भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380

३२२

सुश्रुतसंहिता

[ ३०१ ]

ज्ञान शिरः) अत्यन्त महत्त्व रखते हैं, क्योंकि समस्त शरीर (उसकी स्थिति) इन्हीं तीनों के अधीन है। शिर का अर्थ श्रीयते इति शिरः, अर्थात् जीवन का आश्रय। मस्तक भी शिर का पर्याय है। यह शब्द 'मसी परिणामे' धातु (दिवादि गणीय) से निष्पन्न होता है। जहाँ प्रत्येक विषय का परिणाम-परिपाक-विनिश्चय होता है ॥२७॥

भवन्ति चार्त्र श्लोकाः—

उत्तमः शिरःसि विटपे च सकक्षपार्वे एकैकमङ्गुलमितं स्तनपूर्वमूलम् । विद्ध्यङ्गुलद्वयमितं मणिबन्धगुल्फं श्रीण्येव जानु सपरं सह कूर्पराभ्याम् ॥२८॥ हृद्बस्तिकचं गुदनाभि वदन्ति मूर्धन चत्वारि पञ्च च गले दश यानि च द्वे । तानि स्वपाणितलकुञ्चितसम्मितानि शेषाण्यवेहि परिविस्तृतोऽङ्गुलार्धम् ॥२९॥

इस विषय में श्लोक भी हैं—उर्वा, कूर्चशिर, विटप, कक्षधर, स्तनमूल ये एक-एक अंगुल परिमित हैं। मणिबन्ध, गुल्फ ये दो-दो अंगुल हैं, दोनों कूर्प तीन अंगुल, हृदय, वस्तिक, कूर्च, गुदा, नामि, शिर के चारों शृङ्गाटक, पांचों सीमन्त, गले के बाहर (दो नीठा, दो मन्या, आठ मातृकायें) ये हथेळी के गड्ढे के बराबर हैं। शेष मर्म आधे अंगुल लम्बे-चौड़े समझने चाहिये।

वि० मन्तव्य—इन पाठों में मर्म स्थलों का परिमाण बतलाया गया है, जिससे शस्त्र प्रयोग में वे स्थल बचाए जा सकें। स्वपाणितलकुञ्चितसम्मितानि—अर्थात् इनमें कुछ पाणितल के परिमित हैं और कुञ्चितपाणि (घुट्टी) परिमित हैं, यथा हृदय ॥२८, २९॥

एतत्प्रमाणमभिबीक्ष्य वदन्ति तज्ज्ञाः अत्रेण कर्मकरणं परिहृत्य कार्यम् । पार्वोभिधातितमर्पह निहन्ति मर्म तस्माद्भि मर्मसदृशं परिवर्जनीयम् ॥३०॥

इस परिमाण को जानकर मर्म बताते हुए शस्त्र कर्म करना चाहिये। क्योंकि मर्मों के पास में भी अभिधात होने पर मनुष्य मर जाता है। इसलिये मर्मस्थान को बचाकर शस्त्र कर्म करना चाहिये ॥३०॥

छिन्नेषु पाणिचरणेषु सिरा नराणां सङ्कोचमोयुरसगुल्फमतो निरेति । प्राप्यासितव्यसन्मुखमतो मनुष्याः मंछिन्नशास्त्रतद्वन्धिनं न यान्ति ॥३१॥

क्षिप्रेषु तत्र सतलेषु हृतेषु रक्तं गच्छत्यनीव पवनश्च रुजं करोति । एवं विनाशमुपयान्ति हि तत्र विद्वा वृक्षा इवायुधनिपातनिकृन्तमूला ॥३२॥

हाथ-पैर के काटने पर मनुष्यों की शिराओं के संकुचित हो जाने से रक्त थोड़ा ही निकलने पाता है, यद्यपि हाथ-पैर के काटने पर मनुष्य मर्यंकर संकट को प्राप्त करता है, तथापि शाखा के कटने पर जैसे वृक्ष नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार मनुष्य की मृत्यु भी नहीं होती। क्षिप्र और तल्लहदय मर्म के वेधन पर रक्त बहुत जाता है, और वायु भी अधिक पीड़ा करती है। इनके वेधन होने पर मनुष्य शस्त्र के आधात से कटे हुये मूलवाले वृक्ष की भाँति मृत्यु को प्राप्त करता है ॥

तस्मात्तयोरभिहतस्य तु पाणिपादं छेत्तव्यमाशु मणिबन्धनगुल्फदेशे मर्माणि शल्यविषयार्थमुदाहरन्ति यस्माच्च मर्मसु हता न भवन्ति सद्यः ॥३३॥ जीवन्ति तत्र यदि वैद्यगुणेन केचि- न्चे प्राप्नुवन्ति विकलत्वमसंशयं हि ।

इसलिये तल्लहदय और क्षिप्र मर्म के वेधन होने पर मनुष्य के हाथ, पैर तुरन्त मणिबन्ध और गुल्फ प्रदेश के ऊपर से काट डालने चाहिये। मर्मों पर चोट लगने से तुरन्त मृत्यु होती है, इसलिये मर्म शल्य शास्त्र का आधार भाग है। यदि किसी योग्य वैद्य की चिकित्सा से कोई बच भी जाता है तो भी वह निश्चित रूप में विकलांग बन जाता है।

वि० मन्तव्य—मणिबन्धनगुल्फदेशे—मणिबन्धन एवं गुल्फ से कुछ ऊपर काटना चाहिये। शल्य विषयार्थ—शल्य शास्त्र का अर्थ—आधा अङ्ग मर्मशान है। अर्थात् मर्मों का शान-शल्यचिकित्सा के लिये परमावश्यक है ॥ ३३ ॥

समिन्नजर्जितकोष्ठशिरः कपाळा जीवन्ति शस्त्रनिहृतेरुच शरीरदेशैः ॥३४॥ छिन्नैरुच सकिथमुजपादकरैरशेषै- यैषां न मर्मसु कृता विविधाः ग्रहाराः ।

कोष्ठ, शिर, कपाल, ये फूटकर भले ही जर्जरित हो जायें, टांग, बाहु पैर और हाथ ये भी सम्पूर्ण कट जायें, शस्त्रों के आधात से सारा शरीर छिन्न भिन्न हो जाये, परन्तु यदि मर्म बचे रहते हैं, तो मनुष्य जीवित रहता है ॥ ३४ ॥

सोममासततेजासि रजःसस्वतमासि च असस प्रायशः पंसा भूतात्मा चावतिष्ठते ॥३५॥ मर्मस्वभिहृतास्तस्मान्न जीवन्ति शरीरिणः ।