भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ६ ]

शारीरस्थानम्

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ध्यान अंगुली द्वारा जाने जाते हैं। इन पर अंगुली का दबाव डालने से बोलो नहीं जा सकता, मूकता हो जाती है। इनके सम्बन्ध में चरक २० स्था० अ० ३४-६ में चर्चा की गई है, यथा-तस्य चेतु मन्त्रे परिमृश्यमाने (स्पृश्यमाने) न स्पन्दयेता (फड़कन प्रतीत न हो) परासुः (मृतः) इति विद्यात् (जाने)। मातृका नामक मर्म—ये सिरा मर्म हैं—ये चार हैं, दोनों ओर दो दो। यह शिर की ओर से लौटनेवाली सिरा हैं। मातृका—माता के समान पालिका। कुक्राटिका—यह सन्धि मर्म है—शिर एवं शीर्ष की अस्थियों का सन्धान स्थल है। पुष्पवंश के शिखर पर जहाँ शिर धरा हुआ है वह स्थल है, इसी भाग को 'शिरोधरा' कहा जाता है। यहाँ आनेवाली दो सिरा हैं (दो सिरासन्निपात हैं) जो अगले अध्याय आठ में सू० २२ में 'द्वे कुक्राटिकयोः' कहकर अवैध कही हैं। विधुर नामक मर्म—दोनों कानों के नीचे स्थित हैं। ये स्नायु मय मर्म हैं, यह शुषिर स्नायु है, जो धमनी कहा जाता है और वाग्भट ने इसे 'धमनी मर्म' माना भी है और सुश्रुत ने भी अ० ७ सू० २२ में इनको अवैध सिरा माना है। ये कानों का तर्पण करती हैं। इन्हीं दो को अ० ६ सू० ५ में शब्द का ग्रहण करनेवाली दो धमनियाँ माना है। फणा नामक मर्म—ये भी सिरा मर्म हैं, नासिका के दोनों छोटों के भीतरी भाग में समृद्ध है, सर्प के फन के समान प्रसार संकोच युक्त दृश्यमान नासापुटों के अन्दर की ओर लगे हैं। इनको मु० शा० अ० ७ सू० २२ में औपनासिक्यः चतस्रः कहकर अवैध माना है और अ० ६-सू० ५ में गन्ध का ग्रहण करनेवाली धमनी कहा है। इन पर आघात होने से गन्ध का ज्ञान नहीं होता। अपाङ्ग—ये सिरा मर्म हैं, ये अपाङ्ग की वे सिरा (सिरासन्निपात) हैं जो अपाङ्ग की एक एक सिरा अवैध मानी है और रूप का ग्रहण करनेवाली दो 'धमनियाँ' मानी हैं (पताफणावाला)। ये नेत्र का तर्पण करने तथा रूप का ग्रहण करनेवाली हैं। आवर्त्त—ये सन्धि मर्म हैं, जहाँ भू के बाल उगते हैं। यहाँ रहनेवाली वह सिरा जिस को अवैध माना है। यह भी दृष्टि का तर्पण करती है। शंख नामक मर्म—ये अस्थिमय मर्म हैं, पुटपुटी या पुङ्गुपुडी कहे जाते हैं। यहाँ आनेवाली शंख गता सिरा अवैध मानी गई है, यह आघात होने पर सद्यो-मारक मर्म है। ये भू की पुच्छ के अन्त में स्थित हैं। उत्क्षेप-ये स्नायु मर्म हैं। इस स्थान की सिरा भी अवैध हैं। स्थपनी—यह सिरामर्म है। यहाँ ललाट की दो सिराओं का सन्निपात है। दोनों के संयोग से वह एक हो जाती है, अतः स्थपनी की एक सिरा अवैध मानी है। सीमन्त नामक मर्म—ये सन्धि मर्म

हैं, शिरः कपालों की ५ सन्धियाँ हैं, इनमें से जो सिरा गुजरी हैं वे अवैध मानी हैं और 'सप्त सेविन्यः शिरसि विभक्ताः पञ्च'—अ० ५ का सू० १५ देखिये। चरक सिद्धिस्थान अ० ६ में—शिर पर अभिघात होने से—मन्यास्तम्भ, अदिति, चक्षु-विभ्रम आदि होने का उल्लेख है। शृंगाटक नामक मर्म—शिर के भीतर मस्तिष्क या शिरो मण्डा नामक (मेजा नाम से प्रसिद्ध) अवयव में—वे चार केन्द्र हैं, जहाँ प्राण, श्रोत्र, अक्षि तथा रसना नामक इन्द्रियों का वहन करनेवाली सिराओं के सन्निपात हैं, क्योंकि ये मर्म—सिरा मर्म हैं और अभिघात होने पर सद्योमारक हैं। अभिपति मर्म—यह शिर के भी सबसे ऊपर शिखर पर का मर्म है, इसका सूत्रक शिर पर—बाहर रोमा-वर्त्त (मौरी, बालों का आवर्त्त) होता है। इसमें आनेवाली एक सिरा अवैध मानी गई है। इसके ऊपर की अस्थि में छिद्र रहता है, जो ब्रह्मरन्ध्र कहलाता है, परन्तु यह १ वर्ष व्यतीत होने पर बाल्यावस्था में ही पूर्ण हो जाता है, सद्योजात शिशु के शिर पर हाथ रखने से इसमें सिरा (धमनी) का स्पन्दन (धमन) प्रतीत होता है, अर्थ है—अधिकृत्य पाति रक्षति इति अविपत्तिः, इस अवयव को अधिकृत करके आत्मा शरीर का रक्षण करता है, यही पुराणों का ब्रह्मलोक, वैष्णव पुराणों का विष्णुलोक या वैकुण्ठ तथा शैव पुराणग्रन्थों का शिवलोक या कैलाश है। और गीता का ऊर्ध्वमूल—है, अघःशाख शाख शरीर का ऊपर की ओर वर्त्तमान भी मूल—जड़—जीवन हेतु है। योग-शास्त्र में शिर के पिछले कपाल के अन्दर में स्थित केन्द्र को शिवरन्ध्र माना है, परन्तु यह शैवों का विचार है, वे उसी को जीवन का केन्द्र मानते हैं। इन २३ मर्मों से युक्त समस्त शिर को ही मर्म समझना चाहिये, शिर का पर्याय 'उत्तमाङ्ग' है, उसके लिए भगवान् पुनर्वसु ने लिखा है—'प्राणाः प्राण-भूतां यत्र स्थिताः (श्रिताः) सर्वेन्द्रियाणि च। तदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ॥' और शिरसि इन्द्रियाणि, इन्द्रियप्राण-वहानि च क्षोतांसि—संश्रितानि (चरक सि० अ० ६ सू० ४)। और शिरसि अभिहिते—मन्यास्तम्भ, अदिति चक्षु-विभ्रम, मोह, उद्बेधन, चेधनाश, काम, र्वाप, हनुग्रह, मूकत्व, गद्गदत्व, अक्षिनिमीलन, गण्डस्पन्द, जूमण, लाला-खाव, स्वरहानि, वदनजिह्वादीनि (भवन्ति)। च० सि० अ० ६ सू० ६। चरक में वही लिखा है कि १०७ मर्म होते हैं। उनका पीड़न—अभिहनन होने से प्राणी को बहुत अधिक पीड़ा का (अन्य स्थलों की अपेक्षा अधिक) अनुभव होता है, क्योंकि उन (मर्मों) में प्राणों का विशेषरूप से अनुबन्ध-सम्बन्ध होता है। शाखाश्रित मर्मों की अपेक्षा स्कन्ध अर्थात् अन्तराधि के मर्म विशेष महत्त्व रखते हैं। उनमें भी हृदय, वस्ति तथा शिर (श्रीवा समेत शिर—२३ मर्मों का अवि-