यारह मर्म एक टाँग में होते हैं। इस प्रकार से दूसरी टाँग और दोनों बाहुओं को समझना चाहिये। पेट और छाती में बारह, पीठ में चौदह, प्रौवा से ऊपर के भाग में सैंत स मर्म हैं ॥५॥

तत्र सकथिमर्माणि क्षिप्रतलहृदं प्रकृचं कूर्च शिरोगुल्फं न्द्रवस्तिजान्वाणुयुर्वोलोहिताक्षणि क्षिप्रं चेति, एतेनेतरत्

अ० १]

शारोरेस्थानम्

३२५

सन्धि व्याख्यातम् । उदरोरसोस्तु गुदवस्तिनाभिहृदय- स्तनमूलस्तनरोहितापलापान्यपस्तम्भौ चेति । पृष्ठमर्माण तु कटीकतरुणकुकुन्दरनितम्बपार्श्वसन्धिबृहत्तस्यफलका- न्यसौ चेति । बाहुमर्माण तु क्षिप्रतलहृदयकूर्चकूर्चशिरो- मणिबन्धेन्द्रवस्तकूर्पराणयुर्वीलोहिताक्षणि कक्षधरं चेति, एतेनेतरो बाहुव्याख्यातः । जत्रुण ऊर्ध्वं चतस्रो धमन्योऽष्टौ मातृका द्वे कुकाटिके द्वे विधुरे द्वे फणे द्वावपाङ्गौ द्वाववतौ द्वावुत्तैपो द्वौ शङ्खावैका स्थपनी पञ्च सीमन्ताश्चत्वारि शृङ्गाटकान्येकोऽधिपतिरिति ॥६॥

इनमें सन्धि (टांग) के मर्म—क्षिप्र, तलहृदय, कूर्च, कूर्च- शिर, गुल्फ, इन्द्रवस्ति, जानु, आणि, ऊर्वी, लोहिताक्ष और विटप ये ग्यारह मर्म हैं । इसी भाँति दूसरी टांग में समझना । पेट और छाती के मर्म—गुद, वस्ति, नामि, हृदय, स्तनमूल, स्तनरोहित, अपलाप, और अपस्तम्भ । पीठ के मर्म—कटीक तरुण, कुकुन्दर, नितम्ब, पार्श्वसन्धि, बृहती, अंसफलक और अंस । बाहुके मर्म—क्षिप्र, तलहृदय, कूर्च, कूर्चसिर, मणिबन्ध, इन्द्रवस्ति, कूर्प, आणि, ऊर्वी, लोहिताक्ष और कक्षधर । इसी से दूसरी बाहु भी समझना । जत्रु से ऊपर के मर्म—चार धम- नियां, आठ मातृका, दो कुकाटिका, दो विधुर, दो फणा, दो अपाङ्ग, दो आवर्त्त, दो उत्तैप, दो शंख, एक स्थपनी, पाँच सीमन्त, चार शृङ्गाटक, एक अधिपति हैं ।

वि० मन्तव्य—उदरोरसोस्तु.....चेति—इन में उदर के ३ मर्म हैं—१—गुद, २—वस्ति, ३—नामि (अन्त्र) । शेष ६ उरस के मर्म हैं ॥६॥

तत्र तलहृदयेन्द्रवस्तिगुदस्तनरोहितानि मांसमर्माणि, नीलधमनीमातृकाशृङ्गाटकापाङ्गस्थपनीफणास्तनमूलापला- पापस्तम्भहृदयनाभिपार्श्वसन्धिबृहतीलोहिताक्षोर्ध्वः सिरा- मर्माणि, आणी (णि) विटपकक्षधरकूर्चकूर्चशिरोंवस्तिक्षि- प्रसन्धिधुरोत्तैपाः स्नायुमर्माणि, कटाकतरुणनितम्बवास- फलकशङ्खास्वस्थिमर्माणि, जानुकूर्पसीमन्ताधिपतिगुल्फ- मणिबन्धकुकुन्दरावर्त्तकुकाटिकाश्चति सन्धिमर्माणि ॥७॥

इनमें—तलहृदय, इन्द्रवस्ति, गुद, स्तनरोहित ये मांस मर्म हैं । नीलधमनी, मातृका, शृंगटक, अवांग, स्थपनी, फणा, स्तनमूल, अपलाप, अपस्तम्भ, हृदय, नामि, पार्श्वसन्धि, बृहती, लोहिताक्ष, ऊर्वी ये सिरा मर्म हैं । आणि, विटप, कक्षधर, कूर्च, कूर्चशिर, वस्ति, क्षिप्र, अंस, विधुर, उत्तैप ये स्नायु मर्म हैं । कटिकतरुण, नितम्ब, अंसफलक, शंख ये अस्थिमर्म हैं । जानु, कूर्प, सीमन्त, अधिपति, गुल्फ, मणिबन्ध, कुकुन्दर, आवर्त्त और कुकाटिका ये सन्धि मर्म हैं ॥७॥

तान्येतानि पञ्चविकल्पानि भवन्ति, तद्यथा—सद्यः प्राणहराणि, कालान्तरप्राणहराणि, विशल्यध्वनानि, वैकल्प- कराणि, रुजाकराणि चेति । तत्र सद्यःप्राणहराप्येकोन-

विंगतिः, कालान्तरप्राणहराणि त्रयक्षिगत, त्रीणि विशल्य- ध्वनानि, चतुश्चत्वारिशद्वैकल्पकराणि, अष्टौ रुजाकराणीति ॥

ये सब मर्म पांच प्रकार के हैं । यथा सद्यः प्राणहर, काला- न्तरप्राणहर, विशल्यध्वन, वैकल्पकर और रुजाकर । इनमें सद्यः प्राणहर उत्तीस हैं । कालान्तर प्राणहर तंतीस हैं । विशल्यध्व- नतीन हैं । वैकल्पकर चौवालीस हैं । रुजाकर मर्म आठ हैं ॥८॥ भवन्ति चान्न—

शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्गौ कण्ठसिरा गुदम् । हृदयं वस्तिनाभ्यौ (भौ) च ध्वन्ति सद्यो ह्वतानि ॥९॥

वक्षोमर्माण सीमन्ततलक्षिप्रेन्द्रवस्तयः । कटीकतरुणे सन्धौ पार्श्वजौ बृहती च या ॥१०॥

नितम्बाविति चेतानि कालान्तरहराणि तु । उत्तैपो स्थपनी चैव विशल्यध्वनानि निर्दिशेत् ॥११॥

लोहिताक्षणि जानूर्वीकूर्चवितपकूर्पराः । कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ॥१२॥

अंसांसफलकापाङ्गा नीले मन्ये फणौ तथा । वैकल्पकरणान्याहुरावर्त्तौ द्वौ तथैव च ॥१३॥

रुजाकराणि जानायादष्टावेतानि बुद्धिमान् । क्षिप्राणि विद्धमात्राणि ध्वन्ति कालान्तरणे च ॥१४॥

इसमें श्लोक भी हैं—शृङ्गाटक, अधिपति, शंख (दोनों), कण्ठसिरा, गुदा, हृदय, वस्ति और नामि इन पर आधात लगने से तुरन्त मृत्यु हो जाती है । (कण्ठसिरा-मातृका) वक्ष मर्म (छाती के मर्म), सीमन्त, तलहृदय, क्षिप्र, इन्द्रवस्ति, कटिक- तरुण, पार्श्वसन्धि, बृहती, नितम्ब ये कालान्तर में प्राणहर होते हैं । दो उत्तैप और स्थपनी ये विशल्यध्वन हैं । लोहिताक्ष, जानु, ऊर्वी, कूर्च, विटप, कूर्प, अंस, अंसफलक, अवांग दो नील, दो मन्या, दो फण, कुकुन्दर, कक्षधर, विधुर, कुकाटिका दो आवर्त्त ये वैकल्पकारक हैं । गुल्फ दो, दो मणिबन्ध, कूर्चसिर चार, ये आठ मर्म रुजाकर हैं । क्षिप्रमर्म वेधन होने पर तुरन्त भी मारता है । और कुछ समय पीछे भी मारता है ॥९-१४॥

मर्माणि मांससिरास्नाय्वस्थिमन्धिध्वनितपाताः, तेषु स्वभावतः एव विशेषेण प्राणास्तित्वन्ति, तस्मान्मर्मस्वभि- हतास्तांस्तान् भवानांपद्यन्ते ॥१५॥

मर्म का लक्षण—मांस-सिरा-स्नायु-अस्थि और सन्धि इनके मिलने के स्थल का नाम मर्म है । इनमें स्वभाव से ही प्राण विशेष रूप में रहते हैं । इसलिये मर्मों पर आधात पहुँचने पर शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि इन्द्रियों के विषयों का ज्ञान नष्ट हो जाता है, मन बदल जाता है । अथवा भ्रम, प्रलाप, गिरना और प्रमोह ये लक्षण होते हैं ।

वि० मन्तव्य—मांस आदि के सन्निपात अर्थात् संयोग स्थल का नाम “मर्म” है अथवा यों कहिये—जहाँ मांस आदि

३२६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

का संयोग रहता है उस स्थल का नाम "मर्म" है। ये स्थल विशेषरूप से प्राणों के आधार हैं। प्राण के लिये देखिये अ० ३ का तीसरा सूत्र। और इसी अध्याय का ३५ वाँ श्लोक। तान् तान् भावान् आपद्यन्ते—"उन उन भावों—आपदाओं को प्राप्त होते हैं" के लिये देखिये—सू० स्था० अ० २५ के श्लोक २३ से ४० तथा इसी अध्याय के श्लो० ३६ से ४०। अभिधात—संक्षेपतः अभिधात तीन प्रकार से होता है १—गिरने आदि से चोट लगना, २ शत्रु द्वारा दण्ड एवं शस्त्र आदि की चोट लगना, ३—शस्त्र-कर्म हैं ॥१२॥

तत्र सद्यःप्राणहराण्यग्नेयानि, अग्निगुणेष्व्वासु क्षीणेषु क्षपयन्ति कालान्तरप्राणहराणि सौम्याग्नेयानि, अग्निगुणेष्व्वासु क्षीणेषु क्रमेण च सोमगुणेषु कालान्तरेण क्षपयन्ति, विशल्यप्राणहराणि वायव्यानि, शल्यमुखवावरुद्धो यावदन्तर्वायुस्तिष्ठन्ति तावज्जीवति, उद्धृतमात्रे तु शल्ये मर्मस्थानाश्रितो वायुनिष्क्रामति, तस्मात् सगल्यो जीवत्युद्धृतशल्यो त्रियते (पाकत्पतितगल्यो वा जीवति), वैकल्प्यकराणि सौम्यानि सोमो हि स्थिरत्वात्च्छैत्याच्च, प्राणावलम्बनं करोति, रुजाकराण्यग्निवायुगुणभूयिष्ठानि विशेषतश्च तौ रुजाकरो, पाञ्चभौतिकीं च रुजामाहुरेके ॥१६॥

इनमें सद्यः प्राणहर मर्म आग्नेय (अग्नि गुणवाले) हैं। शरीर में अग्निगुणों के शीघ्र कम होने से मारक होते हैं। कालान्तर प्राणहर मर्म सौम्य और आग्नेय गुणवाले हैं। अग्निगुणों के दुरन्त क्षीण होने पर और सौम्य गुणों के कुछ समय पीछे क्षीण होने पर कालान्तर में मारक हैं। विशल्य प्राणहर मर्म वायव्य हैं—शल्यमुख से रुकी हुई वायु जब तक अन्दर रहती है, तब तक रोगी जीता है। शल्य के निकालते ही मर्म स्थान में स्थित वायु निकल आती है। इसलिये शल्य रहने पर जीता है, शल्य के निकाल लेने पर मर जाता है। (अथवा पक जाने पर शल्य के गिर जाने से रोगी जीता है)। वैकल्प्य कारक मर्म सौम्य हैं। क्योंकि सोम स्थिर एवं शीतल होने से प्राणों को सहारा देता है। रुजाकर मर्म अग्निगुण-वायुगुण की अधिकतावाले हैं। अग्नि और वायु विशेषकर दर्द करनेवाले हैं। कोई आचार्य वेदना को पंचभूतजन्य वेदना मानते हैं।

वि० मन्तव्य—पाञ्चभौतिकीं च रुजामाहुः एके अर्थात्—रुजाकर में केवल आग्नेयरुजा-दाह-सन्ताप आदि तथा वायव्य-रुजा-शूल-उद्वेधन आदि ही रुजा नहीं होती, अपितु—पार्थिव रुजा-कफजरुजा-कण्डू, शैल्य आदि तथा आकाशीय रुजा—शून्यता, शोफ आदि रुजा भी होती हैं—ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं। हमारे विचार में उनका जो कहना है वह सभी आचार्यों को कहना चाहिये, क्योंकि मर्म ही नहीं शरीर के

किसी अवयव पर आघात होने से उक्त प्रकार की वेदना होती देखी जाती है ॥१६॥

केचिदाहुर्मांसादीनां पञ्चानामपि समस्तानां विवृद्धानां समवायात् सद्यःप्राणहराणि, एकहीनानामल्पानां वा कालान्तरप्राणहराणि, द्विहीनानां विशल्यप्राणहराणि, त्रिहीनानां वैकल्प्यकराणि, एकस्मिन्नेव रुजाकराणीति। नैवं, यतोऽस्थिस्मर्स्वप्न्यभिहतेषु शोणितागमनं भवति ॥

कई आचार्यों की मान्यता है कि मांस-सिरास्नायुअस्थि और सन्धि इन पाँचों के मिलने से और बढ़ने पर सद्यः प्राणहर मर्म होते हैं। कालान्तर प्राणहर मर्म एक रचना के कम होने से या थोड़े परिणाम में मिलने से होते हैं। दो रचनाओं के कम होने पर विशल्य प्राणहर मर्म होते हैं। तीन रचनाओं के कम होने से वैकल्प्य कारक, और एक ही रचना के होने से रुजाकर मर्म होते हैं। परन्तु यह बात नहीं है, क्योंकि अस्थि मर्म पर भी आघात होने से रक्त आता है, (जिससे ज्ञात होता है कि वहाँ भी मांससिरा का संयोग है)।

वि० मन्तव्य—जहाँ मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि एवं सन्धि का विवृद्ध—पूर्ण संयोग है सबके संयोगों का सम्मिलन है वहाँ जो "मर्म" बनता है वह सद्यः प्राणहर (सद्यः मारक) होता है और जहाँ मांस आदि में से किसी एक का हीन या अल्प संयोग होता है वह मर्म-कालान्तरमारक होता है। इसी प्रकार अन्य मर्म भी समझिये। परन्तु क्योंकि मांस सिरा आदि पांचों शरीर में सर्वत्र पाये जाते हैं, तथापि मर्म १०७ ही हैं, इसलिये यह "केचित् आहुः" कोई ऐसा कहते हैं वह ठीक नहीं है। इस के लिये देखिये निम्नलिखित श्लोक ॥

चतुर्विधा यास्तु सिराः शरीरे

प्रायण ता मर्मसु सान्निविष्ठाः।

स्नायवस्थिमासानि तथैव सन्धान्

सन्तप्य देहं प्रातयापयन्ति ॥१८॥

क्योंकि इस शरीर में जो चार प्रकार की सिराएँ हैं, वे प्रायः करके मर्मों में स्थित हैं। ये सिराएँ स्नायु, अस्थि, मांस और सन्धियों को पोषण देती हुई शरीर का पालन करती हैं ॥

ततः क्षते मर्मणि ताः प्रधृद्धा

समन्ततो वायुरभिस्तृणोति।

विवर्धमानस्तु स मातरिशवा

रुजः सुतीव्राः प्रवन्तोति काये ॥१९॥

रुजाभिभूतं तु ततः शरीरं

प्रलोयते नश्यति वास्य संज्ञा।

अतो हि शल्यं विनिवर्तुमिच्छ-

न्मर्माणि यत्नेन परीक्ष्य कर्षत ॥२०॥

२०६ ]

शारीरस्थानम्

३२७

अतः मर्म पर चोट लगने पर कुपित हुआ वायु चारों ओर से इन सिराओं में फैल जाता है। बदती हुई यह वायु शरीर में तीव्र वेदनायें उत्पन्न करती हैं। फिर वेदनासे पीड़ित यह शरीर सुख बन जाता है, और इसकी चेतना जाती रहती है। इसलिये शल्य को निकालने की इच्छावाला वैद्य परिश्रम के साथ मर्मों की परीक्षा करके शल्य को निकाले॥१६,२०॥

एतेन शेषं व्याख्यातम् ॥२१॥

वायु के लक्षणों के अनुसार पित्त और कफ के भी लक्षण पैदा होते हैं

वक्तव्य—पित्त के लक्षण दाह, चोष आदि हैं। कफ के लक्षण-तन्ना, भारीपन, स्तोनिरोध आदि हैं ॥२१॥

तत्र सद्यःप्राणहरमन्ते विद्वां कालान्तरेण मारयति, कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्वां वैकल्प्यमापादयति, विशल्यधनं वैकल्प्यकरं च भवति, वैकल्प्यकरं कालान्तरेण क्लेशयति रुजां च करोति रुजाकरमतीववेदनं भवति ॥२२॥

इनमें सद्यः प्राणहर मर्मों के आस-पास पर आघात लगने से कालान्तर में मृत्यु होती है। कालान्तर प्राणहर मर्मों के छोर पर आघात लगने से वैकल्प्य कारक मर्म की अवस्था होती है। विशल्यधन मर्म वैकल्प्य कारक बन जाता है। वैकल्प्य कारक मर्म कुछ समय पीछे दुःख देता है और पीड़ा करता है। रुजाकर मर्म में तीव्र वेदना नहीं होती ॥२२॥

तत्र सद्यःप्राणहराणि समरात्राभ्यन्तरान्मारयन्ति, कालान्तरप्राणहराणि पक्षान्मासाद्या, तेष्वपि तु क्षिप्राणि कदाचिदाशु मारयन्ति विशल्यप्राणहराणि वैकल्प्यकराणि च कदाचिदत्यभिहतानि मारयन्ति ॥२३॥

इनमें सद्यः प्राणहर मर्म सात रात के अंदर रोगी को मार देता है। कालान्तर प्राणहर मर्म पन्द्रह दिन या महीने में मृत्यु को मारता है। इनमें भी क्षिप्रमर्म कभी शीघ्र भी मारक बन जाता है। विशल्य प्राणहर और वैकल्प्य कर मर्म कभी बहुत ज़ोर का आघात लगने पर मारक हो जाते हैं।

वि० मन्तव्य—इस प्रकरण में “सद्यः” शब्द का अर्थ—सात रात्र (सात दिन) और “कालान्तर” शब्द का अर्थ एक पक्ष (१५ दिन) तथा १ मास (३० दिन या २७ दिन) है ॥२३॥

अत ऊर्ध्वं सक्रियमर्मीणि व्याख्यास्यामः—तत्र पादस्याङ्गकुल्योर्मध्ये क्षिप्रं नाम मर्म, तत्र विद्वांस्याच्चेपकेण मरणं; मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेषु मध्ये पादतलस्य तलहृदयं नाम, तत्र रुजाभिसरणं, क्षिप्रस्योपरिष्टादुभयतः कूर्चो नाम, पादस्य भ्रमणवेपने भवतः, गुल्फसन्धेरेध उभयतः कूर्चशिरः तत्र रुजाशोफो; पादजङ्घयोः सन्धाने गुल्फा, तत्र रुजाः स्तब्धपादां खञ्जता वा, पार्णिप्रति जङ्घामध्ये इन्द्रवस्तिः, तत्र शोणितक्षयेण मरणं, जङ्घावोः सन्धाने

जानु, तत्र खञ्जता, जानुन ऊर्ध्वमुभयतस्यकुलमाणी तत्र ओफाभिवृद्धिः स्तब्धसक्रियता च, ऊरुमध्ये उर्वी, तत्र, शोणितक्षयात् सक्रियशोषः, उर्व्या ऊर्ध्वमधो वङ्गक्षणसंवे-रुस्मूले लोहिताक्षं, तत्र लोहितक्षयेण मरणं पक्षाघातो वा, वङ्गक्षणवृषणयोरन्तरे विटर्पं, तत्र पाणत्वमत्यशुक्रता वा भवति, एवमेतान्येकादश सक्रियमर्मीणि व्याख्यातानि। एतेनेतरसक्रिय बाहू च व्याख्यातौ। विशेषतस्तु यानि सक्रिय गुल्फजानुविटपानि, तानि बाहौ मणिबन्धकूर्प-कक्षधराणि, यथा वङ्गक्षणवृषणयोरन्तरे विटपमेवं वंशः-कक्षयोर्मध्ये कक्षधरं, तस्मिन् विद्धे त एवोपद्रवाः विशेषतस्तु मणिबन्धे कुण्डिता, कूर्पराख्ये कुणिः, कक्षधरे पक्षाघातः। एवमेतानि चतुश्चत्वारिशच्छाखासु मर्मीणि व्याख्यातानि ॥२४॥

इनके आगे सक्रिय (टाँग) के मर्मों का व्याख्यान करें—इनमें पैर के अंगूठे और मध्यमा अंगुलि के बीच में क्षिप्र नाम का मर्म है। इसके वेधन होने पर आञ्चोपे के कारण मृत्यु होती है। मध्यमांगुलि की सीधी रेखा में पैर के तलुवे में तलहृदय नामक मर्म है, इसमें वेदना के कारण मृत्यु होती है। क्षिप्र मर्म के ऊपर में दोनों ओर कूर्च नाम का मर्म है। इससे पैर में तिरछापन और कम्पन आ जाता है। गुल्फ सन्धि के नीचे दोनों ओर कूर्चशिर नाम का मर्म है, इसमें वेदना और सूजन होती है। पैर और जंघा की सन्धि पर गुल्फ मर्म है, इसमें वेदना, पैर का स्तब्ध होना, या लंगड़ापन होता है। पार्णि के ऊपर जंघा के बीच में इन्द्रवस्ति नाम का मर्म है, इसमें रक्त-क्षय से मृत्यु होती है। जंघा और ऊरु की सन्धि पर जानु मर्म है, इससे लंगड़ापन होता है। जानु से ऊपर तीन अंगुल में दोनों ओर आणि नामक मर्म है। इसमें शोफ की वृद्धि, टाँग की स्तब्धता होती है। ऊरु के बीच में उर्वी मर्म है, इसमें रक्त के क्षय से टाँग सूख जाती है। उर्वी मर्म के ऊपर, वंक्षण सन्धि के नीचे, ऊरु की जड़ में लोहिताक्ष मर्म है। वंक्षण और वृषणों के बीच में विटर्प मर्म है, इससे नपुंसकता, शुक्र की कमी होती है। इस प्रकार से टाँग में ग्यारह मर्म कह दिये हैं। इसी से दूसरी टाँग और बाहु को समझना। विशेष मेद यह है कि टाँग में जो गुल्फ, जानु और विटर्प मर्म हैं, वे ही मर्म बाहु में मणिबन्ध, कूर्प और कक्षधर नाम से हैं। जिस प्रकार वंक्षण और वृषण के बीच में विटर्प मर्म है, उसी प्रकार वक्ष और कक्षा के बीच में कक्षधर है। इसके वेधन से वे ही (विटर्प के समान) उपद्रव होते हैं। मेद-मणिबन्ध के वेधन होने पर हाथ में निकम्मापन, कूर्प के विद्ध होने पर लूलापन, कक्षधर में पक्षाघात होता है। इस प्रकार शखाओं के चौवालीस मर्म

१२२

मुद्रतसंहिता

[ अ० १ ]

दिये हैं।

वि० मन्तव्य—पाठक ध्यान दें कि इन सर्मों में कौन-कौन मांसमर्म हैं और कौन-कौन खिरामर्म, स्नायुमर्म, अस्थिमर्म अथवा सन्धिमर्म हैं। कूर्चमर्म—पाँव एवं हाथ की शलाकास्थियों को बाँधनेवाले स्नायु का जाल है। तलहृदय मांसमर्म है, लोहिताक्ष—खिरामर्म है और जानु एवं कूर्पर गुरुक एवं मणिबन्ध सन्धिमर्म हैं। इस प्रकार सर्वत्र विचार किया जाय तो सर्मों का रहस्य समझ में आ सकता है, कूर्च-कूची-झाड़ू के समानाकार अथवा झाड़ू की शलाका जैसे रस्सी से बँधी रहती है वैसे ही ये अस्थियाँ स्नायु-से बँधी हैं। कूर्च-शिर—कूर्च का मूल भाग या जहाँ से कूर्च जुड़ा रहता है—कूर्च का शिर। इस मर्म में अनेक अस्थियाँ रहती हैं। मणिबन्ध—मणि जैसी छोटी छोटी अस्थियों का बन्ध बन्धन स्नायु। इन्द्रवस्ति—मांसमर्म है। इसका वर्णन देखिये—चि० स्था० अ० १८ श्लो० २५-२६ में। लोहिताक्ष—यह लाल वर्ण के अक्षकों की का सा होता है, पाँव-टाँग में ठीकर आदि आघात से भी सूज जाता है और इसी के शोथ को “वाधी” कहते हैं और यही प्लेग की ग्रन्थि भी है, जिसे विदारिका या वातालिका कहते हैं। यद्यपि अन्यत्र की ग्रन्थियों के शोथ भी (सोपद्रव) प्लेग कहे जाते हैं, परन्तु ८०-६० प्रतिशत लोहिताक्ष के शोथ देखे जाते हैं और यह भीषण भी अतएव होता है क्योंकि यह मर्मस्थल है। विट्प—यह वृषण या वृषणवाहक स्नायु हैं, क्योंकि विट्प स्नायुमर्म है और इस पर आघात होने से—सर्वथा नाश होने से पाण्डव-नपुंसकता और स्वरूप आघात होने से अलङ्गुश्रुता होती है और उक्त सर्मों का परिमाण—लम्बाई चौड़ाई का विचार इसी अध्याय के श्लो० २८-२९ से कीजिये ॥२४॥

अत ऊर्ध्वमुद्रोरसोर्ममणिबन्धुव्याख्यास्यामः—तत्र वात-वर्चानिरसनं स्थूलान्नप्रतिबद्धं गुर्व नाम मर्म, तत्र सद्यामरणं; अल्पमांसशणितोऽध्यन्तरतः कट्यां मूत्राग्रयो वस्ति; तत्रापि सद्यामरणमश्मरीव्रणाहृते, तत्राप्युभयतो भिन्नं न जीवति, एकतो भिन्ने मूत्रस्त्रावी व्रणो भवति, स तु यत्तेनोपक्रान्तो रोहित; पक्रामाग्रयोर्योर्मध्यं सिराप्रभवा नाभि; तत्रापि सद्योमरणं, स्तनयोर्मध्यमधिष्ठायोरस्यामाशयद्वारं सत्वरजस्तमसामविष्टानं हृदयं, तत्रापि सद्य एव मरणं; स्तनयोरधस्ताद् द्रवकुलमुभयतः स्तनमूले, तत्र कफपूर्णाकोष्ठतया (कासश्चासाभ्यां) प्रियते, स्तनचूचुक्योरुर्वं द्रवकुलमुभयतः स्तनरोहितौ, तत्र लोहितपूणकोष्ठतया कासश्चासाभ्यां च प्रियते; अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वोपरिभागयोरपलापौ नाम, तत्र रक्तं पूयभावं गतेन मरणं,

उभयत्रोरसो नाङ्गौ वातवहे अपस्तम्भौ नाम, तत्र वात-पूणकोष्ठतया कासश्चासाभ्यां च मरणम्; एवमेतान्युद्रोरसोद्वादिश मर्मणि व्याख्यातानि ॥२५॥

इसके आगे उदर और छाती के सर्मों का व्याख्यान करेंगे—इनमें वायु और मल (पुरीष) को निकालनेवाला, स्थूलान्न से सम्बद्ध गुदा नाम का मर्म है। इससे तुरन्त मृत्यु होती है। थोड़े मांस और थोड़े रक्तवाला, कटि के अन्तरस्थित, मूत्र का स्थान ‘वस्ति’ नामक मर्म है। इसमें भी अश्मरीजन्म व्रण को छोड़कर वेधन होने से तुरन्त मृत्यु होती है। अश्मरी व्रण में भी दोनों तरफ से (आर-पार) वेधन होने पर रोगी नहीं बचता। एक तरफ वेधन होने पर मूत्रस्त्रावी व्रण हो जाता है। इस व्रण की सावधानी से निकित्सा करने पर यह मर जाता है। पक्राशय और आमाशय के बीच में सिराओं का उत्पत्ति स्थान नाभि है। इसके वेधन पर भी तुरन्त मृत्यु होती है। स्तनों के मध्य में, छाती के भीतर, आमाशय द्वार के पास में हृदय नामक मर्म है, यह हृदय सत्त्व, रज, तम का स्थान है, इसके आघात से भी तुरन्त मृत्यु होती है। स्तनों के नीचे दो अंगुल, दोनों ओर स्तनमूल नामक मर्म है। इसके कफ से मर जाने पर कास, श्वास से रोगी मर जाता है। स्तन चुचुकों के दो अंगुल ऊपर दोनों ओर स्तन रोहित मर्म हैं। इनके रक्त से मर जाने पर कास, श्वास के कारण रोगी मर जाता है। अंस कूटों के नीचे, पार्श्वों के ऊपर के भाग में अपलाप नामक मर्म है। इनमें रक्त के पूय में बदल जाने से मृत्यु होती है। छाती के दोनों ओर, वात को ले जानेवाली जो दो नाडियाँ हैं, उनका नाम अपस्तम्भ है, इनमें वायु के मर जाने पर कास श्वास के कारण रोगी मर जाता है। इस प्रकार छाती और ऊपर के बारह मर्म कह दिये हैं।

वक्तव्य—“स्तन मूल को Root of the lungs; स्तन रोहित = Base of lungs; अपलाप = Apex of lungs; अपस्तम्भ = Bronchi कहते हैं।

वि० मन्तव्य—गुद-वात-अपान वायु तथा वर्चस्-पुरीष का निरसन-निर्गमन होता है, जिसके द्वारा स्थूलान्न-मलाशय के साथ प्रतिबद्ध ऊपर के छोर से बँधा हुआ। इसका वर्णन—चि० स्था० अध्याय २ में देखिये। वस्ति—मूत्राशय—इसका वर्णन नि० अ० ३ के श्लो० १८-२४ देखिये। नाभि—तुलान्न जहाँ रसवाहिनी सिराओं का प्रभव-उत्पत्ति या मूल या प्रारम्भ है। यह नाभि—धुनी या तुल नामक उदर के बाहर हरयमान अवयव नहीं है। अपितु पक्राशय-मलाशय एवं आमाशय के मध्यवर्ती अन्त्र का नाम है, जहाँ अन्त्र में से रस का पुष्क-करण एवं ग्रहण होता है। विशेष देखिये शा० अ० ४-२६-२७

अ. १ ] ४२

शारीरस्थानम्

३२८

तथा शा० अ० ५-६ । हृदय-हृत् (हार्ट) । स्तन-बाह्यवत्तिस्तन-मण्डल (स्तन चूचुक नहीं अपितु स्तन का पूरा घेरा) से आच्छादित स्थान के भीतर अवस्थित फुफ्फुस का वाचक भी हो सकता है, यथा—स्तन शब्द घ्न-शब्दे धातु (भ्वादि गणीय) से निष्पन्न होता है और शब्द-शप आक्रोशे धातु (भ्वादि गणीय) से निष्पन्न होता है—शब्द तथा आक्रोश (चिल्लाना) फुफ्फुसों के ही बल पर ही सकता है, बाह्य स्तन से नहीं और स्तन का पर्याय “कुञ्ज” है और कुञ्ज शब्द-कुञ्ज-संयोगे धातु (तुदादि गणीय) से निष्पन्न होता है और कोञ्ज-संकोञ्ज (सिकुड़ना)—फुफ्फुस में ही होता है । बाह्य कुञ्जों में नहीं, भले ही ये दोनों शब्द बाह्य स्तनों के लिये भी साहित्य में प्रयुक्त होते हैं, परन्तु हमारा दृढ विश्वास है कि इस प्रकरण में स्तन शब्द फुफ्फुस के लिये आया है । विश्वास का कारण—ये सिरा मर्म है और फुफ्फुस का प्रत्येक कोष्ठ-प्रकोष्ठ सिरा से व्याप्त है । दूसरे इन पर आधात होने पर उरःक्षत, फलतः कफ पूर्णकोष्ठता एवं कास श्वास होने का उल्लेख है और रक्त के पूय भाव को प्राप्त होने का भी उल्लेख है तथा—इनहीं में जानेवाली दो वातवह नाडियों का भी उल्लेख है जो श्वासमार्ग के दो मार्ग होकर फुफ्फुसों में जाती हैं । और बाह्यस्तनों पर आधात होने से यहाँ तक कि उनमें व्रण, व्रणशोथ आदि हो जाने पर भी कास श्वास आदि कुछ भी नहीं होते, स्तन काट दिये जाते हैं, सङ्ग जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं तथापि कासश्वास नहीं होते । और—वक्षस उरस के मर्मों में हृदय को सद्योमारक मानकर अन्य स्तनमूल आदि मर्मों को कालान्तरमारक माना है । यही कारण है कि इन पर आधात होने पर यदि कास श्वास आदि हो जाते हैं तो कालान्तर में मृत्यु होती है । और उक्त मर्म दो हैं—दोनों फुफ्फुसों में १-१ ।

स्तनमूल नामक मर्म—फुफ्फुसों का अष्टस्तन दो अंगुल भाग है । स्तन रोहित नामक मर्म—फुफ्फुसों का बाह्यस्तन के चूचुक (स्तन का कुण्मण्डल) से उपलक्षित मध्य भाग से २ अङ्गुल ऊपरी भाग है । अपलाप नामक मर्म—अंसकूट के नीचे (भीतर) पाक्षों (फुफ्फुसों) के उपरि भाग में विद्यमान है । यहाँ स्पष्ट पार्श्व शब्द का प्रयोग किया है, अर्थ है—पशुकासु भवं पार्श्वम—पशुकासों के भीतर फुफ्फुस ही विद्यमान हैं । अपस्तम्भ नामक मर्म—उरस में दोनों और विद्यमान वातवह—श्वास वायु का वहन करनेवाली दो नालियाँ जो श्वासनलिका से विभक्त होकर दोनों फुफ्फुसों में जाती हैं । इस प्रकार १ गुद, २ वस्ति तथा ३ नाभि, यह तीन मर्म उदर के और १—हृदय तथा फुफ्फुसों के ८ मर्म (दोनों में ४-४) यह ९ मर्म उरस के कह दिये हैं । उरस शब्द श्रु गतो धातु से निष्पन्न होता है, जिसमें गति हो वह उरस कहलाता है, अतः एव वह हृदय एवं

फुफ्फुसों के लिये प्रयुक्त भी होता है, यद्यपि बाह्य स्तनों को भी “उरोज” तथा वक्षोज कहते हैं, परन्तु वह साहित्य की वात है—आयुर्वेद की नहीं ॥२५॥

अत ऊर्ध्वं पृष्ठमर्माणि व्याख्यास्यामः—तत्र पृष्ठवंसुभयतः प्रतिश्रोणिकाण्डमस्थिनी कटीकतरुणे, तत्र शोणितक्षयात् पाण्डुर्विषणों होनरूपश्च श्रियते, पार्थ्यो-जघनबहिर्भागे पृष्ठवंशमुभयतो कुकुन्दरे, तत्र स्वर्गान्तमधःकाये चेष्टोपधातश्च, श्रोणिकाण्डयोरुपर्याशयाच्छादनौ पार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ नितम्बौ, तत्राधःकायगोवो दौर्बल्याच्च मरणं अधःपार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ जघनपार्श्वमध्ययोरित्यैर्गूर्ध्वं च जघनान् पार्श्वसन्धौ, तत्र लोहितापूर्णकोष्ठतया श्रियते, स्तनमूलाहजुभयतः पृष्ठवंशस्य बृहती, तत्र शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तेरुपद्रवैर्श्रियते, पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतच्छिक्संबद्धे अंसफलके, तत्र बाह्योः स्वापशोषौ बाहुमूर्ध्नीवामध्यं उपपीठस्कन्धवन्धनान्वसौ तत्र स्तन्धबाहुता, एवमेतानि चतुर्दशपृष्ठमर्माणि व्याख्यातानि ॥

इसके आगे पृष्ठ के मर्मों का व्याख्यान करेंगे—इसमें पृष्ठवंश के दोनों और प्रत्येक श्रोणिकाण्ड में कटिकतरुण नामक अस्थि मर्म है । इनमें रक्त के क्षय से पाण्डु वर्ण, विवर्ण और हीन रूपवाला होकर मर जाता है । पाक्षों में जघन के बाह्य भागों में पृष्ठ-वंश के दोनों और कुकुन्दर नामक मर्म हैं, इन में शरीर के निचले भाग में स्पर्श की अप्रतीति, और चेष्टा नाश होता है । श्रोणीकाण्ड के ऊपर, आशय को दर्पनेवाले, पार्श्वों के बीच में सम्बद्ध नितम्ब हैं, इन में शरीर के निचले भाग में शोष, और निर्बलता से मृत्यु होती है । पार्श्वों के नीचे लगे हुए, जघन और पार्श्वों के बीच में जघन के ऊपर और तिरछे पार्श्व सन्धि नामक मर्म हैं, इनमें रक्त के भर जाने से मृत्यु होती है । स्तनमूलों की सीध में पृष्ठवंश के दोनों और बृहती नामक मर्म है, इस में रक्त के अतिस्रावजनित उपद्रवों से रोगी मर जाता है । पीठ के ऊपर पृष्ठ वंश के दोनों और त्रिक से सम्बद्ध अंसफलक मर्म हैं, इन से बाहुओं में सुन्नता और शोष होता है । कन्धा और शीवा के मध्य में अंसपीठ और स्कन्ध को बांधनेवाला ‘अंस’ मर्म है । इस पर चोट आने से बाहु जड़ (अक्रियाशील) हो जाती है । इस प्रकार से पीठ के चौदह मर्म कह दिये हैं ।

वि० मन्तव्य—पृष्ठ के ऊपर वा बाहर से अङ्गुलि निर्देश योग्य तथा पृष्ठ के भीतर या पृष्ठ की भित्ति के समीप रहनेवाले मर्म पृष्ठमर्म कहे जाते हैं । कटिक तरुण—यह दोनों अस्थि मर्म हैं, और पृष्ठ वंश के अधोभागिक श्रोणिकाण्ड के दोनों और की दो तरुणस्थियाँ हैं । कुकुन्दर—यह दोनों सन्धिमर्म हैं, ऊपर

३३०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

के ऊपरी भाग का संयोग स्थल जिसका नाम वंक्षण सन्धि है, यह उलूखल सन्धि है। यह जघनास्थि के बहिः पार्श्व में स्थित है। इस पर आघात होने से अधःकाय की चेष्टा (चलना आदि) का उपघात हो जाता है और साथ २ तत्संबद्ध सिरास्नायु पर भी आघात होने से शून्यता हो जाती है। नितम्ब—यह भी अस्थिमय मर्म है, यह दो चौड़ी कपालास्थियाँ हैं—“गुदभग-नितम्बेषु चत्वारि” (अ० ५ सू० १६) में से दोनों ओर की दो अस्थियाँ तथा—जानु नितम्ब—“कपालानि (अ० ५ सू० २०) में वर्णित हैं। ये श्रोणिकाण्ड से कुछ ऊँची, बस्ति आदि आशयों का आच्छादन करनेवाली—दोनों पासों से बचानेवाली, दोनों पासों में अन्दर से बंधी है, यह “नितम्बास्थि” कही जाती है। पार्श्वसन्धि—यह सिरामर्म है, यह दोनों बृक्ष हैं, यह—पार्श्व-फुफ्फुस से अधःभाग में प्रतिबद्ध, जघनास्थि के पार्श्वों के मध्य—परन्तु तिरछे किन्तु उससे ऊपर-ऊँचे में स्थित हैं। श्री त्रिलोक की नाथ वर्मा के शब्दों में—ये दोनों इन्द्रियाँ (नहीं-यन्त्र) उदर में उसकी पिछली दीवार से लगी हुई, रीढ़ के दाहिनी ओर बाँई ओर रहती हैं, उनके आगे अन्त्र की गेण्ड-लियाँ पड़ी रहती हैं, हर एक गुदे (बृक्ष) के पीछे १२ वीं पसली रहती है। ४० श० की २० अ० १२। इन पर आघात होने पर कोष्ठ में (बस्ति में) रक्त भर जाने से मृत्यु हो जाती है। बृहती नामक दो मर्म—यह दोनों भी सिरा मर्म हैं, परिमाण में आधा अंगुल है तथा कालान्तर या एक हैं। यह फुफ्फुस का, पीठ की ओर का भाग है, दोनों के दो भाग हैं। शेष देखिये स्तनमूल मर्म का वक्तव्य। अंसफलक—यह दोनों अस्थिमर्म हैं, पीठ के उपरिभाग में, पृष्ठ वंश के दोनों ओर, त्रिक (दोनों स्कन्ध तथा श्रीवा का सन्धान स्थल) से सम्बद्ध तथा बाहर से स्पर्शोपलम्ब्य हैं जो खम्बे या फर या पर कहे जाते हैं। ये कपालाकार हैं। अंस—कन्धे कहे जाते हैं, ये स्नायु मर्म हैं, बाहु के मूर्ध=ऊपर का शिर (सिरा) तथा श्रीवा के मध्य भाग में वत्तमान, अंसपीठ (भार उठाने योग्य पीड़ा) स्कन्ध (कन्धा) नामक प्रदेश को बांधनेवाले स्नायु अंस नामक मर्म कहे जाते हैं ॥२६॥

अत उध्वमूर्ध्वजत्रुगतानि व्याख्यास्यामः—तत्र कण्ठ-नाडीसुभयतश्चतस्रो धमन्यो द्वे नीले द्वे च मन्ये। न्यस्यासेन तत्र मुक्ता स्वरवैकृतमरसग्राहिता च; श्रीवायासुभयतश्चतस्रः सिरा मातृकाः, तत्र सद्योमरणं, शिरोभीवयोः सन्धाने कूकटिके, तत्र चलमूर्धता, कर्णपुष्पतोऽधः सन्त्रिते विधुरे, तत्र बाधियं, प्राणमार्गसुभयतः स्तोतमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः फणे, तत्र गन्धाज्ञानं, श्रुपुच्छान्तयोरधोऽरुणो-बाँध्यतोऽपाङ्गी, तत्रान्धं दृष्टयुपघातो वा श्रुवोऽरुपरि-निम्नयोरारवर्तो नाम तत्राप्यान्धं दृष्टयुपघातो वा श्रुवो-

रन्तयोरुपरि कर्णललाटयोर्मध्ये गङ्गौ, तत्र सद्यो मरणं, गङ्गखयोरुपरि केगान्त उक्षौपौ, तत्र सराह्यो जीवेत् पाकात् पतितगल्यो वा तोदुधृतगल्यः, श्रुवोर्मध्ये स्थपनो, तत्रोक्षेपवत, पञ्च सन्ध्यः शिरसि विभक्ताः सीमन्ता नाम, तत्रोन्मादभयचिन्तनाशैर्मरणं, प्राणश्रोत्राक्षिजिह्वा-संतर्पणीनां सिराणां मध्ये सिरासन्निपातः शृङ्गाटकानि, तानि चत्वारि मर्माणि, तत्रापि सद्योमरणं, मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् सिरासन्धिस्सन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः, तत्रापि सद्य एव। एवमेतानि समत्रिशदूर्ध्वजत्रुगतानि मर्माणि व्याख्यातानि ॥२७॥

इसके आगे जत्रु से ऊपर के मर्मों का व्याख्यान करेंगे—इस में कण्ठ नाडी के दोनों ओर चार धमनियाँ हैं, एक नीला और एक मन्धा। दूसरे पार्श्व में एक नीला और एक मन्धा, इनका वेधन होने पर गूँगापन, स्वर विकृति, रस का प्रहण न करना होता है। श्रीवा के दोनों ओर चार सिरा मातृकायें हैं, इनमें तुरन्त मृत्यु होती है। शिर और श्रीवा के सन्धि पर कूकटिका मर्म है, इन में शिर हिलता रहता है कर्ण पीठ के नीचे स्थिर विधुर मर्म है, इससे बहरापन होता है। नासिका मार्ग के दोनों पार्श्वों में स्तोत मार्ग से सम्बद्ध, अन्दर की ओर ‘फणा’ मर्म है, इससे गन्ध ज्ञान का नाश होता है। श्रुवों के अन्तिम (बाह्य) छोर पर, नीचे की ओर, आँखों के बाहर की ओर अपांग है, इस में अन्धापन, दृष्टि की विकृति होती है। श्रुवों के ऊपर नीचे की ओर आवर्त्त नामक मर्म है, इनमें भी अन्धापन और दृष्टि का विकार होता है। श्रुवों के अन्दर में ऊपर की ओर कान और माथे के बीच में शंख मर्म है, इनमें भी तुरन्त मृत्यु होती है। शंखों के ऊपर बालों के सिर पर उत्क्षेप मर्म है, इन में शल्य रहने पर जीता है, स्वयं पककर शल्य के गिरने से भी जी सकता है, परन्तु शल्य निकालने से नहीं जीता। श्रुवों के बीच में स्थपनी मर्म है, इसमें उत्क्षेप की भांति, लक्षण होते हैं। शिर में पांच सन्धियाँ अलग अलग पांच सीमन्त मर्म हैं, इन में उन्माद, चिन्ता, भय, चिन्तनाश के कारण मृत्यु होती है। नासिका, कान नाक-जिह्वा को पोषण देनेवाली सिराओं के मध्य में सिराओं के मिलने का नाम शृङ्गाटक है, ये चार मर्म हैं, इन में भी तुरन्त मृत्यु होती है। मस्तिष्क के अन्दर ऊपर की ओर, सिराओं के सन्धि स्थान, बालों के आवर्त्त (भैंवर चक्कर) के समान अविपत्ति मर्म है। इसमें भी तुरन्त मृत्यु होती है। इस प्रकार से ऊर्ध्व जत्रु के सैंतीस मर्मों का व्याख्यान कर दिया।

वि० मन्तव्य—दो नीला तथा दो मन्धा नामक मर्म—दोनों ओर एक एक। ये सिरा मर्म हैं, श्रीवा में कण्ठ नाडी के दोनों ओर—इनका स्पर्श किया जा सकता है। दोनों के

अ० ६ ]

शारीरस्थानम्

३३१

ध्यान अंगुली द्वारा जाने जाते हैं। इन पर अंगुली का दबाव डालने से बोलो नहीं जा सकता, मूकता हो जाती है। इनके सम्बन्ध में चरक २० स्था० अ० ३४-६ में चर्चा की गई है, यथा-तस्य चेतु मन्त्रे परिमृश्यमाने (स्पृश्यमाने) न स्पन्दयेता (फड़कन प्रतीत न हो) परासुः (मृतः) इति विद्यात् (जाने)। मातृका नामक मर्म—ये सिरा मर्म हैं—ये चार हैं, दोनों ओर दो दो। यह शिर की ओर से लौटनेवाली सिरा हैं। मातृका—माता के समान पालिका। कुक्राटिका—यह सन्धि मर्म है—शिर एवं शीर्ष की अस्थियों का सन्धान स्थल है। पुष्पवंश के शिखर पर जहाँ शिर धरा हुआ है वह स्थल है, इसी भाग को 'शिरोधरा' कहा जाता है। यहाँ आनेवाली दो सिरा हैं (दो सिरासन्निपात हैं) जो अगले अध्याय आठ में सू० २२ में 'द्वे कुक्राटिकयोः' कहकर अवैध कही हैं। विधुर नामक मर्म—दोनों कानों के नीचे स्थित हैं। ये स्नायु मय मर्म हैं, यह शुषिर स्नायु है, जो धमनी कहा जाता है और वाग्भट ने इसे 'धमनी मर्म' माना भी है और सुश्रुत ने भी अ० ७ सू० २२ में इनको अवैध सिरा माना है। ये कानों का तर्पण करती हैं। इन्हीं दो को अ० ६ सू० ५ में शब्द का ग्रहण करनेवाली दो धमनियाँ माना है। फणा नामक मर्म—ये भी सिरा मर्म हैं, नासिका के दोनों छोटों के भीतरी भाग में समृद्ध है, सर्प के फन के समान प्रसार संकोच युक्त दृश्यमान नासापुटों के अन्दर की ओर लगे हैं। इनको मु० शा० अ० ७ सू० २२ में औपनासिक्यः चतस्रः कहकर अवैध माना है और अ० ६-सू० ५ में गन्ध का ग्रहण करनेवाली धमनी कहा है। इन पर आघात होने से गन्ध का ज्ञान नहीं होता। अपाङ्ग—ये सिरा मर्म हैं, ये अपाङ्ग की वे सिरा (सिरासन्निपात) हैं जो अपाङ्ग की एक एक सिरा अवैध मानी है और रूप का ग्रहण करनेवाली दो 'धमनियाँ' मानी हैं (पताफणावाला)। ये नेत्र का तर्पण करने तथा रूप का ग्रहण करनेवाली हैं। आवर्त्त—ये सन्धि मर्म हैं, जहाँ भू के बाल उगते हैं। यहाँ रहनेवाली वह सिरा जिस को अवैध माना है। यह भी दृष्टि का तर्पण करती है। शंख नामक मर्म—ये अस्थिमय मर्म हैं, पुटपुटी या पुङ्गुपुडी कहे जाते हैं। यहाँ आनेवाली शंख गता सिरा अवैध मानी गई है, यह आघात होने पर सद्यो-मारक मर्म है। ये भू की पुच्छ के अन्त में स्थित हैं। उत्क्षेप-ये स्नायु मर्म हैं। इस स्थान की सिरा भी अवैध हैं। स्थपनी—यह सिरामर्म है। यहाँ ललाट की दो सिराओं का सन्निपात है। दोनों के संयोग से वह एक हो जाती है, अतः स्थपनी की एक सिरा अवैध मानी है। सीमन्त नामक मर्म—ये सन्धि मर्म

हैं, शिरः कपालों की ५ सन्धियाँ हैं, इनमें से जो सिरा गुजरी हैं वे अवैध मानी हैं और 'सप्त सेविन्यः शिरसि विभक्ताः पञ्च'—अ० ५ का सू० १५ देखिये। चरक सिद्धिस्थान अ० ६ में—शिर पर अभिघात होने से—मन्यास्तम्भ, अदिति, चक्षु-विभ्रम आदि होने का उल्लेख है। शृंगाटक नामक मर्म—शिर के भीतर मस्तिष्क या शिरो मण्डा नामक (मेजा नाम से प्रसिद्ध) अवयव में—वे चार केन्द्र हैं, जहाँ प्राण, श्रोत्र, अक्षि तथा रसना नामक इन्द्रियों का वहन करनेवाली सिराओं के सन्निपात हैं, क्योंकि ये मर्म—सिरा मर्म हैं और अभिघात होने पर सद्योमारक हैं। अभिपति मर्म—यह शिर के भी सबसे ऊपर शिखर पर का मर्म है, इसका सूत्रक शिर पर—बाहर रोमा-वर्त्त (मौरी, बालों का आवर्त्त) होता है। इसमें आनेवाली एक सिरा अवैध मानी गई है। इसके ऊपर की अस्थि में छिद्र रहता है, जो ब्रह्मरन्ध्र कहलाता है, परन्तु यह १ वर्ष व्यतीत होने पर बाल्यावस्था में ही पूर्ण हो जाता है, सद्योजात शिशु के शिर पर हाथ रखने से इसमें सिरा (धमनी) का स्पन्दन (धमन) प्रतीत होता है, अर्थ है—अधिकृत्य पाति रक्षति इति अविपत्तिः, इस अवयव को अधिकृत करके आत्मा शरीर का रक्षण करता है, यही पुराणों का ब्रह्मलोक, वैष्णव पुराणों का विष्णुलोक या वैकुण्ठ तथा शैव पुराणग्रन्थों का शिवलोक या कैलाश है। और गीता का ऊर्ध्वमूल—है, अघःशाख शाख शरीर का ऊपर की ओर वर्त्तमान भी मूल—जड़—जीवन हेतु है। योग-शास्त्र में शिर के पिछले कपाल के अन्दर में स्थित केन्द्र को शिवरन्ध्र माना है, परन्तु यह शैवों का विचार है, वे उसी को जीवन का केन्द्र मानते हैं। इन २३ मर्मों से युक्त समस्त शिर को ही मर्म समझना चाहिये, शिर का पर्याय 'उत्तमाङ्ग' है, उसके लिए भगवान् पुनर्वसु ने लिखा है—'प्राणाः प्राण-भूतां यत्र स्थिताः (श्रिताः) सर्वेन्द्रियाणि च। तदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ॥' और शिरसि इन्द्रियाणि, इन्द्रियप्राण-वहानि च क्षोतांसि—संश्रितानि (चरक सि० अ० ६ सू० ४)। और शिरसि अभिहिते—मन्यास्तम्भ, अदिति चक्षु-विभ्रम, मोह, उद्बेधन, चेधनाश, काम, र्वाप, हनुग्रह, मूकत्व, गद्गदत्व, अक्षिनिमीलन, गण्डस्पन्द, जूमण, लाला-खाव, स्वरहानि, वदनजिह्वादीनि (भवन्ति)। च० सि० अ० ६ सू० ६। चरक में वही लिखा है कि १०७ मर्म होते हैं। उनका पीड़न—अभिहनन होने से प्राणी को बहुत अधिक पीड़ा का (अन्य स्थलों की अपेक्षा अधिक) अनुभव होता है, क्योंकि उन (मर्मों) में प्राणों का विशेषरूप से अनुबन्ध-सम्बन्ध होता है। शाखाश्रित मर्मों की अपेक्षा स्कन्ध अर्थात् अन्तराधि के मर्म विशेष महत्त्व रखते हैं। उनमें भी हृदय, वस्ति तथा शिर (श्रीवा समेत शिर—२३ मर्मों का अवि-

३२२

सुश्रुतसंहिता

[ ३०१ ]

ज्ञान शिरः) अत्यन्त महत्त्व रखते हैं, क्योंकि समस्त शरीर (उसकी स्थिति) इन्हीं तीनों के अधीन है। शिर का अर्थ श्रीयते इति शिरः, अर्थात् जीवन का आश्रय। मस्तक भी शिर का पर्याय है। यह शब्द 'मसी परिणामे' धातु (दिवादि गणीय) से निष्पन्न होता है। जहाँ प्रत्येक विषय का परिणाम-परिपाक-विनिश्चय होता है ॥२७॥

भवन्ति चार्त्र श्लोकाः—

उत्तमः शिरःसि विटपे च सकक्षपार्वे एकैकमङ्गुलमितं स्तनपूर्वमूलम् । विद्ध्यङ्गुलद्वयमितं मणिबन्धगुल्फं श्रीण्येव जानु सपरं सह कूर्पराभ्याम् ॥२८॥ हृद्बस्तिकचं गुदनाभि वदन्ति मूर्धन चत्वारि पञ्च च गले दश यानि च द्वे । तानि स्वपाणितलकुञ्चितसम्मितानि शेषाण्यवेहि परिविस्तृतोऽङ्गुलार्धम् ॥२९॥

इस विषय में श्लोक भी हैं—उर्वा, कूर्चशिर, विटप, कक्षधर, स्तनमूल ये एक-एक अंगुल परिमित हैं। मणिबन्ध, गुल्फ ये दो-दो अंगुल हैं, दोनों कूर्प तीन अंगुल, हृदय, वस्तिक, कूर्च, गुदा, नामि, शिर के चारों शृङ्गाटक, पांचों सीमन्त, गले के बाहर (दो नीठा, दो मन्या, आठ मातृकायें) ये हथेळी के गड्ढे के बराबर हैं। शेष मर्म आधे अंगुल लम्बे-चौड़े समझने चाहिये।

वि० मन्तव्य—इन पाठों में मर्म स्थलों का परिमाण बतलाया गया है, जिससे शस्त्र प्रयोग में वे स्थल बचाए जा सकें। स्वपाणितलकुञ्चितसम्मितानि—अर्थात् इनमें कुछ पाणितल के परिमित हैं और कुञ्चितपाणि (घुट्टी) परिमित हैं, यथा हृदय ॥२८, २९॥

एतत्प्रमाणमभिबीक्ष्य वदन्ति तज्ज्ञाः अत्रेण कर्मकरणं परिहृत्य कार्यम् । पार्वोभिधातितमर्पह निहन्ति मर्म तस्माद्भि मर्मसदृशं परिवर्जनीयम् ॥३०॥

इस परिमाण को जानकर मर्म बताते हुए शस्त्र कर्म करना चाहिये। क्योंकि मर्मों के पास में भी अभिधात होने पर मनुष्य मर जाता है। इसलिये मर्मस्थान को बचाकर शस्त्र कर्म करना चाहिये ॥३०॥

छिन्नेषु पाणिचरणेषु सिरा नराणां सङ्कोचमोयुरसगुल्फमतो निरेति । प्राप्यासितव्यसन्मुखमतो मनुष्याः मंछिन्नशास्त्रतद्वन्धिनं न यान्ति ॥३१॥

क्षिप्रेषु तत्र सतलेषु हृतेषु रक्तं गच्छत्यनीव पवनश्च रुजं करोति । एवं विनाशमुपयान्ति हि तत्र विद्वा वृक्षा इवायुधनिपातनिकृन्तमूला ॥३२॥

हाथ-पैर के काटने पर मनुष्यों की शिराओं के संकुचित हो जाने से रक्त थोड़ा ही निकलने पाता है, यद्यपि हाथ-पैर के काटने पर मनुष्य मर्यंकर संकट को प्राप्त करता है, तथापि शाखा के कटने पर जैसे वृक्ष नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मनुष्य की मृत्यु भी नहीं होती। क्षिप्र और तल्लहदय मर्म के वेधन पर रक्त बहुत जाता है, और वायु भी अधिक पीड़ा करती है। इनके वेधन होने पर मनुष्य शस्त्र के आधात से कटे हुये मूलवाले वृक्ष की भाँति मृत्यु को प्राप्त करता है ॥

तस्मात्तयोरभिहतस्य तु पाणिपादं छेत्तव्यमाशु मणिबन्धनगुल्फदेशे मर्माणि शल्यविषयार्थमुदाहरन्ति यस्माच्च मर्मसु हता न भवन्ति सद्यः ॥३३॥ जीवन्ति तत्र यदि वैद्यगुणेन केचि- न्चे प्राप्नुवन्ति विकलत्वमसंशयं हि ।

इसलिये तल्लहदय और क्षिप्र मर्म के वेधन होने पर मनुष्य के हाथ, पैर तुरन्त मणिबन्ध और गुल्फ प्रदेश के ऊपर से काट डालने चाहिये। मर्मों पर चोट लगने से तुरन्त मृत्यु होती है, इसलिये मर्म शल्य शास्त्र का आधार भाग है। यदि किसी योग्य वैद्य की चिकित्सा से कोई बच भी जाता है तो भी वह निश्चित रूप में विकलांग बन जाता है।

वि० मन्तव्य—मणिबन्धनगुल्फदेशे—मणिबन्धन एवं गुल्फ से कुछ ऊपर काटना चाहिये। शल्य विषयार्थ—शल्य शास्त्र का अर्थ—आधा अङ्ग मर्मशान है। अर्थात् मर्मों का शान-शल्यचिकित्सा के लिये परमावश्यक है ॥ ३३ ॥

समिन्नजर्जितकोष्ठशिरः कपाळा जीवन्ति शस्त्रनिहृतेरुच शरीरदेशैः ॥३४॥ छिन्नैरुच सकिथमुजपादकरैरशेषै- यैषां न मर्मसु कृता विविधाः ग्रहाराः ।

कोष्ठ, शिर, कपाल, ये फूटकर भले ही जर्जरित हो जायें, टांग, बाहु पैर और हाथ ये भी सम्पूर्ण कट जायें, शस्त्रों के आधात से सारा शरीर छिन्न भिन्न हो जाये, परन्तु यदि मर्म बचे रहते हैं, तो मनुष्य जीवित रहता है ॥ ३४ ॥

सोममासततेजासि रजःसस्वतमासि च असस प्रायशः पंसा भूतात्मा चावतिष्ठते ॥३५॥ मर्मस्वभिहृतास्तस्मान्न जीवन्ति शरीरिणः ।

अ० ७ ]

शारीरस्थानम्

३३३

मर्मों में प्रायः सोम (जल), वायु, अग्नि, रज, सत्व, तम, और मूत्रात्मा (आत्मा) ये रहते हैं। इसलिये मर्मों पर आघात लगने पर प्राणी जीवित नहीं रहते।

वि० मन्तव्य—इसको समझने के लिये देखिये—शा० अ० ४ का सू० ३ ॥३५॥

इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्मनोबुद्धिविपर्ययः ॥३६॥

रुजश्च विविधास्तीव्रा भवन्त्याशुहरे हते।

हते कालान्तरघ्ने तु ध्रुवं धातुक्षयो नृणाम् ॥३७॥

ततो धातुक्षयाज्जन्तुर्वदनाभिश्च नश्यति।

हते वैकल्पजनने केवलं वैद्यैर्नपुणात् ॥३८॥

शरीरं क्रियया युक्तं विकलत्वमवाप्नुयात्।

विशल्यघ्ने तु विज्ञेयं पूर्वोक्तं यच्च कारणम् ॥३९॥

रुजाकराणि मर्माणि क्षतानि विविधा रुजः।

कुर्वन्त्यन्ते च वैकल्प्यं कुर्वेद्यवशगो यदि ॥४०॥

सद्यः प्राणहर मर्मों पर आघात लगने से रूप रस आदि ह्रस्वों के विषयों का ज्ञान नहीं होता। मनस् एव बुद्धि में वैपरीत्य हो जाता है और नाना प्रकार की तीव्र वेदनायें होती हैं। कालान्तरघ्न मर्मों पर आघात होने पर धातुक्षय निश्चित रूप में होता है। इसलिये धातुओं के क्षय से और वेदनाओं के कारण रोगी की मृत्यु होती है। वैकल्प्य कारक मर्मों पर आघात होने पर केवल वैद्य की बुद्धिमानों से शरीर क्रिया युक्त रहने पर भी विकलता को प्राप्त होता है। विशल्यघ्न मर्मों का विघात होने पर जब तक शल्य रहता है, तब तक जीता है, पूर्वोक्त कारणों के अनुसार मृत्यु समझनी चाहिये। रुजाकर मर्मों पर आघात पहुँचने पर नाना प्रकार की पीड़ायें होती हैं। और यदि किसी अनाड़ी वैद्य के चंगुल में फस गया तो रोगी विकलांग हो जाता है ॥३६-४०॥

छेदभेदाभिघातेभ्यो दहनाहारणादपि।

उपघातं विजानीयान्मर्मणां तुल्यलक्षणम् ॥४१॥

मर्मों के समीप मर्म पर छेदन, भेदन, चीट लगने, जलने, फटने, से भी मर्मों के ऊपर लगे सीधे आघात के समान लक्षण होते हैं।

वि० मन्तव्य—मर्मस्थल पर छेदन भेदन आदि से भी उपघात के ही समान लक्षण होते हैं अर्थात् उसके ऊपर चाहे चिकित्सा के दृष्टिकोण से किये छेदन आदि कर्म हो जायें अथवा अन्य प्रकार से दण्ड एवं तल्लव बन्धों आदि से आघात हो जायें, परन्तु लक्षण समान ही होते हैं। अतएव श्लो० ३३ में मर्मज्ञान को शल्यतन्त्र-शल्यचिकित्सा का आधा भाग होना है और समझने के लिये देखिये श्लो० ३०, ३१, ३२, ३३ तथा ३४ और ४२ तथा ४३ ॥ ४१ ॥

मर्माभिघातस्तु न कश्चिदस्ति

योऽरुपात्ययो वापि निरत्ययो वा।

प्रायेण मर्मस्वभिताडितास्तु

वैकल्प्यमूच्छन्त्यथवा श्रियन्ते ॥४२॥

मर्मों पर चीट पहुँचने से थोड़ा उपद्रव या विलकुल हानि न हो, यह बात असम्भव है। मर्मों पर आघात पहुँचने पर प्रायः विकलता अथवा मृत्यु अवश्य होती है ॥४२॥

मर्माण्यविघ्नाय हि ये विकारां

मूच्छन्ति काये विविधा नराणाम्।

प्रायेण ते कूच्छतमा भवन्ति

नरस्य यत्नैरपि साध्यमानाः ॥४३॥

शरीर के जो भी विकार मर्म स्थानों में होते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक चिकित्सा करने पर भी प्रायः कष्टसाध्य रहते हैं ॥४३॥

इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने प्रत्येकमर्म-निर्देशशरीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

सप्तमोऽध्यायः

अध्यातः सिरावर्णविभक्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे सिरा वर्ण विभक्ति शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में सिराओं का तथा उनके वर्णों का वर्णन है ॥१,२॥

सप्त सिराशतानि भवन्ति, यामिरिदं शरीरमाराम इव जलहारीणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्तिष्ठते-ऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, दुमपत्रसेवनो-नामिव तासां प्रतानाः, तासां नाभिमूलं, ततश्च प्रसरन्त्युर्ध्वमधस्तिर्यक् च ॥३॥

सात सी शिरायें हैं। जिस प्रकार जल को ले जानेवाली नाली द्वारा उपवन अथवा कुल्या (कुलहरे) के द्वारा जिस प्रकार खेत का उपस्तेहन और पोषण होता है, उसी प्रकार इन सिराओं के सिकुड़ने फैलने आदि से इस शरीर का स्नेहन और पोषण होता है। ये सिरायें शरीर में वृक्ष के पत्ते की सेवनियों के समान फैली हुई हैं। इन सिराओं का मूल नाभि है, वहाँ से ये सिरायें ऊपर, नीचे और तिरछी जाती हैं।

वक्तव्य—तीन उपमाओं से सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम सिराओं को बताया है। जिस प्रकार नाली में चलता हुआ पानी आस-पास की भूमि को भी गीला करके पोषण देता है, उसी प्रकार सिराओं से पास के तन्तुओं का भी पोषण होता है, इसी का नाम 'उपस्तेहन' है ॥३॥

३१४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

भवतश्चात्र श्लोकौ—

यावत्यस्तु सिराः काये संभवन्ति शरीरिणाम् ।

नाभ्यां सर्वा निवद्वस्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ॥४॥

इसमें दो श्लोक हैं— मनुष्यों के शरीर में जितनी भी सिराएँ हैं, वे सब नाभि से सम्बद्ध हैं । वहाँ से (नाभि से) ये चारों ओर फैलती हैं ॥४॥

नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणाश्चाभिर्न्युपाश्रिता ।

सिराभिरावृता नाभिक्षक्रनाभिरिवारकैः ॥५॥

प्राणियों के प्राण नाभि में आश्रित हैं, और प्राणों से नाभि आश्रित है । नाभि सिराओं से घिरी है, जिस प्रकार चक्र (पहिये की धुरी)-आरों से घिरी रहती है ।

वक्तव्य—सम्भवतः यह कल्पना गर्भावस्था में गर्भ की स्थिति के आधार पर की गई है । गर्भावस्था में गर्भ का जीवन इसी नाभि के आधार से रहता है, यहीं से उसे पोषण मिलता है ।

वि० मन्तव्य—गर्भ का जीवन उस बाह्य नाभि (घुन्नी-तुच्छ) के आधार में रहता ही है, परन्तु जन्म के पश्चात् उसके जीवन का आधार नाभि नामक मर्म है वहाँ से इसके साथ साथ प्राण का सञ्चार भी होता है । इसको समझने के लिये श्री शाङ्ख-धराचार्य का सुभाषित स्मरणीय एवं मननीय है, यथा—

नाभिस्यः प्राणपवनः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् ।

कण्ठादुर्बहिर्विनिर्णोति पातुं विष्णुपदामृतम् ॥

पीत्वा चाऽम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।

प्रीणयन् देहमखिलं दीपयन् जठरानलम् ॥

अर्थात्—नाभि में स्थित प्राणवायु सिराओं द्वारा हृदय कमल के अन्तर (भीतरी भाग) को स्पर्श करके (भीतर से होकर) कण्ठ (श्वास मार्ग) से बाहर निकल जाती है, केवल विष्णुपद (आकाश) के अमृत (अमृत तत्त्व मय आप—न्यास जल) को पीने के लिये और आकाश के पीयूष (अमृत) को पीकर तत्काल पुनः भीतर चली जाती है । जाते ही समस्त शरीर का प्रीणन तर्पण करती है और जठराग्नि का दीपन करती है । यह क्रिया जन्म के पश्चात् जीवन भर चलती रहती है । सिराएँ नाभि से प्राणमय रस को लेकर हृदय में आती हैं और हृदय से फुफ्फुसों में ले जाती हैं और और रस तो फुफ्फुसों में ही रह जाता है, परन्तु प्राण वायु उदान के साथ मिलकर कण्ठ से बाहर चला जाता है, परन्तु तत्काल लौट आता है । हृदय भी सिरामय मर्म है (दे० शा० अ० ६ सू० ७) । सिराओं ने ही हृदय का रूप बना लिया है या सिराओं का ही आगे चलकर “हृदय” बन गया है, हृदय से यद्यपि रक्त चालू होता है, परन्तु वह रस मय होता है और रस ही लाल हो जाने पर रक्त कहलाता है ।

यह रस या रसमय रक्त प्राणमय होता है, फलतः समस्त शरीर को अनुप्राणित करता है । हृदय से शरीर की ओर जानेवाली भी सिरा ही हैं, उनमें ध्यान होता है, अतः धमनी कही जाती है, जहाँ आगे चलकर अत्यन्त सूक्ष्म (द्रुमपत्र सेवनीवत्) रूप में परिणत हो जाती है वहाँ “क्षोतस” कही जाती है और वहाँ से लौटकर पुनः हृदय की ओर आनेवाली सिरा ही सिरा कही जाती है, चरक के शब्द में धमानात् धमन्यः, खवणात् क्षोतासि, सरणात् सिराः च० सू० अ० ३ । यह क्षोतस शब्द सुश्रुत के योगवाही क्षोतों तथा मुख नासा आदि बहिर्गामी क्षोतों (छिद्रों) से भिन्न है ॥५॥

तासां मूलसिराश्चस्वारिंशत् ; तासां वातवाहिन्यो दश, पित्तवाहिन्यो दश, कफवाहिन्यो दश, दश रक्तवाहिन्यः । तासां तु वातवाहिनीनां वातस्थानगतानां पञ्चसप्ततिशतं भवति, तावत्य एव पित्तवाहिन्यः पित्तस्थाने, कफवाहिन्यश्च कफस्थाने, रक्तवाहिन्यश्च यकृतप्लीहोः, एवमेतानि सप्त सिराशतानि ॥६॥

इनमें मूल सिराएँ चालीस हैं । इनमें दस सिराएँ वातवहा, दस पित्तवहा, दस कफवहा और दस रक्तवहा हैं । वायु को ले जानेवाली और वायु के स्थानों में पहुँची सिराएँ एक सौ पच्चीस (१७५) हैं । इतनी ही पित्त स्थान में रहनेवाली, पित्त को ले जानेवाली, इतनी ही कफ स्थान गत और कफ को ले जानेवाली, इतनी ही रक्त को ले जानेवाली—रक्त के स्थान यकृत, प्लीहा में रहनेवाली सिराएँ हैं । इस प्रकार से सात सौ सिराएँ हैं ।

वि० मन्तव्य—मूल अर्थात् मुख्य या वर्णन करने योग्य सिरा ४० हैं । वायु के स्थान हैं—नाभि (प्राण का) ‘उदानवायोः’ आधारः फुफ्फुस प्रोध्यते बुधैः । आमपक्वाशयमध्यवरः समानः, मलाशयचरः अपानः । सर्वशरीरचरो व्यानः’ दे० नि० अ० १ । वैसे तो वायु एक ही है, परन्तु स्थान नाम आदि भेद से प्रकार का माना जाता है । पित्त के स्थान—अग्न्याशय, यकृत एवं प्लीहा, हृदय नेत्र तथा त्वचा । कफ के स्थान—आमशय, हृदय, कण्ठ, शिरस् तथा सन्धियाँ । अथवा—वातस्थान—वाताशय, पित्तस्थान—पित्ताशय, कफस्थान—श्लेष्माशय (दे० शा० अ० ५ सू० ७) । इन अवयवों का उपस्नेहन—सिक्शन—सन्तर्पण करनेवाली है । उक्त सिराओं में १०—१० एवं १० × ४ = ४० ॥६॥

तत्र वातवाहिन्यः सिरा एकस्मिन् सकृन् पञ्चविंशतिः, एतेनैतरसकथ बाहू च व्याख्याती, विशिष्यतस्तु कोष्ठे चतुर्बिंशत्, तासां गुदमेदाश्रिताः श्रेण्यामष्टौ, द्वे पार्श्वयोः, षट् पृष्ठे, तावत्य एवोदरे, दश वक्षसि ।

अ० ७ ]

गारीरस्थानम्

३२५

एकचत्वारिंशच्चतुष्ण ऊर्ध्वं, तासां चतुर्दश श्रीवायां, कर्ण- योश्चतस्रः, नव जिह्वायां, षण् नासिकायां, अष्टौ नेत्रयोः, एवमेतत् पञ्चसप्ततिसप्तं वातवाहिनीनां सिराणां न्या- ख्यातं भवति । एष एव विभागः शेषाणामपि । विशेष- तस्तु पित्तवाहिन्यो नेत्रयोर्दश, कर्णयोर्द्वे, एवं रक्तवहाः कफवहाश्च । एवमेतानि सप्त शिरागतानि सविभागानि न्याख्यातानि ॥७॥

एक दृग्ग में वातवाही सिरायाँ पञ्चौस हैं । इतनी ही दूसरी दृग्ग और बाहुओं में समझना । विशेष भेदकोष्ठ में चौतीस सिरायाँ हैं, इनमें आठ सिरायाँ गुदा और मेहन का आश्रय करके श्रोणी में रहती हैं । पाश्वों में दो-दो, पीठ में छै, उदर में भी छै वक्षस्थल में दश । ज्वर से ऊपर इकतालीस सिरायाँ हैं । इनमें से श्रीवा में चौदह, कान में चार, जिह्वा में नौ, नासिका में छै, नेत्रों में आठ । इस तरह वातवाही एक सौ पचहत्तर सिरायाँ कह दीं । इसी प्रकार से शेष सिराओं का विभाग है । केवल भेद इतना है, कि—नेत्रों में पित्तवाहिनी दस हैं, कानों में दो हैं । इसी प्रकार रक्तवहा और कफवहा हैं । इस प्रकार से ये सात सौ सिरायाँ विभाग के साथ कह दीं हैं ।

वि० मन्तव्य—नेत्र तेजस् विशिष्ट स्थान है, अतः उसके वर्द्धनार्थ पित्तवाहिनी दो सिरा अधिक हैं, रक्त-धातु-पित्तमय होता है, अतः रक्तवाहिनी सिरा दो अधिक हैं और पित्त एवं रक्त के शमनार्थ कफवाहिनी सिरा भी दो अधिक हैं । और पित्तवाहिनी, रक्तवाहिनी तथा कफवाहिनी सिरा दो दो ही हैं जब कि कर्ण में वात वाहिनी सिरा चार हैं, क्योंकि— कर्ण शब्दवह स्रोत है और वायु शब्दवह है ॥७॥

भवन्ति चात्र—

क्रियाणामप्रतीघातसमोहं बुद्धिकर्मणाम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाः सिराः पवनश्चरन् ॥८॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः सिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसंभवाः ॥९॥ आजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् । ससर्पन् स्वाः सिराः पित्तं कुर्पोच्चान्यान् गुणानपि । यदा प्रकुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः सिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते पित्तसंभवाः ॥११॥ स्नेहमन्नेषु सन्धीनां स्थैर्यं वलमुर्द्धणताम् । करोत्यन्यान् गुणांश्चापि वृत्तासः स्वाः सिराश्चरन् ॥ यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः प्रतिपद्यते । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसंभवाः ॥१३॥ धातूनां पूर्णं वर्णं स्पश्रंज्ञानमसंशयम् । स्वाः सिराः संचरद्भक्तं कुर्पोच्चान्यान् गुणानपि ॥१४॥ यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः सिराः । तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसंभवाः ॥१५॥

इसमें श्लोक भी हैं—अपनी सिराओं में गति करता हुआ वायु क्रियाओं में किसी प्रकार को रुकावट को उत्पन्न नहीं करता बुद्धि के कर्मों में मोह ( अज्ञान ) उत्पन्न नहीं करता, अन्य गुणों ( प्रसर्दन, उद्वहन, पूरण आदि ) भी करता है । कुपित हुआ वायु जब अपनी सिराओं में गति करता है, तब वातजन्य नाना प्रकार के रोग मनुष्य को होते हैं । पित्त अपनी सिराओं में गति करता हुआ आजिष्णुता ( कान्ति ), अन्न में रुचि, अग्नि की प्रदीप्ति, नीरोगता उत्पन्न करता है । कुपित हुआ पित्त जब अपनी सिराओं में जाता है, तब पित्तजन्य नाना प्रकार के रोग मनुष्य को होते हैं । अपनी सिराओं में गति करता हुआ कफ अंगों में स्निग्धता, सन्धियों में स्थिरता, प्रबल बल और दूसरे भी गुणों को उत्पन्न करता है । जब कुपित कफ अपनी सिराओं में गति करता है तब कफजन्य नाना रोग मनुष्य को होते हैं । अपनी सिराओं में चलता हुआ रक्त धातुओं को भरना, वर्ण ( कान्ति ), संशय रहित स्पश्रंज्ञान और अन्य गुणों को उत्पन्न करता है । और जब कुपित रक्त अपनी सिराओं में फिरता है, तब रक्तजन्य नाना रोग उत्पन्न होते हैं ।

वक्तव्य—वायु के कार्य आदि के लिये चरक सूत्रस्थान अध्याय बारह, सुश्रुत० सूत्रस्थान अ० १५ देखें ।

वि० मन्तव्य—जब वायु अपनी सिराओं में ही घूमता है तब वह प्रकृतिस्थ होता है अथवा यों कहिये कि प्रकृतिस्थ वायु अपनी सिराओं में घूमता है—विकृत नहीं । तब तो उसका उन्मार्ग गमन-मार्ग का उल्लंघन करके गमन ध्रुव- निश्चित है, इसी प्रकार पित्त, कफ एवं रक्त को भी समझिये । तात्पर्य यह है कि वायु, पित्त, कफ एवं रक्त जब तक प्रकृतिस्थ रहते हैं तब तक अपनी सिराओं में गति करते हैं । फलतः प्राणी प्रकृतिस्थ स्वस्थ रहता है और जब वे अपनी सिराओं का उन्मार्गगमन करते हैं तब प्राणी अस्वस्थ हो जाता है और उन्मार्गगमन तभी करते हैं जब विकृत हो जाते हैं ॥८-१५॥

न हि वातं सिराः काश्चिन्न पित्तं केवलं तथा ।

श्लेष्माणं वा वहन्त्येता अतः सर्ववहाः स्मृता ॥१६॥

कोई भी सिरा अकेली न तो वायु का, न पित्त का, न कफ का अकेला वाहन करती है, अपितु सब सिराओं का वहन करती हैं । इसलिये इनको सर्ववहा कहते हैं ।

वि० मन्तव्य— वास्तव में सब सिरा सर्ववहा हैं अर्थात् प्रत्येक सिरा वात, पित्त, कफ एवं रक्त की वहा होती है । आहार पांचभौतिक होता है । उसका रस भी पाञ्चभौतिक होता है वही रस रक्त में मिलता है और रक्त पित्त द्वारा रंगा जाने पर रक्त कहलाता है और रक्त वहन उक्त सिरा करती हैं, तात्पर्य है कि—वात-पित्त-कफमय रक्त होता है,

३३६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

तथापि वातस्थानों में वात, पित्तस्थानों में पित्त, कफस्थानों में कफ तथा रक्तस्थानों में रक्त का वहन विशेष रूप से होता है, अतः वातवहा आदि कहना उचित ही है । अर्थात् सर्ववहा होने पर भी उक्त नामकरण किया जाता है ॥१६॥

प्रदुष्टानां हि दोषाणां मूच्छितानां प्रधावताम् ।

ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः ॥१७॥

दुषित होकर दौड़नेवाले दोष परस्पर मिलकर अपने स्थान या मार्ग को छोड़कर गलत मार्ग में जरूर जाते हैं । इसलिये सब सिरायें सर्ववहा कही जाती हैं ।

वि० मन्तव्य—प्रदुष्ट दोषों का उन्मार्ग गमन होने से ही रोग उत्पन्न हो जाते हैं, प्रदुष्ट होकर वे परस्पर मिल भी जाते हैं और वे लगाम बोड़ा के समान प्रधावतां—दौड़ने लगते हैं और वायु पीड़ा आदि, पित्त—दाह आदि तथा कफ कण्डू आदि और रक्त-कुष्ठ आदि रक्तज रोगों को उत्पन्न कर देता है और सिरावेध (देखिये अ० ८) द्वारा तथा जलोत्का आदि (दे० सू० अ० १३) द्वारा रक्त अर्थात् वात पित्त कफ मय रक्त निकाल देने से उक्त रोग शान्त हो जाते हैं । अतएव “सिराव्यधः चिकित्सायै” (शा० अ० ८-२३) कहकर सिरावेध अर्थात् रक्तस्त्रावण का महत्त्व बतलाया गया है सब है कि रक्तस्त्रावण को दृष्टि में रखकर यह सब कथा कही गई है ॥१७॥

तत्रारुणा वातवहाः पूर्णन्ते वायुना सिराः ।

पित्तादुष्णाश्च नीलाश्च, जीता गौर्यः स्थिराः कफात् ।

अस्मृगृह्णातु रोहिण्यः सिरा नात्युष्णजीतलाः ॥१८॥

इनमें वातवहा सिरायें अरुण वर्ण की, और वायु से भरी रहती हैं । पित्त से सिरायें नीली और उष्ण होती हैं, कफ से शीतल, स्थिर और श्वेत वर्ण की होती है । रक्त को वहन करनेवाली रोहिणी (गहरे लाल रंग की) रंग की तथा न बहुत उष्ण और न बहुत शीतल होती है ।

वक्तव्य—रक्त अनुष्णशीत है, यथा—“अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः । शोणितं गुरुं विषं स्याद् विदाहश्चास्य पित्तवत् ॥” सुश्रुत० ।

वि० मन्तव्य—इन लक्षणों द्वारा चतुर चिकित्सक सिराओं को देखकर वायु आदि की अधिकता का अनुभव कर सकता है और जब वे वातपूर्ण हो जाती हैं तब अरुण कालापन लिये (लाल) पित्त से नीली तथा कफ से श्वेत हो जाती हैं । फलतः शरीर का वर्ण भी अरुण, पीत या नील तथा श्वेत हो जाता है ॥१८॥

अत ऊर्ध्वं प्रपद्यामि न विधेय्याः सिरा भिषक् ।

वैकल्प्यं मरणं चापि न्यधात्तासां ध्रुवं भवेत् ॥१९॥

गिराशतानि चत्वारि विधाच्छाखासु बुद्धिमान् ।

षट्त्रिंशच्च शतं कोष्ठे चतुःषष्ठं च मूर्धनि ॥२०॥

शाखासु षोडश सिरा कोष्ठे द्वात्रिंशदेव तु ।

पञ्चाशजत्रजत्रुणश्चोर्ध्वमव्यध्याः परिकीर्तिताः ॥२१॥

इसके आगे उन सिराओं को कहूँगा—जिनका कि वेधन वैध को नहीं करना चाहिये । क्योंकि उन अवैध सिराओं का वेधन करने से विकृतता या मृत्यु निश्चित है । शाखाओं में चारसौ, कोष्ठ में एक सौ छत्तीस, शिर में एक सौ चौसठ (१६४) सिरायें हैं । इनमें से शाखाओं में सोलह, कोष्ठ में बत्तीस और शिर में पचास सिरायें अवैध कही हैं ।

वि० मन्तव्य—जिन सिराओं के वेधन का निषेध किया गया है, वे सब मर्म स्थान गत हैं अथवा उनके समीपगत हैं देखिये शा० अ० ६ में प्रत्येक मर्म का निर्दिष्ट स्थल और उनके नाम । सिरावेध अवश्य करना चाहिये, उससे मानव की व्याधियों की लगभग आधी चिकित्सा हो जाती है, परन्तु वेध करते समय उक्त स्थानों की सिराओं का वेध नहीं करना चाहिये अर्थात् उनको बचाकर अन्यत्र वेध करना चाहिये यही उसका तात्पर्य है । वेध निषेध के हेतु १—धमन होने के कारण क्षत का सन्धान होने में कठिनाई होती है, २—रक्त का स्त्रावण बहुत वेग के साथ होता है, ३—उक्त स्थान मर्मस्थल है अथवा मर्म के समीपस्थ हैं । इन १६, ३२, ५०×६८ सिराओं का रक्तस्त्रावण के लिये वेध नहीं करना चाहिये और उक्त स्थानों पर छेदन भेदन आदि शस्त्रकर्म करते समय उन सिराओं को कटने से बचाना चाहिये । वहाँ पर अभिनकर्म तथा शस्त्रकर्म का प्रयोग भी नहीं करना चाहिये (देखिये अ० ६ का श्लोक ४१) ॥२१॥

तत्र सिराशतमेकस्मिन् सविधन भवति, तासां जलधरा स्वेका, तिस्रश्चाभ्यन्तराः—तत्रोर्वीमंजो द्वे, लोहिताक्षसंज्ञा चैका, तास्त्वव्यध्याः, एतेनैतरसकिय बाहू च व्याख्याती, एवमशस्त्रकृत्याः षोडश शाखासु । द्वात्रिंशच्चोण्यां, तासामष्टावज्रशकृत्याः—द्वे द्वे विटपयोः, कटीकतरुणयोश्च, अष्टावष्टावैकैकस्मिन् पार्श्वं, तासामैकैकामूर्ध्वगां परिहरेत्, पार्श्वसन्धिगते च द्वे, चतस्रो विजतिश्च पृष्ठं षष्ठवज्रमुभयतः, तासामूर्ध्वगामिन्यौ द्वे द्वे परिहरेद्द्वतीसिरे, तावत्य एवोदरे तासां मेदोपरि रोमराजोमुभयतो द्वे द्वे परिहरेत् ; चत्वारिशद्दक्षिं तासां चतुर्दशाश्वकृत्याः—हृदये द्वे, द्वे द्वे स्तनमूले, स्तनरोहितापलापस्तम्भेषुभयतोऽष्टौ, एवं द्वात्रिंशद्दशाश्वकृत्याः पृष्ठोदरोऽसु भवन्ति । चतुःषष्ठं सिराशतं जत्रण ऊर्ध्वं भवति, तत्र षट्पञ्चाशच्चिरोधरायां, तासामष्टौ चतस्रश्च मर्मसंज्ञाः परिहरेत्, द्वे कुक्राटिकयोः, द्वे विधुरयोः, एवं त्रीवायां षोडशाव्यध्याः, हन्वोरुभयतोऽष्टावष्टौ, तासां सन्धिधमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत्, षट्त्रिंशच्चिद्वायां, तु सन्धिधमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत्, वामवहे च द्वे, तासामधः षोडशाश्वकृत्याः, रसवहे द्वे, वामवहे च द्वे, द्विद्वीदश नासायां, तासामोपनासिक्यश्चतस्रः परिहरेत् ।

अ. ८ ] ४३

शारीरस्थानम्

३३७

तासमेव च तालुयेकां श्रुवातुहेशे, अष्टत्रिशदुभयोनेत्रयोः, तासमेकैकैकामपाङ्कयोः परिहरेत, कर्णयोर्दण्ड, तासां श्रुद्वा-वाहिनीमेकैकां परिहरेत, तासानेत्रगतस्तत् ललाटे षष्टिः, तासां केगान्तातुगताश्चतस्रः, आवर्त्योरेकैका, स्थपन्यां चैकां परिहर्तव्या, शंखयोर्दण्ड, तासां शंखसन्धिगतामेकैकां परिहरेत, द्वादश मूर्धनि, तासामुत्क्षेपयोर्द्वि परिहरेत, कृत्याः पञ्चागजज्युग ऊर्ध्वमिति ॥२२॥

प्रत्येक टांग में एक सौ सिरायेँ हैं, उनमें से जालधरा सिरा और अन्दर की ओर तीन सिरायेँ (दो-उर्वी और लोहितस्र) वे अवैध हैं। इसी तरह दूसरे पैर और बाहुओं की सिरायेँ समझना। इस तरह सब शाखाओं में सोलह सिरायेँ अवैध हैं। (जालधरा सिरातल हृदय मर्म में रहती है)।

श्रोणि में बत्तीस सिरायेँ हैं। इनमें आठ सिरायेँ अवैध हैं, विट्पमर्मी में दो-दो। एक एक पार्श्व में आठ सिरायेँ रहती हैं। उनमें ऊपर जानेवाली एक एक सिरा को बचाना चाहिये। पार्श्व सन्धगत दो सिराओं को भी बचाना चाहिये। पृष्ठ में पृष्ठवंश के दोनों ओर २४ सिरायेँ हैं। उनमें ऊपर जानेवाली बूढ़ी नामक दो सिरायेँ बचानी चाहिये। उदर में भी चौबीस सिरायेँ हैं। इनमें से मूत्रेन्द्रिय के ऊपर, रोमराजी के दोनों आर दो दो सिराओं को बचाना चाहिये। वक्षस्थल में चालिस सिरायेँ हैं, उनमें से चौदह सिरायेँ शस्त्र कर्म में अयोग्य हैं। यथा—हृदय तथा स्तनमूल में दो-दो, स्तन रोहित में दो-दो अपलाप और अपस्तम्भ दोनों ओर एक एक, इस प्रकार आठ सिरायेँ अवैध हैं। इस तरह पीठ, पेट, छाती में बत्तीस सिरा अवैध हैं।

जन्तु के ऊपर के भाग में एक सौ चौसठ सिरायेँ हैं, श्रीवा में ५६ सिरायेँ हैं। उनमें से १२ मर्म संज्ञक सिरायेँ, दो कुक्का-दिका, दो विधुर, इस प्रकार श्रीवा में सोलह सिरायेँ बचानी चाहिये। हनुके दोनों ओर आठ आठ सिरायेँ हैं, उनमें सन्धि में रहनेवाली दो-दो धूमनियाँ छोड़नी चाहिये। जिह्वा में ३६ सिरायेँ हैं। इनमें से सोलह जिह्वा के नीचे होती हैं, इनमें दो रसवहा और दो वागवहा सिरायेँ शस्त्रकर्म में बचानी चाहिये। नासिका में २४ सिरायेँ हैं, इनमें से नाक के पास की चार सिरायेँ बचानी चाहिये। तालु के मुहु देश में की एक सिरा को भी बचाना चाहिये। दोनों नेत्रों में अङ्गुलीस सिरायेँ हैं। इसमें से अपांओं की एक एक सिरा को बचाना चाहिये। कानों में दस सिरायेँ हैं—इनमें से एक एक शब्दवाहिनी सिरा को बचाना चाहिये। नासिका और नेत्र गत ललाट में साठ सिरायेँ हैं, इनमें से केशान्तों में जानेवाली चार, आवर्चमर्मा

में एक एक, स्थपनी में एक, कुल सात सिरायेँ बचानी चाहिये। शंखों में दस सिरायेँ हैं, उनमें से शंख सन्धि की एक एक सिरा को बचाना चाहिये। शिर में बारह सिरायेँ हैं—इनमें से उत्क्षेप मर्म में दो, सीमन्तो की पांच, अधिपति में से एक सिरा को बचाना चाहिये। इस प्रकार से पचास सिरायेँ जन्तु के ऊपर अवैध हैं ॥२२॥

भवति चात्र—

व्याप्नुवन्त्यभिने देहं नाभितः प्रमृताः सिराः।

प्रतानाः पद्मिनोक्न्ददाद् विसादीनां तथा जलम् ॥२३॥

इसमें श्लोक भी है—जिस प्रकार पद्मिनी कन्द से निकले विष आदि के प्रतान जल में फैले रहते हैं, उसी प्रकार नाभि से निकली सिराओं के प्रतान इस सारे शरीर में फैले हुए हैं ॥

इति शुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सिरावणविभक्तिशारीरं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥

अष्टमोऽध्यायः

अथातः सिरान्यधविधि शारीरं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे 'सिरान्यध' विधि शारीर का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—सिराका व्यध या वेधन सिरान्यध कहलाता है। रोग शान्ति के लिये सिरावेध किया जाता है, जब रुक्—रुजा—रोग का हेतु वातादि से दूषित रक्त होता है तब सिरा वेध आवश्यक है। यूनानी चिकित्सा करने वाले भारतीय चिकित्सक प्रायः सिरा वेध करते हैं। पञ्जाब-जहाँ रक्तसार मानव अधिक हैं—में सिरावेध किया जाता है। च० सू० अ० २४ में लिखा है कि—शीतोष्णस्निग्धरूक्षधैः उपक्रान्ताश्च ये गंदाः। सम्यक्साध्या न सिध्यन्ति रक्तजान् तान् विमावयेत् ॥ अर्थात् जो रोग—शीत, उष्ण, स्निग्ध एवं रूक्ष आदि द्रव्यों द्वारा चिकित्सा करने पर सुखसाध्य रोग भी शान्त नहीं होते उनको रक्तज रोग समझना चाहिये। देखा गया है कि जीर्ण ज्वर आदि में अनेक चिकित्साओं के असफल होने पर सिरा वेध से आरोग्य लाभ हुआ। वातादि द्वारा रक्त दूषित होने पर शारीरिक ही नहीं मानसिक रोग भी हो जाते हैं, अतः उन्माद, अपस्मार, मद, मोह, मूर्च्छा, उद्वेग, महागद, अभिन्यास, हृदयद्रव (जडकन) आदि अनेक रोग हो जाते हैं। उनकी शान्ति के लिये भी सिरावेध का स्मरण कर लेना अच्छा है। जलौका, सिंगी एवं पन्क्ष से एकदेशीय रोग की शान्ति होती है, परन्तु बिना सर्वाङ्ग शोधिनी है। कुष्ठ के प्रारम्भ में यदि

३२८

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ८ ]

बार २ सिरा बेध किया जाय तो बहुत लाभ हो। परन्तु खेद है कि कोई चिकित्सक इधर ध्यान ही नहीं देता। सु० सू० अ० १४ के श्लो० ३३ तथा ३४ में कहा गया है कि—रक्त का समीचीन विद्यावण हो जाने पर शरीर में लघुता, वेदना की शान्ति, व्याधि के वेग का परिक्ष्य तथा मन्स का प्रसाद (प्रसन्नता-निर्दोषता) हो जाता है और कुछ आदि स्वर्गदोष, मन्त्रियार्थ, व्रणशोथ तथा अन्य सब रक्तविकार कभी नहीं होते ॥

बालस्थविररुक्षक्षतक्षीणभीरूपरिश्रान्तमद्यपाध्वस्त्रीक-शितवमित्रविरिक्तास्थापितानुवासितजागरितकलोबकुगग-भिणोनां कासश्वासजोषप्रवृद्धश्चराक्षपक्षपाघातोपवासपि-पासामूर्च्छाप्रपीडिनां च सिरां न विध्येत, यश्चाव्यध्याः, न्यध्याश्चाष्टाः, ष्टाश्चायन्त्रिताः, यन्त्रितश्चानुस्थिता इति ॥३॥

निम्न अवस्थाओं में सिराबेध न करे—बालक, बृद्ध, रूक्ष, उग्रक्षतः से क्षीण, डरपोक, थका हुआ, मद्य पीनेवाला, यात्री; एवं स्त्री के सेवन से कुश, वमन, विरेचन आस्थापन-अनुवासन दिये, रात में जागरण किया, नपुंसक, कुश, गर्भवती, कास, श्वास, शोष, तीव्रस्वर, आन्धेपक, पक्षाघात, उपवास, प्यास, मूर्च्छा से पीड़ित अवस्थाओं में वैद्य सिरा का वेधन न करे। अवेध्य शिराओं में भी वेधन न करे। वेधन योग्य सिरा यदि दिखाई न दें, तो उसमें भी वेधन न करे। देखने पर भी यदि सिरा को बाँधा नहीं गया, तो भी वेधन न करे। बाँधने पर भी यदि सिरा ऊपर को न उभरें, तो भी वेधन न करे।

वक्तव्य—सिरा में इजैक्षण देने के लिए जो विधि बरती जाती है, वही विधि सिरा बेध की है। प्रायः करके कोहनी के जरा नीचे सिरा (त्रैक्रियल वेन) का वेधन करते हैं। इसमें सिरा का वेधन करने के लिये पहले सिरा को ऊँचा उभारना आवश्यक है। इसके लिये बाहुपर कसकर पट्टी, रवड़ की नली, या दूसरी तरह से दबाव देते हैं। जिससे रक्त का ऊपर जाना जरा देर के लिये रुक जाये। रक्त न जाने से सिरा में रक्त रुकने से सिरा फूल आती है। फूलने पर उभर आती है। अब इसका वेधन किया जाता है ॥३॥

शोणितावसेकसाध्याश्च ये विकाराः प्रागभिहित्वा स्तेषु चापक्वेध्वन्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं च सिरां विध्येत् ॥४॥

रक्त मोक्षण से अच्छे होनेवाले रोग पहले सूत्रस्थान अध्याय चौदह में कह दिये हैं, उन रोगों में तथा रक्त मोक्षण से ठीक होनेवाले जो रोग वहाँ नहीं कहे (जैसे गुरुत्व, प्लीहा आदि), उनमें एवं रोगों की अपकावस्था में (रक्त मोक्षण साध्य

रोगों की), अभ्यास के अनुसार (जिस शिरा का वैद्य वेधन करते हैं) जैसा न्याय (उचित) हो, वैद्य उस प्रकार सिरा का वेधन करे। (यथाभ्यासमिति यथासमीपमिति—डल्हणः) ॥४॥

प्रतिषिद्धानामपि च विषोपसर्गं आत्ययिके च सिरा-न्यधनमप्रतिषिद्धम् ॥५॥

जिन लोगों के लिये सिराबेध का निषेध किया है, उनमें भी विष के उपद्रव होने पर तथा आत्ययिक रोग (विनाशक रोग-विद्रधि, अन्तः विद्रधि आदि) होने पर सिरा वेधन करना चाहिये ॥५॥

तत्र सिन्धस्विन्नमातुरं यथादोषप्रत्यतीकं द्रवप्राय-मन्तं भुक्तवन्तं यवाम् पातवन्तं वा यथाकालमुपस्थाप्या-सीनं स्थितं वा प्राणान्बाधमानो वस्त्रपट्टचमोन्तवर्त्तकल-लतानामन्यतमेन यन्त्रयित्वा नातिगाढं नातिश्रिथिलं शरीरप्रदेगमासाद्य प्राप्ते शास्त्रमादाय सिरां विध्येत् ॥६॥

रोगी को स्नेहन देकर दोष के विपरीत पतला सा अन्न पिलाकर अथवा यवाम् पिलाकर योग्य काल में अपने समीप बिठाकर या खड़ा करके, जीवन में जिससे हानि न हो, ऐसे वस्त्र पट्ट, चर्म, अन्तवर्त्तकल, लतादि किसी वस्तु से बाँधकर बहुत कड़ा या बहुत ढीला न हो, ऐसे ढंग से शरीर के उस भाग में यथोक्त शस्त्र से शिरा का बेध करे ॥६॥

नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाग्निरे ।

सिराणां न्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ॥ ७ ॥

बहुत शीतकाल में या अधिक गरमी में, जोर से चलती वायु में, आकाश के मेघान्छन्न होने पर, तथा बिना किसी रोग के सिरा का वेधन न करे।

वि० मन्तव्य—रक्तक्षायण भी वमन विरेचन के समान शोधन कर्म है, अतः वमन विरेचन के समान देश काल आदि का विचार कर लेना चाहिये। एतदर्थ—सूत्रस्थान का अध्याय १२ तथा अध्याय १६ और चिकित्सा स्थान का अ० ३३ आदि अवश्य देख लेना चाहिये। अरोगे वा कदाचन—का तात्पर्य है कि अरोग-आरोग्य म भी कभी २ रक्तक्षाय कराना चाहिये, यथा वमन विरेचनात्मक संशोधन किया जाता है—शीतोद्भव दोषचय वसन्ते विशोधयन् ग्रीष्मजमभ्रकाले। घनोत्पत्ये वाषिक् माशु सम्यक् प्राप्नोति रोगान् क्लुप्तान् न जातु ॥ इन्हीं समयों में सिराबेध भी किया जाता है और आत्ययिक दशा में जब भी आवश्यक हो तभी रक्त क्षायण कर देना चाहिये, परन्तु तदनु-कूल व्यवस्था करके। जैसा कि १० वें श्लोक में कहा गया है—सिराबेध करते समय सु० सू० अ० १४ के पाठ-२१ से ४५ अवश्य देखिये और आवश्यकतानुसार तदनुसार कार्य-कौजिये ॥